आज यानी 15 मार्च को राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि है।15 मार्च 1992 को 64 वर्ष की आयु में बंबई में उनका निधन हो गया। राही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितंबर 1927 को ग़ाज़ीपुर के गंगौली गाँव में हुआ था। आरंभिक शिक्षा-दीक्षा ग़ाज़ीपुर में ही हुई। क़िस्सा है कि बचपन में एक बार वो बीमार पड़े तो स्कूल जाना छूट गया। पड़े-पड़े घर में मौजूद सारी किताबें पढ़ गए। क़िस्सों से उनका दिल बहलाने के लिए एक मुलाज़िम कल्लू काका भी रखे गए थे। उन्होंने बाद में यह कहा कि कल्लू काका न होते तो उन्होंने शायद कोई कहानी न लिखी होती। यूं कल्लू काका उनका पहला स्कूल हुये। आगे की उनकी पढ़ाई अलीगढ़ से हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ही उन्होंने उर्दू में ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पर पी.एच.डी. की। फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ही उर्दू के प्राध्यापक लग गए। अलीगढ़ से उनका बेहद लगाव रहा।
अलीगढ़ अगर ‘मजाज़’ का था तो चर्चा में वह भी कोई पीछे न थे। वे कहा करते थें कि उनकी तीन माएँ हैं- नफ़ीसा बेगम,गंगा और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी।’ गंगा जो उनके गांव ‘गंगौली’ में बहती थी।’
वे अलीगढ़ में ही ‘नय्यर जहां’ से मिले जो उनकी जीवनसाथी बनीं। हालांकि नय्यर पहले से ही शादी-शुदा थीं। अलीगढ़ में ही वह कम्युनिस्ट भी हुये। इतने कम्युनिस्ट कि नगरपालिका चुनाव में भूमिहीन मज़दूर प्रत्याशी कॉमरेड पब्बर राम के पक्ष में न केवल अपने पिता के ख़िलाफ़ प्रचार किया, बल्कि उन्हें हरवा भी दिया। उनका यह साम्यवादी नज़रिया आगे भी बना रहा। वह वास्तविक अर्थों में ‘सेकुलर’ दृष्टिकोण रखते थे।
लेखन का आरंभ उन्होंने शायरी से किया था और शेरो-सुख़न में एक मुक़ाम भी पाने लगे थे। वे उर्दू में नज़्म और ग़ज़ल लिखते थे। फिर शायरी छोड़ दी और गद्य लिखने लगे। वे एक साथ कई चीज़ें लिखा करते थे। शाहिद अख्तर, आफाक़ हैदर और आफ़ताब नासिरी उनके ही अलग-अलग नाम थे जो उन दिनों अलीगढ़ में रूमानी और जासूसी नॉवेल लेखक बतौर बहुत चर्चा में थे।
उनके अन्य उपन्यास हैं- टोपी शुक्ला’, ‘कटरा बी आर्ज़ू’, ‘मुहब्बत के सिवा’, ‘असंतोष के दिन’, दिल एक सादा कागज, ‘नीम का पेड़’। नीम का पेड़ तो 1984 के दूरदर्शन का एक बहुत प्रसिद्ध धारवाहिक भी रहा है। टोपी शु्क्ला उनके इन सारे उपन्यासों में से बतौर पाठक और लेखक दोनों , मुझे बेहद प्रिय है।
‘नया साल’, ‘मौजे-गुल: मौजे-सबा’, ‘रक्से-मय’, ‘अजनबी शहर के अजनबी रास्ते’, ‘ग़रीबे शहर’ उनके प्रमुख उर्दू काव्य-संग्रह हैं और उनकी उर्दू कविताओं के हिंदी अनुवाद को ‘मैं एक फेरीवाला’, ‘शीशे के मकां वाले’, ‘ग़रीबे शहर’ संकलनों में प्रकाशित किया गया है।
‘देश में निकला होगा चाँद’ उनकी बेहद लोकप्रि नज़्म है जिसे जगजीत सिंह- चित्रा सिंह ने पहली बार गाया था। उन्होंने कई फ़िल्मों और धारवाहिकों के लिए पटकथा और संवाद-लेखन भी किया था। ‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’ फ़िल्म की पटकथा के लिए उन्हें ‘फ़िल्म फ़ेयर’ मिला था।
वह बाद में अलीगढ़ छोड़ बंबई चले गए। या यूं कहें कि उन्हें वहां से चले जाने को मजबूर किया गया। हालांकि अलीगढ के लोग आज भी इसे उनका मुंबई ‘भाग जाना’ कहते हैं। फ़िल्मों से उन्हें शुरू से ही लगाव रहा था। बंबई में संघर्ष लंबा चला। बंबई के इन दिनों का जीवन, अलीगढ की यादें और भीतर का टूटन सब वहां लिखे गये उनके उपन्यासों में दर्ज है। खासकर ‘ दिल एक सादा कागज़’ में। शेर और नज्मों को रोजी-रोटी के दौर में वो बहुत पीछे छोड़ आये थे, पर अब भी कहीं वो जिंदा, धड़क रहा था, उनके उपन्यासों में। ‘दिल एक सादा कागज़’ में वे लिखते हैं-
1- ‘रात के झिलमिलाते सफ़र में,
खो गयी हैं कहीं मेरी परछाइयां।
गैर है आस्मां, अजनबी है जमीं
मैं पुकारूं किसे, चल के जाऊं कहां?
रात के जगमगाते सफर में, खो गयी हैं कहीं मेरी परछाइयां।’
2- ‘हिज्र के शह्न में
याद की रहगुजर
दूर तक, आज, वीरान है
दोस्त गुम हो गये
सिर्फ परछाइयां रह गयीं
और सुबह
अभी, न जाने कितनी रातों के बाद आयेगी?’
और इस किताब में नायिका की आड़ में वो जैसे नय्यर जहां से हीं मुखातिब है-
‘तेज चलने लगी गुरबत में हवा,
गर्द पड़ने लगी आईने पर
जागते रहने का हासिल क्या है?
आओ सो जाओ मेरे सीने पर
ख्वाब तो दोस्त नहीं है कि बदल जायेंगे
ख्वाब तो दोस्त नहीं कि
धूप में देखें तो मुड़ जायेंगे…
अगले शब रूठ के सोया था जहां
चांद ठहरा है उसी जीने पर।
जागते रहने का हासिल क्या है, आओ सो जाओ…’
सचमुच वे दिन बेकली के रहे होंगे। गुरबत, भूखमरी, आशियाने की तलाश और पीछे छूट चुके अपने शहर, दोस्त और उससे मिली रुसवाइयों की स्मृतियां। तब उनकी मदद धर्मवीर भारती और कमलेश्वर ने की। बाद में बी.आर.चोपड़ा और राज खोसला की दोस्ती उनके बहुत काम आई, वे उन्हें अपनी फिल्में देने लगे थे। बी.आर. चोपड़ा ने अपने बेहद लोकप्रिय धारवाहिक ‘ महाभारत’ का पटकथा-लेखन भी उनसे कराया।
मुंबई उनके लिए साहित्यिक लेखन के दृष्टिकोण से भी उर्वर रही। यहां रहते हुये उन्होंने ‘आधा गाँव’, ‘दिल एक सादा काग़ज़’, ‘ओस की बूँद’, ‘हिम्मत जौनपुरी’ जैसे बेहतरीन उपन्यास लिखे गयें। और ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। आधा गांव के बाद उन्होंने कुछ भी उर्दू में नहीं लिखा। और यह न लिखना एक सबक की तरह था और उसका परिणाम भी। इस सबसे पहले शायद अलीगढ रहते हुये ही उन्होंने एक महाकाव्य भी लिखा था, जो बाद में हिंदी में ‘क्रांति कथा’ शीर्षक से छपी।
उनके संदर्भ में सबसे दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात यह है कि राही उर्दू के मशहूर और मकबूल शायर रहे हैं, लेकिन उन्हीं उर्दू वालों ने उनके औपन्यासिक लेखन को बिल्कुल तरजीह नहीं दिया। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू के अस्थायी अध्यापक थे। स्मृति शेष वीरेंद्र यादव के अनुसार जब उनके स्थायीकरण के लिए कमेटी बैठी तब उन्हें खारिज करते हुए सर्वसम्मति से यह दलील दी गई कि उन्हें साहित्य की समझ नहीं है। किसी साहित्यकार और शिक्षक दोनों के लिए इससे बुरा भला क्या कहा जा सकता है? चयन समिति के अध्यक्ष प्रो. आले अहमद सुरुर थे, जो उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी थे। दरअसल उनका चयन न किए जाने का मुख्य कारण नवाब रामपुर के दामाद कर्नल यूनुस की पत्नी नय्यर जहाँ से उनका प्रेम विवाह था। इस कारण उर्दू साहित्य और मुस्लिम समाज के अरिस्टोक्रेट से लेकर तरक्कीपसंद तक सभी उनसे दुराव रखते थे। हालांकि कर्नल ने उनपर कभी कोई इल्जाम नहीं. लगाया और इसे अपनी पत्नी की पसंद और चुनाव ही कहा पर वहां के लोग उनसे खार खाये रहें।
मैंने दशकों बाद उनके गांव से ताल्लुक रखनेवाले अपने एक मित्र से भी यह सुना कि राही मासूम रजा़ कोई अच्छे याकि बड़े लेखक नहीं थे, वे बहुत चरित्रहीन किस्म के इंसान थे। गंगौली के लोग उन्हें अपने गांव का बाशिंदा कहने में संकोच करते हैं। मुझे हैरत हुई कि वह साहित्य का विधार्थी नहीं था। वह कानून का विधार्थी था और उसकी वल्दियत भी यही थी। फिर भी राही के लिए उसके मन में बसा दुराग्रह बहुत कुछ कह रहा था।
प्रचलित छवि और कथाओं से इतर अब बात सिर्फ राही के लेखन, उर्दू और अलीगढ की। उनका ‘आधा गाँव’ उपन्यास, जो मूल रूप से फारसी लिपि में लिखा गया था उर्दू में न छपकर हिंदी में छपा। हिंदी। उर्दू में वह बाद में आया, प्रकाशन के 38 वर्षों बाद, उनके न रहने पर कलकत्ता के एक प्रकाशन से और वह भी हिंदी वालों के सहयोग से। जबकि उसका अंग्रेजी सहित कई अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद बहुत पहले हो चुका था।
राही ने ‘आधा गाँव’ में जिस तरह मुस्लिम अभिजन समाज को निशाने पर लेते हुए एक इनसाइडर के रुप में आलोचना की, वह उर्दू के लिटरेरी इस्टैबलिशमेंट को स्वीकार नहीं था। वीरेंद्र यादव ने वर्ष 2001 में ‘आधा गाँव’ पर एक विस्तृत आलोचनात्मक लेख तद्भव’ पत्रिका में लिखा था, जिसमें प्रसंगवश इसकी तुलना ‘आग का दरिया’, ‘उदास नस्लें ‘और ‘छाको की वापसी’ से की गयी थी। ‘तद्भव’-5′ में प्रकाशित उस लेख को साजिद रशीद मुम्बई से प्रकाशित अपनी उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘नया वरक़’ में अनुवाद करवा कर छापना चाहते थे। लखनऊ के उर्दू साहित्य के मर्मज्ञ वकार नासिरी बाखुशी इसके अनुवाद को तैयार थे। उन्होंने इससे पहले भी यादव के ‘गोदान’ पर लिखे लेख का अनुवाद ‘नया वरक़’ के लिए किया था। लेकिन आलोचना पढने के बाद वकार ने काफी आक्रोश भरे स्वर में पत्रिका वापस करते हुए उन्हें उलाहना दिया कि यह तो आपने तकरीबन कुफ्र जैसा काम किया है। आपने ‘आधा गाँव’ की तुलना ‘आग का दरिया’ से कर दी। उन्होंने वीरेंद्र यादव से कहा कि – ‘आप हिंदी वालोँ के लिए राही बड़े नाविलनिगार होंगें, लेकिन उर्दू अदब में बहैसियत नावेलिस्ट उनका कोई मुकाम नहीं है।’ राही हमारे लिए बस एक मकबूल शायर हैं और सिर्फ इतना भर ही हैं… मैं नहीं जानती वह लेख फिर उर्दू में अनूदित हुआ या नहीं या फिर कहीं अन्य शाया हो सका भी या नहीं…
उर्दू वाले तो उर्दू वाले हिंदी वालों ने भी ‘आधा गाँव’ को जोधपुर और मराठवाड़ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से अश्लीलता का आरोप लगाकर निकलवाया था और साहित्य अकादमी सम्मान की सूची से भी वे बहिष्कृत ही रहे थे। दरअसल राही को अपने स्वाभिमान, प्रतिबद्धता और अपने स्वतंत्र सोच की कीमत आजीवन चुकानी पड़ी थी। अपने धर्म निरपेक्षता का कर्ज अदा करना पड़ा।
अलीगढ़ के लोगों ने जिन दो लोगों को कभी माफ़ नहीं किया या यूँ कहें कि जो उनके निशाने पर रहे वे थे राही साहब और दूसरी प्रो रशीद अहमद सिद्दीकी की बेटी सलमा सिद्दीकी, जिन्होंने कृशनचंदर से शादी की थी। कहें तो मुस्लिम समुदाय और अलीगढ वालों की राही से नाराज़गी की सबसे बड़ी वजह भी यही थी। उनका वश चलता तो वे उनके सारे लिखे को आग लगा देते, फाड़कर फेंक डालते। पर ऐसा करना अपने ही कहे और किये से एक.तरह से मुकर जाने जैसा होता शायद। नैय्यर जहां से शादी और अपने मुंबई जाने से पूर्व वे एक प्रतिष्ठित शायर थें। अलीगढ की जनता और पढे-लिखे लोग उन्हें उनके इसी रूप में देखती और जानती थी। फिर वे इससे इंकार किस मुंह से करते?
अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक विधार्थी का ये कहना था -‘मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही पढ़ाई की है। सेंट्रल लाइब्रेरी की कुछ पत्रिकाओं में राही साहब और सलमा आपा के फ़ोटोज़ को बुरी तरह से जब बिगड़ा हुआ देखा तब कहीं जाकर यहां के लोगों की मानसिकता का अंदाज़ा हो सका था कि यहां के लोग जिस शिद्दत से प्यार करते हैं उसी हद तक नफरत भी।’
इसी मुतल्लिक़ एक और दिलचस्प वाक़िया। कहा जाता है कि अलीगढ़ वालों का सेंस ऑफ ह्यूमर गजब का होता है। कहते हैं कि कर्नल साहब की बीवी को ले उड़ने के बाद बहुत दिन तलक राही साहब अलीगढ़ नहीं आए। आख़िरकार बहुत बरस बाद जब उसी शहर में उनका आना हुआ तो विद्वजनों की महफ़िलें सजीं। राही साहब की आंखें नम थी। बहरहाल नई पीढ़ी के छात्रों में अपने लिए प्यार और उत्साह देखकर राही साहब कुछ पुरानी यादों में खो गए होंगे और कुछ शेर उन्होंने भावुकतावश सुना दिए –
‘अब जो है गर्मिए बाज़ार तो हम उसमें नहीं,
हम भी थे गर्मी-ए-बाज़ारे जहाँ में पहले।
जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं
शाखें गुल कैसी है है, खूश्बू के मकां कैसे हैं?
ऐ सबा तू तो उधर से भी गुज़रती होगी,
,उन गलियों में मिरे क़दमों के निशां कैसे हैं?’
तो छात्रों के बीच से एक जोरदार आवाज़ आई –
“’आधे आधे’ या शायद डेढ़ डेढ़ …’
राही साहब नम आंखों से भी विधार्थियों की इस हाजिरजबाबी और शरारत पर हंस दिये थे। दरअसल बचपन में राही साहब को पोलियो की वजह से पैर में हल्का सा लंगड़ापन था। उनका एक पैर ज़मीन पर पूरा नहीं पड़ता था। शहर ने अतीत की कहानियों को न भूलते हुये, उनकी कमियों की तरफ ईशारा करते हुये दरअसल उन्हें उनका अतीत ही तो याद याद दिलाया था।
डॉ० राही मासूम रज़ा को फ़िल्म निर्माता व निर्देशक बीआर चोपड़ा ने “महाभारत” टीवी सीरियल की पटकथा लिखने को कहा। राही मासूम रज़ा ने इनकार कर दिया था- मुझे यह करके अच्छा लगता पर…।
दूसरे दिन यह ख़बर न्यूज़ पेपर में छप गयी। हज़ारों लोगों ने चोपड़ा साहब को ख़त लिखा कि – ‘एक मुसलमान ही मिला “महाभारत” लिखवाने के लिए? ज्ञानी लोग हिंदी में अब बचे ही नहीं?
उन्होंने बात दिल पर ले ली। वे आहत भी बहुत थे। उन्होंने कहा- ‘आप यह कहते कि राही अनपढ है, वो वेद-पुराण नहीं जानता, तो मैं आपको मैं समझाता कि मैंने सब पढा है और बार-बार पढा है। पर आप कह रहे हैं राही मुसलमान है, वो महाभारत के डायलॉग नहीं लिख सकता। तो मैं सबसे पहले एक भारतीय हूं। अपने गांव गंगौली का निवासी हूं। और एक गंगा पुत्र के सिवा महाभारत की दास्तां और कौन लिख सकता है भला?’
महाभारत का टेलीकास्ट जब शुरु हुआ,चोपड़ा साहब आये हुये सारे ख़तों को राही मासूम रज़ा के पास भिजवा देते थे कि इससे वो खुश होंगे, उनका मनोबल बढेगा। धीरे-धीरे उनके घर में ख़तों के अंबार लगते गए। लोगों ने डॉ० राही मासूम रज़ा की खूब तारीफें की एवं उन्हें खूब दुआएँ दी। ख़तों के कई गट्ठर बन गए, लेक़िन एक बहुत छोटा सा गट्ठर उनकी मेज़ पर करीने से रखा रहता। जिसके बारे में पूछने पर राही मासूम रज़ा साहब कहते कि – ‘ये वह ख़त हैं जिनमें मुझे गालियाँ लिखी गयी हैं।’
‘कुछ हिंदू इस बात से नाराज़ हैं कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुसलमान होकर “महाभारत” की पटकथा लिखने की?’
‘कुछ मुसलमान नाराज़ हैं कि तुमने हिंदुओं की किताब पर क्यूँ लिखा?’ राही कहते कि- ‘ख़तों की यही सबसे छोटी गट्ठर दरअसल मुझे हौसला देती है कि मुल्क में बुरे लोग हैं तो पर कितने कम हैं।’
ऐसा नहीं कि वे आहत नहीं होते थे, वे आहत होते थे पर ऐसे वक्त में ये चिट्ठियां उन्हें समझाती थी, संभाल लेती थी।
दूसरी बार वे तब टूटे थें जब उनके बेटे ने इंडोनेशियाई मूल की एक पॉप सिंगर पार्वती से शादी की थी। (पार्वती महाराज त्रिनिदाद और टोबेको की रहनेवाली थीं। वे डिस्को डांसर फिल्म के गीत ‘ जिमी- जिमी से चर्चित हुईं। बाद में उन्होंने पॉप की तरफ रुख किया और वर्तमान में वे भजन और अध्यात्म से जुड गयी हैं। आज वे अगर अध्यात्म से जुड़ी हुई हैं तो इसमें भी रज़ा साहब के परिवार के लोकतांत्रिक मूल्यों का हाथ है) चूंकि पार्वती ने धर्म परिवर्तन नहीं किया था, शादी के बाद उनका नाम हुआ था-पार्वती खान। लोगबाग एक बार फिर से उबलने लगे थे। यह उनकी देवी का अपमान था। पार्वती के साथ ‘खान’ का जुड़ना उन्हें बेहद नागवार गुजर रहा था। तब आहत राही ही सामने आये थे। उन्होंने कहा था – ‘पार्वती का नाम अगर पार्वती है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं? क्या प्रेम करना पाप है, या फिर प्रेम में शादी करना? क्या यह गलत हुआ कि मैंने या मेरे बेटे ने उसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया? वह जैसी है हमारे परिवार ने उसे वैसे ही कुबूला? यदि ऐसा नहीं हुआ होता तो आपकी शिकायत शायद खत्म हो जाती।’
यूं भी राही की अब संभलने और खुद को सहेजने की उम्र नहीं रह गयी थी। चिट्ठियों का वह छोटा अंबार अब बड़ा हो चुका था। और शायद इसी थकान में उन्होंने उस रात अपनी डायरी में बस दो पंक्तियां लिखी थीं-
‘लड़ते-लड़ते हार गये हम,
लगता है बेकार गये हम।’


कहानीकार कविता द्वारा लिखा गया यह स्मरण-लेख राही मासूम रज़ा के जीवन, लेखन और उनके साथ घटित सामाजिक-सांस्कृतिक विडंबनाओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाता है। लेख में गंगौली से अलीगढ़ और फिर बंबई तक की उनकी यात्रा के बहाने यह दिखाया गया है कि एक स्वतंत्र, धर्मनिरपेक्ष और बेबाक लेखक को अक्सर अपने ही समाज में अस्वीकार और संदेह का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से उनके उपन्यास आधा गाँव तथा लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से लेखिका ने यह रेखांकित किया है कि राही की असली पहचान किसी धर्म या भाषा की सीमाओं में नहीं, बल्कि एक व्यापक भारतीय चेतना वाले रचनाकार की थी। यह लेख केवल एक साहित्यकार का स्मरण नहीं, बल्कि उस पीड़ा और संघर्ष का दस्तावेज़ भी है जिसे एक प्रतिबद्ध लेखक अपनी वैचारिक स्वतंत्रता की कीमत के रूप में झेलता है।
शुक्रिया उर्वशी!