इन दिनों भारतीय राजनीति में जवाहरलाल नेहरू लगातार चर्चा में हैं। लेकिन इतिहास के रूप में नहीं, आरोपों के रूप में। सत्ता और उससे जुड़े वैचारिक तंत्र ने नेहरू को एक ऐसे खलनायक में बदलने की कोशिश की है, जिस पर आज की हर विफलता का बोझ डाला जा सके। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक, नेहरू एक स्थायी ‘टारगेट’ बना दिए गए हैं। समकालीन भारतीय राजनीति में यदि कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व सबसे अधिक विवाद, विकृति और वैचारिक हमले का शिकार हुआ है, तो वह जवाहरलाल नेहरू हैं। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने आधुनिक भारत की वैचारिक नींव रखी, वही आज सत्ता-राजनीति के लिए सबसे सुविधाजनक ‘बलि का बकरा’ बना दिया गया है। नेहरू को इतिहास से नहीं, बल्कि वर्तमान की असफलताओं में भी घसीटकर लाया जा रहा है और हरेक नाकामी का ठीकरा उनके माथे फोड़ा जा रहा है।
ऐसे समय में, नेहरू का रंगमंच पर आना केवल एक नाट्य घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। आज जब नेहरू को या तो पूरी तरह खारिज कर दिया जाता है या ट्रोलिंग के शोर में दबा दिया जाता है, तब इस नाटक का मंचित होना अपने आप में एक साहसिक कदम है।
संजय कुंदन द्वारा लिखित एकल नाटक ‘नेहरू : द स्टेट्समैन’ और उसका हालिया दिल्ली मंचन इसी हस्तक्षेप का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह नाटक नेहरू को न तो देवता बनाता है, न ही उन्हें कटघरे में खड़ा करता है; बल्कि उन्हें उनके समय, संघर्षों, वैचारिक प्रतिबद्धताओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों के साथ देखने का एक विनम्र आग्रह करता है।
यह एक विचारणीय तथ्य है कि यह नाटक लिखे जाने के काफी समय बाद मंच पर आ सका, जिसे बिलकुल भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह देरी महज़ संयोग नहीं है। दरअसल, यह देरी उस आत्म-सेंसरशिप की ओर इशारा करती है, जो आज के भारतीय रंगमंच में गहराई तक पैठ चुकी है। सत्ता के विपरीत पाले में खड़ा होना आज के समय में किसी के भी लिए एक जोखिम भरा काम है। और नेहरू जैसे व्यक्तित्व पर नाटक करना केवल इतिहास को मंच पर लाना नहीं, बल्कि वर्तमान सत्ता-संरचना से टकराने जैसा कुछ भी माना या कहा जायेगा।
ऐसे विपरीत और विचित्र माहौल में, दिल्ली की बेला थिएटर संस्था द्वारा इस नाटक को मंचित करना उल्लेखनीय और सराहनीय दोनों है। इस बात के लिए उन्हें अप्रीशियेट किया जाना चाहिये कि निर्देशक अमर शाह और अभिनेता अविनाश तोमर ने न केवल एक कठिन विषय को चुना, बल्कि उसे दर्शकों के सामने पूरे आत्मविश्वास और निडरता के साथ रखा। यह मंचन यह भी साबित करता है कि डर के बावजूद रंगमंच पूरी तरह मूक नहीं हुआ है। बस उसकी आवाज़ अब चुनिंदा जगहों से, थोड़ी हिचक के साथ, लेकिन फिर भी उठ रही है।

एकल नाटक अपने आप में रंगमंच की सबसे कठिन विधाओं में से एक है। मंच पर अकेला अभिनेता, बिना किसी सहारे के, दर्शकों को बाँध कर रखे,यह साधारण चुनौती नहीं। ‘नेहरू : द स्टेट्समैन’ में अविनाश तोमर की भूमिका इसी चुनौती से जूझती है। लगभग एक घंटे की प्रस्तुति में उन्होंने नेहरू के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को सामने रखने का प्रयास किया। उनकी बौद्धिकता, बुद्धिमत्ता, उनकी बेचैनी, उनका द्वंद्व और उनका राजनीतिक आत्मविश्वास। वे यहां कई तरह से दिखते हैं- एक पढ़ा-लिखा मनुष्य, बेचैन व्यक्ति, सवाल पूछने वाला जिज्ञासु और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध एक नेता। दर्शक उनके साथ इतिहास के कुछ निर्णायक मोड़ों से गुजरता है। उनके अभिनय में ईमानदारी है और मंच पर उपस्थिति कुछ हद तक प्रभावशाली भी।
हालांकि कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जहाँ लगता है कि वे और आगे जा सकते थे। उनके अभिनय में कहीं-कहीं एक ठहराव दिखता है, जो शायद नाटक को अधिक संतुलित और सुरक्षित रखने की कवायद में भी हो सकती है। अभिनेता का आत्मविश्वास कई जगह चमकता है, लेकिन कुछ क्षणों में ऐसा लगता है मानो वह अभी और आगे जा सकते थे,और जा सकते थे… पर…हालांकि इसका दोष अभिनेता पर उस तरह न जाकर उस चरित्र पर जाता है, जो वे निभा रहे थे। जिन्हें रुपायित करने का दबाव उनपर रहा होगा और किस हद तक रहा होगा, यह अभिनेता ही जानते और समझते रहे होंगे। किसी आदमकद व्यक्तित्व को जीना, उसे खुद में एकमेक करना इतना आसान नहीं। बहुत सारी चुनौतियां आड़े आती हैं। बहुत तरह के दबाव काम करते हैं, जिसमें सबसे बड़ा दबाव मानसिक और मनोवैज्ञानिक होता है। आप फलां लग रहे हैं या नहीं? दर्शक आपको फलां की तरह से देखेंगे या नहीं? किसी अच्छे और परिपक्व अभिनेता को सबसे पहले इस डर से लड़ने की जरूरत होती है, नहीं तो यह डर अच्छे-अच्छों को ले डूबता है। आप कितनी भी कोशिश कर लें, दर्शकों के आगे आप कमतर ही होंगे। मामला कभी-कभी प्रभाव से आगे बढकर आराधना और आराध्य का सा हो जाता है, फिर तो हर छवि अधूरी ही दिखती है और अधूरी ही होगी… शुक्र यह है कि अविनाश डूबते नहीं, तैरते भी नहीं, बहकर निकल जाते हैं बस नेहरू की रौ में….

यह नाटक लगभग 90 मिनट का है, लेकिन मंचन में इसे संक्षिप्त कर लगभग 50-60 मिनट में प्रस्तुत किया गया। इस संक्षेपण का असर नाटक की वैचारिक तीव्रता पर पड़ता दीखता है। यह नाटक दो हिस्सों में बंटा हुआ है- पहला हिस्सा नेहरू की पृष्ठभूमि और जीवन यात्रा पर केंद्रित है, जबकि दूसरा हिस्सा उनके राजनीतिक और वैचारिक संघर्षों पर। यहां नेहरू की पृष्ठभूमि, स्वतंत्रता संग्राम और शुरुआती वर्षों को मंच पर लाना अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि यह हिस्सा कथात्मक है। मंचन में पहला हिस्सा अपेक्षाकृत अधिक जगह घेर लेता है, जबकि नाटक का अधिक बल नेहरू की वैचारिकी पर होना चाहिए था- धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, वैज्ञानिक दृष्टि, संस्थाओं की स्थापना और आलोचनात्मक सोच पर। मंचन में यही हिस्सा थोड़ा अधूरा-सा लगता है। दर्शक को यह महसूस होता है कि नाटक अचानक समाप्त हो गया है, जबकि अभी कई सवाल अनकहे रह गए हैं। शायद यह अधूरापन लेखन की नहीं, बल्कि मंचन में की गई काट-छांट का परिणाम हो।
इस नाटक की सबसे महत्वपूर्ण आलोचना उसका डिफेंसिव टोन है। यह नाटक कई जगह नेहरू का बचाव कुछ इस तरह करता हुआ प्रतीत होता है, मानो वह आज के आरोपों का जवाब देने के लिए मंच पर आए हो। या फिर तब वे सोच पा रहे थे कि भविष्य में उन पर कौन से आरोप लगने वाले हैं। विपक्षी उन्हें किन उपाधियों से नवाजने वाले हैं। यह अस्वभाविक नहीं तो स्वाभाविक भी नहीं है।

प्रश्न यह है कि क्या नेहरू को सफाई देने की ज़रूरत है? आधुनिक भारत के निर्माताओं में शामिल नेहरू किसी भी तरह के व्यक्तिगत बचाव से बड़े हैं। जरूरत यह नहीं कि वे जवाब दें, बल्कि यह कि वे सवाल पूछें कि गांधी, नेहरू, आंबेडकर और भगत सिंह के सपनों का भारत आज कहाँ खड़ा है? यदि यह नाटक इस आक्रामक वैचारिक मुद्रा को थोड़ा और अपनाता, तो उसकी राजनैतिक धार थोड़ी और तेज़ हो सकती थी। फिर भी अंततः यही कहना है कि इसका मंचन एक अभूतपूर्व और साहसिक प्रयास है, जिसे बार-बार लगातार दुहराये जाने की जरूरत है। हर खौफ, हर डर और आशंका से लड़ते हुये, इसे और अधिक जीवित और जानदार बनाते हुये।

