कमलेश्वर हिंदी साहित्य के उन विरले रचनाकारों में थे जिनके लिए लेखन किसी एक विधा की सीमाओं में बंधा कर्म नहीं, बल्कि समय और समाज से लगातार संवाद का माध्यम था। कहानी, उपन्यास, संपादन, पत्रकारिता, फिल्म और टेलीविजन, हर क्षेत्र में उनकी सक्रिय उपस्थिति उनके भीतर के बेचैन, सामाजिक रूप से सजग लेखक की पहचान बनती है। वे सिर्फ रचनाकार नहीं, साहित्यिक आंदोलनों के सूत्रधार और नए लेखकों के भरोसेमंद संपादक भी थे। कमलेश्वर का लेखन मूल में मध्यवर्ग और स्त्री जीवन की विडंबनाओं का दस्तावेज़ है।
मनोहर श्याम जोशी ने अपने विभिन्न विधाओं में समानांतर आवागमन पर किए गए सवालों पर बड़े स्पष्ट लहजे में कभी कहा था- ‘जो भी विधा मुझे अपने पास बुलाएगी, मैं वहाँ चला जाऊँगा…।’ हालांकि उनसे भी ज्यादा कहीं यह बात कमलेश्वर के लेखन पर लागू होती दिखाई देती है। वे मनोहर श्याम जोशी से भी कहीं अधिक भूमिकाओं में अपने पूरे जीवनकाल में दिखते हैं।
कहानीकार और उपन्यासकार के अतिरिक्त संपादन, पत्रकारिता, अनुवाद, फिल्म पटकथा और संवाद लेखन,कमलेश्वर के व्यक्तित्व के बिल्कुल अलग-अलग आयाम रहे, जिन्हें एक में मिलाकर नहीं देखा जा सकता। यूँ कहा जा सकता है कि कमलेश्वर की कलम से निकलने वाले शब्दों का रंग स्याह न होकर पानी जैसा था। जिस भी विधा को वह छूती, उसी के रंग और लहजे में खुद को ढाल भी लेती। फिर भी उनका “कमलेश्वरी तर्ज़” उनके हर लिखे में दस्तखत की तरह मौजूद और मौजूँ दिखता है। यह उनका स्थायी सिग्नेचर टोन है, सामाजिक विषमताओं का अंकन और उसके प्रति मूलभूत विद्रोह।
मध्यवर्गीय जीवन की विषमताएँ और उस सब में भी स्त्री जीवन का एकांत और उसका दुख, यह विषय उपन्यास लेखन के साथ-साथ कमलेश्वर के फिल्म पटकथा लेखन का भी हिस्सा रहा। ‘तलाश’, ‘मांस का दरिया’, ‘राजा निरबंसिया’ और ‘देवा की माँ’ जैसी उनकी अनेक कहानियाँ स्त्री जीवन और उसके दुखों की गहराई से पड़ताल करती हैं। उनके उपन्यासों पर आधारित फिल्में- ‘आंधी’ (काली आंधी), ‘मौसम’ (आगामी अतीत) और और कहानी पर आधारित ‘फिर भी’ (तलाश), इसके प्रमुख उदाहरण हैं। पर समय बीतने के साथ ‘सारा आकाश’, ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ जैसी सार्थक फिल्मों की धारा से निकलकर कमलेश्वर “साजन की सहेली” और “सौतन की बेटी” जैसी घोर कमर्शियल फिल्मों के चक्कर में भी आ फँसते हैं।
एक अर्थ में यह गिरावट मात्र नहीं थी। कमलेश्वर तब के कमर्शियल सिनेमा के ख्यात पटकथा और संवाद लेखक हो चुके थे। पर कला और विषय की दृष्टि से देखें तो यह घटना समाज और अच्छी फिल्मों के दर्शकों के लिए एक गंभीर क्षति थी। ध्यान देने योग्य यह भी है कि उनकी कोई भी फिल्म बिना किसी सामाजिक संदेश के समाप्त नहीं होती, और औरत वहाँ चाहे जिस रूप में भी आई हो, उसका एक उजला पक्ष कहीं- न- कहीं अवश्य दिख ही जाता है।
अपनी कहानियों में कमलेश्वर बहुत सहज दिखते हैं, बिल्कुल स्पष्ट संदेशों के साथ। नई कहानी आंदोलन की त्रयी (राजेंद्र यादव और मोहन राकेश के साथ) में वे सबसे सहज हैं। यह उनकी कहानियों के नामों से भी समझ में आता है- यथा ‘वापसी’, ‘देवा की माँ’, ‘नीली झील।’ यहाँ नाम में चमत्कार भरने की कोशिश नहीं है। आम लोगों की भाषा में कहानी कह देने की कला ही वह वजह रही कि ‘राजा निरबंसिया’ के प्रकाशित होते ही पाठकों ने उसे हाथों-हाथ लिया।
इसके विपरीत एक टीवी पत्रकार और इस माध्यम के लेखक के रूप में वे हर जगह अपनी विशिष्टता बनाए रखते हैं। ‘परिक्रमा’ और ‘बंद फ़ाइलें’ उनके लिखित ऐसे कार्यक्रम थे, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में नया इतिहास रचा। ‘परिक्रमा’ ने लगातार सात साल तक दूरदर्शन पर अपना वर्चस्व बनाए रखा। धार्मिक और ऐतिहासिक धारावाहिकों के बाद यह अकेला कार्यक्रम था, जिसका हिंदी भाषी क्षेत्रों की जनता बेसब्री से इंतजार करती थी।
कमलेश्वर ने अपने जीवनकाल में 300 से अधिक कहानियाँ और कुल 13 उपन्यास लिखे। वे अपनी पीढ़ी के ऐसे लेखक रहे, जिन्होंने अंतिम समय तक लेखन नहीं छोड़ा, या यूँ कहें, लेखन ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उनके जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा गया उनका उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ लोकप्रियता के सारे आयाम पीछे छोड़ देता है। इसके लगातार आ चुकें न जाने कितने संस्करण इसका प्रमाण हैं।
‘कितने पाकिस्तान’ के लिए कमलेश्वर को साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ। हालांकि इस पर क़ुर्रतुल ऐन हैदर के ‘आग का दरिया’ की छाया स्पष्ट दिखती है। आकार-प्रकार ही नहीं, विषयवस्तु, कथ्य और शिल्प में भी सामंजस्य दिखाई देता है। पर इसे नकल नहीं, बल्कि शिल्प और कथ्य के अनुकरण की परंपरा में देखना अधिक उचित होगा। जिम्मेदार लेखक अंततः अपने समय और समाज की विसंगतियों की ओर ही लौटता है, कमलेश्वर जैसे लेखक तो सबसे पहले।
‘विहान’, ‘इंगित’, ‘नई कहानियाँ’, “सारिका”, ‘कथा यात्रा’, ‘श्री वर्ष’ और ‘गंगा’ जैसी पत्रिकाएँ कमलेश्वर के संपादक रूप की घोषणा-पत्र मानी जा सकती हैं। खासकर ‘नई कहानियाँ’ और ‘सारिका’ का संपादन। ‘सारिका’ के माध्यम से चलाया गया ‘समानांतर कहानी आंदोलन’ साहित्य में नए सामाजिक सरोकारों की दस्तक था। इसी मंच ने दलित लेखन, विशेषकर मराठी दलित लेखन को पहली बार व्यापक पहचान दी।
बतौर संपादक कमलेश्वर की प्राथमिकता नए लेखकों को मंच देना और उन पर भरोसा करना रहा। अपने ‘संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने लेखकों के लिए ‘गर्दिश के दिन’ नाम से एक कॉलम शुरू किया। मैनपुरी, इलाहाबाद और दिल्ली के संघर्षमय दिनों की स्मृतियाँ इसकी पृष्ठभूमि थीं। मन्नू भंडारी बताती हैं कि वे कई बार एडवांस लेकर लिखते थे और नई पीढ़ी के लेखकों को भी अग्रिम पारिश्रमिक देने में संकोच नहीं करते थे।
कमलेश्वर अपने उसूलों के इतने पक्के थे कि आपातकाल के दौर में जब उनसे कहा गया कि पत्रिका छपने से पहले सरकारी अधिकारियों को दिखाई जाए, तो उन्होंने ‘सारिका’ के पन्नों को काला करके विरोध दर्ज किया। यह विरोधी तेवर और विरोधी पक्ष के प्रति खुला मन उनके स्वभाव का मूल हिस्सा था। दूरदर्शन के महानिदेशक पद की प्रक्रिया के दौरान इंदिरा गांधी से मुलाकात में उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने आपातकाल के विरोध में ‘काली आंधी’ लिखी थी और संपादकीयों में विरोध किया था। उनकी साफगोई से इंदिरा गांधी प्रभावित हुईं, यह घटना उनकी बेबाकी का प्रमाण है।
कमलेश्वर के जीवन में आवारगी, संघर्ष और अस्थिरता भी रही। इन्हीं दिनों को उन्होंने “खंडित यात्राएँ”, “जलती हुई नदी” और “यादों के चिराग” जैसे संस्मरणों में दर्ज किया। विवादों और कथाओं से परे, साहित्य के प्रति उनका समर्पण और योगदान निर्विवाद है।

