Friday, March 20, 2026
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सऊदी अरब और यूएई के तनाव की क्या है वजह? रियाद के हमले से बढ़ी टेंशन कम होने के आसार

सऊदी अरब और यूएई के बीच गहराते संकट कम होने की आशंका है। यूएई ने मंगलवार को यमन से अपनी शेष सेना बुलाने की घोषणा की।

UAE-Saudi Arab Tension: खाड़ी देशों सऊदी अरब (Saudi Arabia) और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच इस महीने की शुरुआत से ही तनाव देखने को मिल रहा है। हालांकि, बीते मंगलवार (30 दिंसबर) को संयुक्त अरब अमीरात द्वारा यमन से सेना वापल बुलाने की घोषणा से दोनों देशों के संबंधों में नरमी की उम्मीद है। इससे पहले सऊदी अरब ने यमन के बंदरगाह पर हमला किया और यूएई के सैन्य बलों को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया था।

सऊदी अरब ने यूएई पर आरोप लगाया कि उसने हथियार और सैन्य सामग्री भेजी, जो अलगाववादी संगठन एसटीसी के इस्तेमाल के लिए थी। यूएई ने हालांकि इससे इंकार किया और कहा कि यह सामग्री यमन में मौजूद उसकी सेना के लिए थी, जो देश में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से लड़ रही है। यमन लगभर 11 वर्षों में गृहयुद्ध का सामना कर रहा है जिससे निपटने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब गठबंधन काम कर रहा है।

सऊदी अरब द्वारा अल-मुकल्ला बंदरगाग पर बमबारी के बाद यूएई ने यमन में मौजूद अपनी सेना को वापस बुलाने की बात कही है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब सऊदी अरब ने अपने सबसे करीबी साझेदार यूएई पर दक्षिणी यमन में अलगाववादी संगठन सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (एसटीसी) का समर्थन करने के लिए सैन्य मदद भेजने का आरोप लगाया।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में क्या है तनाव की वजह?

दोनों देशों के बीच उपजे हालिया तनाव को पश्चिमी एशिया उत्तरी अफ्रीका में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा जारी रखने की होड़ के रूप में देखा जा रहा है।

सऊदी अरब ने ये हमले यमन के राष्ट्रपति रशाद अल-अलीमी के उस भाषण के कुछ ही क्षण बाद किए जिसमें उन्होंने यूएई से यमन से हटने की बात की थी। राष्ट्रपति रशाद को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के प्रमुख के रूप में मान्यता प्राप्त है। वह सऊदी अरब समर्थित यमन की राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद के नेता हैं।

यूएई, सऊदी अरब के नेतृत्व वाले उस नेतृत्व का भी हिस्सा है जो देश में उपजे एक दशक पुराने संघर्ष में उलझा है। यमन में ईरान समर्थित हूती का राजधानी सना सहित उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण कायम है जिसके खिलाफ दोनों देश संघर्ष कर रहे हैं। भले ही दोनों देश हूती गुट के प्रभाव से लड़ने के लिए एक ही गठबंधन का हिस्सा हैं लेकिन दक्षिणी यमन ने दोनों ने अलग-अलग गुटों का समर्थन किया है।

सऊदी अरब ने जहां राष्ट्रपति अलीमी का समर्थन किया है तो वहीं यूएई ने एसटीसी का समर्थन किया है। यमन के गृहयुद्ध से निपटने में शामिल इस गठबंधन से यूएई के निकलने के बाद अरब गठबंधन बिखर गया है। सऊदी अरब के चिंता बढ़ गई है क्योंकि उसे आशंका है कि हद्रामौत और अल महारा प्रांतों में अस्थिरता उसके यहां तक पहुंच सकती है।

सऊदी अरब और यूएई ने क्या कहा?

बीते मंगलवार को सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि यूएई ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिन्हें अत्यंत खतरनाक माना जाता है। उसने इस बात पर जोर दिया कि रियाद की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली कोई भी कार्रवाई ‘सीमा रेखा’ है। इस संबंध में एक्स पर एक पोस्ट भी किया जिसमें कहा गया कि “सऊदी अरब साम्राज्य अपने मित्र देश संयुक्त अरब अमीरात द्वारा दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (एसटीसी) की सेनाओं पर हद्रामौत और अल-महारा प्रांतों में सऊदी अरब की दक्षिणी सीमाओं पर सैन्य अभियान चलाने के लिए दबाव डालने की कार्रवाई से अपनी निराशा व्यक्त करता है।”

हालांकि यूएई ने अपने सैनिकों को वापस बुलाने से पहले ये कहा था कि अबू धाबी ने ने दक्षिणी यमन के दो प्रांतों पर नियंत्रण पाने के लिए एसटीसी पर मौजूदा सैन्य अभियान चलाने का दबाव डाला था। यूएई ने यह भी कहा कि अल मुकल्ला बंदरगाह पर कोई हथियार नहीं उतारे गए थे और बताया कि जिन वाहनों पर हमला हुआ वे यमन में मौजूद उसकी सेनाओं के द्वारा इस्तेमाल किए जाने थे।

यूएई के रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि “रक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया है कि संयुक्त अरब अमीरात के सशस्त्र बलों ने सहमत आधिकारिक ढांचे के भीतर सौंपे गए मिशनों को पूरा करने के बाद 2019 में यमन गणराज्य में अपनी सैन्य उपस्थिति समाप्त कर दी थी। शेष उपस्थिति आतंकवाद विरोधी प्रयासों के हिस्से के रूप में संबंधित अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के समन्वय में विशेष कर्मियों तक सीमित थी।”

गौरतलब है कि यमन लंबे समय से गृहयुद्ध जैसे हालातों का सामना कर रहा है। वहां यह स्थिति साल 2014 से बनी है। इसी दौरान ईरान समर्थित हूती गुट ने यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। सऊदी अरब समर्थित अरब गठबंधन ने साल 2015 में हूती गुट को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किये थे। इस गठबंधन में यूएई भी शामिल था।

यूएई ने हालांकि 2019 में अपनी रणनीति में बदलाव किया और अपनी अधिकतर सेना वापस बुला ली। हालांकि वह अरब गठबंधन में शामिल रहा। 2022 में अरब गठबंधन और हूती गुट के बीच युद्धविराम को लेकर सहमति बनी जिसका तीन वर्षों में ज्यादातर पालन किया गया है।

यमन हालांकि आज भी गहरे राजनैतिक संकट से घिरा हुआ है क्योंकि उसका अधिकांश भाग हूती विद्रोही गुट के कब्जे में है। एसटीसी, जो देश का सबसे प्रभावशाली समूह माना जाता रहा है, उसकी मांग है कि दक्षिणी यमन को अलग से देश बनाया जाए। इस संगठन का गठन 2017 में हुआ था।

अमरेन्द्र यादव
अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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