‘बचपन में एक गुब्बारा हाथ में थामे एक सड़क पर दौड़ता हुआ जा रहा था। मैं बहुत खुश और मगन था कि गुब्बारा अचानक आवाज के साथ फट गया। मैंने पीछे मुड़कर देखा, सड़क पर काबिले-रहम अंदाज में एक पिचकी हुई रबड़ की एक लिजलिजी-सी चीज पड़ी हुई थी। अब इस उम्र में मुझे यह समझ में आया वह पिचकी हुई चीज दुनिया थी’ – होजे सारामागो
फरवरी माह का यह संपादकीय बसंत पर लिखना तय जैसा था। चूंकि यह प्रेम का महीना था चाहती थी मैं इस बार प्रेम पर लिखना…पर लिख जिस विषय पर रही हूं, वह ‘आत्महत्या’ है।
बसंत और प्रेम दोनों हीं कुछ अर्थों में पर्यायवाची से हैं… बसंत प्रेम का प्रतीकार्थी है। बसंत में मन प्रेममय हुआ चाहता है। अपने-पराये, आकाश-जमीं, पेड़-पौधे और प्रकृति सबके लिए। सबके लिए मन में राग हुआ जाता है….
और हम प्रेम में जब होते हैं तो हर मौसम बसंत का सा हुआ जाता है…
बहुत सुंदर होता है जीवन में प्रेम और बसंत का बने रहना…वो न हो तो…तो फिर जो होता है वो ….
मैं लिखने को उद्यत हुई ही थी कि किसी युवा लड़के की आत्महत्या की खबर सुनने को आई, जो अपने मां-बाप की इकलौती संतान था। पढने में कुशाग्र था, व्यवहारिक था। लोगों से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखता था। दबे मुंह यह सुनने को मिला कि प्रेम में मिली असफलता…
दूसरी खबर ठीक एक दिन पहले पढ़ने को मिली थी। टेलीविजन इंडस्ट्री में अपनी पहचान रखनेवाली एक 22 वर्षीय अभिनेत्री ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि माता-पिता बहुत समय से उसपर विवाह के लिए दबाव डाल रहे थे।
ये दोनों घटनाएं प्रेम और प्रेम पात्र को न पा सकने और मर्जी के विरूद्ध विवाह संस्था में धकेले जाने का परिणाम थीं। प्रेम पर लिखने से मन उसी पल जो हट गया सो हट ही गया, विषय भी तदुनुरूप ही बदल गया…
आत्महत्या : प्रेम, उपेक्षा और अस्तित्व की खाली जगह
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आत्महत्या विश्व स्तर पर मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है और हर वर्ष लाखों लोग इस कारण जीवन खो देते हैं। यह तथ्य बताता है कि यह समस्या व्यक्तिगत कम और सामाजिक-मानसिक अधिक है।
अनचाहे होने के दर्द और चाहे जाने के चाह के बीच ही होती है कोई एक खाली-सी जगह। ख़ुदकुशी वहीं छुपकर बैठी होती है दरअसल। जब कोई नहीं पुकारता तो वह पुकारती है हमें पूरी आत्मीयता और लगाव से। किसी पालतू कुत्ते की तरह हमारे जख्म चाटती है। और लगाव और प्यार के भूखे लोग इस आत्मीयता को फिर गले लगा लेते हैं…ये अपनी जिंदगी की बदशक्लियत से ऊबे और खीजे हुए लोग होते हैं। यह उनका प्रतिरोध होता है इस बदशक्ल दुनिया के खिलाफ …या फिर रूठकर मुँह फेर लेने जैसा कुछ….दरअसल सपनों और यथार्थ के बीच की खाली जगह ही वह स्पेस होती है, जहाँ अक्सर आत्महत्याएं होती या चुनी जाती हैं।
वह दरअसल प्यार और ध्यान पाने की आखिरी नाकामयाब कोशिश होती है। अपने वजूद को चीन्हे जाने की आखिरी तलाश। दुनिया से नाराज किसी व्यक्ति में एक उम्मीद भी दबी होती है कहीं न कहीं…. जो कौंधती है रह रहकर और जिसके आलोक में जिंदगी की विरुपताएं और भद्दी और बुरी दिखती हैं।
ये जिंदगी से हार माननेवाले लोग नहीं, दरअसल जिंदगी को बहुत शिद्दत से चाहनेवाले लोग होते हैं। वे अपनी जिंदगी की बदशक्लियत से ऊबे और खीजे हुए होते हैं। उनके सपनों का संसार बहुत सुन्दर होता है और दुनिया उतनी ही भयावह। यह उनका प्रतिरोध होता है इस बदशक्ल दुनिया के खिलाफ जिसे हम उनकी कायरता घोषित करते हैं।
आत्महत्या वह एकमात्र सूत्र है, जो समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन, धर्म और रहस्यवाद को एक सिरे से जोड़ता है। वह एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं होती। वह समाज, मनोविज्ञान, इतिहास, और मानवीय संवेदनाओं के जटिल ताने-बाने में पनपती एक त्रासदी है। यह मृत्यु से पहले मनुष्य के भीतर घट चुकी अनेक अदृश्य मौतों का अंतिम बिंदु होती है। बाहर से शांत दिखने वाला चेहरा अपने भीतर अक्सर एक ऐसे भूकम्प से गुज़र रहा होता है, जिसकी कंपन किसी को सुनाई नहीं देती। मनोवैज्ञानिक एडविन श्नाइडमैन ने आत्महत्या को ‘असहनीय मानसिक पीड़ा से मुक्ति की कोशिश’ कहा है। यहाँ मृत्यु की इच्छा कम, पीड़ा के अंत की आकांक्षा अधिक होती है।
मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय अध्ययनों ने बार-बार यह संकेत किया है कि आत्महत्या का संकट किसी एक क्षण की उपज नहीं, बल्कि दीर्घकालिक मानसिक, सामाजिक और संरचनात्मक दबावों का संगम होता है। एमिल दुर्खीम ने बहुत पहले स्पष्ट किया था कि जब व्यक्ति और समाज के बीच का संबंध शिथिल हो जाता है, या सामाजिक संरचनाएँ मनुष्य की आकांक्षाओं और वास्तविकताओं के बीच संतुलन नहीं बना पातीं, तब निरर्थकता की अनुभूति गहरी होने लगती है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे ‘मानसिक पीड़ा की असहनीयता’ के रूप में पहचानता है। एक ऐसी स्थिति जहाँ व्यक्ति को अपनी वेदना स्थायी, वह स्वयं को बेकार, और उसे अपना भविष्य निराशाजनक प्रतीत होता है। यह त्रिकोण पीड़ा, अकेलापन और निराशा, आत्मघाती विचारों की उर्वर भूमि बनाता है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आत्महत्या का जटिल यथार्थ
भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो आत्महत्या का संकट और जटिल इसलिए हो उठता है, क्योंकि यहाँ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर मौन, सामाजिक प्रतिष्ठा का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएँ, आर्थिक अस्थिरता और लैंगिक असमानताएँ एक-दूसरे में अथाह रूप से गुंथी हुई हैं।
किसान आत्महत्याओं पर हुए अध्ययन आर्थिक ऋण को केवल वित्तीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और आत्मपहचान के संकट से जुड़ा अनुभव बताते हैं। विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्याएँ केवल परीक्षा-परिणाम का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी संस्कृति, भावनात्मक एकांत और असफलता के प्रति असहिष्णु सामाजिक दृष्टि की ओर संकेत करती हैं। स्त्रियों के मामले में घरेलू हिंसा, भावनात्मक अवहेलना और सामाजिक निर्भरता जैसे कारक अक्सर अदृश्य रहते हैं तो वहीं पुरुषों के संदर्भ में भावनात्मक अभिव्यक्ति पर सांस्कृतिक रोक उन्हें भीतर ही भीतर टूटने देती है।
इस प्रकार कहें तो आत्महत्या का प्रश्न व्यक्तिगत दुर्बलता का नहीं, संरचनात्मक संवेदनहीनता का दर्पण बन जाता है। आत्महत्या व्यक्ति का निर्णय कम और समाज की विफलताओं पर लगा मौन अभियोग अधिक है। दरअसल जो व्यक्ति जीवन छोड़ता है, वह मरना नहीं चाहता। वह उस परिस्थिति से निकलना चाहता है जिसमें उसे जीना असंभव लग रहा है। इसलिए चर्चा ‘किसी ने क्यों आत्महत्या की?’ पर नहीं, इस बात पर होनी चाहिए कि ‘हम उसे जीने लायक दुनिया क्यों नहीं दे पाए?’
साहित्य में ‘आत्महत्या’ : पीड़ा का मानवीय दस्तावेज
साहित्य में आत्महत्या की ऊपरी तौर पर जो वकालत करती दिखनेवाली बहुत सारी किताबें हैं, उनमें जिस दो की मैं यहां विशेष रूप से चर्चा करना चाहूंगी उनमें पहला नाम है ‘ मैंने मांडू नहीं देखा’ ( स्वदेश दीपक) का। दूसरी किताब है- ‘मौत की किताब’ (खालिद जावेद)।
पहली किताब पर आने से पहले यह एक बात साफ करनी है कि आलोचकों का यह कहना था कि आत्महत्या और हत्या स्वदेश दीपक के कहानी के पात्रों की अंतिम परिणति हैं। उनके बारे में यह भी कहा जाता था कि लेखक अपनी हर रचना में अपने पात्रों के साथ भरी हुई बंदूक लेकर चलता है। आलोचकों की राय थी कि उनकी कहानियों का दुखांत होना किसी रूढ़ि की तरह तय होता है। उनके आत्मकथात्मक संस्मरणों पर आधारित किताब ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ में आत्मा और मस्तिष्क के डार्करूम को खंगालने वाली इस किताब के अध्यायों के शीर्षक भी बहुत ही सम्मोहक हैं– ‘घूमते अंधेरे सा पतझड़’, ‘मरना भी एक कला है’, ‘मेरा अंत ही मेरी शुरुआत है’, ‘आपने कितने खून किये हैं स्वदेश दीपक’। यही नहीं, इस किताब में सिल्विया प्लेथ भी हैं, विलियम फॉकनर भी और खुद स्वदेश दीपक भी। यहाँ एक मायाविनी है, जो उन्हें जीवन की ओर मुड़ने नहीं देती और एक स्वदेश दीपक भी, जो हर हाल खुद को मरने नहीं देता।
हिंदी में अब तक ऐसी कोई किताब नहीं थी, जिसमें अपने ही मनोरोगों को इतनी तटस्थता और दूरी बरतते हुए कभी एक पात्र की तरह देखा जाए और कभी एक भुक्तभोगी की तरह। किताब की शक्ल में आने से पूर्व यह संस्मरण कथादेश में धारावाहिक रूप से ‘खंडित जीवन के कोलाज’ नाम से प्रकाशित होते वक्त ही अपने अनोखेपन की वजह से धूम मचा चुका था। कई मनोरोग विशेषज्ञों ने तो इसे मानसिक रोगों के अध्ययन का एक जरूरी दस्तावेज भी माना। लेकिन इसके लिखे जाने की दास्तान भी बहुत दिलचस्प है। अपने गायब होने से पूर्व जब एक दौर में लग रहा था कि वे स्वस्थ हो रहे हैं, निर्मल वर्मा ने उनसे कहा कि तुम अपने इन अनुभवों को संस्मरण का रूप दो और उनके ही अनुरोध पर इस किताब की शुरुआत हुई। लेकिन इस किताब के मर्मांतक प्रभाव को देखते हुए उन्होंने ही उनसे खत लिखकर कहा कि अब बस करो। तुम्हारे जीवित और स्वस्थ रहने के लिए इस श्रृंखला का कब बंद होना जरूरी है।
मांडू की ही तर्ज पर ‘ मौत की किताब’ भी अपने बहुत छोटे से कलेवर के बावजूद क्लासिक की श्रेणी में रखे जाने का माद्दा रखती है। इसकी कहानी ऊपरी तौर पर दिमागी रूप से एक अस्वस्थ व्यक्ति की कथा है जिसे पागलखाना पाठशाला दिखती है और दुनिया ‘बेहोश इंसानों के लिए बनी हुई एक बेमतलब की जगह’। खुदकुशी हमेशा जिसके अगल-बगल आसपास या फिर जूते में छिपी बैठी रहती है। उसे उकसाती है। नायक के अनुसार वह उसकी हमजाद है और वह इस दुनिया में उसके साथ ही आई थी। जाहिर है इस सोच के उसके अपने कारण हैं। वह हर बार उसके उकसावे पर खुदकुशी करने निकलता है और उस रास्ते के अधबीच से लौट आता है। इससे ख़ुदकुशी नाराज नहीं होती। उस अंतिम पुकार के इंतजार में दुबककर बैठ जाती है कहीं उसी के भीतर। अंतिम बार ख़ुदकुशी खुद नहीं आती वह उसे पुकारकर बुलाता है। अपनी मर्जी से उसे चुनता है। यही वह पल है जब उसके इस निर्णय पर उसकी जिंदगी की यातना से गुजरनेवाले पाठक राहत की सांस लेते हैं।
मौत की किताब असल में जिंदगी की किताब है। जीने के लिए लड़नेवाली, दुनिया को जीने लायक खूबसूरत बनाने की वकालत करती किताब। यह आत्महत्या के कारणों, जिंदगी की दुश्वारियों और अनचाहे होने की पीड़ा को व्यक्त करने और खुदकुशी के कारणों को तलाशने वाली किताब है। खुदकुशी करने वालों का मन-जीवन कैसा होता है, वे इस दुनिया के लिए क्या सोचते हैं और किन परिस्थितियों में जीते हैं, यह किताब भरे के बीच के उनके इसी खालीपन को रखांकित करती है।
साहित्य में आत्महत्या का प्रसंग दरअसल मृत्यु का आख्यान नहीं होता। वह उस क्षण का दस्तावेज़ होता है, जहाँ मनुष्य को जीवन से संबंध-विच्छेद महसूस होता है। साहित्य यह बताता है कि पीड़ा तर्क से नहीं, अनुभव से समझी जाती है। आत्महत्या कायरता नहीं, बल्कि अक्सर असहनीय एकाकीपन और टूटन की परिणति होती है। मनुष्य मरने से पहले समाज से कटता है….शोध भी तो यही कहते हैं। यहीं, इसी बिंदु पर साहित्य और शोध एक-दूसरे का हाथ थामते हैं।एक जैसी बात करते दीखते हैं।
शोध, आँकड़ों और सिद्धांतों के माध्यम से संकट की रूपरेखा बनाता है। साहित्य उस रूपरेखा में रक्त-मांस भर देता है। आँकड़े बताते हैं कि समस्या व्यापक है, पर कथा यह बताती है कि पीड़ा कैसी होती या लगती है। यही संगम हमें निवारण की दिशा में अधिक मानवीय दृष्टि देता है, क्योंकि समाधान तभी संभव है जब हम संकट को न केवल समझें, बल्कि महसूस भी कर सकें।
साहित्य ने आत्महत्या को महिमामंडित नहीं, बल्कि उसके पीछे की पीड़ा को समझने का प्रयास किया है।शेक्सपियर के हैमलेट से लेकर हिंदी साहित्य तक, यह प्रश्न बार-बार उभरता है कि मनुष्य आखिर किस बिंदु पर जीवन से हार मान लेता है? कौन से होते हैं वो कारक? तो इसके पीछे कोई एक कारक या कारण नहीं। ढेरों होते हैं। उन्हीं में से कुछ चुने हुये ब़िदुओं पर हम आगे इस लेख में बात करेंगे।
भीतर का अँधेरा
अवसाद (डिप्रेशन), द्विध्रुवी विकार (बाईपोलर सिंड्रोम), चिंता विकार, व्यक्तित्व विकार और नशे की लत, ये सभी के सभी आत्मघाती विचारों के प्रमुख कारक हैं। गहरे अवसाद से जूझ रहे व्यक्ति को अक्सर भविष्य का कोई प्रकाश दिखाई नहीं देता। उसकी चेतना एक सुरंग में बदल जाती है, जहाँ उसे केवल अँधेरा ही अँधेरा दिखता है।
टूटते रिश्ते और बिखरते सहारे
मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है। अकेलापन, पारिवारिक विघटन, प्रेम में असफलता, सामाजिक अपमान, आर्थिक संकट, बेरोज़गारी, और सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थितियाँ व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती हैं। समाजशास्त्री एमिल दुक्खीम ने आत्महत्या को सामाजिक एकीकरण और नियमन से जोड़ा था। जहाँ व्यक्ति समाज से कटा महसूस करता है, वहाँ आत्मघाती प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। आज के डिजिटल युग की विडंबना यह है कि ‘कनेक्टेड’ दुनिया में भी भावनात्मक एकांत गहरा होता जा रहा है। यह सिर्फ एक बड़ी त्रासदी ही नहीं आत्महत्या के बड़े कारकों में से एक है।
आर्थिक और संरचनात्मक दबाव
ऋण, बेरोज़गारी, अस्थिर आय और सामाजिक असुरक्षा जैसे शब्द आज अर्थशास्त्र से जुड़े पारिभाषिक शब्द भर नहीं हैं, बल्कि आत्मसम्मान पर चोट करने वाले अनुभव हैं। किसान आत्महत्याओं पर हुए अध्ययन दर्शाते हैं कि आर्थिक असुरक्षा अक्सर सामाजिक अपमान और निराशा से जुड़कर एक गहरे मानसिक संकट में बदल जाती है। और फिर…
सांस्कृतिक और लैंगिक आयाम
पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुषों से ‘मजबूत’ बने रहने की अपेक्षा और स्त्रियों पर मौन सहने का दबाव, दोनों ही घातक होते हैं। पुरुष अक्सर भावनाएँ व्यक्त नहीं कर पाते, स्त्रियाँ अपनी पीड़ा को सामाजिक बंधनों में दबा देती हैं। दोनों ही स्थितियाँ भीतर एक खामोश विस्फोट रचती हैं और इस आवेग के परिणामस्वरूप भी बहुत सारी आत्महत्याएं होती हैं।
आकस्मिक संकट और आवेग
कई बार आत्महत्या किसी लंबे विचार का परिणाम नहीं, बल्कि तीव्र भावनात्मक आवेग में लिया गया निर्णय होती है। अचानक के अपमान, असफलता, या संबंध विच्छेद के क्षणों में व्यक्ति का निर्णय-तंत्र अस्थायी रूप से धुँधला हो जाता है और…
मृत्यु से नहीं पीड़ा से युद्ध
आज मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं है कि लोग आत्महत्या क्यों करते हैं, बल्कि यह है कि समाज में ऐसी कौन-सी संरचनाएँ निर्मित करे जिससे व्यक्ति उस अंतिम निराशा तक पहुँचे ही नहीं। आत्महत्या की रोकथाम दरअसल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टि की माँग करती है, जहाँ समस्या को व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, सामूहिक उत्तरदायित्व की चुनौती माना जा सकता है याकि माना जाना चाहिए। इसके लिए सबसे जरूरी है, मानसिक स्वास्थ्य को व्यक्तिगत और सामाजिक अधिकार की तरह देखना।
आत्महत्या से निवारण का पहला और सबसे बुनियादी आधार सुलभ तथा सस्ती मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ हैं। परामर्श, मनोचिकित्सा, संकट-हेल्पलाइन और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र किसी भी तरह की विलासिता नहीं, बल्कि जीवन-रक्षा के आवश्यक साधन हैं। जब अवसाद, चिंता या आघात को ‘चरित्र की कमजोरी’ के बजाय एक चिकित्सकीय और मानवीय संकट के रूप में देखा जाता है, तभी व्यक्ति सहायता लेने का साहस कर पाता है। इसके साथ ही संवाद की संस्कृति का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। अधिकांश आत्मघाती स्थितियाँ गहरे भावनात्मक एकांत से जुड़ी होती हैं। विद्यालयों, परिवारों और कार्यस्थलों में ऐसा वातावरण विकसित किया जाना चाहिए जहाँ अपनी भावनाएँ व्यक्त करना असामान्य न लगे। असफलता की पुनर्व्याख्या भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आज के प्रतिस्पर्धी समाज में असफलता को अक्सर अपमान और हीनता से जोड़ दिया जाता है, जबकि असफलता को जीवन-प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा समझा जाना चाहिए, न कि अस्तित्व की विफलता। यदि शिक्षा-प्रणालियाँ, मीडिया और परिवार उपलब्धियों से अधिक प्रयास और सीखने की प्रक्रिया पर बल दें, तो आत्ममूल्य बाहरी परिणामों पर कम निर्भर होगा और आत्महत्या की दर में भी कमी आ सकती है।
मानसिक संकट को गहराने में आर्थिक और संरचनात्मक असुरक्षाएँ भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। ऋण, बेरोज़गारी, असुरक्षित श्रम और सामाजिक असमानता व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती हैं। सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, ऋण-राहत, स्थिर आजीविका और संकटग्रस्त वर्गों के लिए संस्थागत समर्थन केवल आर्थिक उपाय नहीं, बल्कि आत्महत्या-निवारण की प्रभावी रणनीतियाँ भी हैं। एक सम्मानजनक जीवन की संभावना मनुष्य को निराशा से बचाती है।
इस संदर्भ में समुदाय की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षक, सहकर्मी, मित्र और परिवारजन वे लोग हैं जो शुरुआती संकेतों को सबसे पहले पहचान सकते हैं। व्यवहार में अचानक बदलाव, निराशा भरी भाषा और सामाजिक दूरी जैसे संकेत उनसे बेहतर कोई और नहीं देख सकता। यदि इस समुदाय को संवेदनशील और प्रशिक्षित किया जाए, तो वे पेशेवर सहायता तक पहुँचने का सेतु बन सकते हैं।
घातक साधनों तक पहुँच कम करना भी निवारण का एक व्यावहारिक पहलू है। दुनिया में इस विषय पर हुए तमाम शोध यह बताते हैं कि आत्महत्या के अनेक निर्णय आवेग में लिए जाते हैं। ऐसे में कीटनाशकों का सुरक्षित भंडारण, ऊँची इमारतों की सुरक्षा, दवाओं की नियंत्रित बिक्री जैसे उपाय आकस्मिक क्षणों को स्थायी त्रासदी में बदलने से रोक सकते हैं।
आत्महत्या केवल एक जीवन नहीं लेती, बल्कि अनेक जीवनों को गहरे आघात में डाल देती है। इसलिए आत्महत्या के बाद शोकग्रस्त लोगों की देखभाल भी उतनी ही आवश्यक है। परिवार, मित्र और समुदाय के लिए परामर्श और सहारा जरूरी है, ताकि अपराधबोध, शर्म और मौन आगे किसी और त्रासदी का कारण न बनें।
आत्महत्या की रोकथाम के प्रयास मृत्यु से लड़ाई नहीं, जीवन की संभावना को मजबूत करने की प्रक्रिया है। जब समाज व्यक्ति को यह भरोसा देता है कि पीड़ाएं साझा की जा सकती है, असफलता अंतिम नहीं है, और सहायता उपलब्ध है, तब निराशा का अँधेरा थोड़ा हल्का पड़ता है। आत्महत्या को रोकने का रास्ता उपदेश नहीं, संवाद है। निर्णय नहीं, सहानुभूति है। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, परिवार और मित्रों का भावनात्मक सहारा, सामाजिक सुरक्षा और संवेदनशील सार्वजनिक विमर्श, ये सभी सुरक्षा-कवच की तरह काम करते हैं। आत्महत्या मरने की इच्छा नहीं, बल्कि उस पीड़ा से छुटकारे की पुकार है जिसे व्यक्ति अकेले ढोते-ढोते थक चुका होता है। इसलिए आत्महत्या की रोकथाम को जीवन की पुनर्स्थापना की प्रक्रिया की तरह देखा जाना चाहिए। है। आत्मघाती मनःस्थितियों से गुजर रहे व्यक्ति को यह अनुभव कराना जरूरी है कि उसकी पीड़ा अदृश्य नहीं है, उसका अस्तित्व व्यर्थ नहीं है और बंद दिखती दीवारों में भी कहीं-न-कहीं एक खुली खिड़की संभव है।
आत्महत्या पर बात करना अँधेरे को बढ़ाना नहीं, अँधेरे में रखे उस दीपक को पहचानना है जो अब तक दिख नहीं रहा था। हर वह व्यक्ति जो जीवन से हारता दिखता है, दरअसल जीवन से ही अपनी सबसे गहरी मांग कर रहा होता है- ‘देखो मुझे… सुनो मुझे… रहने दो मुझे।’
इसलिए आत्महत्या पर हर गंभीर संवाद अंततः जीवन के पक्ष में दिया गया बयान है।

