वर्मा आँटी हैरान परेशान सी इधर-उधर हो रही थी। वर्षों बरस एक तरह से रहने की आदि हो चुकी बुजुर्ग क्या ‘अति बुजुर्ग’ की श्रेणी में आ चुकी वर्मा आँटी बदलाव की हल्की कंपन से ही विचलित हो उठती थी, वहीं यह तो बड़ा बदलाव ही कहा जाएगा। दरअसल बात यह थी कि आँटी जिस बिल्डिंग में 40 से भी अधिक वर्षों से रह रही थी वह बेहद जर्जर अवस्था में आ चुका था। छत टपकने लगी थी, दीवारें कमजोर हो चुकी थी और प्लास्टर झड़ झड़ कर बिल्डिंग को वीभत्स बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। इस कारण बिल्डिंग वालों ने पूरी बिल्डिंग को ध्वस्त कर फिर से बनाने का सामूहिक निर्णय लिया था। तब तक वहाँ रहने वालों को दूसरी जगह शिफ्ट होने का निर्देश दिया गया था। उस बिल्डिंग में रहने वाले सभी फ्लैट ऑनर्स ने खुशी खुशी सहमति और सहयोग दिया था इस योजना के क्रियान्वयन के लिए, सिवाय वर्मा आँटी के।
85+ उम्र, झुकी कमर धुंधलाती नजर और क्षीण काया की वर्मा आँटी अपने फ्लैट में लगभग अकेले ही रहती थी। चार बेटियां-दामाद भी बुजुर्ग हो चले थे, उनकी संख्या भी कम होने की दिशा में अग्रसर थी। आँटी अकेली रहती थी और गृहस्थी को इस तरह से जमा कर सहेजा था कि दस वर्ष पूर्व अंकल के गुजरने के बावजूद भी टकधुम – टकधुम चल ही रही थी। वर्षों पुरानी महरी की पुश्त यानी की उसकी पोती उनके घर का एक एक काम और उनकी देखभाल करती थी। महरी के पोती-पोतों को तो आँटी ने ही पढ़ाया था। उसकी पोती एक ब्यूटी पार्लर में पार्ट टाइम काम करती और बाकी वक्त उनके काम। घर में काम ही कितना होता था, चिड़िया सा तो पेट था आँटी का जो वह झटपट पका देती, बाकी वक्त तो आँटी को बाहरी दुनिया की चटपटी कहानी सुनाने में गुजरता था। ड्राइवर भी कुछ ऐसा ही खानदानी था जो इनका बैंक, अस्पताल, बाजार इत्यादि की जिम्मेदारियां पूरी करता था। अंकल सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे तो पेंशन अच्छी खासी मिलती ही थी और बाकी सारी ज़रूरतें उनकी बेटियां पूरी करती।
एक बात खास थी उनकी कि वे मरने की बातें कभी नहीं करती थी, वरन् उनमें में जीने की अदम्य इच्छा थी। जीवन जीने की लालसा ही उन्हें अब तक जीवित भी रखा था और सक्रिय भी।
हां सौ बातों की एक बात की आँटी अपना फ्लैट नहीं छोड़ना चाहती थी। बिल्डिंग के ज्यादातर लोग घर खाली कर अगल बगल रहने चले गए थे, पर आँटी मानो जिद पर अड़ी थी कि वह घर नहीं खाली करेंगी। उनकी बेटियां समझा- समझा कर हार गई थी। बिल्डर की अंतिम नोटिस पर अबकी उनकी छोटी बेटी दामाद आ कर रह रहें थे ताकि शिफ्टिंग का कार्य पूरा कर दिया जाए। बिल्डर को जो अतिरिक्त राशि देनी थी उस का भुगतान भी हो चुका था पर आँटी टस से मस नहीं हो रही थीं। पर घर को खाली तो करनी ही थी सो सामान शिफ्ट करने वालों को बुला लिया गया और घर खाली होनी शुरू हो गई। नजदीक तो कोई फ्लैट नहीं मिल पाया था सो शहर के अगले छोर पर जाने की तैयारी हो रही थी। बेटी दामाद तो शहर ही छोड़ने की जिद कर रहे थे,
“अम्मा, अब छोड़ो गृहस्थी का मोह साथ रहो हमारे। क्या रखा है इस शहर में अब? इन फर्नीचर को बांट दो और जो भी ले कर चलना है चलो हमारे साथ। देखो मैं खुद दो बरस पर आ पाई हूं”
साठ की दहलीज पार करती बिटिया बार बार दुहरा रही थी।
“मैं कैसे चली जाऊं, मैं कैसे यहां से चली जाऊं?”…
आँटी धीमे-धीमे लगातार बुदबुदा रही थी।
“अम्मा ज़िद मत करो, देखो मेरे बाल सफेद हो रहें है। तुम साथ ही रहोगी तो मैं निश्चिंत रहूंगी न”
बिटिया आखिरी कोशिश कर रही थी। फिर खीज कर अपने पति की तरफ उन्मुख को कहा,
“अम्मा शुरू से हम बहनों को कमतर ही समझती रही और परायापन भी बरकरार रखा। आज भी देखो कैसे जिद कर रही है। ना होगा तो मैं कुछ दिन/ महीने साथ में नये घर में रह जाऊंगी और सब सेट कर दूंगी”
आँटीजी तो मानो किसी और ही दुनिया में चली गई थी, बेटी की बातों को अनसुनी करते हुए,
“मैं कैसे जा सकती हूं इस घर को छोड़कर” की रट लगाई हुई थी।
अब बिटिया की भी आंखें भर आई थी पास आकर उसने आँटीजी को अपने अंक में भरते हुए कहा
“अम्मा मान भी जाओ कि अब वह नहीं आएगा। आना होता तो कब का आ चुका होता सुमित नहीं आएगा यह मान जाओ प्लीज”
कहते हुए सुगंधा फफक – फफक कर रो पड़ी, शून्य में विचारते आँटी के सूने नयन तत्क्षण जागृत हो उठे।
“मत रो मेरी सुग्गा, मत रो। मुझे उस पंडित ने कहा था कि सुमित जिंदा है और एक दिन जरूर वापस आएगा। मुझे पंडित जी की बातों पर पूरा विश्वास है, देखो क्या किसी को उसके नहीं रहने का कोई प्रमाण मिला है? जब तक उसका शरीर नहीं मिलेगा हम कैसे मान सकते हैं कि तुम्हारा भाई नहीं रहा?”
वर्मा आँटी बेटी को समझाते कहते जा रही थी। अब की पथराने की बारी सुगंधा के नयनो की थी।
सुमित चार बहनों का इकलौता भाई, उस जमाने में जब लाख मन्नतों के बाद चार- चार लड़कियों के बाद उसका जन्म हुआ था तो वर्मा आँटी को लगा कि उनका जीवन अब जाकर पूर्ण हुआ। लड़कियों को उच्च शिक्षित करने का कोई खास रिवाज नहीं था उनके घर में; सो सभी को जल्दी-जल्दी ब्याह कर निपटा दिया गया। बेटे को खूब पढ़ाना था सो जब ग्रेजुएशन के बाद उसने अमेरिका जाकर पढ़ने की इच्छा जाहिर की तो, झट से मान ली गई। सुमित बहुत होशियार था पढ़ने में वहाँ जा कर भी अच्छा रिजल्ट करता रहा। उसकी नौकरी भी लग चुकी थी, ज्वाइन करने से पहले वह देश आने का प्रोग्राम बना रहा था कि अचानक उसके गायब हो जाने की खबर आई। पैंतीस साल हो गए होंगे लगभग इस बात को। वर्मा अंकल और आँटी विश्वास ही नहीं कर पाए कभी कि सुमित जिंदा नहीं होगा। अमेरिका जैसे बड़े से देश में उनका बेटा गुम हो गया, यह बात उनके गले ही नहीं उतरती थी। विकट था; बृहदतम था; यह दुख अनंत था; किसी के पाले पोसे कमाऊ लड़के का अचानक से गायब हो जाना किसी पहेली से कम नहीं था। उस वक्त आज की तरह संचार के साधन नहीं थे। हर संभव कोशिश की गई कि कुछ सुराग तो मिले पर ना दूतावास से कोई खबर मिली ना उसके वहाँ के दोस्तों से। कोई कहता स्विमिंग पूल में डूब गया तो कोई कहता किसी ने मर्डर कर दिया। पर सबूत? कोई तो सबूत हो बॉडी तक नहीं मिला; तो कैसे मान लिया जाए कि सुमित नहीं रहा। वह गहन अंधकार वाली रात थी वर्मा दंपत्ति की पूरी दुनिया लुट चुकी थी। उलझनों में उलझ वर्मा दंपत्ति मानो ना जीने में थे ना ही मरने में। बार बार दिल यही कहता कि वह जिंदा है और एक दिन वापस जरूर आएगा। यही कारण था कि वे लोग कभी घर छोड़ कर नहीं जाते थे। सुमित को तो यहीं का एड्रेस पता है हम कहीं जाए और पीछे से वह आ जाए तो? किसी को यह बात बहुत मामूली लग सकती है कई तर्क भी दिए जा सकते हैं पर माँ के दिल से बहस नहीं किया जा सकता। उसका अंतर्मन हमेशा यही कहता कि किसी कारणवश सुमित उन्हें भूल गया है पर उसकी तंद्रा एक दिन टूटेगी और वह वापस उनकी आंचल में आ जाएगा। इस सोच के पीछे उस पंडित का भी बड़ा हाथ था जिसने सुमित की जन्मपत्री देख यह भविष्यवाणी की थी कि यह वापस जरूर आएगा। जब उम्मीद के सारे रास्ते बंद दिखते हैं तो लोग पूजा पाठ, टोना टोटका, जन्मपत्री दिखवाने जैसे कर्म भी आजमाने लगते हैं पर तब तक सिर्फ इंतजार इंतजार और इंतजार…
साल दर साल गुजरते गए पर ना ही सुमित आया और ना ही उसकी कोई खबर। अंकल आँटी एक दूसरे से छिपा छिपा कर रोते। दोनों एक दूसरे से सुमित की चर्चा तक नहीं करते कि अगला खुश मुस्कुराता दिख रहा है तो उसकी हंसी क्यों छिनी जाए। अक्सर दोनों की आँखों में तिनका चला जाता था कि आँखें लाल दिखती थी। बेटियों ने बहुत सहारा दिया था ताउम्र। जिसे पालन पोषण के क्रम में पराया धन ही समझ गया था। कभी-कभी वर्मा संपत्ति बेहद अफसोस करते की बेटियों को उन्होंने आत्म निर्भर नहीं बनाया, क्या पता किसी बेटी को यह बेरुखी गहरी छुप गई हो कि पुत्र को ज्यादा मान ध्यान दिया जा रहा और उसकी ही आह लग गई। मन हर कोठी भटकता कि आखिर क्या हुआ होगा। अमेरिका जाना आसान नहीं था और ना ही कोई अता पता या सूत्र ही था जिसे पकड़ सुमित को खोजा जा सके उस अनजान सुदूर देश में। हर आती जाती श्वास के साथ अमेरिका को कोसते दोनों, जिसने उनका बेटा निगल लिया। दुख कहर बनकर टूटा पर दोनों में किसी ने कभी मरने की इच्छा जाहिर नहीं की।
“वह लौट कर आएगा एक दिन”
इस विश्वास ने उनकी जीजिविषा को जागृत रखा। वर्मा अंकल कोई दस वर्ष पहले गुजरे। उन दिनों उनकी आँखों में, आए दिन कोई तिनका मानों चुभा रहता, हर वक्त लाल जो रहती थी। आँटी जब पूछती कि आंखें लाल दिख रही हैं, तो अंकल का जवाब हाजिर रहता,
“तुम्हें तो बस डॉक्टर के पास मुझे ले जाने का बहाना चाहिए कह तो रहा हूँ कि टहलते वक्त आंखों में कुछ चला गया है। अभी ठंडा पानी के छींटें मारता हूं निकल जाएगा।
….और इस तरह दिन भर आंखें गीली रहती तिनका तो नहीं निकला पर एक दिन उनके प्राण पखेरू अवश्य निकल गए। आँटी ने बेहद बहादुरी से उनकी मृत्यु को स्वीकार किया और अब अकेली ही सुमित की राह देखने लगी थी।
“अम्मा देखो अब लगभग सभी कुछ जा चुका है थोड़े बहुत बचे हैं उन्हें मैं समेटती हूं”
सुगंधा ने ड्राइंग रूम की दीवारों से तस्वीरों को उतारते हुए कहा। अपनी रॉकिंग चेयर पर बगल में ही बैठी आँटी अभी भी,
“मैं नहीं जाऊंगी” की जप कर रहीं थी।
सुगंधा ने अपने पिता की हार चढ़ी तस्वीर को उतारा, कुछ क्षण को थम कर उन्हें देखती रही; कैसे तड़पते हुए गए अपने अंतिम समय में। काश! कि भाई की कोई खबर ही मिल जाती कम से कम आत्मा को चैन तो मिलता। उसने बेहद संभाल कर वर्मा अंकल की तस्वीर को दीवार के सहारे खड़ा किया। अब बस सुमित की तस्वीर बची थी उस पर आज तक किसी ने हार नहीं चढ़ाया था। फोटो उतारने के पहले सुगंधा ने अपनी अम्मा की तरफ देखा, जाने अम्मा, अब इस घर में दोबारा बनने तक जीवित भी रहेगी या नहीं। पर अम्मा बड़ी अदम्य इच्छा शक्ति वाली है सुमित से मिले बिना नहीं ही जाएगी ऐसा सोचते सोचते उसने तस्वीर को दीवार से उतारा,
….ये क्या गिरने लगा?…
फोटो के पीछे से एक मोटा सा लिफाफा फिसल कर गिर पड़ा, जो गिरते हुए बिखर गया। यह क्या… ? यह तो तस्वीरें हैं;दूतावास से आई कोई चिट्ठी भी है, सुगंधा हाथ में तस्वीरों को थामे ही लेटर पढ़ने लगी। लेटर में लिखा था कि वर्षों बाद सुमित के गायब हो जाने की गुत्थी सुलझ गई है। सुमित अमेरिका प्रवास के दौरान किसी लड़की से प्रेम करने लगा था, पर वह प्यार एक तरफ निकला। लड़की के इनकार करने पर सुमित ने पुल से नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली थी.
शायद जैसा कि उसके किसी दोस्त ने पहले भी आशंका व्यक्त की थी। बॉडी बहते हुए कहीं दूर निकल गई थी और शायद चट्टानों के बीच फंसी रह गई थी। लेटर में अफसोस जताते हुए कहा गया था कि हम आज भी यह बताने में असमर्थ है कि उसने आत्महत्या की या उसकी हत्या की गई या यह महज एक दुर्घटना थी। बहुत खोजबीन के बाद भी सही तथ्यों की जानकारी नहीं मिल पाई है पर इतना तय है कि वह मर चुका है। साथ में उसकी पानी में फूली सड़ी गली सी शरीर की तस्वीर भी थी। फोटो जूम कर लिए गए थे, जिसमें उसकी कलाई की तस्वीर भी थी हाथ में चांदी के कड़े को उसने तुरंत पहचान लिया। चिट्ठी पर तारीख कोई दस साल पहले की थी यानी वर्मा अंकल ने सच्चाई जानने के बाद ही दुनिया छोड़ा था। सुगंधा धम् से नीचे बैठ गई सुमित की बिखरी तस्वीरों के बीच और फफक कर रो पड़ी। कुछ ही देर बाद उसकी अन्मयस्कता टूटी, नजर घुमा कर अम्मा की तरफ देखा,
अम्मा अब भी रॉकिंग चेयर पर ही थी, आंखें मूंदी थी पर अब बुदबुदाना बंद था। सुगंधा तत्परता से सभी तस्वीरों को समेटने लगी अम्मा की नजर ना पड़ जाए, सोच चिट्ठी सहित सभी को दोबारा लिफाफे में भरने लगी। वह भी वही करेगी जो उसके पिता करके गए थे इनको कहीं ऐसी जगह छुपा देगी कि अम्मा की नजर नहीं पड़े। जल्दी से अपने पर्स में डाल वह अम्मा को उठाने गई, छूते ही उनकी देह एक तरफ झूल गई और आंचल से एक तस्वीर फिसलते हुए नीचे गिर गई। सुगंधा को मानो करंट लगा यानी अम्मा ने देख लिया था तस्वीरों को बिखरते हुए।
कुछ ही पलों में वर्षों का इंतजार समाप्त हो चुका था और साथ ही साथ मानों अम्मा के जीने का मकसद भी। राह ताकती सूनी अँखियां अब सदा के लिए बंद हो चुके थे। पलकों पर बैठा आस का जुगनू उड़ चुका था।
——————-समाप्त————–


बहुत अच्छी मार्मिक कहानी
Very nice, well written story.
बहुत ही मार्मिक कहानी ! झूठी ही सही लेकिन उम्मीद की चिंगारी जलती रहती है तो जीने का मकसद भी मिल जाता है । बेटियों की शिक्षा के प्रति उपेक्षा और बेटे को येन-केन-प्रकारेण विदेशी नागरिकता हासिल करने का परिणाम कहानी का महत्वपूर्ण पक्ष है
मजबूत कथ्य और बेहतरीन बुनावट से कहानी बहुत ही सुंदर और पठनीय हो गई है ।
कहानी का अंत पढ़ते हुए मन भीग जाता है ।
सफल और सुंदर कहानी के लिए कथाकार को बहुत बहुत बधाई !
Such a touching story! Very well written
Well narrated very nice story.
दिल को छु गई आपकी रचना 👍