Friday, March 20, 2026
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खबरों से आगे: जम्मू-कश्मीर संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और आयु में छूट को लेकर पैदा हुआ बेतुका विवाद

आयु में छूट की मांग कर रहे उम्मीदवारों की मदद करने के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इरादे और गंभीरता पर अब सवाल उठ रहे हैं। अगर वह वाकई उम्र सीमा में छूट दिलाने के इच्छुक थे, तो उन्हें एलजी मनोज सिन्हा को बहुत पहले ही पत्र लिख देना चाहिए था।

जम्मू और कश्मीर संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2025 (JKCCE) के लिए रविवार (7 दिसंबर) को परीक्षा आयोजित की गई थी। इससे कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को एक पत्र भेजकर इच्छुक उम्मीदवारों के लिए आयु में छूट की मांग की थी। अचानक यह मांग उठी कि उड़ानों, खासकर इंडिगो एयरलाइंस की सेवा में व्यवधान को देखते हुए परीक्षा स्थगित कर दी जानी चाहिए। कुछ कश्मीरी युवा इन मांगों के समर्थन में धरने पर बैठ गए।

ऊपरी आयु सीमा में छूट और देश भर में उड़ानें रद्द होने के विवाद के बीच फॉर्म भरने वाले 22,573 उम्मीदवारों में से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के 53 परीक्षा केंद्रों पर 13,732 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए। परीक्षा दो सत्रों में आयोजित की गई थी – सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक और दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे तक। यह परीक्षा जम्मू प्रांत के जम्मू, डोडा और राजौरी जिलों में, और कश्मीर प्रांत के श्रीनगर, बारामूला और अनंतनाग जिलों में आयोजित की गई थी।

इस परीक्षा में शामिल विभिन्न पदों के लिए इस वर्ष केवल 80 रिक्तियां हैं। जूनियर स्केल जेकेएएस अधिकारियों, जेएंडके अकाउंट्स (राजपत्रित) सेवा और जेएंडके पुलिस (राजपत्रित) सेवा के लिए विज्ञापन इस साल 22 अगस्त को जम्मू और कश्मीर लोक सेवा आयोग द्वारा जारी किए गए थे, जिसमें 7 दिसंबर को प्रारंभिक परीक्षा की तारीख तय की गई थी। आवेदन प्रक्रिया 25 अगस्त से शुरू हुई और जमा करने की अंतिम तिथि 30 सितंबर (विस्तारित) निर्धारित की गई थी। आयोग ने 1 दिसंबर को अपनी वेबसाइट पर एडमिट कार्ड उपलब्ध कराए।

एक हफ्ते से भी कम समय पहले रखी गई आयु छूट की मांग

एक दिन बाद 2 दिसंबर को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एलजी मनोज सिन्हा के सामने आयु में छूट की मांग अचानक उठाई। यह परीक्षा की निर्धारित तिथि से एक सप्ताह से भी कम समय पहले किया गया था। जाहिर तौर पर ये हैरान करने वाली बात भी है कि इतनी देर से ऐसी मांग रखी जा सकती है!

संभागवार देखें तो जम्मू प्रांत के 37 परीक्षा केंद्रों में 9,885 उम्मीदवारों ने परीक्षा दी, जबकि कश्मीर प्रांत में स्थापित 16 परीक्षा केंद्रों में 3,847 उम्मीदवार उपस्थित हुए।

परीक्षा के संचालन से जुड़े बहुत से कर्मचारियों को शनिवार (6 नवंबर) तक पता नहीं था कि यह आयोजित होगी या नहीं! ऐसे में उनकी दुर्दशा की कल्पना करने की कोशिश भी न करें। कई, बल्कि अधिकांश परीक्षा केंद्र सरकारी स्कूलों में बनाए गए थे। हर रोज, ये स्कूल नगरपालिका सीमा में सप्ताह के छह दिन सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक और सभी 20 जिलों में नगरपालिका सीमा के बाहर सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक संचालित होते हैं।

पर्यवेक्षी कर्मचारियों को सुबह 7.30 बजे स्कूल परिसर में बुलाया गया था, जो उनके आने के समय से बहुत पहले था। और शाम 5.30 बजे के बाद ही वे स्कूल परिसर (परीक्षा केंद्र में बदल गए) से बाहर निकल सके।

यहां इस बात को विस्तार से समझाया जा रहा है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परीक्षा आयोजित कराने में कितना प्रयास लगता है। परीक्षा से पहले अधिसूचना जारी की जाती है, हजारों अभ्यर्थी फॉर्म भरते हैं, फिर परीक्षा के प्रश्नपत्र छपवाए जाते हैं। जाहिर है, पूरी प्रक्रिया की गोपनीयता बनाए रखना बेहद जरूरी है। फिर इन प्रश्नपत्रों को अलग-अलग पैकेट में रखकर, अच्छी तरह सील करके हर केंद्र पर भेजना होता है। संयोग से, ऐसे सैकड़ों केंद्र फैले हुए हैं।

एलजी मनोज सिन्हा के कार्यालय ने क्या बताया

एलजी सिन्हा के कार्यालय ने शनिवार (6 दिसंबर) को एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें 2 दिसंबर (मंगलवार) को सीएम कार्यालय से एक पत्र मिला था। यह पत्र उसी दिन सीएम कार्यालय को वापस भेज दिया गया और पूछा गया कि अगर आयु में छूट की मांग मान ली जाती है, तो क्या 7 दिसंबर को परीक्षा आयोजित करना संभव है? एलजी कार्यालय ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थगन (7 दिसंबर, रविवार को निर्धारित परीक्षा को रद्द करने) की कोई मांग नहीं थी। एलजी सिन्हा के कार्यालय के बयान में कहा गया है कि उसी दिन 2 दिसंबर को प्राप्त सीएम के पत्र का जवाब देने के बाद एलजी कार्यालय को शनिवार (6 दिसंबर) तक कोई और पत्र या जवाब नहीं दिया गया था।

एलजी कार्यालय के बयान में बताया गया है कि उक्त परीक्षा की अधिसूचना कुछ महीने पहले इसी साल 22 अगस्त को जारी की गई थी। उस अधिसूचना में, उम्मीदवारों की आयु स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई थी और पिछले कुछ वर्षों से इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके अलावा, एलजी कार्यालय के बयान में बताया गया है कि परीक्षा की तारीख 7 दिसंबर निर्धारित की गई थी और यह अधिसूचना एक महीने पहले 6 नवंबर को जारी की गई थी।

सवाल है कि यदि नियत तिथि (7 दिसंबर, रविवार) की अधिसूचना कम से कम 30 दिनों तक सार्वजनिक डोमेन में थी, तो मुख्यमंत्री कार्यालय 2 दिसंबर तक आयु में छूट का अनुरोध भेजने का इंतजार क्यों कर रहा था? 22 अगस्त को परीक्षा की अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद उसने उम्मीदवारों के लिए आयु में छूट की मांग क्यों नहीं की?

नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के विधायक तनवीर सादिक ने कुछ दिन पहले एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट डालकर कहा था कि उम्मीदवारों के लिए आयु में छूट होनी चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इसी मांग को दोहराते हुए एक पोस्ट किया था। पूछा जाना चाहिए कि मुख्यमंत्री ने आयु में छूट की मांग करते हुए उपराज्यपाल को पत्र लिखने के लिए 22 अगस्त से 2 दिसंबर तक का इंतजार क्यों किया? उन्होंने 100 दिन और सितंबर, अक्टूबर और नवंबर के महीने बीत जाने दिए और इस मुद्दे को बिल्कुल आखिरी समय पर उठाया।

सीएम उमर अब्दुल्ला पर उठ रहे सवाल

आयु में छूट की मांग कर रहे उम्मीदवारों की मदद करने के मुख्यमंत्री उमर के इरादे और गंभीरता पर अब सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि अगर वह वाकई कुछ उम्मीदवारों को उम्र सीमा में छूट दिलाने के इच्छुक थे, तो उन्हें एलजी मनोज सिन्हा को बहुत पहले ही पत्र लिख देना चाहिए था। कुछ लोगों का कहना है कि यह काम अगस्त में ही कर देना चाहिए था।

कुल मिलाकर, उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच कुछ छोटी-मोटी अनावश्यक बातों के बाद यह विवाद स्वाभाविक रूप से खत्म होता दिख रहा है। उमर सरकार द्वारा 2 दिसंबर को आयु सीमा में छूट के बारे में लिखना बेहद अनुचित था। यह काम बहुत पहले किया जा सकता था और तब शायद कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आते। अब भी, अगर उमर अब्दुल्ला को लगता है कि इस परीक्षा के अभ्यर्थियों को आयु सीमा में छूट की जरूरत है, तो उन्हें उपराज्यपाल को फिर से पत्र लिखना चाहिए और देखना चाहिए कि उनका क्या जवाब आता है। लेकिन इस तरह से परीक्षा को पटरी से उतारने की कोशिश करना बिल्कुल भी उचित नहीं था।

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