सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 12 साल से कोमा में पड़े 31 वर्षीय युवक हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी। अदालत ने डॉक्टरों की निगरानी में कृत्रिम लाइफ सपोर्ट हटाने की इजाजत दी है। हरीश पिछले 12 वर्षों से ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (अचेतन अवस्था) में थे। इसे देश में इस तरह का पहला मामला माना जा रहा है, जिसमें शीर्ष अदालत ने सीधे हस्तक्षेप कर पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दी है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मरीज की गरिमा और उसके सर्वोत्तम हित को देखते हुए जीवन को कृत्रिम तरीके से लंबे समय तक बनाए रखना उचित नहीं है, खासकर तब जब चिकित्सकीय रूप से उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो। अदालत ने निर्देश दिया कि लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया दिल्ली एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में की जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सकीय सहायता से दी जाने वाली पोषण और जल आपूर्ति (CANH) सामान्य देखभाल का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक चिकित्सकीय हस्तक्षेप है जिसे डॉक्टरों की सलाह और निगरानी में दिया जाता है। इसलिए मेडिकल बोर्ड अपनी विशेषज्ञ राय के आधार पर इसे हटाने का फैसला ले सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मूल सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मरीज को मरने दिया जाए या नहीं, बल्कि यह देखना जरूरी है कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में चिकित्सा हस्तक्षेप से जीवन को बढ़ाते रहना सही है या नहीं।
2013 में हादसे के बाद से कोमा में थे हरीश राणा
हरीश राणा, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी और पंजाब यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र हैं। वर्ष 2013 में अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी। तब से वह पूरी तरह अचेत अवस्था में हैं और पोषण तथा पानी के लिए फीडिंग ट्यूब पर निर्भर हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में उनकी न्यूरोलॉजिकल स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है और उन्हें लगातार देखभाल की जरूरत पड़ती है।
लंबे समय तक इलाज और थेरेपी के बाद उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने इस मामले में कई मेडिकल जांच कराई। गाजियाबाद और मेरठ के डॉक्टरों की प्राथमिक मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 100 प्रतिशत विकलांगता के साथ क्वाड्रिप्लेजिया की स्थिति में बताया और सुधार की संभावना बेहद कम बताई। इसके बाद एम्स की द्वितीयक मेडिकल बोर्ड ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय है और सुधार की कोई संभावना नहीं है।
फैसला सुनाने से पहले अदालत ने हरीश राणा के परिवार से भी मुलाकात की और उनकी पीड़ा को दर्ज किया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मरीज के परिजनों ने वर्षों तक पूरी निष्ठा के साथ उनकी देखभाल की है और यह मामला सिर्फ कानून का नहीं बल्कि संवेदनशील मानवीय परिस्थितियों का भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कुछ दिशानिर्देश भी तय किए
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लाइफ सपोर्ट हटाने का अर्थ मरीज को छोड़ देना नहीं है, बल्कि यह प्रक्रिया पूरी संवेदनशीलता और व्यवस्थित तरीके से की जानी चाहिए ताकि मरीज को कम से कम पीड़ा हो और उसकी गरिमा बनी रहे।
इसके साथ ही अदालत ने भविष्य में ऐसे मामलों के लिए कुछ दिशानिर्देश भी तय किए हैं। अदालत ने कहा कि जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारी विशेषज्ञ डॉक्टरों के पैनल तैयार करें, जो पैसिव यूथेनेशिया से जुड़े मामलों का मूल्यांकन कर सकें। यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले में तय किए गए ढांचे के अनुरूप होगी, जिसमें गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी गई थी।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि पैसिव यूथेनेशिया को लेकर स्पष्ट कानून बनाने पर विचार किया जाए, क्योंकि इस विषय पर अभी विधायी स्तर पर स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।
इच्छामृत्यु को लेकर भारत में क्या हैं नियम
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में अपने ऐतिहासिक ‘कॉमन कॉज’ फैसले में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) को कानूनी मान्यता दी थी और इसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया भी तय की थी। अदालत ने कहा था कि किसी असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीज को गरिमा के साथ जीवन समाप्त करने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए कुछ सख्त नियमों का पालन करना जरूरी होगा।
1. जब मरीज ने पहले से ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो
अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हुए पहले ही अपनी इच्छा लिखित रूप में दर्ज कर देता है, तो इसे ‘लिविंग विल’ कहा जाता है। इसमें व्यक्ति साफ तौर पर लिखता है कि अगर भविष्य में वह ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो जाए, जिससे ठीक होना संभव न हो, तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर कृत्रिम रूप से जीवित न रखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए कुछ शर्तें तय की हैं- लिविंग विल लिखने वाला व्यक्ति 18 साल से अधिक उम्र का और मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए। दस्तावेज पर दो गवाहों के सामने हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। और इसे न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा सत्यापित किया जाना जरूरी है।
इसके बाद भी प्रक्रिया यहीं खत्म नहीं होती। इलाज कर रहे डॉक्टरों, अस्पताल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी जरूरी होती है। दोनों मेडिकल बोर्ड सहमत होने पर ही वेंटिलेटर या अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाए जा सकते हैं। पूरी प्रक्रिया की जानकारी मरीज के परिवार को दी जाती है और किसी विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
2. जब कोई ‘लिविंग विल’ मौजूद न हो
अगर मरीज ने पहले से लिविंग विल नहीं बनाई है, तब भी कुछ परिस्थितियों में परिवार या करीबी लोग लाइफ सपोर्ट हटाने की मांग कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए भी सख्त प्रक्रिया तय की गई है।
सबसे पहले अस्पताल के डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड मरीज की स्थिति की जांच कर रिपोर्ट तैयार करता है। इसके बाद जिला कलेक्टर 3 से 5 विशेषज्ञ डॉक्टरों का दूसरा मेडिकल बोर्ड गठित करते हैं, जो पहली रिपोर्ट की समीक्षा करता है। अगर दोनों बोर्ड सहमत होते हैं, तो मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट मरीज से मिलकर और दस्तावेजों की जांच के बाद अंतिम फैसला लेते हैं। विवाद होने की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
हरीश राणा का मामला क्यों है खास
हरीश राणा का मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह भारत में पैसिव यूथेनेशिया का ऐसा पहला मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई पूरी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है। 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले में जो नियम बनाए गए थे, वे अब तक किसी मामले में इस तरह लागू नहीं हुए थे।
इसी सिलसिले में 11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के एम्स को निर्देश दिया था कि वह एक दूसरी मेडिकल बोर्ड बनाकर हरीश राणा की स्थिति की विस्तृत जांच करे। इस मामले में प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की पूरी प्रक्रिया अदालत की निगरानी में चल रही है।
गौरतलब है कि भारत में इच्छामृत्यु पर बहस की शुरुआत 2011 के अरुणा शानबाग केस से हुई थी। मुंबई के केईएम अस्पताल में कार्यरत नर्स अरुणा शानबाग पर 1973 में एक वार्ड अटेंडेंट ने हमला किया और उनका यौन उत्पीड़न किया। इस हमले में लगी गंभीर दिमागी चोटों के कारण वह कोमा में चली गई थीं।
करीब 36 साल तक इसी हालत में रहने के बाद 2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर लाइफ सपोर्ट हटाने की मांग की थी। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी रूप से मान्यता दी, लेकिन अरुणा शानबाग को इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि वह बिना मशीनों के सांस ले पा रही थीं। बाद में 2015 में अरुणा शानबाग की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो गई। यही मामला आगे चलकर 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले और मौजूदा कानूनी व्यवस्था की नींव बना।

