नई दिल्ली: धार्मिक स्थलों महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सबरीमाला पर 2018 फैसला इस धारणा पर आधारित है कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाओं का स्थान इससे नीचे हैं।
उन्होंने इसके बाद कई ऐसे उदाहरण दिए जहां पुरुषों पर प्रतिबंध लागू हैं। उन्होंने बताया कि कुछ मंदिर ऐसे हैं जहां पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जहां पुरुष पुजारियों को धार्मिक दायित्व के तहत महिला श्रद्धालुओं के पैर धोने होते हैं।
मेहता ने कहा, ‘मैंने ऐसे मंदिरों के उदाहरण दिए हैं जहां पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जहां पुरुष पुजारियों को धार्मिक दायित्व के तहत महिला श्रद्धालुओं के पैर धोने होते हैं।’
एक मंदिर में महिलाओं के वेश में आना पड़ता है….’
तुषार मेहता ने उन मंदिरों का भी उदाहरण दिया जहां विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। सॉलिसिटर मेहता केरल के एक मंदिर का जिक्र किया जहां पुरुषों को महिलाओं के वेश में आना पड़ता है। ऐसे में वे अक्सर परिवार की महिला सदस्यों की सहायता से तैयार होते हैं।
उन्होंने कहा, ‘पुष्कर मंदिर जैसे कई मंदिर हैं जहां विवाहित पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। केरल में एक मंदिर ऐसा है जहां यह प्रथा है कि पुरुष महिलाओं के वेश में जाते हैं। वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं और परिवार की महिला सदस्य उन्हें साड़ी और अन्य वस्त्र पहनाने में मदद करती हैं। केवल पुरुष ही जाते हैं।’
तुषार मेहता ने इन उदाहरणों पर जोर देते हुए कहा कि धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं को पुरुष-प्रधान या महिला-प्रधान के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। इससे पहले मंगलवार को केरल के पथानामथिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले 2018 के फैसले पर केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया था।
केंद्र सरकार ने कहा था कि धार्मिक प्रथाओं को आधुनिकता या तर्क के पैमाने पर न परखा जाए। केंद्र सरकार अपने जवाब में कह चुकी है कि ‘अदालतें अपने नजरिए से धर्म को न बदलें।’ केंद्र ने कहा कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ के आधार पर धार्मिक प्रथाओं को खारिज करना खतरनाक है। धार्मिक परंपराओं को समय के साथ बदलने का अधिकार समाज और संप्रदाय का है, न कि अदालत का।
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई
सर्वोच्च न्यायालय इन दिनों सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है। कोर्ट ऐसे मामलों से जुड़े 50 से ज्यादा याचिकाओं पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक सुनवाई कर रही है।
इसके लिए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में 9 जजों की पीठ बनाई गई है। इसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमालया बागची शामिल हैं।
इससे पहले 28 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में महिला श्रद्धालुओं पर लगी आयु सीमा की रोक को हटा दिया था। कोर्ट ने साथ ही केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3(b) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था, जिसमें रीति-रिवाज के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी। बाद में कोर्ट ने इसे 7 जजों की बड़ी बेंच के लिए ट्रांसफर कर दिया था लेकिन 2018 के फैसले पर रोक नहीं लगाई थी।

