Friday, March 20, 2026
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खेती बाड़ी-कलम स्याही: क्या है बंगाल के मुस्लिम बहुल सीटों का गणित?

पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। यहां 112 सीट ऐसी है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। वर्तमान विधानसभा में इन 112 सीटों में से 106 पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पाले हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोलकाता आ रहे हैं। यहां के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वह एक रैली को संबोधित करेंगे। लेकिन इन सबके बीच बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं के मन में क्या चल रहा है, हुमायूं कबीर की पार्टी किस ओर करवट लेगी, इन सब मुद्दों पर पर भी ध्यान देने की जरुरत है।

दरअसल तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद हुमायूं कबीर ने ‘जनता उन्नयन पार्टी ‘ बनाई थी। इस नए राजनीतिक दल की एंट्री के बाद से ही बंगाल के मुस्लिम वोटों के लिए 2026 की चुनावी जंग आधिकारिक शुरुआत हो गई थी।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। यहां 112 सीट ऐसी है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। वर्तमान विधानसभा में इन 112 सीटों में से 106 पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पाले हैं। अंक गणित के लिहाज से समझें तो उसे शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है।

2021 में तृणमूल कांग्रेस ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं, सफलता दर 60 फीसदी थी। इस जीत के साथ तृणमूल को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया। वहीं मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने 72 हिंदू-बहुल सीटें जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उसकी एक भी न चली।

इन सब आंकड़ों पर नजर घूमाने के बाद जब हम बंगाल में हुमायूं कबीर के उदय को देखते हैं तो बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन औवेसी की पार्टी के सियासी प्रयोग के बारे में सोचने लगते हैं। 2025 के बिहार चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में 5 सीटें जीतीं। औवेसी ने मुस्लिम वोटों में बिखराव लाने का काम किया और यही वजह रही कि इन इलाकों में महागठबंधन को कई सीटों का नुकसान हुआ। 2020 में भी औवेसी की पार्टी ने इन इलाकों में ऐसा ही कुछ किया था।

भाजपा के रणनीतिकार इस फार्मूले पर भी जोड़-घटाव कर रहे हैं लेकिन बिहार के सीमांत जिले और पश्चिम बंगाल की कहानी कई मायनों में अलग है। बिहार में, मुस्लिम मतदाता सीमावर्ती जिलों की एक संकीर्ण पट्टी में केंद्रित हैं। सीमांचल के 4 जिलों में ही 27 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है। जबकि बंगाल में मुस्लिम आबादी काफी अधिक होने के बावजूद वह कहीं अधिक बिखरी हुई है। कोलकाता के शहरी इलाकों, उत्तर के ग्रामीण बेल्ट और दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी फैली है। शीर्ष 5 मुस्लिम बहुल जिलों में लगभग 90 सीटें आती हैं, लेकिन मुस्लिम राज्य भर के दर्जनों अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी अल्पसंख्यक हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की जनसंख्या में मुस्लिम लगभग 27 फीसदी हैं। हालांकि भाजपा दावा करती है कि पिछले दशक में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 फीसदी या उससे अधिक हो गई है।

बंगाल के 3 जिले- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे अधिक है। दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35 फीसदी से ऊपर है। इन क्षेत्रों में 89 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है। साथ ही 112 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 25 फीसदी से अधिक है।

2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 35 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर वाले 89 में से 87 सीटें जीती थीं, यह लगभग एकतरफा जीत था। 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से तृणमूल ने 106 पर कब्जा किया, जबकि भाजपा के पास केवल 5 सीटें रहीं। 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता दर लगभग शून्य थी।

‘एक्सिस माई इंडिया’ के 2021 के एग्जिट पोल डेटा के अनुसार, लगभग 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 83 फीसदी हो गई।

वहीं इन सब आंकड़ों के कहानी के बीच पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने एलपीजी संकट के बीच सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने बताया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 16 मार्च को कॉलेज स्क्वायर से डोरिना क्रॉसिंग तक जुलूस निकालेंगी।

मुख्यमंत्री ने मौजूदा गैस संकट और बढ़ती कीमतों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि पश्चिम एशिया संकट कई दिनों से बना हुआ है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने समय रहते कोई तैयारी या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। उनके अनुसार, गैस जैसी जरूरी वस्तु की आपूर्ति को लेकर केंद्र की लापरवाही के कारण आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

मतदाताओं के मिजाज, राजनीतिक दलों की रणनीति, रसोई गैस की किल्लतों की मौजूदा स्थितियों के बीच खबर आ रही है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों में कराये जा सकते हैं।

निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी। अधिकारी ने कहा कि निर्वाचन आयोग के नयी दिल्ली कार्यालय में एक और बैठक होगी, जिसके बाद बंगाल चुनाव 2026 पर अंतिम निर्णय लिया जायेगा। अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीट के लिए चुनाव अगले महीने यानी अप्रैल में होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर राज्य की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने कोलकाता में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बैठक के दौरान एक या दो चरणों में चुनाव कराने की मांग की थी। सुरक्षा बल सहित अन्य अधिकारियों से भी ऐसे ही सुझाव मिले थे।

गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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