Monday, April 6, 2026
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स्मरण: ‘अनंत’ स्मृतियों में जलती हुई एक धीमी लौ

लेखक अनंत कुमार सिंह गये दिन नहीं रहें पर वरिष्ठ लेखक राकेश कुमार सिंह ने यहां अपने परम मित्र को जिस आत्मीयता और बेबाकी से याद किया है, उसमें एक दोस्त के ‘जाने का शोक’, उसके सदा संग होने की उष्मा और गरिमा में परिणत हो जाता है। यहां प्रेम की गहराई भी है और आलोचना की ईमानदारी भी। यह लेख दोस्ती के उस तापमान को दर्ज करता है, जहाँ मनुष्य अपने समूचे गुण-दोषों के साथ स्वीकारा जाता है, न कि काट-छांट और झूठ-फरेब की दास्तान में। यह स्मरण सिर्फ एक मित्र की स्मृति-गाथा नहीं, बल्कि उस दुर्लभ मनुष्यत्व का आख्यान है जो धीरे-धीरे हमारे समय से लुप्त होता जा रहा है।

अनंत नहीं रहें। पर मेरे लिए वो हमेशा थे, हमेशा रहेंगे।

इससे पहले कि फेसबुक की दीवारों पर लिखी इबारतें देख कर युवा/युवती/ नयी पीढ़ी सवाल करे – ‘कौन अनंत कुमार सिंह?’ मैं अपने अभिन्न अनंत के बारे में साहित्य की दुनिया को कुछ बताना चाहता हूं, यहां।

कथाकार-संपादक सुभाष शर्मा जी की पत्रिका ‘संभव’ (जुलाई 1999) में मैंने एक आलेख लिखा था-‘आरा के कथात्रयी और समकालीन कथा परिदृश्य’ जिसमें मैंने आरा के तीन कथाकारों को लिया था। मधुकर सिंह, मिथिलेश्वर और अनंत कुमार सिंह। यह किस्सा कथात्रयी के उस तीसरे शहसवार कथाकार-संपादक अनंत कुमार सिंह नामधारी “आरा कहानी” की उस बेचैन आत्मा का।

पलामू के अपने गृह जिले से निकल कर रोटी-रोजगार के सदके मेरा आखिरी ठिकाना बना आरा का हरप्रसाद दास जैन महाविद्यालय। हार्वे स्कूल या कॉलेज के कई ऐसे परिचित रहे जिनके नाम या चेहरे यादों में धुंधले हो चुके हैं। समय के रेले में कौन किधर बह गया, पता नहीं। कॉलेज के भीतर और बाहर भी परिचय-पहचान तो अनेकों से हुई पर मित्र कह सकूं ऐसा कोई नहीं।मेरी फितरत कुछ ऐसी रही कि-

‘चलता हूं थोड़ी दूर हर इक तेज रौ के साथ,
पहचानता नहीं हूं अपने राहबर को मैं।’

अपने ऐसे मिजाज के बावजूद साहित्य में मैंने एक मित्र तो जरूर कमाया। जब भी मैं साहित्यिक-गैर साहित्यिक दोनों किनारों की ओर ताकता हूं तो गुरहा से बाहर मित्र रूप में सिर्फ एक चेहरा दिखता है- अनंत ! मेरे कॉलेज के सहकर्मी, साहित्य के मेरे गिनती के शुभचिंतक और कुछ कलम-दवातिया भी मेरे इस बयान से रंज या मायूस हो सकते हैं पर यहां यह खतरा तो मुझे उठाना ही होगा। स्वीकार करना होगा कि अनंत मेरे इकलौते हमनवां, हमराज, हमकदम, हमदम, हमसाया रहे जिनके समक्ष मैं अपनी तमाम बुराईयों और समस्त दुष्टताओं के साथ नंगा खड़ा हो सकता था। अनंत की देह से दोस्ती की महक फूटती थी।

अनंत भावुक, अनंत ईमानदार और अनंत संवेदनशील अनंत से मैं बेहद प्यार करता हूं। अनंत जैसी दुर्लभ कमाई के लिए मैं कुछ भी कर सकता .. किसी का कत्ल भी…!

अनंत से मेरा पहला परोक्ष परिचय तब हुआ था जब मैंने मिथिलेश्वर जी के घर से लाकर पहली बार साहित्यिक पत्रिका “हंस”(जून 1995) पढ़ा था। इस अंक में अनंत की कहानी “प्रदूषण” छपी थी। मैंने इस कहानी पर प्रतिक्रिया भी लिखी थी। ‘प्रदूषण बदलते सामाजिक/नैतिक मूल्यों और पीढ़ियों के अंतर को रेखांकित करती है परन्तु पूरी कहानी में एक बेचैनी-सी परिलक्षित होती रही मानों अनंत कुमार सिंह जो कहना चाह रहे हों, कह नहीं पा रहे।’ (हंस अगस्त 1995/अपना मोर्चा)।

यही वह पहला फिकरा था जिसके साथ मैंने अपने लिखे शब्दों के प्रकाशन की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया था। अब मैं कह सकता हूं कि अपने शब्दकोश के सीमित होने के कारण अनंत कुमार सिंह ‘प्रदूषण’ में स्वयं को खुल कर व्यक्त नहीं कर सके थे।

आरा की लेखक बिरादरी में रिवाज तो यही था कि व्यक्तिगत रूप से मुंह पर लेखक के काम को सराहा जाता था परन्तु अपने खेमें-गुट-धारा के बाहर वाले लेखक पर सार्वजनिक वक्तव्य में या लिखित में कभी प्रतिक्रिया नहीं दी जाती थी। चालाक चुप्पियों वाले शहर में कोई अपवाद था तो युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र थे। अपने-अपने स्वनिर्मित पिरामिडों की ऊंचाई पर समाधिस्थ आत्मकेंद्रित साहित्य-साधना के अवसरवादी समय में आरा में किसी की रचना पर लिखित प्रतिक्रिया नहीं दी जाती थी।

शातिर चुप्पी की स्थापित परंपरा को तोड़ती आरा से आई मेरी प्रतिक्रिया पर अनंत का चौंकना स्वाभाविक था। अनंत ने साहित्यिक गलियारों में टोह लगाई थी परन्तु तब मैं एक गुमनाम पाठक मात्र था। अनंत मेरी सूंघ नहीं पा सके थे।
जब मेरी पांच-सात कहानियां प्रकाशित हो चुकी थीं तभी ‘उद्भभावना’ का कहानी विशेषांक प्रकाशित हुआ था। मिथिलेश्वर जी से पता चला था कि अनंत के पास ‘उद्भभावना’ की प्रतियां आती हैं। मैं अनंत के पास, “सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक- आरा” के दफ्तर पहुंच गया था। यह अनंत से मेरी पहली मुलाकात थी (9 जनवरी 1996)।’उद्भभावना’ मिल गई थी।

पटना-दिल्ली के चायखानों और कॉफी हाउस के चर्चे साहित्य की दुनिया में खूब कहे-लिखे गए हैं। आरा में भी लेखकों के मिल बैठने-गपियाने का अड्डा था… अनंत का चैम्बर। ‘सेन्ट्रल कोआपरेटिव बैंक’ के एकांत में, एक कोने में स्थित अनंत का नीम अंधेरा कक्ष, प्रगतिशील-जनवादी लेखकों की अड्डेबाजी के लिए पूरे जनपद में ख्यात था। अन्य प्रांत-शहर से आए सैलानी-साहित्यकार भी अनंत के इस अड्डे पर पहुंच कर खुद के सही जगह पर होने की आश्वस्ति का अनुभव करते थे। तब भले ही अनंत से मेरा दोस्ताना नहीं था। पर’और लातूर गुम हो गया’ जैसी चर्चित कहानी के कथाकार शैवाल पर केंद्रित पत्रिका ‘जनपथ’ के संपादक थे अनंत। सुभाष शर्मा जी की पत्रिका “संभव” के प्रबंध संपादक भी थे अनंत और मैं? मैं क्या था? एक अक्षर प्रेमी मात्र। एक नौसिखिया कथाकार।

उस पहली ही भेंट मे अनंत ने मुझसे “जनपथ” के लिए कहानी का आग्रह कर मुझे कथाकार की मान्यता दे दी थी। मैंने कहानी दी थी। मेरी वह कहानी थी- ‘आदिम चक्रव्यूह के बीच’, जिसे मैं अब पढ़ता हूं तो खुद मुझे ही बड़ी कच्ची और अनगढ़ लगती है; “जनपथ” के अगले ही अंक में प्रकाशित हो गई थी।

Anant Kumar Sing And Rakesh Singh
अनंत कुमार सिंह और राकेश कुमार सिंह

जिस अनंत को कहानी लिखते ग्यारह वर्ष हो चुके थे, जिसकी पहली ही कहानी “उत्तरार्ध”(1984) में छपी थी उस आदमी ने मेरी अपरिपक्व कहानी को अपनी पत्रिका में स्थान क्यों दिया था? यह आमंत्रित रचना को वापस न करने का संपादकीय शिष्टाचार था या नवलेखन को प्रोत्साहित करने की संपादकीय दृष्टि थी या फिर रचना अस्वीकृत न कर पाने की असमर्थता? वह जो भी था, अनंत से मेरा परिचय घना होने लगा था। मेल-जोल के अवसर नियमित अंतराल पर सुलभ होने लगे थे।

अनंत मागध थे। गया जिले के ‘बहेरा कला’ गांव से हैं अनंत। मेरी पत्नी भी मागध थीं सो अनंत और मेरी पत्नी में भाई-बहन का रिश्ता बन गया था। पत्नी अनंत को भईया कहती थीं।

बहरहाल, अनंत में इनकार न कर पाने की कमजोरी शुरू से थी। वे इससे कभी निजात नहीं पा सके। अनंत पटना पुस्तक मेले से ढेरों किताबें खरीद लाते पर अनंत के पढ़ने से पहले मित्र लोग वे किताबें पढ़ने को मांग ले जाते थे। ले जाने वाले किताबें वापस करना भूल जाते और पढ़ने को गई किताबें फिर कभी वापस नहीं लौटती थीं क्योंकि एक तो अनंत थे ही भुलक्कड़, दूसरे अपनी ही किताबें वापस न मांग पाने की अनंत की आत्महंता शालीनता…!

शिष्टता के भार से टेढ़ी होती जाती गर्दन के कारण अनंत ‘जनपथ’ के ग्राहकों और वितरकों से पैसे-हिसाब का तकाजा भी नहीं कर पाते थे। अनंत के पास कई पत्रिकाओं की दस-बीस प्रतियां आती थीं।’वसुधा’, ‘उद्भभावना’, ‘वागर्थ’,’कथन’, ‘नया ज्ञानोदय’ ‘वर्तमान साहित्य’, ‘इतिहास बोध’, ‘जनविकल्प’, ‘समयांतर’ … आदि-आदि।

‘पैसे बाद में देता हूं’ के कभी न पूरे होने वाले वायदे के साथ पत्रिका खरीदने वाले युवा-वरिष्ठ, किसी लेखक से पैसे वसूल नहीं कर पाते थे अनंत बाबू। हर माह पांच-दस प्रतियों का भुगतान अपनी जेब से करते रहते थे अनंत।
देसी बोली मैं कहूं तो ‘मुंहदुबर’ अनंत कभी ‘ना’ नहीं कह सकते थे। प्रकाशकों की हर बेजा शर्त शिरोधार्य। कोई संपादक ‘शहरनामा’ लिखने या कोई अतिथि संपादक मित्र ‘रोपनी गीत’ या ‘जांता गीत’ लिखने का आग्रह कर देता तो अनंत बाबू अपनी लिखी जा रही चीज अधूरी छोड़ कर आग्रह की रक्षा हेतु कटिबद्ध हो जाते थे। तात्कालिक लेखन की लत अनंत को बवासीर की भांति परेशान करने लगती थी।

सामान्य भेंट हो, घरेलू बातचीत हो, वार्तालाप का विषय चाहे जो भी हो, अनंत रेलवे के पॉइंट्समैन (रेल की पटरियां बदलने वाला) की भांति एक लीवर खींचते और वार्तालाप को साहित्य की पटरी पर डाल कर दौड़ाने लगते।

अनंत के मित्रों-परिचितों की गिनती भी अनंत ही थी।लगन-ब्याह के दिनों में अनंत को पचासाधिक न्योते निभाने होते थे।अनिद्रा,थकान,अफारा और अपच…! उल्टी-दस्त…माने हाजमा बिगड़ने का मोल चुका कर भी न्योते-भोज निपटाने में अक्सर बीमार हो जाते थे अनंत।

दिखने में लंबे-चौड़े पर स्वास्थ्य के पतले अनंत जिगर के उतने ही जबरदस्त। आर्थिक डांवाडोल से जूझते हुए अनंत ने ‘जनपथ’ को मासिक कर वर्ष 2021 तक जिंदा रखा तो यह अनंत जैसे ‘घर फूंक तमाशा’ दिखा सकने वाले ‘जनपथाए’ आदमी का ही कलेजा था। भोजपुर में ‘जनवादी लेखक संघ’ प्रखर और सक्रिय रहा था तो इसमें अनंत की वाम-प्रतिबद्धता और किसी सक्रिय कार्यकर्ता जैसी जिद्द और जुनून का ही हाथ था।

ठगे जाने के लिए, चूना लगवाने के लिए, फर्जी उधार चुकाने हेतु ऐन तीर की नोंक पर स्वयं प्रस्तुत हो जाने वाला शिकार था मेरा यार। यदि चार झूठे दावे किए जांय कि फलां-फलां तारीख को ढिमका काम के लिए अनंत ने रूपए उधार लिए थे सो वापस कर दें तो भुलक्कड़ अनंत कम-से-कम तीन दावों को सही मान कर उधार चुका देंगे। इस भुलक्कड़पन के कारण ‘जनपथ’ अनवरत वितरित होती रहती, लेकिन न चंदे का हिसाब-किताब सही रहता था, न अनंत को वापसी की ही फिक्र रहती थी। नतीजा,’जनपथ’ हमेशा लाख-डेढ़ लाख के कर्ज-घाटे में फंसा रहता था।

अनंत का यूं घाटे में रहना, कर्ज में फंसा रहना मेरे लिए पीड़ादायक था पर अनंत के लिए तो यह सब ‘फिकर नॉट’ था।इन ‘फिकर नॉट’ किस्म की विफलताओं से दो-चार होते अनंत घंटा कहानी (ज्ञानरंजन) के कुंदन सरकार हो गए थे…और बात है कि यहां भी अनंत गुरूघंटाल नहीं बन सके थे। प्रायः अनंत का कोई घंटा अनंत की पुंगी बजा कर निकल जाता था। अनंत का भावनात्मक और आर्थिक दोहन करने के बाद फेसबुक पर अनंत को ही गरियाने-लांक्षित करने लगता था और अनंत अपने फिर-फिर छले जाने के बोध से हताश..!

इतना सहज,सरल, साहित्य के प्रति सच्चा, विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध और दूसरों को बेखटके अपना विश्वास सौंप देने वाला व्यक्ति आज के समाज में मूर्ख और वक्त की रफ्तार का मारा माना जाता है। बड़े मियां खुद को बार-बार बेवकूफ साबित करने-कराने के प्रति भी गजब के प्रतिबद्ध थे। यह एक जरूरी बात है जो शायद अब नहीं रही कि लेखक अपनी रचनाओं में जिन मूल्यों, आदर्शों या नैतिकता की दुहाई देता है, खुद उसे अपनाता भी है या नहीं। व्यक्ति के जीवन और लेखन में फांक लेखन या लेखक को अविश्वसनीय नहीं बनाती? कोई चाहे कितना ही अच्छा लिख लें, वक्तव्य चाहे जितना भी उम्दा दे डाले… अच्छा आदमी हो पाना और बात है। अनंत के लिए यह हर्गिज अतिश्ययोक्ति नहीं थी। वे बेहतर इंसान रहे हैं, देश-प्रांत के किसी कोने का कोई लेखक, जो अनंत के संपर्क में रहा हो, इस बात की तस्दीक करेगा।

अनंत की धर्मनिरपेक्षता भी खांटी थी। कोईअंगूठी, कलावा, गंडा, ताबीज, धागा… कुछ भी धारण नहीं करते थे अनंत , जबकि आरा में बनियान के नीचे जनेऊ छुपाए कई धर्मनिरपेक्ष वामपंथी मित्र ग्रह-नक्षत्रों के कुप्रभावों को निरस्त करने हेतु आधा दर्जन अंगूठियां धारण करते थे। आरा में ही जन संस्कृति मंच के राज्याध्यक्ष जी के बैठकखाने में बजरंग बली का खूब बड़ा चित्र शोभायमान है। अनंत की धर्मनिरपेक्षता ‘आरती से दूरी:अजान से गलबहियां” किस्म की नहीं थी, जबकि आरा के कई जनवादी मंदिरों की चौखट पर नियमित मत्था टेकते थे। एक वरिष्ठ प्रगतिशील तो अपनी पांडुलिपि प्रकाशक को अरसाल करने से पहले बजरंग बली की चौखट पर रख कर पुस्तक की सफलता के लिए आशीर्वाद भी मांगते थे। अनंत ने किसी अंधश्रद्धा, अंधभक्ति, अंधविश्वास या धार्मिक रूढ़ि को अपनाया हो, ऐसा कोई नहीं कह सकता।

‘धर्म व्यक्तिगत आस्था का मामला है’ का जाप करते हुए, जनवाद का चोला पहने गैर-जनवादी राजनीति करने वाले राजनीतिक दल वोट-बैंक बिगड़ने के भय से धर्म पर निर्णायक प्रहार करने से कतराते हैं। गिनती के लेखक जिसमें अनंत बेशक थे, इस दलीय दलदल का शिकार होने से बचे रहे। अंदर-बाहर दोनों एक, खालिस वामपंथी।

मैं साहित्यिक प्रतिबद्धताओं पर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के हावी होने देने के विरुद्ध रहा हूं पर इस विषय पर अनंत से बहस करने से हमेशा कतराता रहा, क्योंकि अनंत अपनी राजनीतिक विचारधारा के अंध समर्थक रहे थे। आलोचना सह नहीं पाते थे। प्रतिकार के तर्क न ढूंढ पाने पर एकदम रूआंसे हो उठते थे। अनंत की सोच कभी-कभी मुझे डराने लगती थी। साहित्य से समाज को बदल डालने की सद्इच्छा अनंत जैसे लेखक को मानसिक अवसाद की ओर न धकेल दे, मैं डरता था। कई लोग इसका शिकार हुए भी हैं क्योंकि उनमें साहित्य को लेकर यह मुगालता कूट-कूट कर भरा था कि वे लेखन से समाज-दुनिया को बदल सकते थे।

मेरी मान्यता है कि साहित्य सिर्फ विचार दे सकता है। समाज की सोच को मथ कर समाज की पेंदी में बैठी तमाम गाद-गर्द को सतह पर ला कर दिखा सकता है। शेष कार्य के लिए, सामाजिक परिवर्तन के लिए औजार दूसरे हैं। तर्क जुदा हैं। विचार को जमीन पर उतारने वाली शक्तियां दूसरी हैं। मथानी से कड़छी का काम लेना या तलवार से सूई का काम लेना न मुमकिन है, न ही मुनासिब है।

अनंत दरअसल मार्क्सवाद की पूजा करने की हद तक पहुंचे हुए थे। वे इस बात से असहमत रहते थे कि लेखक बिरादरी ने विचार को विचारधारा में घोल कर प्रचार के पोस्टर लिख डाले हैं। जो इस कृत्य से सहमत नहीं है वह विचारहीन है।

साहित्य में विचारहीनता एक मिथक है और प्रतिबद्धता का सरलीकृत अर्थ हो गया है राजनीतिक प्रतिबद्धता।

अपने बैंक के ‘कर्मचारी संघ’ एवं कई श्रमिक संगठनों में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते अनंत अपने कार्यक्षेत्र से इतने गहरे तक जुड़े थे कि प्रबंधन के किसी कर्मचारी विरोधी निर्णय, भ्रष्टाचार, अनियमितता आदि-आदि को देख उद्वेलित हो उठते थे। अनंत का मानसिक उद्वेलन उनकी “साख , को ‘गजब’, ‘चक्रव्यूह’, ‘कठफोड़वा’, और ‘दादा का भूत’ आदि कहानियों में देखा जा सकता है, हालांकि उदाहरण और भी होंगे।

वर्ष 2010 के बाद अनंत की कहानियों में उनके कार्यक्षेत्र की जटिलताएं, आंदोलन, धरने-प्रदर्शन, अनशन आदि इतने अधिक आने लगे थे कि इस पृष्ठभूमि के बाहर के पाठक अनंत के लेखन में एकरसता और दुहराव का अनुभव करने लगे थे। हर तीसरी-पांचवीं कहानी में वही भ्रष्ट अधिकारी, वही भ्रष्ट व्यवस्था, वही जोशीले नारे, वही आंदोलन आदि-आदि के स्थायी होते जाते भाव से मैं स्वयं भी घबराने लगता था परन्तु इसका एक उजला पक्ष भी था। अनंत के लेखन में उनके कार्यक्षेत्र की विपुल उपस्थिति को शायद भविष्य में रेखांकित किया जाएगा। शायद अनंत का सक्रिय कार्यकर्ता अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें दीक्षित-प्रशिक्षित करना चाहता था जिनके बीच वह काम करता था।

यूं समकालीन कहानी में कहानी को श्रमिक जीवन से जोड़ने में जो भूमिका शेखर जोशी की रही, अनंत उन्हीं शेखर जोशी की बैटन (दौड़ की छड़ी) थाम कर आगे निकल पड़े थे। शेखर जोशी ने ‘नौरंगी बीमार है’ लिखी है तो अनंत ने भी ‘शराफत जिंदा है’ लिख कर गया की गोष्ठी में पत्थर खाए हैं। शेखर जोशी ने कोई उपन्यास नहीं लिखा। अनंत भी कहां कम थे ? वर्षों से अपना उपन्यास “शून्य के विरुद्ध’ लिख रहे थे और उपन्यास था कि पूरा होने को राजी नहीं था। अचानक अनंत ने ‘शून्य के विरुद्ध’ छोड़ा और एक दूसरा उपन्यास लिख ही डाला था- ‘ताकि बची रहे हरियाली’ और क्या ही खराब उपन्यास लिखा था। उपन्यास छप तो गया था लेकिन आरा से बाहर तो क्या, आरा में भी इसे पसंद नहीं किया गया था। लोगों ने पढ़ा और वही चालाक चुप्पियां जिसके लिए आरा शहर मशहूर रहा है।

कई अन्यों की भांति मैं भी अनंत का अच्छा मित्र होने का दम भरता था लेकिन अन्यों के विपरीत मैं कभी-कभार अनंत को सदबुद्धि की घूंटी पिलाने लगता था कि यार मेरे, बहुत अच्छा आदमी होना बहुत बुरी बात है। कोई हर्ज नहीं कि थोड़ा-थोड़ा बुरा भी हुआ जाय। मुझे अफसोस होता था कि मेरा दोस्त कभी जमाने के मुताबिक ढलने की कोशिश करता भी था तो मुंह की खा बैठता था। अनंत जैसे सड़े पान-पत्ते के साथ मैं ताजा पान भी कुछ-कुछ सड़न का शिकार होने लगा था। अनंत की सज्जनता और ‘बहुत अच्छे आदमी’ होने का खामियाजा भुगतती थी अनंत की वे कहानियां ,जो कुछ और बेहतर बन सकती थीं। अनंत की अति संवेदनशीलता का मोल चुकाती थी अनंत की प्रतिभा, जो और निखर सकती थी।

अपनी ताजा कहानी सुनाने के बाद जब हमारे बड़े भईया अनंत अपनी आवारा-अनाड़ी मार्का राजकपूरी मुद्रा बनाए चातक-दृष्टि से प्रतिक्रिया की बूंदों की प्रतीक्षा करने लगते तो कौन माई का लाल श्रोता इतना कठकरेज (हृदयहीन) था जो इतने अच्छे आदमी का दिल दुखाते हुए यह कहने का साहस जुटाता कि भाई साहब, कहानी की भाषा तो घिसट रही है या कहानी के विवरण लद्दड़ लग रहे हैं या कहानी की लंबाई ऊबाऊ है या कहानी में पठनीयता का प्रवाह नहीं बन पाया है।

नतीजा यह कि ठकुरसुहाती बतियाने वाले मित्रों के कारण कई कमजोर कहानियां अनंत के खाते में हैं जबकि अनंत के पास कथ्य का इतना जबरदस्त जखीरा रहता था कि गिनती के कथाकारों के पास होता होगा। सामान्य दिखती घटनाओं की सतहें तोड़ कर बेहतर चीजें निकाल लेने का “स्वयंप्रकाशी” हुनर अनंत के पास था।

श्रम कानूनों को तोड़-मरोड़ कर जिस प्रकार विकृत किया गया था, भारत के भीतर जिस प्रकार छोटे-छोटे उपनिवेश की भांति राष्ट्र में ‘सेज’ (विशेष आर्थिक क्षेत्र) सजाई गई जा रही थी; अनंत ने इसे बहुत पहले अपनी कहानी ‘इलिसाबेटा डोरिया नगर उर्फ रेणु टांड़’ में भविष्य-कथन की भांति दर्ज कर डाला था। और बात है कि “बिलौती महतो की उधार-फिकिर (पंकज मित्र) या “सूखते स्रोत”(जयनंदन) को रेखांकित करने वाली आलोचना ने इनसे आगे की कहानी “इलिसाबेटा डोरिया…” का संज्ञान नहीं लिया। नहीं लिया तो यह चूक आलोचना की है। अनंत को इस चूक के लिए कोई गिला था भी नहीं।गलती तो अनंत की ही थी जिसने समय के आगे की कहानी कु-समय (समय से पहले) लिख डाली थी।

अनंत की कहानियां गांव और कस्बे के बीच ठिठकी खड़ी कहानियां हैं जो नए समय की रौशनी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अपनी पहचान ढूंढ रही हैं।

अपने इकलौते यार के तुनकने का भय संजोते हुए मैं अनंत को बार-बार समझाता था कि धुंआधार कहानियां लिखते जाने की बजाय थोड़ा ठहर कर भाषा पर भी काम कर लिया करो लेकिन नहीं ! अनंत तो कहानियों की फैक्ट्री ही बने रहना चाहते थे।

ऐसा नहीं था कि मैं और अनंत हर मुद्दे पर हमेशा सहमत ही होते थे। कई मुद्दों पर हमारे झगड़े भी होते थे। कभी-कभी तो बात तू तू-मैं मैं तक पहुंच जाती थी। इतनी मुखर कि तीसरे व्यक्ति को गुमान हो उठता था कि यारों के बीच हाथापाई बस अब हुई कि तब हुई। पारिवारिक कर्तव्यों पर संगठन या ‘जनपथ’ को तरजीह देने का मामला होता, अनंत के उपन्यास ‘शून्य के विरुद्ध’ के वर्षों तक घिसटते रहने का मामला होता, कहानी अधूरी छोड़ “जांता-ढेंकी-रोपनी गीत जुटाते अनंत पर मेरी झुंझलाहट होती या “जनपथ” हेतु रचनाओं-रेखाचित्रों पर मेरी किसी असहमति के पंगे होते…हमारी मुंहांठोंठी हो जाती थी लेकिन हमारे बीच का कोई मुंहफुलौव्वल कभी चौबीस घंटे से अधिक नहीं टिक सका था।

पंजाब में एक कहावत चलती है…’यारा नाल बहारा : मेले मित्तरा दे।’ जब यार साथ है तो हर मौसम बहार का मौसम है.. .जहां भी दो जिगरी दोस्त जुट गए, वहीं मेले जुड़ गए। हम आरा में साथ-साथ थे तो हर तीसरे दिन मेला जुड़ता रहता था। मेरे और अनंत के बीच जो भी टकराव या विचार-वैभिन्य होते थे वे हमारे निजी होते थे जिन्हें हम अगले होली-दशहरे तक सुलझा ही लेते थे और फगुआ-नवरात्र हमारी यारी में हर तीसरे-पांचवें दिन आता रहता था।

अब हम दोनों सेवानिवृत्त हो चुके थे। अनंत अपने गांव बहेरा कला में रहने लगे थे… मैं रांची, परन्तु यकीन था कि हम जब भी अगली बार मिलेंगे वह कहावत हमारे साथ होगी- ‘यारा नाल बहारा,मेले मित्तरा दे…।’

आज अनंत असमाप्त महायात्रा पर निकल पड़े तो बहुत-बहुत याद आने लगे अनंत के साथ जिए गए दिन, वे पल-छिन। कितने-कितने मरे मुहुर्त जी उठे। अनंत भौतिक दुनिया में भले सशरीर नहीं रहे लेकिन मेरे मन के एक उजले कोने में रहेंगे अनंत… हमेशा !

राकेश कुमार सिंह
राकेश कुमार सिंह
आदिवासी जन-जीवन पर लिखने वाले गैरआदिवासी रचनाकारों में 'राकेश कुमार सिंह' एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। जन्म , 20 फरवरी 1960, पलामू (झारखण्ड) के गुरहा गाँव में। शिक्षा: स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान (पी-एच.डी.) एवं विधि स्नातक। कहानी ‘ठहरिए आगे जंगल है’ पर दूरदर्शन द्वारा इसी नाम से टेलीफिल्म निर्मित-प्रदर्शित। दर्जन से अधिक उपन्यास और आधे दर्जन से अधिक कथा-संग्रह लिखनेवाले वरिष्ठ लेखक के पुरस्कार और सम्मान निम्नलिखित हैं- :झारखण्ड का प्रतिष्ठित राधाकृष्ण सम्मान (2004), ‘पाखी’ पत्रिका का शब्द साधक जनप्रिय सम्मान (2015), आनन्द सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान (2016), कथाक्रम कहानी प्रतियोगिता (2001 तथा 2002) में प्रथम पुरस्कार, कथाबिम्ब कहानी प्रतियोगिता (2002) में प्रथम कमलेश्वर स्मृति कथा सम्मान (2008) में प्रथम पुरस्कार।
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