Friday, March 20, 2026
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कहानीः झील सूख रही है

झील सूख रही है’ एक स्त्री के भीतर के सूखते जल, बढ़ती तन्हाइयों और टूटते हृदय की कथा है। कहानी उस स्त्री की है, जिसके जीवन में विवाह के बाद प्रेम धीरे-धीरे अपना रस खो देता है और साथ रहते हुए भी ‘साथी’ वही नहीं रह जाता। यह कहानी प्रेम की स्मृति, रिश्ते की रिक्तता और मानसिक टूटन के बीच झूलते मन का वृत्तांत है। यहाँ प्रेम, विवाह, मातृत्व और मानसिक बीमारी एक-दूसरे से टकराते हुए जीवन के सबसे नाज़ुक सवाल खड़े करते हैं। जिसमें सबसे बड़ा सवाल विवाह संस्था की जड़ता, कृत्रिमता, एकरसता और निस्सारता को लेकर है।

थोड़ी देर लगता रहा जैसे कोशिश करके, खींचकर भी उतनी लंबी साँस ली ही नहीं जा रही,जितनी चाहिए। छोटी छोटी सांसे दम घोंटने लगीं तो मुंह खोलकर सांस घसीट ली! उसकी प्रोफाइल पिक पर हाथ फेरा,वही तो था…एकदम वही ,पूरा का पूरा विक्की! आज से पहले इतनी बार ढूंढ़ा,मिला क्यों नहीं? सोशल मीडिया पर नया अकाउंट बनाया होगा, लेकिन इस तरह? प्रोफाइल पिक्चर के अलावा एक भी और फोटो नहीं..सिर्फ किसी सूखती हुई झील की फोटो या फिर किसी लंबी ऊंची इमारत की तस्वीर! मैंने प्रोफाइल खंगाल डाला,सच में बस यही दोनों ही भरे हुए थे सारी तस्वीरों में, ऐसी क्या बात थी इनमें? पानी को खोती‌ हुई, स्लेटी रंग की एक जगह, इससे ज़्यादा क्या पहचान थी उस झील की? और ये ऊंची ऊंची इमारतें? क्या मतलब था इन‌ सबका?

मैंने ‘ऐड फ्रेंड ‘ पर क्लिक करते खुद को रोक लिया..वक्त विक्की के लिए भी आगे बढ़ गया हुआ तो? मान लो कह दिया कि‌ नहीं पहचान पा रहा‌ हूं..तो? सवाल जवाब चलते ही जा रहे थे कि तभी तभी मोबाइल स्क्रीन पर बेटे का नाम आने लगा था,

“हैलो मम्मा..इस हफ्ते घर नहीं आऊंगा, गुस्सा नहीं होना प्लीज़”

बेटे का फोन थोड़ा और परेशान कर गया था। आ ही जाता..मन हटता, वहां से हटता जहां से घसीटकर भी नहीं लाया जा सकता था। आंखें फिर विक्की के प्रोफाइल में जा अटकीं,पता नहीं क्या ढूंढ़ती रहीं…एक बार फ़ोन फिर बजा था, इस बार बेटे का पिता मुझे अपने वीकेंड से दूर कर रहा था,

“अरे यार, पूरी टीम लेकर मुंबई जाना है इस वीकेंड..जस्ट अभी पता चला, तुम मां बेटा ऐश करो “

“बेटा भी नहीं आ रहा है इस वीकेंड..”

मैं बस इतना ही बोल पाई थी, उधर से शायद बिना सुने जवाब आ गया था,

“पंद्रह बीस मिनट में ड्राइवर पहुंच रहा है,एक बैग में एक फॉर्मल शर्ट और दो टी शर्ट, एक पजामा रख दो”

बात सुनते सुनते ही सामान पैक भी होने लगता था। एक नज़र उस बैग पर डाली; चार तहों में खुद को समेटकर इसमें रख पाती तो..बच तो जाती! मान लो मैं विक्की से मिलने चली गयी,तो? कौन सा नाज़ुक पल कब धावा बोलकर कहीं और जोड़कर सब तोड़ ले जाए,भरोसा थोड़ी है।

‘भरोसा’… इतने सालों पहले उस दिन विक्की ने छत पर बने कबाड़ वाले कमरे में हाथ थामकर यही शब्द तो थमाया था,

“भरोसा नहीं है मुझ पर?”

मैं हाथ छुड़ाकर भागती चली आई थी..ये हुआ क्या था उस‌ दिन? हाथ ही थामा था , झुनझुनी पूरे शरीर में कैसे दौड़ गयी थी? इतने सालों बाद भी वो स्पर्श अभी‌ भी‌ ताज़ा था, मैंने छूकर देखा;पहले अपना हाथ,फिर प्रोफाइल पिक्चर पर वो चेहरा, फिर आंखे,चश्मा..’एड फ्रेंड’ पर अपने आप क्लिक हो गया।

पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि इनबॉक्स मैसेजेस से भर गया था…कैसी हो? कहां हो? अपना फोन नंबर दो! ये मेरा फोन नम्बर है। जब भी फ्री होना,कॉल करना.. प्लीज़!

इतनी बेताबी..ये लास्ट में ‘प्लीज़’ लिखना, ये विक्की ही है न? आंखें भरकर खाली होने पर आमादा थीं,तभी ड्राइवर आकर सन्नाटा भंग‌ कर गया था।

“साहब ने बैग मंगवाया है”

 अच्छा ही हुआ,ये आ गया.. बहुत देर तक सन्नाटा पसरा रहे तो भीतर शोर उठा देता है। फिर वो शोर दवाएं मांगता है,कभी माइग्रेन की,कभी डिप्रेशन की..अबकि‌ डॉक्टर ने एक नई बीमारी का नाम भी फुसफुसाया था। मैंने ड्राइवर को जाते हुए रोक दिया,

“तुम कैब करके चले जाओ..कार छोड़ जाओ, मुझे जाना है कहीं”

“नहीं मेम साब, मैं आता हूं बैग देकर..आप मेरे साथ ही चलना”

ड्राइवर तरस दिखाकर गया था परवाह? या फिर ये दिखाकर कि उसे पता है मैं बीमार हूं.. कहीं अकेले जाने लायक़ नहीं। घर पर एक बाई मेरे इर्दगिर्द घूमती है..नहाते समय भी हिसाब लेती है,

“मेम साहब,ठीक हो आप?”

सब मुझे मरने से रोकते हैं, कुछ ऐसे जैसे लत छुड़ाने की कोशिश में हों..मरने की ओर बढ़ना भी एक लत ही तो है, बिल्कुल विक्की की याद की तरह! आज फिर विक्की की तलब किसी लत की तरह उठी है,  फोन नंबर के दसों अंक नाच रहे हैं आंखों के ठीक सामने..अभी तुरंत यहां से मन को हटाना होगा खींचकर! अचानक लगा जैसे मन देह के भीतर न होकर बाहर चिपकी कोई परत हो, घसीटकर तन से अलग करना..वो भी‌ इस कदर कि खून हर जगह दिखे, तन पर भी,मन पर भी!

खून याद आते ही वो पिछले महीने की वो शाम याद आती गई.. अंधेरा घर का उजाला काटने लगा था और ब्लेड मेरी कलाई का एक हिस्सा! कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था..ऐसे जैसे ब्लेड छुआने से पहले मैंने वो जगह खुद सुन्न कर दी हो। बस खून बहना दिखाई देता रहा, शायद सुनाई भी देता रहा…टप टप टप टप! थोड़ी देर में लगा जैसे शरीर से कुछ निकलने की बजाय वापस आ रहा था,ठीक उसी तरह..टप टप टप टप! कराहते हुए आंखें खोली थीं, सिरहाने बैठे पति को देखा और पैर के पास खड़ी नर्स को!

“आराम से आंखें खोलो..”

पति की गहरी,भरी आंखें.. आंखों में दर्द से ज़्यादा सवाल!

“आर यू मैड? तुमको कुछ हो जाता तो मैं अकेले क्या करता? तुम ऐसा कैसे …”

भरी आंखों से टपका एक आंसू  गाल खराब कर गया था..तुम अकेले क्या करते? वही सब ,जो मैं करते आई हूं.. थोड़ा रोते,चीखते, मेरी तरह चार-पांच सिगरेट ख़त्म करके बचे टुकड़े गिनते!

डॉक्टर काफ़ी देर समझाता रहा, सवाल पूछता रहा,डॉक्टर यकीन करना चाहता था कि समझ उसके दिमाग से हम तक कितने परसेंट ट्रांसफर हुई?

“इनको अकेले नहीं छोड़ना है, बिल्कुल भी नहीं..और आप सुगंधा जी, लाइफ एक बार ही मिलती है, ऐसे वेस्ट नहीं करने का”

मैं उस मूर्ख को ताकती रह गई थी..  वो भी जानती है, फीनिक्स नहीं है।एक बार खत्म हुई तो फिर खत्म ही! ड्रिप चढ़नी बंद हो गई थी। मैंने अपना बचा खुचा हिस्सा जोड़कर पूछा था,

“कितने दिनों से यहां हूं?”

जवाब में नर्स ने दो उंगलियां उठा दी थीं..बस? दो दिन हुए मुझे मरने से बचे हुए? मुझे सालों पुरानी बात क्यों लग रही थी..बार बार मरना और बार बार बचना! उस दिन अस्पताल से घर जाते समय,रास्ते भर फिर यही मरना जीना ही चलता रहा,

“तुमने सोच भी कैसे लिया यार? सोचो न, बेटे तक बात पहुंचती तो ? अच्छा हुआ, वीक डेज़ में ये सब हुआ, बेचारा कैसे हैंडल करता..”

कार भागती जा रही है,मैं ‘अच्छा हुआ’ पर रुक गई हूं! ये सब जब भी हुआ, अच्छा कैसे हुआ?

“एक बात बताओ यार, क्या नहीं मिला तुमको..आई मीन, और क्या कर दूं मैं तुम्हारे लिए जो तुम..जो तुम ये सब..”

“सुसाइड की कोशिश..”

मैंने बोलना आसान किया, उतनी ही आसानी से जैसे पड़ोसी का नाम याद दिलाया हो,

“हां… सुसाइड अटेम्प्ट “

पति ने उतनी ही आसानी से स्वीकारा भी! कुछ और भी था स्वीकारने को, मैं पहले ही मान चुकी थी,पति को अब मानना पड़ा था।

“डॉक्टर का कहना है कि सीवियर डिप्रेशन है..हो जाता है इस एज में! मेनोपॉज़ भी रीज़न हो सकता है”

“डॉक्टर ने आगे क्या कहा?”

मुझे पति की राय नहीं, डॉक्टर की एक्सपर्ट एडवाइज जाननी थी!

“डॉक्टर क्या कहेगा! एक दूसरे की दुकान चला रहे हैं..एक सायकियाट्रिस्ट का कार्ड पकड़ा दिया है, दिखाने को कहा है”

एक पल‌ के सन्नाटे के बाद आवाज़ फिर ऊंची हुई,

“वो‌ क्या बताएगा यार! मैं बता रहा हूं न..घूमो फिरो, शॉपिंग करो, मूवी देखो..इतना कंटेंट भरा है आजकल टी वी पर..सब कुछ है,फिर क्या ये डिप्रेशन? पहले भी तो होता था मेनोपॉज़, कौन ये सब करता था ?”

मेरी कलाई पर बंधी पट्टी, हथकड़ी का रूप ले चुकी है.. मैं क़ैद हूं,एक जुर्म करके। सामने खड़ा थानेदार मुझसे सवाल पूछ रहा है.. पता ही नहीं, किस डिग्री का टॉर्चर है,सहते ही नही बन रहा! अगले ही दिन हम क्लीनिक में थे।

“मैं इनसे अकेले में बात करूंगा”

दिमाग का डाक्टर दिल खटखटाना चाहता होगा, तभी तो पति को बाहर भेज दिया,

“देखिए सुगंधा जी.. मैं आपको सुगंधा कह सकता हूं?”

वही रटी रटायी बातें, कैज़ुअल होने की कोशिश। मैं जानती हूं, अगले पल बातें और मीठी होंगी, हुईं भी,

“मैं आपका डॉक्टर नहीं, फ्रेंड मानिए”

” सॉरी डॉक्टर, फ्रेंड्स से मैं खुल नहीं पाती..आप डॉक्टर ही रहिए”

अचकचाया डॉक्टर खीज गया होगा, लेकिन दिखा नहीं सकता।

“ओके,दैट्स बेटर!”

मैं बताती जा रही हूं.. अपनी तकलीफ़, ग़ायब होती हँसी और मुझसे दूर भागती नींद! उसके हाथ कागज़ पर चल रहे हैं, कुछ लिख रहा है,या कुछ खींच रहा है,नक्शे जैसा?

“मेरे दिमाग का नक्शा?”

मैं रुककर पूछती हूं,वो सतर्क होकर कहता है,

“आप कहिए, मैं सुन रहा हूं “

उस दिन जितना खोल आई, उतना ही घर आकर और उलझ गई! दवाएं सिरहाने जमा हो गयीं.. सामने दीवार पर क्लीनिक से मिले पोस्टर चिपका दिए गए, मोटिवेशनल कोट्स वाले पोस्टर! बेटा चार दिन बाद आया था, कलाई की पट्टी हट चुकी थी। दवाएं और पोस्टर चुगलखोर साबित हुए थे।

“क्या मम्मा..यू आर सो टैलेंटेड! हटाओ ये दवाएं, डिप्रेशन आपके पास कब आया?”

मैंने उसके बालों में हाथ फेर दिया,

“जब से तुम यहां से चले गए..”

“मम्मा! गिल्ट में ला रही हो मुझे..जॉब बुला रही थी, तभी तो गया”

“मुझे तो कोई बुलाता भी नहीं”

मैंने सीलिंग फैन को ताकते हुए कहा, बेटे ने अपनी ओर मेरा चेहरा घुमा लिया,

“सब तो बंद कर रखा है..कोई बुला भी रहा होगा तो सुनोगी कैसे? सोशल मीडिया पे जाओ ना आप, पुरानी फ्रेंड्स ढूंढो..सब मिल जाते हैं वहां”

बस उसी दिन से,या उसी रात से विक्की को ढूंढ़ना शुरू कर दिया था। कहीं था ही नहीं वो..जब से मुझसे अलग हुआ, गुम हो गया क्या? हर दिन ढूंढा, हर तरह से..इतना कि और सब कुछ खोता गया! मेमोरी के कुछ हिस्से, जीवन के कुछ सलीके और कुछ रिश्ते भी! पति झुंझलाकर समझा गया था,

“हर‌ वक्त सोशल मीडिया! कुछ नहीं है यहां..सब फर्जी है, कुछ नहीं मिलता यहां टाईम वेस्ट करके”

मैंने स्क्रीन पर देखते हुए खुद से कहा था,

“मिलता है..खोया हुआ कुछ मिलता है”

आखिरकार आज मिल ही गया न! प्रोफाइल में शहर का नाम दिल्ली था, विक्की यहीं कहीं है,आस पास.. मैं पता नहीं कितनी देर उसी तरह सोफे पर जमी रही,बिना हिले डुले! ड्राइवर आकर कब से दरवाज़े पर खड़ा है, ‘ साहब को बैग देकर आ गया’ जैसी  फालतू जानकारी से लेकर ‘कहां चलना है मेम साहब ‘ जैसे वाहियात सवालों का पुलिंदा लिए हुए! मैं जहां जाना चाहती हूं..वो रास्ता मुझे खुद भी नहीं पता है..फोन नंबर अभी भी आंखों के सामने है और ड्राइवर  बायीं तरफ,थोड़ी दूरी पर!

आज मन किसी भुलावे में आने को तैयार ही नहीं, बस एक ही रट.. फोन करो! बाई ने अंदर कमरे से मुझे झांककर देखा,मैंने फोन करने की बजाय मैसेज किया,

“हाय.. मैं सुगंधा”

जवाब में विक्की का फोन ही आया,

“हैलो सुगंधा..”

चार आँसू कूदकर आंखों में आ बैठे..बिना कहे!

“कैसी हो?”

“तुम कैसे हो? दिल्ली में रहते हो या”

“कुछ काम से आया हूं..मिल लो‌ प्लीज़ “

ऐसे प्लीज़ लगाकर मिलने को और क्यों नहीं कहता? मैं रोने के सिवा और कुछ कह ही नहीं पा रही, चार जोड़ी आंखें मुझपर तैनात हैं!

“होटल‌ का एड्रेस भेज रहा हूं, मुझे पता है तुम आओगी”

मन डगमग हो रहा था, सवाल जाने या न जाने का नहीं..सवाल वापस आने या न आने का भी था! क्या हो अगर विक्की मुझे मिलते ही भींच ले, या फिर मेरे एकदम करीब आकर गर्दन पर गिनते हुए पूछ ले,

“यहां चार तिल हैं,इसका मतलब तो जानती हो ना?”

कार किसी स्पीड ब्रेकर पर उछली थी, मैंने खुद को ख्यालों से निकालकर अपने चारों तिल छुए..कौन सा किसका है? कितने विक्की के? कितने पति के? कितने मेरे खुद के?

कार होटल के बाहर आकर रुक गयी है, ड्राइवर की निगाहें फिर उसी चिंता से लबालब हैं, अकेले न छोड़ने वाली चिंता,

“मैं कार पार्क करके आता हूं मेम साहब”

 मैंने साफ़ साफ़ कह दिया है,

“तुम जाओ.. मैं फ्रेंड्स के साथ हूं”

होटल के अंदर जाते मेरे पैर कांप गए, विक्की के बारे में पूछूं या सीधे रूम में? रिसेप्शन पर बढ़ते हुए कदम अपने आप लिफ्ट के सामने जाकर रुक गए थे..क्या सच में ये रास्ता उस तक जा रहा था? लिफ्ट तो ऐसे ऊपर उठ रही थी जैसे पाँचवीं मंजिल तक नहीं बल्कि पचासवीं मंज़िल तक का सफर तय कर रही थी..

“एक्सक्यूज़ मी, रूम नंबर फाइव ज़ीरो नाइनटीन?”

रूम सर्विस वाले लड़के ने एक पल रुक कर कहा,

“सॉरी मैम! फाइव जीरो एटीन तक रूम्स हैं फ्लोर पर”

 मैंने लिफ्ट की ओर मुड़ते हुए पूछा,

“ओह! फाइव ज़ीरो नाइनटीन इससे ऊपर वाली पर होगा..”

“नो मैम..हर फ्लोर पर रूम्स वन से लेकर एटीन तक ही हैं..”

मैंने फिर से मैसेज पढ़ा, फाईव ज़ीरो नाइनटीन ही तो लिखा था..विक्की भी न!मैंने  तुरंत फोन किया,

“होटल में फिफ्थ फ्लोर पर हूं लिफ्ट के पास, आकर मिलो”

“फिलहाल मैं बाहर हूं” एक बेहद रूखा जवाब! ये क्या था? चौंको तो कम से कम!

“तुम बाहर हो.. कहां हो? वहीं आ जाती हूं, अकेले हो?”

एक पल रुक कर झेंपा सा जवाब आया,

“वाइफ भी है साथ में..”

होटल में कोई सायरन बजने लगा था..फायर अलार्म शायद! सांय-सांय, जैसे तेज़ हवा आग की तरह बढ़ती चली आ रही हो..

“वाईफ के साथ हो! ठीक है,बाद में मिलते हैं..शादी कब हुई,बच्चे?”

” मेरा एक बेटा है‌, सुगंधा”

सायरन और तेज़ बजने लगा है, उस बात का जवाब विक्की को देना होगा, मेरी फिर मिलने वाली बात का!

“बाद में मिलते हैं”

मैंने दोहरा दिया,जस का तस.. उन्हीं चार शब्दों में!

“सुनो सुगंधा.. मैं ये कह रहा था कि जो बीत चुका है,उसको बीता रहने देते हैं, सबकुछ रिवर्स नहीं किया जा सकता न, पति बन चुका हूं,पापा भी.. केवल यही दोनों रोल निभाने दो, प्लीज़..”

मैंने अपनी गर्दन के चारों तिल छुए.. धूमिल होकर हट रहे हैं क्या? सामने खड़ा लड़का लिफ्ट में जाते हुए रुक गया,

“आप ठीक हैं मैम? एक बार फिर से रूम नंबर पूछ लीजिए,कोई कन्फ्यूजन होगा शायद”

कोई कन्फ्यूजन नहीं, सब साफ़ है अब..विक्की की तस्वीरें भी। वो एक ऊंची इमारत है, मैं एक झील हूं उसको ताकती हुई, गर्दन उठाकर देखती हुई! झील की गर्दन ऊपर उठे हुए दुखने लगी है,इमारत ऊंची होती जा रही है..

“वॉशरूम कहां है?”

मैं उससे बस इतना ही पूछ पाई हूं!

“ग्रांउड फ्लोर पर मैम”

वो बस इतना ही बता भी पाया है! वॉशरूम में भी मुझे वही सायरन सुनाई दे रहा है.. सांय-सांय, सांय-सांय..बीच बीच में विक्की की आवाज़ गूंजती है,

“भागो मेरी लाईफ से.. प्लीज़ “

मुझे बेटे की आवाज़ भी सुनाई दी,

“सब कुछ छोड़कर आपके पास बैठ जाऊं क्या?”

फिर पति बोलता है,

“तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता, तुम्हारी एक्सपेक्टेशन बहुत हैं यार”

इसके‌ बाद कुछ सुनाई नहीं दे रहा‌ है, मुझे सिर के एक हिस्से पर बेहद तेज़ दर्द महसूस हो रहा है बस, कुछ गीला गीला वहां से बहता हुआ,शायद लाल रंग का.. जाकर उसी झील में मिलता हुआ, सूखी हुई झील,विक्की की प्रोफाइल‌ वाली। अचानक उस‌ झील के रंग बदल गए! लाल पानी वाली झीलें..मेरे खून से लबालब! मेरी आंखें मुंदती जा रही हैं, या फिर खुल रही हैं!

“इनको होश आ रहा है..”

एक बार फिर वही कमरा..इस बार नर्स सिरहाने खड़ी थी,पति पैरों के पास! कुछ लोग और भी थे.. पहले वाला डॉक्टर भी, सायकियाट्रिस्ट भी!

“कैसी हो सुगंधा?”

इस बार सायकियाट्रिस्ट ने ज़िम्मेदारी ली है, वो सवाल जवाब करेगा! अपराध वही,अपराधी वही..थानेदार बदल गया! उसने सबको बाहर जाने के लिए कहा,

कमरे में बस अब हम दोनों, सायकियाट्रिस्ट समझाता रहा.. मैं सिर्फ सुनती रही!

“देखो सुगंधा.. मैंने पहले भी कहा था, इस बीमारी की गंभीरता समझो, दवाएं इग्नोर मत करो। वो तो अच्छा हुआ कि ड्राइवर तुमको फॉलो करता रहा, और बचा पाया..तुम चक्कर खाकर होटल के बाथरूम में गिर पड़ी थी, सिर पर गहरी चोट आयी है।आगे कुछ उससे खराब भी हो सकता है! मुझे पूरी बात बताओ,हुआ क्या था”

मैं सब बताती चली गई, विक्की का प्रोफाइल ढूंढ़ना, उससे बात करना,उसका होटल बुलाना और फिर खुद ही मना कर देना!

“आपको नहीं लगता डॉक्टर कि ये सब मुझे तोड़ने के लिए काफी था?”

वो मेरी बात से सहमत नहीं था,

“विक्की अगर अपनी लाइफ में खुश है.. अपनी नयी ज़िम्मेदारी में बिज़ी है,तो क्या ये उसकी ग़लती है?”

“आप भी एक आदमी हैं न.. नहीं समझेंगे! नया शुरू करना,पुराना खत्म करना नहीं होता..”

“अच्छा बताओ, विक्की से क्यों मिलना चाहती थी तुम?”

“विक्की के साथ मैं खुश होती थी डॉक्टर! मैं सबसे ज्यादा सुंदर लगती थी तब…उसकी बातें, उसकी आंखें..वो मेमोरीज मुझे अपने पीछे दौड़ाती हैं “

बोलते-चीखते मैं हांफने लगी थी,या फिर उन यादों के पीछे भागते भागते!

“अच्छा एक बात बताओ…तुमको हस्बैंड अच्छा नहीं लगता ? बिल्कुल ईमानदारी से बताना”

“अच्छा लगता है,विक्की जितना नहीं..”

“तुम्हारी लव मैरिज थी न! पति भी तो पहले प्रेमी ही था न…फिर से उसमें ही सब कुछ ढूंढ लो”

मेरे हाथ में झुनझुनी शुरू हुई है..फिर पूरे शरीर में दौड़ने लगी है,

“पति अलग है.. उसमें वो नहीं मिल सकता, जो ढूंढने मैं होटल गयी थी”

सायकियाट्रिस्ट ने पन्ने पर फिर कुछ खींचा है,

“अच्छा! एक बात बताओगी मुझे,

सच सच?”

“हाँ, पूछिए”

“तुमको पता है न, जो कुछ तुमको लगता है, ज़रूरी नहीं वो सब सच में हो रहा हो”

मैं चुप थी, मेरी बीमारी के लक्षण मुझे बहुत बार बताए जा चुके हैं। डॉक्टर ने फिर एक सवाल पूछा है,

“दवाएं स्किप कर रही हो न? साफ़ दिख रहा है “

मैं जवाब‌ ही नहीं दूंगी। पूछते रहो सवाल। लो,अगला सवाल भी आ गया,

“हस्बैंड का नाम बताओ,क्या‌ नाम है?”

वही होटल‌ वाला सायरन, सांय सांय,इस बार धुआं भी है! मेरी ज़बान लड़खड़ा रही है,

“हस्बैंड का नाम विकास..”

“तुम विकास को पहले क्या कहकर बुलाती थी? याद करो”

धुआं मुझे पूरी गिरफ्त में ले चुका है, दम घुट रहा है.. सांस छोटी छोटी, मुंह से भी सांस घसीटी नहीं जा रही,

“मैं नहीं बताऊंगी, आप कुछ भी कर लीजिए “

सायकियाट्रिस्ट फिर पूछ रहा है,उसकी आंखें फैल गयी हैं, आवाज़ किसी दैत्य जैसी भारी ..ऐसी भारी आवाज़ कि  अस्पताल की छत अभी गिर पड़ेगी,अभी इसी वक्त..

“बताओ सुगंधा, तुम विकास को पहले क्या कहकर बुलाती थी?”

मैं इससे ज़्यादा नहीं सह सकती, आंखें मुंदती जा रही हैं..सब कुछ धुंधला धुंधला! इमारत की ओर ताकती झील तेजी से सूखती चली जा रही है,इमारत भी धुंधली होती जा रही है.. होंठ हल्के से हिले,

“मैं.. मैं विक्की कहकर बुलाती थी…”

लकी राजीव
लकी राजीव
परिचय नाम-लकी राजीव जन्म- कानपुर (उ प्र) शिक्षा - एम ए (अंग्रेजी साहित्य), बीएड, शास्त्रीय नृत्य (भरतनाट्यम) में प्रशिक्षित, अनेक पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित, रेडियो पर कहानियाँ प्रसारित, कहानी संग्रह 'करिया' एवं 'शर्बत' प्रकाशित संप्रति - स्वतंत्र लेखन संपर्क- luckyrajeevlucky@gmail.com फ़ोन नंबर -9850833546
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7 COMMENTS

  1. ‘झील सूख रही है’ सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि स्त्री मन के भीतर घटती उस धीमी त्रासदी का दस्तावेज़ है, जिसे समाज अक्सर “सब ठीक है” कहकर ढँक देता है। सुगंधा का चरित्र प्रेम, विवाह, मातृत्व और मानसिक बीमारी के चौराहे पर खड़ा होकर सवाल करता है कि क्या रिश्तों की निरंतरता ही जीवन की पूर्णता है, या भीतर बचा हुआ ‘स्व’ भी कुछ माँगता है।
    विक्की और विकास का द्वंद्व महज़ दो पुरुषों का नहीं, बल्कि स्मृति और वर्तमान, इच्छा और दायित्व, और ‘जो था’ व ‘जो होना चाहिए’ के बीच का संघर्ष है। सूखती झील का प्रतीक अत्यंत सशक्त है, वह स्त्री के भीतर के उस जल का रूपक बन जाता है, जिसे हर कोई देखता है, पर भरने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।
    कहानी की भाषा बेचैन करती है, पाठक को सहज नहीं रहने देती और यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज की सतही समझ, ‘सब कुछ है फिर भी डिप्रेशन क्यों’ जैसे सवालों की क्रूरता, और स्त्री की पीड़ा को हार्मोन या उम्र के खाते में डाल देने की प्रवृत्ति, बेहद तीखेपन से उभरती है।
    लकी राजीव ने बिना किसी भावुक अतिरंजना के एक कठिन विषय को संवेदनशील, ईमानदार और विचारोत्तेजक ढंग से रखा है। यह कहानी पढ़कर ख़त्म नहीं होती, यह भीतर देर तक गूंजती रहती है, बिल्कुल उस सायरन की तरह, जिसे अनसुना करना अब संभव नहीं।

  2. सुंदर मनोवैज्ञानिक कहानी के लिए लेखिका को हार्दिक बधाई 🌹

  3. कहानी आज दुबारा पढ़ी…डिप्रेशन और सीजोफ्रेनिया के चक्रवात में फंसी सुगंधा अपनी ही फैंटेसी से जूझ रही है। प्रेमी विक्की जब पति विकास बनता है तो कहीं खो जाता है, उसी को पाने की जद्दोजहद व भटकन ने उसे अकेलेपन में कैद करके दवाओं का मोहताज बना दिया है। मानव मन भी एक अबूझ पहेली है जिसका इतना सुन्दर मनोवैज्ञानिक कथानक बुनने पर बहुत बधाई लकी, कहानी की गूंज कई दिनों तक पीछा करेगी😊
    -उषा किरण

  4. स्त्री के मनोभावों को बहुत ही सुन्दर तरीके से रेखांकित किया है। सभी के जीवन में ये समय आता है जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, बच्चे और पति व्यस्त होते हैं।

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