Friday, March 20, 2026
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पंजाब में अकाली दल के भीतर बवाल! सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ क्यों उठ रही है आवाज और कौन है इसके पीछे?

अमृतसर: देश की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और उसे अपने वरिष्ठ नेताओं द्वारा विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है।

पार्टी के शीर्ष नेताओं ने अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया है और उन पर कई आरोप भी लगाए हैं। शिअद जैसी पुरानी पार्टी के लिए यह नई बात है क्योंकि इससे पहले पार्टी में इस तरह के विद्रह को नहीं देखा गया था।

पार्टी लोकसभा और विधानसभा में हुई है फेल

बता दें कि 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार हुई है। पंजाब की 13 सीटों पर उसे केवल एक ही सीट पर जीत हासिल हुई है। केवल लोकसभा चुनाव ही नहीं बल्कि 2022 में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को बुरी तरह के हार का सामना करना पड़ा था।

विधानसभा चुनाव में हार से पार्टी के भीतर ही विद्रोह शुरू हो गया है जो लोकसभा चुनाव की हार के बाद और भी तेज हो गया है।

सुखबीर को विरासत में मिली है पार्टी

इस पार्टी की स्थापना सन 1920 में हुई थी जिसका सिख राजनीति में एक लंबा इतिहास रहा है। सुखबीर को यह पार्टी अपने पिता प्रकाश सिंह बादल से विरासत से मिली है। पंजाब की राजनीति में प्रकाश सिंह बादल को काफी पुराने और अनुभवी नेता के रूप में जाना जाता है जिन्होंने दो दशकों से भी अधिक समय तक शिरोमणि अकाली दल का नेतृत्व किया है।

सुखबीर को नहीं मिलता है पिता के समान सम्मान

इतने लंबे समय से पार्टी पर पकड़ रखने वाले प्रकाश सिंह बादल के बेटे उतना प्रभावी साबित नहीं हुए हैं। पिछले एक दशक में जैसे-जैसे सुखबीर पार्टी में आगे बढ़ते रहे हैं, उनके पिता का सम्मान करने वाले कई शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें उतना सम्मान नहीं मिल पाया है।

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा उनके नेतृत्व पर सवाल भी खड़ा किया गया है और उन पर कई गंभीर आरोप भी लगाया गया है। हाल के पंजाब विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनके खिलाफ खुल कर बोलना शुरू भी किया है।

शिअद के किन नेताओं ने किया है विद्रोह

पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ विरोध करने वालों प्रमुख विद्रोहियों में पूर्व सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा, पूर्व एसजीपीसी प्रमुख बीबी जागीर कौर और पूर्व विधायक गुरपरताप सिंह वडाला भी शामिल हैं।

यही नहीं पूर्व मंत्री सिकंदर सिंह मलूका, परमिंदर सिंह ढींढसा, सरवन सिंह फिल्लौर, सुरजीत सिंह रखड़ा और वरिष्ठ नेता सुच्चा सिंह छोटेपुर ने भी सुखबीर के खिलाफ अपनी आवाज उठाई है।

शिअद बचाओ आंदोलन की हुई है घोषणा

विरोध करने वाले इन प्रमुख और वरिष्ठ विद्रोही नेताओं ने अगले महीने “शिअद बचाओ” (शिअद बचाओ) आंदोलन शुरू करने की योजना की घोषणा की है। इन नेताओं का कहना है कि सुखबीर के नेतृत्व में पार्टी पुनर्जीवित नहीं हो सकती है।

इन नेताओं का दावा है कि उनके नेतृत्व में पार्टी की कमियों को दूर नहीं किया जा सकता है। यही नहीं पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सुखबीर पर यह भी आरोप लगाया है कि वे उनकी कोई भी बात सुनते नहीं है।

पार्टी की कार्य समिति ने क्या कहा है

इन नेताओं के विद्रोह करने के एक दिन बाद पार्टी की कार्य समिति ने न केवल सुखबीर के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है बल्कि विरोधियों से सिख समुदाय के दुश्मनों के हाथों में नहीं खेलने का आग्रह किया है।

हालांकि प्रमुख विद्रोहियों में से एक चंदूमाजरा ने कमेटी के सुखबीर के समर्थन वाले बयान पर सवाल भी उठाया है। यह पहली बार नहीं है जब सुखबीर के नेतृत्व पर सवाल उठ रहा है।

सुखबीर के नेतृत्व पर उठते आ रहे हैं सवाल

कई सालों से सुखबीर के नेतृत्व में पार्टी पर भ्रष्टाचार, वंशवादी शासन और सिख धार्मिक संस्थानों के खिलाफ अपवित्र कृत्यों के लिए जिम्मेदार होने के आरोप लगते आ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में पार्टी के कुछ फैसलों ने पजांब में उसके आधार को और भी कमजोर किया है।

बात करें अगर कृषि कानूनों का तो इस मामले में पार्टी ने शुरुआत में भाजपा को अपना समर्थन दिया था क्योंकि शिअद उस समय एनडीए का एक हिस्सा था और सुखबीर की पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्रीय मंत्री थीं।

हालांकि बाद में पार्टी ने कृषि कानूनों के मुद्दे पर एनडीए से अपना समर्थन वापस ले लिया था। लेकिन इस कारण पार्टी को पंजाब में काफी नुकसान का भी सामना करना पड़ा है।

पार्टी को पुनर्जीवित करने वाले फैसले भी हो रहे हैं फेल

2024 लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए सुखबीर की राज्यव्यापी यात्रा भी शुरू किया था लेकिन इसका कुछ फायदा नहीं हुआ है और पार्टी को केवल एक ही सीट पर जीत हासिल हुई है।

काफी लंबे समय से पंजाब में केवल दो ही प्रमुख पार्टियों- कांग्रेस और शिअद का शासन चलते आ रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में सुखबीर के नेतृत्व में शिअद ने अपनी पहचान को खोई है जिसका फायदा आम आदमी पार्टी ने को हुआ है।

‘आप’ ने ली शिअद की जगह

पिछले कुछ सालों में आम आदमी पार्टी ने पंजाब में अपनी पकड़ को मजबूत की है और शिअद की जगह ली है। हाल के सालों में पंजाब में कांग्रेस के कमजोर होने और पार्टी के प्रमुख नेता व पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के पार्टी छोड़ने के बीच आम आदमी पार्टी ने खुद को यहां काफी मजबूत किया है।

पंजाब की दोनों प्रमुख और पुरानी पार्टियों के कमजोर होने का फायदा आम आदमी पार्टी को मिला है जिससे ‘आप’ पंजाब की सत्ता पर शासन करने में कामयाब रही है।

विरोध कर रहें नेता चाहते होंगे ये

शिअद के वरिष्ठ नेताओं द्वारा विद्रोह करना पार्टी और सुखबीर के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। हालांकि विरोध कर रहे वरिष्ठ नेता भी पार्टी में विभाजन नहीं चाहते होंगे।

ऐसा इसलिए क्योंकि पूर्व में अलग हुए अकाली गुट ऐतिहासिक रूप से असफल रहे हैं। ऐसे में यह हो सकता है कि वे इस विरोध के जरिए पार्टी में सुखबीर के प्रभाव को कम करना चाहते हो।

पंजाब में अभी शिअद का क्या है प्रभाव

अपने मौजूदा संघर्षों के बावजूद काफी लंबे समय से शिअद पंजाब की राजनीति में एक अहम रोल अदा करते आ रही है। पार्टी के लंबे इतिहास और ग्रामीण पंजाब में इसकी गहरी जड़ों के कारण यह इतनी आसानी से खत्म नहीं हो सकती है।

फिलहाल शिअद पंजाब में तीन मुख्य पार्टियों से पीछे हैं जिसमें भाजपा भी शामिल है लेकिन राज्य में इसका प्रभाव कम नहीं हुआ है और यह अभी भी बरकरार है।

पिछले 30 सालों से शिअद पर है बादल परिवार का कब्जा

बता दें कि पिछले तीन दशकों से शिअद पर बादल परिवार का कब्जा है। साल 1995 में सरदार प्रकाश सिंह बादल अकाली दल के प्रमुख बने थे और वे इस पद पर 2008 तब बने हुए थे। इसके बाद 2008 से प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह बादल ने इसकी कमान संभाली थी।

साल 1996 से लेकर 2019 तक पंजाब में शिअद भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन उसे इन चुनावों में कुछ खास फायदा नहीं हुआ है।

पंजाब में कई सालों से भाजपा के साथ चुनाव लड़ रहा है शिअद

शिअद और भाजपा ने पंजाब में साल 2007 से 2017 तक साथ मिलकर सरकार चलाई है। लेकिन किसान आंदोलन के कारण दोनों पार्टियों के बीच खटास पैदा हो गई थी जिस कारण दोनों पार्टियां अलग हो गई थी।

इस कारण 2022 में शिअद भाजपा से अलग हो गई थी और बीएसपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे इस बार भी कुछ खास फायदा नहीं हुआ था।

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