Friday, March 27, 2026
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स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं है

गत 20 मार्च प्रयागराज में  ‘स्त्री दर्पण’ ने स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाने में एक नई पहल की। प्रयागराज की नायिकाएँ, रामेश्वरी नेहरू शिवरानी देवी को पहली बार इस शहर ने किया याद किया। समकालीन समाज और साहित्य में स्त्री की स्थिति पर केंद्रित यह संवाद सिर्फ उपलब्धियों के उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन संरचनात्मक असमानताओं की भी तीखी पड़ताल करता है जो अब भी स्त्री-अस्तित्व को हाशिये पर रखती हैं।  आमंत्रित वक्ताओं के विचारों ने एक ओर जहां साहित्य और समाज में स्त्रियों की उल्लेखनीय उपस्थिति को रेखांकित किया, तो दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठाया कि इतिहास, परिवार और सामाजिक संरचनाएँ अब भी किस हद तक पुरुष-प्रधान दृष्टि से संचालित हैं। यह विमर्श अंततः इसी आग्रह और अनुरोध पर आकर थमा कि स्त्री को ‘स्त्री’ नहीं, सबसे पहले ‘मनुष्य’ के रूप में देखने की बुनियादी चेतना विकसित की जाए, समाज के सर्वांगीण विकास के लिए यह बेहद जरूरी है।

चाहे देश की आज़ादी की लड़ाई हो या साहित्य संस्कृति और रंगमच का क्षेत्र हो, प्रयागराज की नायिकाओं ने अपनी प्रतिभा और संघर्ष से राष्ट्रीय स्तर पर न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि वे समाज को रास्ता दिखानेवाली रहनुमा बनीं।

यह बात गत दिनों स्त्री दर्पण और रज्जू भैया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रयागराज की नायिकाओं और स्त्री विमर्श पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने कही।

उनक़ा कहना था कि प्रयाग राज की देश में पहचान  मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और फिराक, निराला पंत के कारण  ही नहीं बनी बल्कि रामेश्वरी नेहरू, जानकी बाई छप्पन छुरी, दिलीपा बाई,(नरगिस की नानी) शिवरानी देवी( प्रेमचन्द की पत्नी)  महादेवी  वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान से भी बनी है। ये महिलाएं जेल भी गयी घर भी संभाला और बच्चों की परवरिश भी की।

उनक़ा कहना था कि इतिहास में अक्सर पुरुषों के योगदान को याद किया जाता है जबकि महिलाओं के योगदान को कमतर आंका जाता है या उन्हें भुला दिया जाता है।

प्रयागराज में  पहली बार ‘स्त्री दर्पण’ की सम्पादक स्वाधीनता सेनानी रामेश्वरी नेहरू और प्रेमचन्द की लेखिका पत्नी  शिवरानी देवी को याद किया गया है। यही नहीं जानकी बाई छप्पन छुरी को भी याद किया गया जिनके जीवन पर आधारित  उपन्यास प्रयागराज की एक अंग्रेजी  विदुषी  ने लिखा, जिन्हें 4 साल पहले  साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। इस साल हिंदी के लिए प्रयागराज की ममता कालिया को अवार्ड मिला।

संगोष्ठी में  साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित अंग्रेजी लेखिका प्रो. नीलम शरण गौड़, रज्जू भैय्या यूनिवर्सिटी की कुलसचिव प्रो. विनीता यादव, वर्धा अंतर्राष्ट्रीय विश्वद्यालय , इलाहाबाद की प्रो. सुप्रिया पाठक, डॉ शमेनाज़ बानो, कवयित्री अनुराधा ओस और आलोचक  प्रो.अलका प्रकाश ने अपने विचार व्यक्त किये।

वक्ताओं का कहना था कि प्रयागराज ने साहित्य ही नहीं बल्कि रंगमच और संगीत नृत्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक काम किया है।आज प्रयाग संगीत समिति अपनी स्थापना के सौ साल मना रही है। तेजी बच्चन ने प्रयाग में महत्वपूर्ण  रंगकर्म किया। अगर वह रंगमच नहीं करती तो उनके पुत्र अमिताभ बच्चन सुपरस्टार नहीं होते पर हम पुरुषों की सफलता के पीछे उसकी माँ और पत्नी के योगदान को याद नहीं करते। प्रख्यात रंगकर्मी रेखा जैन ने भी इस शहर में रंगमच को नई दिशा दी है। गत वर्ष उनकी जन्मशती दिल्ली में मनाई गई। आज भी इस शहर की लेखिकाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही हैं और जीवन के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं।

उनक़ा कहना था कि कमला नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस तरह प्रयाग राज ने राष्ट्रीय मानचित्र पर  अपनी विशेष पहचान बनाई है।

स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं 

वक्ताओं का कहना था कि स्त्री विमर्श केवल अस्मिता विमर्श नहीं है बल्कि वह समाज मे चल रही लड़ाई और विमर्श का हिस्सा है औऱ सबकी भागीदारी से ही स्त्रियों की मुक्ति संभव है।

राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श और दलित आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम जरूर किया पर वीरभारत तलवार के शब्दों में स्त्री दर्पण पत्रिका से ही हिंदी पट्टी में स्त्री विमर्श की शुरुआत हुई है।

समारोह में  स्त्री लेखा पत्रिका के  स्मृति अंक का विमोचन किया गया जो प्रसिद्ध साहित्यकार राजी सेठ की स्मृति में प्रकाशित  गया है। इसमें गत दिनों दिवंगत हुए नौ लेखकों को भी याद किया गया है, जिनमें  राजी सेठ के अलावा विनोद कुमार शुक्ल , ज्ञान रंजन , राजेन्द्र कुमार , वीरेंद्र यादव  आदि शामिल हैं। 

कवयित्री अलका प्रकाश के कविता संग्रह ‘अलंघ्य है प्रेम का’ विमोचन किया गया, साथ ही अलका प्रकाश के कविता संग्रह का अंग्रेजी में अनूदित पुस्तक के कवर का विमोचन किया गया, इस पुस्तक का अनुवाद  डॉ शमेनाज़ बानो ने किया है।

रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित विश्व कविता समारोह पर आधारित पुस्तिका ‘अंधेरे में जलती मोमबत्तियां ’का भी यहां विमोचन किया गया।

लिखते समय लेखक स्त्री और पुरुष दोनों किरदारों को गढ़ता है

मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर नीलम शरण गौड़ ने  अपने वक्तव्य में  कहा कि ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त करने से पूर्व वे स्वयं को कहीं न कहीं ‘अदृश्य’ महसूस करती थीं। उन्होंने अपने साहित्यिक सफर एवं कृतियों का परिचय देते हुए कहा कि साहित्यकार की पहचान उसके सृजन से होती है, न कि उसके स्त्री या पुरुष होने से’।उनका कहना था कि एक लेखक  अपनी रचनाओं में पुरुष और स्त्री किरदार  दोनों रचता है इसलिए वह मनुष्य को खांचे में नहीं देख सकता।

विशिष्ट अतिथि के रूप में कुलसचिव प्रो. विनीता यादव ने अपने उद्बोधन में ‘महिलाओं को शक्ति का स्वरूप बताते हुए आत्मचेतना, जागरूकता एवं समाज के बुनियादी ढांचे में सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नवरात्रि आने वाला है और हम मां की आराधना में जुट जाएंगे, लेकिन अपने घर, समाज  की स्त्रियों को दोयम दर्जा देने से नहीं चूकेंगे। श्रीमती यादव उत्तरप्रदेश की पहली महिला कुल सचिव तो हैं  ही सम्भवतः देश की पहली महिला कुलसचिव हैं।

 हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आशुतोष कुमार सिंह ने कहा कि यह आयोजन प्रयागराज की स्त्री लेखिकाओं की समृद्ध परंपरा को सामने लाने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

 कुलानुशासक प्रोफेसर आर. के. गुप्ता ने वैदिक ऋचाओं में महिलाओं के योगदान का उल्लेख करते हुए स्त्री की सम्मानित स्थिति पर प्रकाश डाला तथा सती प्रथा जैसी कुप्रथा के संदर्भ में महिलाओं की ऐतिहासिक स्थिति का विश्लेषण किया। उन्होंने महिलाओं के उत्थान में उनकी स्वयं की सक्रिय भागीदारी को भी आवश्यक बताया।

कार्यक्रम का  संचालन  करते हुए समारोह की संयोजक डॉ. अलका प्रकाश ने  प्रयागराज की साहित्यिक परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि जहाँ एक ओर फिराक, निराला,, पंत, बच्चन एवं धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों को स्मरण किया जाता है, वहीं रामेश्वरी नेहरू, शिवरानी देवी, सुभद्रा कुमारी चौहान  पंत की जीवनीकार शांति जोशी जैसी स्त्री रचनाकारों की उपेक्षा होती रही है। महादेवी वर्मा को छोड़ दिया जाए तो बाकी लेखिकाओ की स्मृति में कभी भी कोई आयोजन नहीं किया गया, जबकि इलाहाबाद से बीस साल तक स्त्री दर्पण पत्रिका निकली, लेकिन हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने इसे रेखांकित नहीं किया। यह पत्रिका 1909 में महिलाओं द्वारा निकाली गई। उस समय गांधी जी भारत नहीं लौटे थे ।प्रेमचन्द, प्रसाद,  मैथिलीशरण गुप्त, निराला, पंत की पहचान नही  बनी थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में सरस्वती 1903 में निकलनी शुरू हुई थी। प्रताप, मतवाला, माधुरी, हंस, विशाल भारत  औऱ कर्मवीर जैसी पत्रिकाएं भी नहीं निकली थी। ऐसे में बीस साल तक महिलाओं द्वारा ‘स्त्री दर्पण’ निकालना  स्त्री सशक्तिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम था।

डॉ. अनुराधा ओस ने राजा राममोहन राय, सावित्रीबाई फुले एवं फातिमा शेख के उदाहरणों के माध्यम से स्त्री शिक्षा और अधिकारों की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित किया तथा तालिबान के संदर्भ में वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला।

श्रीमती  ओस ने अपने विचार रखते हुए कहा कि स्त्रियों को महज़ स्त्री नहीं बल्कि मानव समझा जाना चाहिए तभी समाज में बदलाव आएगा । उन्होंने ग्रामीण महिलाओं की स्थित पर अपना विचार रखा और कहा की अभी भी बहुत बदलाव की जरूरत है, साहित्य में भी महिलाओं को वह स्थान नहीं मिल सका है जिसकी वो हकदार हैं। 

डॉ. शमेनाज़ बानो ने महिलाओं की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बुक़र पुरस्कार जैसे सम्मान का उदाहरण दिया तथा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के संदर्भ में प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने महादेवी वर्मा, गीतांजलि श्री, उषा प्रियंवदा एवं सलमा सिद्दीकी के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए साहित्य में महिलाओं की अग्रणी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने इलाहाबाद की नायिकाओं के विषय में विस्तार से चर्चा किया।  

बताया कि इलाहाबाद में एक से बढ़कर एक महिलाएं हुईं जिन्होंने फिल्म कला, शिक्षा, साहित्य में अपना अमूल्य योगदान दिया।

इतिहास पुरुषों की दृष्टि से लिखा गया

डॉ. सुप्रिया पाठक ने ममता कालिया का उदाहरण देते हुए स्त्री-विमर्श के व्यापक आयामों पर प्रकाश डाला तथा यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियों को सर्वप्रथम ‘मनुष्य’ के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने ‘History’ को ‘His Story’ के रूप में व्याख्यायित करते हुए इतिहास-लेखन की पुरुष-प्रधान दृष्टि की ओर संकेत किया, उन्होंने कहा कि स्त्रियों को परिवार ने, समाज ने केंद्र से बाहर रखा जिससे उन्हें अपना महत्व कभी पता ही नहीं चला, वैदिक काल से लेकर आज तक हुए तमाम बदलाव को उन्होंने रेखांकित किया, जेंडर की इक्वलिटी पर ध्यान देने की बात कही।

उन्होंने कहा कि स्त्री को स्त्री कहना बन्द किया जाना चाहिए उसे एक मानव की तरह देखा जाना चाहिए और पुरुष प्रधान समाज को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए एवम घर के काम काज में श्रम का विभाजन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज कामकाजी महिलाओं की समस्याएं अधिक हैं उन्हें दफ्तर घर बच्चे सब कुछ देखना पड़ता है लेकिन पुरुष सहयोग नहीं करते।

कार्यक्रम के सह-संयोजक डॉ. अजीत सिंह एवं डॉ. बब्लू यादव ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंत में डॉ. स्वास्तिका सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। यह आयोजन ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी एवं स्त्री-विमर्श के व्यापक आयामों को समझने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुआ।

यह भी पढ़ें- विश्व रंगमंच दिवस- अदृश्य होती दुनिया में मनुष्य की तलाश

अनुराधा ओस
अनुराधा ओस
जन्म- मीरजापुर जनपद, उत्तर प्रदेश के गांव में, गांव के पास के स्कूल में बारहवीं तक पढ़ाई करने के बाद, मीरजापुर से हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। तत्पश्चात 'मुस्लिम कृष्ण भक्त कवियों की प्रेम सौंदर्य दृष्टि' पर पीएच. डी.किया। हिंदी की सभी महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। दो कविता संग्रह ‘ओ रंगरेज’ और वर्जित ‘इच्छाओं की सड़क: ’प्रकाशित हैं। सम्मान- अमर उजाला का अपराजिता सम्मान। संपादन- ‘खिलूंगी यहीं कहीं’ स्त्री कविता संग्रह का (चयन एवं संपादन)।
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