Friday, March 20, 2026
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शरीयत काउंसिल कोई अदालत नहीं, तलाक के लिए कानूनी स्टैंप जरूरी: मद्रास HC

चेन्नई: मद्रास हाई कोर्ट ने तीन तलाक से जुड़े एक मामले के सुनवाई के दौरान शरीयत परिषद को एक अदालत नहीं बल्कि एक निजी संगठन बताया है। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मुस्लिम जोड़े से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान की है।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने कहा है कि अगर पत्नी को पति द्वारा दिए गए तलाक की वैधता को लेकर सवाल उठाती है तो इस केस में पति को तलाक के लिए कानूनी घोषणा प्राप्त करना चाहिए। यही नहीं न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन ने मामले में शरीयत परिषद की भूमिका की भी आलोचना की है।

कोर्ट ने कहा है कि जब तक अदालत द्वारा घोषणा पत्र जारी नहीं किया जाता है तब तक कोई विवाह टूट नहीं सकता है और वह अस्तित्व में होता है। न्यायालय ने यह भी कहा है कि यह जिम्मेदारी केवल पति का है कि वह तलाक ले तो वह एक कानूनी तरीके वाला तलाक हो।

पत्नी ने तलाक पर उठाया था सवाल

दरअसल, साल 2010 में एक डॉक्टर दंपति ने शादी की थी और कुछ साल बाद दोनों के बीच तलाक हो गया था। साल 2017 में तमिलनाडु तौहीद जमात से संबद्ध शरीयत परिषद ने पति को तलाक दिलवाया था।

परिषद ने मध्यस्थता की कोशिश के दौरान यह कहकर पति को तलाक दिला दिया था कि पत्नी सहयोग नहीं कर रही है। साल 2018 में पत्नी ने तलाक पर सवाल उठाया था और घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत याचिका दायर की थी।

पत्नी ने तर्क दिया था कि उसके पति ने उचित तरीके से तीसरा तलाक नहीं दिया था और फिर शादी कर ली थी। ऐसे में उसका कहना है कि उनका यह तलाक अमान्य है और उसकी शादी अभी भी बरकरार है। साल 2021 में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने पहली पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया था और पति को मुआवजा देने के कहा था।

अदालत ने पति को पांच लाख रुपए का मुआवजा और हर महीने उनके एक बेटे के लिए 25 हजार रुपए खर्च देने का आदेश दिया था। इस फैसले को एक सत्र अदालत ने बरकरार रखा था जिसके बाद पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा है

मामले में कोर्ट ने शरीयत परिषद के रोल पर सवाल उठाते हुए कहा कि परिषद को पारिवारिक और वित्तीय मामलों में सहायता करने का अधिकार है लेकिन उसे तलाक प्रमाणपत्र जारी करने या फिर जुर्माना लगाने का अधिकार नहीं है।

पीठ ने परिषद द्वारा पति को तलाक प्रमाण पत्र देने के उसके फैसले को “चौंकाने वाला” बताया है और कहा है कि केवल कोर्ट के पास तलाक से जुड़े फैसले जारी करने के अधिकार हैं।

अदालत ने यह भी कहा है कि इस तरह के मामले में पति एकतरफा निर्णय नहीं ले सकता है नहीं तो वह अपने मामले में खुज जज बन जाएगा। उन्होंने निचली अदालत के फैसले को खारिज करने की पति की याचिका को खारिज करते हुए यह भी कहा कि जब तक अदालत तलाक नहीं दे देता है, शादी वैध रहता है।

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कानूनी रूप से अपनी पहली पत्नी से विवाहित होते हुए भी पति की दूसरी शादी को द्विविवाह के समान और क्रूर माना जाएगा जिससे पहले पत्नी की मानसिक क्षति हुई है। कोर्ट ने इसे महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 से जोड़ते हुए कहा है कि पति द्वारा यह एक ‘घरेलू हिंसा’ का कृत है।

कोर्ट ने आगे कहा अगर कोई हिंदू, ईसाई, पारसी या यहूदी पुरुष पहली शादी खत्म किए बिना दूसरी शादी करता है तो इसे द्विविवाह और क्रूरता माना जाता है। ऐसे में यह सिद्धांत मुस्लिमों पर भी लागू होता है जो पहली पत्नी को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा करने का अधिकार देता है।

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