नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में बढ़ते झूठी शिकायतों, मनगढ़ंत आरोपों और फर्जी सबूतों के खतरे से निपटने के लिए बड़ा कदम उठाया है।
मंगलवार को शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस याचिका पर विचार करते हुए यह आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होने की संभावना है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका, कानूनी ढांचे की खामियों पर सवाल
याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान कानूनी ढांचा अनजाने में ही सही, लेकिन झूठी शिकायत करने वालों को संरक्षण दे रहा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 215 और 379 की मौजूदा व्याख्या ने कई दंडात्मक प्रावधानों को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बना दिया है। इसके कारण अपराधियों को पुलिस थानों में झूठी एफआईआर की बाढ़ लाने और अदालतों पर फर्जी सबूतों व बयानों का बोझ डालने की खुली छूट मिल गई है।
इस मुद्दे की संवेदनशीलता को उजागर करने के लिए याचिका में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले की एक दिल दहला देने वाली घटना का जिक्र किया गया है। यहां कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसाए जाने की धमकी मिलने के बाद एक पूरे परिवार ने आत्महत्या कर ली थी।
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याचिका में कहा गया है कि झूठे आरोपों के कारण निर्दोष नागरिकों को न केवल सामाजिक बदनामी और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, बल्कि वे आर्थिक रूप से भी टूट जाते हैं। कई मामलों में न्याय मिलने तक वर्षों की कानूनी लड़ाई बेकसूर लोगों के जीवन को बर्बाद कर देती है।
याचिका में एनसीआरबी डेटा का भी जिक्र
याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार, एनसीआरबी के पास झूठी शिकायतों और ‘परजरी’ (झूठी गवाही) से जुड़े मामलों का कोई ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है, जो इस समस्या से निपटने में तंत्र की विफलता को दर्शाता है। वर्तमान स्थिति यह है कि पीड़ित व्यक्ति खुद जालसाजों के खिलाफ सीधे कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता, जब तक कि उसे अदालत से लंबी प्रक्रिया के बाद अनुमति न मिल जाए।
याचिका में मांग की गई है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) और BNSS के प्रावधानों की ऐसी उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की जाए जिससे पीड़ितों को झूठे सबूत देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने में आसानी हो। याचिकाकर्ता ने जोर दिया कि आपराधिक कानून का बेरोकटोक दुरुपयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए सीधा खतरा है।
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सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकने और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से निर्दोष नागरिकों की रक्षा के लिए प्रभावी दिशानिर्देश जारी करे।

