Friday, March 20, 2026
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कहानीः अबे साले तुम लोग…

यह कथा बयान करती है कि बँटवारा सिर्फ नक्शे पर नहीं होता; वह इंसान के भीतर घर बना लेता है। एक सीधा-सादा आदमी, जिसने बस रिश्तों की आवाजाही पर भरोसा किया, अचानक सरहदों की निगरानी में खड़ा “मुल्ज़िम” हो जाता है, बिना किसी जुर्म, बिना कोई सुनवाई। यहाँ गुनाह किसी ने किया नहीं, लेकिन सज़ा पीढ़ियाँ काटती हैं। शक की नज़रों में, पहचान की दीवारों के बीच, और उन यादों के बोझ तले जिनका कोई पासपोर्ट जारी नहीं होता। अंजुम और दलजीत की बातचीत में एक छोटे शहर का साझा जीवन, रोटी और चावल की नोकझोंक, बेकरी की महक, कॉलेज की शरारतें, ये सब धीरे-धीरे समय की ठंडी उँगलियों से छूकर  किसी पत्थर में तब्दील हुए जाते हैं।

फर्ज करो कि तुमने कोई जुर्म नहीं किया हो लेकिन उसकी सजा तुम काट रही हो। और तुम सोचती रहो कि गलती किसकी थी, तुम समझो भी कि वक्त की थी लेकिन खुद को बरी न कर पाओ।

अंजुम का चेहरा घने बादल की तरह धूसर सा होने लगा, बोलते-बोलते चाय में दो चम्मच और चीनी डाल कर घोलने लगी। चाय पहले से ही बहुत मीठी बनी थी।

दलजीत उसकी इस आदत से परिचित थी। उसे बहुत मीठी चाय पीने की आदत थी, वह गयी नहीं है। परेशान हो तो और भी मीठा डाल कर पीने लगती थी।

दलजीत ने पलट कर कहा “मैं सजा क्यों भोगूंगी जो गुनाह मैंने नहीं किया है। नहीं किया है, कम से कम मैं तो जानती हूं।”

“मैं नहीं परवाह करती कि दूसरे क्या सोच रहे हैं।”

“हां, ऊपर से हर कोई यही कहेगा लेकिन तुम्हारे जानने से क्या होता है दोस्त, जब तुम्हारे अपनों की आंखों में शक की एक लकीर उभर आये या तुम्हे लगे कि उन्हे तुम पर यकीन नहीं तो सजा तो अपने आप ही मिल जाती है ना।”

अंजुम बोलती जा रही थी। हाथ में चाय का कप थामे जैसे चाय को मुँह से लगाना भूल जाती थी वैसे ही बात करना भी।

“ये जो गुनाहगारी है, उसमें अपनो आंखों की निगहबानी में कोई चलता है। ये आँखे जिसमें सही-गलत का पूरा बहीखाता है जो सीधे साधे लोग लिये घूमते हैं। उन्होंने पूरी उम्र खुद को एक अलग ही आदमी में ढ़ाला था। तुम जानती हो, कोई कुछ कह न दे.. ”

अंजुम अब्बू के बारे में बताने लगी। बोलते हुए अंजुम आज एकदम अलग लग रही है। जैसे अपनी आवाज़ और अंदाज़ से बता रही हो कि दोनों की मुलाकात में उम्र के चार साल बढ़ चुके हैं।

“उनको यहीं अमरूद के बाग वाले कब्रिस्तान में दफनाया गया है, याद है ना वो बागीचा!”

अमरूद की बाग वाला कब्रिस्तान। दलजीत उसे कैसे भूल सकती थी। उसने और अंजुम ने वहाँ से कितनी बार अमरूद खरीदा था। कब्रिस्तान के हिस्से में अब भी अमरूद का बाग था और आधा हिस्सा मिट्टी में घुलती मिट्टी का था। वहाँ पर मुश्किल से दस एक ही कब्र ऐसी थी जिसको पक्का कराया गया था। ज्यादातर कब्रे कच्ची थीं।

हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के बाद अमरूद के बाग के बिलकुल करीब में नुमायश कैम्प वाली जगह शरणार्थियों का मोहल्ला बन गया था। पहले ये छोटा मोहल्ला था फिर दंगे होते रहे और दो बार तीन बार अलग शहरों से उजड़े लोगों के घर यहाँ बसने लगे। पहले जब मेला मेरठ नौचंदी से चलकर घुघाल की नुमाइश बनता तब यहीं पर सजता था लेकिन अब वह जगह कम पड़ने के चलते शहर के पार चला गया है। नौगजा पीर और गोगा वीर के झंडे लिए कभी कभी जुलूस निकलते थे। वो लोग भी अमरूद की बाग के सामने खड़े होकर ढोल-नगाड़ा बजाते थे, लेकिन अब वह भी शहर से बाहर चल कर निकल जाते हैं।   

यह अमरूद का बाग वैसे तो अब भी बाग था जिसमें अनगिनत अमरूद के पेड़ थे। इसके गेट पर अमरूद की ठेलियां लगी रहती थी। हरे अमरूद के भीतर सुर्ख गूदे निकलते थे। ऊपर से ठेलियों वाले लोग गुलाब के फूलों से उसे सजा देते थे। जीवन-मृत्यु का ऐसा मेला शायद ही कहीं हो।

उससे थोड़ी ही दूर पर उन दोनों का कॉलेज था। उन दोनों को कभी यह ख्याल भी नहीं आया कि जो अमरूद खा रही हैं वह किसी कब्र से खाद पानी लेकर बड़ा हुआ है। वैसे तो बीएससी करते समय दोनों हँसती रहती थी कि धरती का ऐसा कोई बाशिन्दा न हुआ है जो किसी न किसी तरह अपने पूर्वजों की खाद पानी लेकर न बड़ा हुआ हो।

 छोटे शहरों में बहुत छोटी बात भी किसी को मशहूर कर सकती है। अंजुम और दलजीत की दोस्ती मशहूर थी। दोनों के पुरखों का भी वतन कहीं और छूट गया था। लेकिन उन दोनों का वतन यही था। उसकी एक सरहद मंगल बाजार तो दूसरी दिल्ली रोड थी। वह तो इतनी कम दूरी में बसा था कि उसे कालेज, अमरूद की बाग यानी कब्रिस्तान फिर नुमाइश कैम्प के बीच में नापा जा सकता था। उनके वतन में चाट-फुल्की, कपड़े-लत्ते और एकदूसरे को एकदूसरे के घर छोड़ने जाने की यात्रा होती थी। कम्पनी बाग के फूलों की चोरी करते समय वो सरहद पार करने जैसी जुगत लगाती थीं।

दलजीत की जाई यानी उसकी दादी और अंजुम के अब्बू दोनों ही अपने  वतन में रह कर ‘वतन’ की याद करते हुए घंटों बातें करते थे।

दलजीत और अंजुम ने गुरू नानक इंटर कालेज से इंटर साइंस में पास किया और साथ ही बीएससी में महराज सिंह कालेज में एडमिशन ले लिया। दलजीत का घर तो महाराज सिंह कालेज के पास था लेकिन अंजुम के घर के पास एक गर्ल्स कालेज था। लेकिन अंजुम के अब्बू की शुरू से ख्वाहिश थी कि अंजुम महाराज सिंह कालेज से पढ़े फिर इसके लिए अंजुम को बाकी लड़कियों की तरह लड़ना भी नहीं पड़ा।

बहुत साल तक अंजुम के अब्बा फलों का ट्रक चलाते रहे। उन्होंने पूरा हिन्दुस्तान इस बहाने देख लिया था लेकिन एक एक्सीडेंट ने उनके हाथ कमजोर कर दिये और ड्राइवर के हाथों की कमजोरी, आंखों की थकन में उतर आयी। उनकी ड्राइवरी के किस्से से पहले दलजीत को ट्रक ड्राइवर से बहुत डर लगता था। पता नहीं उन लोगों की लाल आँखें बड़ी खूंखार लगती थी। बस लगता था कि जो सामने आता होगा उसको ठोक-ठाक के निकल जाते होंगे। लेकिन ग्रेजुएशन फर्स्टईयर से थर्ड ईयर तक अब्बू से जितने किस्से सुने लगा कि ड्राइवर की जिन्दगी में तो किस्से ही किस्से हैं। उनके पास तो ऐसे किस्सों की भरमार है कि अलिफ लैला की कहानियां बन जायें।

“अजी गोवा जाते समय कितने दरिया पड़ते हैं। चारो तरफ पहाड़, फूल और खाने के लिए इफरात मछली मिलती है। बस जी रोटी नहीं मिलती है।

रोटी नहीं खाते हैं वो लोग…

दलजीत और अंजुम रोटी ज़ोन के थे। उनके बीच सिर्फ शाइस्ता थी जो चावल ज़ोन की थी। जब ये कहती कि आज हमारे घर नमकीन चावल बना है तो वह हंसती थी।

यार, तुम लोगों का बिना चावल पेट कैसे भरता है।

और वो दोनों उसे चिढ़ाती थी कि बहन तू रोज रोज चावल कैसे खा लेती है।

अंजुम के अब्बू तुरंत ही शाइस्ता की ओर हो जाते। उनका चावलों वाला किस्सा शुरू हो जाता।

“अजी मोटे मोटे लाल लाल चावल होते हैं…रोटी तो कोई खाता ही नहीं था वहाँ।”

अब्बू की सीधी सरल दुनिया थी। अंजुम उनकी इकलौती बेटी थी। अंजुम की अम्मी को दूसरी औलाद नहीं हुई। लेकिन अब्बू ने कभी दूसरी औलाद की फिक्र नहीं की। ड्राइवरी से लौटे तो बेकरी का काम करने लगें।

अंजुम के लिए अब्बू दुनिया के सबसे अच्छे पिता थे बस उनकी एक ही बात उसे परेशान कर देती थी। उनकी पाकिस्तान की याद, उनको पाकिस्तान जाने की हुड़क उठती थी। वो भी चार छह साल में एक बार उठे तो समझ आये वो तो चाय-सिगरेट की तरह उठती थी। बचपन में तो पूरा परिवार जाता था पाकिस्तान। शुरू में अंजुम को बहुत अच्छा लगता था लेकिन जब से कालेज आयी है तो पढ़ाई छोड़कर जाने को राजी नहीं होती है।

“यार, हर साल जाते हैं वो पाकिस्तान, वहां अपना मोहल्ला देखेंगे। उनसे इंडिया की तारीफे करेंगे और मुमानी से पुरानी बातें करेंगे। न मालूम क्या मिलता है उनको?”

अंजुम कभी कभी खीज कर कहती थी।

दलजीत को अपनी जाई की याद आ जाती थी। दलजीत की जाई जी तो अपनी यादों के साथ चली गयीं। उनकी इच्छा की एक दफा उनको पाकिस्तान कोई ले जाये रह ही गई। दलजीत के घर के हालात ऐसे न थे कि उन्हें कोई पाकिस्तान लेकर जाता। दूसरे वहाँ कौन बचा है, इसका कोई पता ठिकाना नहीं था।

अंजुम आज बहुत उम्रदराज लग रही थी। दोनों बैठकर अब्बू को याद कर रहे थे। जिन्दगी अपने पेचीदा रास्तों से बड़े बड़ो का तरीका बदल देती है। आधा हँसने-आधा बोलने वाली दोनों लड़कियां सिर्फ बोल रही थी। दोनों ने समझ लिया कि जिन्दगी ने एक तीखा मोड़ ले लिया है। आदमी फलसफे में यूं ही नहीं बोलने लगता है। आज दोनों कितनी बातें फलसफें में कर रही थी।

दोनों एक ही कालेज में पढ़े थे। और एक दूसरे के जानी दुश्मन की तरह जानी दोस्त रहे हैं। जब तक कालेज रहा।  दोनों एक साथ कालेज गये, एक साथ खाना-खाया और रात भर एक साथ कचर-कचर करते हुए गुजारी है।

दलजीत का तो अंजुम की गली में आते ही स्वाद जाग जाता था। अंजुम के घर बेकरी थी। मुहल्ले के बीचो-बीच बेकरी के चलते गली में ताजे बिस्किट और पापे की महक घुली रहती थी। सुबह से लेकर शाम तक लोगों का आना जाना था। बाजार में पैकेट के खारी और पापे मंहगे पड़ते थे, लोग यहां से खरीदते थे। उसकी जाई को यहाँ के रस बहुत पसंद थे और उसे अंजुम का घर। किलो के भाव में ढ़ेढ़ से दो किलो पड़ता था। बच्चे तो ऐसे ही सफाई के वक्त सुबह सुबह मांगने आ जाते थे।

अंजुम के अब्बा की बेकरी। वैसे इस बेकरी का कोई नाम नहीं है, गलियों मोहल्लों में चलती इन दुकानों के नाम भला कौन रखता है? लेकिन अंजुम ने अपनी बेकरी के नाम पर इतने बच्चों से लड़ाई झगड़ा और नखरा मोल ले रखा है कि उसके घर को लोग ‘अंजुम की बेकरी’ कहने लगे। माजिद मियां ने ये बेकरी कुल दस साल पहले शुरू की थी, उसके पहले फलों की ढ़ुलाई वाली ट्रक चलाते थे। ड्राइवर आदमी थे तो चाय और सिगरेट उनके होंठों से लगी रहती थी और इसके साथ तमाम तरह की बातें। अंजुम को अपने अब्बा पर बहुत गुमान था। जब मोहल्ले के तमाम पिता अपनी बेटियों पर पाबन्दियों के फरमान सुनाते थे, ऐसे मे उसके अब्बा उसे कैसे चोरी से घूम आने, बाजार जाने के पैसे दे देते थे।

दोनों लड़कियों को अपने घर की माली हालत मालूम थी। जैसे उनके घर की दीवारों से काई चिपकी थी और ओंदी दीवार पर कहीं पीपल तो कहीं पाकड़ उगा था वैसे ही दोनों एकदूसरे की दुनिया में थी। उन्होंने एक दूसरे की ओंदी दुनिया में जगह बना ली थी।  वो एक दूसरे से कुछ भी नहीं छुपाती थी। दलजीत के पापा जी का काम इस शहर में जम ही नहीं पाया। उसकी  मम्मी मलेर कोटला अपने मायके चलने के लिए कहती थीं। वहाँ पर उनके भाइयों का जमा-जमाया काम था। दूसरे वो बुलाते भी रहते थे।

अंजुम को अपने मोहल्ले और अब्बा की माली हालत मालूम थी। उसके अब्बू पूरे समय बेकरी के काम में लगे रहते थे लेकिन कच्चा माल मंहगा हो रहा था दूसरे लकड़ी और कोयला भी मंहगा हो गया था। काम पर भी किसी न किसी को रखना पड़ता था। आमदनी इतनी नहीं थी कि चार लोगों को काम पर रखें। फिर माहौल बदल रहा था। शहर बदल रहा था। भरोसे का रिश्ता बदल रहा था। बाजार में ज्यादातर दुकानें हिन्दुओं की थी लेकिन अब वो इतने खुलूस से पैकेट नहीं मंगवाते थे। दूसरे ग्राहकों को बड़ी कम्पनियों के पापे और रस पसंद आने लगे थे।

जब दोनों अलग हुई तो इतना ही था।

………………..

दोनों बरसों बाद एक साथ बैठीं थीं। इस बीच शहर में दो बार दंगे हो चुके थे। पुरानी दुकानों की जगह नयी दुकानों ने ले ली थी।

यादों बेकरी की पुरानी महक की तरह लहरों में उठ बैठ रही थी। अब्बू की परछाई हर जगह थी। अंजुम का एक बड़ा सा घर था लेकिन उस घर के कई हिस्सेदार थे। अंजुम के अब्बा के हिस्से में एक दुकान और एक कमरा था और आगे थोड़ी सी जगह थी यही पर उनकी बेकरी थी। दलजीत की  यादों में अब भी उस घर की वह खिड़कियां थी जिसमें लोहे की छड़ या कोई भी फ्रेम नहीं लगा था यानि लकड़ी का पाट खोलो तो पूरा बाहर।

दिमाग में यादों का रेला आ जा रहा था। रह रह दलजीत को लग रहा था कि अभी अब्बू कहीं से निकलेंगे और कहेंगे “भाई दलजीत के लिए चाय-वाय ले आओ…” अब्बू की चौड़ी-चौड़ी हथेलियों की लम्बी ऊँगलियों में या तो सिगरेट या चाय या फिर मैदा सना रहता था। उनके हाथ कभी भी खाली नहीं दिखते थे।

अंजुम बोले जा रही थी। चाय तब तक बिलकुल ठंडी हो गयी थी। उसे ख्याल ही न पड़ा कि सामने चाय रखी है, एक कप और चाय पीते हैं।

 “तुम भी अब्बू की तरह बहुत चाय पीती हो। पुरानी बीमारी है तुम्हारी।” अंजुम ने उसे टोका।

“ तू तो जानती है कि अब्बू को पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत क्यों थी। अम्मी भी तो अब्बू को पाकिस्तान में मिली थीं। अम्मा दस साल की थी, नानी के साथ पाकिस्तान गयी थी। अभी मुश्किल से दस दिन ही हुए थे कि 1965 की जंग छिड़ गयी। मेरे नानू हिन्दुस्तान में ही थे, उन्हें सदमा लग गया। उन दोनों के लौटने से पहले ही खतम हो गये। अब्बू तो शुरू से ही हरफन मौला थे। अब्बू तीन साल के थे जब उनके अब्बू ने उनकी माँ को तलाक दे दिया था। अब्बू अपनी अम्मी के साथ खैरात में ननिहाल पहुँच गये थे। जल्दी ही उनकी अम्मी का भी दूसरा निकाह करा दिया गया। अब्बू कभी छोटी खाला के घर तो कभी बड़ी खाला के घर रह कर पले। फिर धीरे धीरे लोगों ने खाला के दिमाग में भर दिया कि पाल रही हो तो हिस्सा भी देना पड़ेगा। अब्बू मुश्किल से आठ दस साल के थे, वो ट्रक पर कलेंजरी करने लगे। बस उनको घर का प्यार अपने ननिहाल से मिलता था जो कि पाकिस्तान था।

यार, पूरी जिन्दगी पाकिस्तान हिन्दुस्तान सुनती रही हूँ..।

दलजीत की निगाह एकबारगी पूरे घर पर गयी। ऐसा लगा कि पहले से हालात बहुत बदल गये है। बगल के तीनों कमरों के बाहर एक जैसी पुताई है और साफ सफाई भी खूब है। खिड़कियों में लोहे की जाली लग गयी है। अंजुम ने समझ लिया वो फिर बोलने लगी-

“कैसा होता है दिल। कभी मन करता है कि आदमी क्यो ईसा के लिए सोने का क्रास बनवाता है। उसे लगता है सोने चांदी के क्रास से शायद दर्द दूर होता होगा लेकिन क्या होता होगा? हाथ पांव में ठुकी कीले, अपमान और लोगों की गालियां तिल तिल मरने का दर्द, क्या उससे कम होता होगा?”

ये घर मेरे गले में लटका है..इसका रंगो-रोगन सब कुछ सिर्फ दर्द देता है।

..अब्बू को क्या हुआ था। बेकरी तो ठीक ही चल रही थी.. दलजीत के मुँह से इतनी देर बाद हिचकते हुए निकला।

“वन डज नाट लिव बाई द ब्रेड अलोन, तुम्हें याद है ये बात?”

जैसे अंजुम ने ये बात पूरी की। उसे उस प्रोफेसर का चेहरा याद आ गया। और कैसे ये बात जब पहली बार सुना था तो वह सन्न रह गयी थी।

“क्या हुआ, योगेश सर याद आ गये क्या?”

अरे नहीं बस ऐसे ही।

यार दलजीत, तुझे जानती हूं तू कब कहाँ पहुँच जाती है।

तु सुना, तुम्हारे पापा कैसे हैं और मम्मी। सुना था कि तुम कहीं पढ़ा रही हो ठीक है यार।..।

पाँच साल बाद की इस मुलाकात में दोनों के जीवन में बहुत कुछ आगे-पीछे हो गया था। दलजीत का परिवार मलेर कोटला लौट गया था। दलजीत ने बीएड करके गुरूद्वारे के ट्रस्ट के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था और पास के गाँव में पोस्टिंग मिल गयी थी। शहर छूटने के बाद दोनों के बीच  एकआध बार आपस में फोन पर बात हुई लेकिन न मालूम क्या हुआ कि वो सिलसिला भी टूट गया। शायद फोन टूट गया था। नम्बर नहीं सेव था या पता नहीं क्या हुआ।

जिन्दगी की आपाधापी में दुबारा मिलना पाँच साल बाद हुआ।

दोनों ने एक दूसरे को बीच के पांच साल का हिसाब देने की जरूरत नहीं समझी।

कुछ रिश्तों में हिसाबदारी नहीं होती है।

दलजीत ने अपनी जाई को देखा था। अपनी मां को देखा था कि कैसे वो  मलेर कोटला के लिए तड़पती थी। उसका तो मलेर कोटला में ऐसा कुछ नहीं था। माँ का था। उनका पूरा परिवार वहीं था। जाई जैसे मुल्तान अपने दिल में लिए रहती थीं वैसे उसकी मां मलेर कोटला। उन्हें सहारनपुर शहर के दर्जी, सब्जी वाले औरत-मर्द हर किसी से शिकायत थी। उन्हें लगता था कि यहाँ सब बेईमान है। उन्हें लाख समझाओं वो तो चाट फुलकी वाले से भी लड़ती थीं- “तुम लोगों को चाट बनाने नहीं आता है।”

“भला हो कि पापा का दवाइयों का काम मामा लोगों के चलते मलेर कोटला में जम गया और हमारा परिवार वापस वहाँ चला गया।”

“मलेर कोटला में तो मेरे भीतर मम्मी की आत्मा आ गयी है। बेवजह लोगों से बहसती रहती हूँ। लगता है कि इस शहर को कोई शऊर ही नहीं है। मैं भी तुझे अब्बू को सबको बहुत याद करती हूँ। कहीं से पता लगा कि अब्बू नहीं रहे।”

“अब्बू को क्या हो गया था..।”

“तीन साल हो गये दोस्त इस बात को।”

अंजुम के कहने में कोई भी तंज नहीं था लेकिन उसे सुनकर दलजीत ने कुर्ते का कोना थोड़ा खींच कर पकड़ लिया, उसे शर्मिंदगी सी महसूस हुई। किस मुँह से दुहराती  कि वो उन्हें बहुत प्यार करती थी, फिर अपनी दोस्त को भी बहुत याद करती है। उसका दिल नहीं लगता है मलेर कोटला में। मुँह से कुछ नहीं निकला। नज़र बचाने के लिए दीवार की ओर देखने लगी।

सामने कमरे की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी। उसका एक हिस्सा सीलन से छीज गया था। वहाँ सफेद रंग का धब्बा उग आया था। सफेद धब्बे के किनारे एक हरे रंग की लकीर खिच गयी थी। ऐसा लग रहा था वहां सिर्फ पानी है और धीरे धीरे पानी में तस्वीरें डूब रही हैं। लोग डूब रहें हैं उनकी यादें डूब रही हैं, बस पानी के किनारे की काई दूर से दिख रही है। उतना ही जितना जिसके लिए उसने पढा था कि जिन्दगी काई से शुरू हुई।

तस्वीर अब्बू के बचपन की थी। उसमें उनकी अम्मी और मुमानी है और भी न मालूम कौन से लोग हैं।

अब्बू हर बार यह फोटो जरूर दिखाते थे। उनका बस चलता तो वो तस्वीर के अंदर जाकर उसे चलता-फिरता दृश्य बना देते। दलजीत फिर से वह फोटो देखने लगी।

अम्मी घर पर नहीं थी, हमेशा की तरह किसी तबलीक में गयीं थी।

फिर क्या हुआ था, क्या कुछ हुआ था पाकिस्तान में..।

नहीं यार। कुछ नहीं हुआ। बस अम्मी कहती रहती हैं कि उस दिन तुम्हारे अब्बू अटारी और पाकिस्तान के स्टेशन के बीच में कहीं गये। उन्होंने किसी तरह पाकिस्तान में दस दिन बिताये। घर लौटे तो बस लेटे रहते थे। किसी से कोई बात नहीं करते थे।

बेकरी बंद हो गयी थी। मैंने पहले ही कह दिया था कि मेरा अभी निकाह करने का मन नहीं है। उन्होंने नीचे वाली दुकान का सौदा कर लिया था, पैसा मेरी पढ़ाई में लग गया था। तेरे जाने के बाद मैंने फार्मेसी ज्वाइन कर लिया था। उनके पास पैसा था नहीं। घर किसी तरह चल रहा था। बीच में उन्होंने किसी की गाड़ी चलाने के बारे में बात की लेकिन हाथ कांपते थे तो क्या ही करते।

मैं कहती रहती थी कि अब्बू मेरी पढ़ाई पूरी हो जाने दो। काम शुरू हो जायेगा।

अब्बू हँसते रहते थे तुम अपनी पढ़ाई में दिमाग लगाओ मैं घर चला लूँगा। चल भी रहा था लेकिन..।

तुम जानती हो वो हर साल पाकिस्तान जाते थे। साल पूरा नहीं होता था कि उनको वहाँ कि याद आने लगती थी लेकिन तीसरा साल होने वाला था वो पाकिस्तान नहीं जा पा रहे थे। पाकिस्तान में उनकी मुमानी बीमार चल रही थीं। उनका दिल बस वहीं लगा था।

रोज़ के नमाज़ी अब्बू कभी न थे। बस जुम्मे की नमाज पढ़ आते थे। वही से कुछ का कुछ सुनते। उनको उन तकरीरों से भी बड़ी दिक्कत होती थी।

उनको तो मुहल्ले के चौक पर बैठना पसंद था। वही पर दुनिया भर की गप्पे करते रहते थे। बेकरी न के बराबर चल रही थी। मेरा कोर्स पूरा होने वाला था। कैसे भी करके अब्बू मेरे तक कोई बात आने नहीं देते थे। इसी बीच अब्बू को कहीं से पता लगा कि कुछ लोग सवारी के साथ समान पाकिस्तान भिजवाते हैं। उसके बदले कुछ पैसा देते हैं। अब्बू ने ये कभी नहीं किया था। तुम जानती हो वो कैसे आदमी थे। उनका अपना ही दीन ईमान का मामला था।

पाकिस्तान चायपत्ती-चावल और बेलों वाले दुपट्टे वो शौकिया लेकर जाते थे। उनको वहाँ जाते समय कुछ चीजे खरीद कर ले जाना अच्छा लगता था।

 जैसे जैसे समय बीत रहा था अब्बू को वहाँ कि याद आ रही थी। न मालूम किस खफ्त में उन्होंने किसी से हामी भर दी।

सामान भिजवाने वाले दलाल ने कहा कि कोई ऐसा वैसा सामान नहीं होता है, बस घर की चीजें होती हैं। तुम्हारे हाथ में दो पैसे आ जायेंगे।

अब्बू को बहुत डर लग रहा था। उन्होंने कितनी बार घर में ये बोला कि अगर कुछ ऐसा वैसा हुआ तो क्या होगा? लेकिन उन्हें एक दो लोगों ने भरोसा दिया कि भाई जान सिर्फ घरेलू सामान होता है कोई दिक्कत नहीं होती है।

दलाल ने कहा कि दो सवारी का सामान तुम्हें अटारी से पहले मिल जायेगा। अम्मी और अब्बू के पास अटारी के पहले पचास-पचास किलो का सामान आ गया। अब्बू को उम्मीद नहीं थी कि इतना सामान भी कोई भेज सकता है लेकिन बदले में कुछ रूपये आठ दिन पहले मिल गये थे जिससे किराया और चाय, चावल और कई छोटी छोटी चीजे अब्बू ने खरीदी। इसके बाद भी कुछ रूपये बच गये थे।  बार बार कहते थे कि मुमानी से आखिरी मुलाकात होगी। अटारी में कस्टम वाले ने समान चेक किया। जानती हो तब तलक अब्बू के दिल की धड़कने बेताब हो चुकी थी। उन्हें लग रहा था कि उनका कलेजा  उछल कर बाहर गिर पड़ेगा, क्या होगा अगर कोई गलत सामान निकला?

उन्होंने तो पैसे लेने की खुशी में वो देखा तक नहीं बस इतना पूछा कि जायज सामान है न। आम आदमी ज्यादा सवाल भी नहीं पूछ पाता है। कस्टम वाले ने पैकेट खोल खोलकर कुरेद कुरेद कर सामान चेक किया। पहले सामान कायदे से बैग में बंद था। न तो देखने में ज्यादा लग रहा था, न बिखरा हुआ था, उठाना कमोबेश आसान था। बाद में….

अब्बू ड्राइवर आदमी थे। उन्होंने सामान कायदे से लदवाया और उठाया था लेकिन उस दिन उनसे हो ही नहीं रहा था।

अब्बू का दिल घबड़ा रहा था। अटारी पर कस्टम वाले ने गाली दी- “सालों तुम लोग ऐसे ही हिन्दुस्तान से सामान लाद कर ले जाते हो।”..

चारो तरफ गठरी खुली पड़ी थी। एक एक सामान खोल कर देखा गया था। ऐसा पहली बार हो रहा था जब वो पाकिस्तान जा रहे थे और घबड़ा रहे थे।

वह ट्रक ड्राइवर रहे थे। जिन्दगी में न मालूम कैसे कैसे लोगों से पाला पड़ा था लेकिन वो हर बात को यूं हँसते हुए बताते थे जैसे कोई दिलचस्प किताब का जिक्र कर रहे हों। या फिर कोई ताजा ड्रामा देख लिया हो। लेकिन उस दिन वो कुछ और होते जा रहे थे।

जानती है अब्बू को अपने मुसलमान होने को लेकर कभी गालियां नहीं मिली थी। तूने तो देखा है कि वो कैसे बोलते थे। पाकिस्तान में उनकी यादें बसती थीं लेकिन हिन्दुस्तान में उनकी जान बसती थी। बस दोनों बटा सा नहीं था।

बोलते हुए अंजुम की आंख भर आयी।

दलजीत ने उसका हाथ पकड़ लिया- फिर…

ट्रेन खुलने  में ज्यादा समय नहीं था। अम्मी-अब्बू ने किसी तरह सामान बांधा। अम्मी बता रही थी कि अब्बू पूरे समय गठरियां देखते रहे कि कुछ अदल बदल न जाये। उन्हें लग रहा था कि क्या पता कोई उन्हें ताड़ रहा हो और चालाकी करके गठरी बदल दे। पूरी यात्रा में उन्हें फिक्र रही कि कुछ गिर तो नहीं गया या कुछ खुल न जाय। ऐसा पहले कभी नहीं होता था पहले जितनी बार पाकिस्तान जाना होता था तो यादों के एक पुल पर से गुजरना होता था।

पहले तो वो पूरे रास्ते अपने बचपन के बारे में बताते रहते थे।

दलजीत के सामने माजिद मियां यानी अब्बू का चेहरा छा रहा था। अब्बू उसके जन्मदिन पर सूखा हुआ प्लम केक बनाते थे। उसमें घिसा हुआ बादाम होता था। पता नहीं उसके जन्मदिन कभी किसी ने इतना खास नहीं बनाया। उसने अपनी माँ को हमेशा बच्चों से बेहाल होते ही देखा था, और उसके पापा रात को घर आते थे। दलजीत जाई जी के कमरे में सोती थी। उसकी दादी सारी उम्र अपने माँ बाप के शहर मुल्तान के बारे में बताती रहती थी। अब्बू ऐसे ही थे। वो उसकी जाई के लिए भी अलग से पापे बनाते थे। मुहल्ले भर में कौन बीमार है, कौन अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेज रहा है। यह सब करने का जिम्मा उन्होंने ले लिया था। अजब ही मोही आदमी थे,अब्बू। दलजीत अंजुम की तरह माजिद मियां को अब्बू ही कहती थी और उसकी अम्मी को अम्मी। अम्मी और अब्बू दो दुनिया की तरह थे।

अम्मी मिलते ही अंजुम की बुराई करना शुरू कर देती थी। बाप की तरह रेडियो सुनती रहती है, काफिरों की तरह जूड़ा बना कर घूमती है।

मजेदार बात यह थी कि अंजुम की अम्मी दलजीत को खूब प्यार करती थी। अंजुम पीछे से चिल्लाती थी- “अम्मी काफिर किसको कह रही हो, वो तो तेरे सामने बैठी है, बोल उसको..।

अम्मी फिर अंजुम पर बरसने लगती थी।

फिर उसी पल बड़े प्यार से मुझसे पूछती चाय पियेगी, तेरे अब्बू भी आने वाले हैं।

दलजीत और अब्बू दोनों चाय और बातों के दीवाने थे। अब्बू कभी कोंकण दिखाते तो कभी गोवा और बातों बातों में किसी एक्सीडेंट के बारे में बताते थे। और कभी कभी तो किसी रूही सड़क के बारे में भी बताते थे। अब्बू को उसके काफिर होने से कोई दिक्कत नहीं थी। दिक्कत तो अम्मी को भी नहीं थी लेकिन न मालूम क्यों उन्हें अपनी बेटी से लड़ने के लिए सबसे सही शब्द यही मिलता था।

पाकिस्तान जाने के महीनों पहले अब्बू की बात मूमानी से होने लगती। मुमानी सिगरेट की बड़ी शौकीन थी अब्बू आईटीसी कम्पनी के दो पैकेट खास तौर पर लेकर जाते थे। ये आने जाने का सिलसिला इतना पुराना इतना सिलसिलेवार था कि हर बार यादों का पुल मजबूत हो जाता। इन दो बार की यात्राओं में साल भर में एक बार मुमानी भी आती। लेकिन मुमानी की माली हालत कमजोर हो गयी थी दूसरे उनके लड़के अपने में बहुत मशगूल हो चुके थे।

पहली दफा अब्बू की आंख बार बार भर आ रही थी मानो मन ही मन तय कर रहे थे कि ये आखिरी यात्रा है अब वो पाकिस्तान आना जाना नहीं कर पायेंगे। पाकिस्तान कस्टम पर फिर से चेकिंग हुई फिर से एक गाली उन तक आ कर टकरायी- “साले तुम लोग धंधा करने आते हो।”

अब्बू की रूलाई छूट गयी-  “न हीं सा हब..”

फिर सामान को तयशुदा जगह पहुंचाना था उन्हें लगा कि वहां चुपचाप कोई सारा सामान ले लेगा और उन्हें बख्श देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वहां लाल बुरके में एक औरत आयी उसने एक एक सामान की गिनती की। एक एक सामान फिर से खोला उसको चेक किया। गिनती होते होते चार बज गये। मुमानी के घर हर बार साढ़े दस ग्यारह बजे तक पहुंच जाते थे। लेकिन पहली दफा वो इतनी देर से गये और इतने बेजार हो चुके थे।

अब्बू का चेहरा काला पड़ गया था अबकी मुमानी के घर उनका दिल नहीं लगा। रह रह कर उनकी नींद उचट जाती थी। उनके दिल में किसी ऐसी बात की फांस धंस गयी थी जो किसी ने कही भी नहीं।

 बारह दिन बाद अम्मी-अब्बू वापस आ गये थे। वहीँ से उन्हें तेज बुखार लग गया था। सच तो ये है कि वो हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बीच कहीं रह गये। अब्बू ने कोई गुनाह नहीं किया था, बस उनकी यादों को सरहदों की ताकत नहीं मालूम थी। वो उनसे नहीं लड़ सकते थे, उनकी सजा से खुद को कहां बरी कर सके..।

कितना समझाया कोई फायदा न हुआ।

अंजुम बोलते बोलते चुप हो गयी।

“छोड़ यार, हिन्दुस्तान पाकिस्तान। पूरा बचपन यही सुनती रही हूँ। बेगुनाह की सजा हैं ये सरहदें..” कहते हुए अंजुम ने एक गहरी थकान भरी सांस छोड़ी और कुर्सी से खड़ी हो गयी।

सविता पाठक
सविता पाठक
परिचय- सविता पाठक का जन्म जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ है। शिक्षा विभिन्न शहरों से हुई है। हिन्दी की कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ प्रकाशित। इसके अलावा सविता अनुवाद करती है। डा आंबेडकर की आत्मकथा वेटिंग फार वीजा का अनुवाद। क्रिस्टीना रोसोटी की कविताओं के अलावा कई लातीन अमरीकी कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद। पाखी के सलाना अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित। वीएस नायपाल के साहित्य पर शोध। हाल में ही इनका उपन्यास ‘कौन से देस उतरने का’ लोकभारती प्रकाशन से आया है जिसकी काफी चर्चा हुई। हिस्टीरिया और अन्य कहानियाँ नाम से कहानी संग्रह। फिलहाल सविता पाठक दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं।
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