नई दिल्ली: सऊदी अरब में एक खास वजह से चर्चा में है। इस हफ्ते सऊदी अरब के उत्तरी रेगिस्तान के कुछ हिस्सों में भारी और दुर्लभ बर्फबारी देखी गई। तबुक और अल-जॉफ जैसे इलाकों में तापमान जीरो डिग्री से नीचे गिरने के कारण रेत के टीले मोटी बर्फ से ढक गए। बर्फ से ढके रेगिस्तान में ऊंटों के चलने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही हैं।
यही नहीं, सऊदी के पूर्वी प्रांत के अल-अहसा के निवासियों ने भी बर्फबारी देखी, जो आमतौर पर एक गर्म इलाका माना जाता है। ठंडी हवा के साथ उत्तरी और मध्य सऊदी अरब में बड़े पैमाने पर बारिश भी हुई। बीर बिन हरमास, अल-अयनाह और अम्मार जैसे इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश दर्ज की गई।
ये नजारे देखने में खूबसूरत तो लग रहे हैं, लेकिन चर्चा इस बात की भी चल पड़ी कि आखिर इस तरह की बर्फबारी क्या संकेत दे रही है। जानकारों के अनुसार यह साफ संकेत है ग्रह के क्लाइमेट सिस्टम में कुछ बुनियादी बदलाव हो रहा है, और इसके नतीजे दिखने लगे हैं।
इससे यह भी साफ हो गया है कि मौसम में अचानक बदलाव अब कोई काल्पनिक खतरा नहीं रह गया है। यह अचानक हो रहा है, और अक्सर ऐसे तरीकों से हो रहा है जो पुराने अनुभवों से बिल्कुल अलग हैं।
सऊदी में पहले भी हुई है बर्फबारी
सऊदी अरब के उत्तरी इलाकों में बर्फबारी की खबरें पहले भी आती रही हैं। यह दुर्लभ जरूर है लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसा कभी नहीं हुआ हो। तबुक प्रांत के ऊंचे इलाकों में पिछले कुछ दशकों में रुक-रुक कर बर्फ गिरती रही है। लेकिन अब जो अलग है, वह है रेगिस्तानी इलाकों में बर्फबारी का पैमाना और फैलाव, जिसके बारे में मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दशकों से नहीं देखा गया है।
सऊदी नेशनल सेंटर ऑफ मेटियोरोलॉजी (NCM) ने कहा है कि सऊदी अरब में सबसे तेज ठंड की लहर 1992 में रिकॉर्ड की गई थी। देश के उत्तर-पश्चिम में इसके हेल स्टेशन पर उस साल जनवरी में तापमान रिकॉर्ड निचले स्तर पर -9.3°C तक गिर गया था। रिपोर्ट यह भी दावा करते हैं कि जनवरी 1973 में, साइबेरिया से आई ठंडी हवा के कारण रियाद में लगभग 20 सेंटीमीटर बर्फबारी हुई थी।
मौसम में ऐसे फेरबदल, भारत को क्यों चिंतित होना चाहिए?
आमतौर पर यही कहा जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग से हर जगह सिर्फ तापमान बढ़ता है। जलवायु विशेषज्ञ हालांकि इससे सहमत नहीं हैं। एक गर्म ग्रह वातावरण में ज्यादा गर्मी और नमी को रोककर रख लेता है, जिससे अस्थिरता बढ़ती है और मौसम की चरम और अप्रत्याशित घटनाओं को बढ़ावा मिलता है। यही वजह है कि आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ लू, तेज बारिश, अचानक बाढ़ और अचानक ठंड पड़ रही है, जिसमें ऐसे इलाके भी शामिल हैं जहाँ पहले ऐसी घटनाएँ कम होती थीं।
भारत ने पिछले एक साल में इस अस्थिरता का सीधा अनुभव किया है। उत्तरी और मध्य भारत के बड़े हिस्सों में लंबे समय तक रिकॉर्ड तोड़ लू चली। इसके तुरंत बाद, बादल फटने और भारी बारिश से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम में भूस्खलन और बाढ़ आ गई। कई इलाकों में मानसून देर से और अनियमित रूप से आया, जबकि दूसरी जगहों पर यह विनाशकारी साबित हुआ। ये विपरीत घटनाएँ अचानक नहीं हैं। जानकारों के अनुसार ये सभी मिलकर एक ऐसे जलवायु सिस्टम की ओर इशारा करते हैं जो दबाव में है।
सऊदी में बर्फबारी, भारत के लिए चेतावनी?
भारत के लिए, यह सबक दूर के रेगिस्तानों में अचानक बर्फबारी के बारे में नहीं है, बल्कि देश में मौसम के लिहाज से बढ़ती अस्थिरता है। खेती, पानी के संसाधन, शहर और पावर सिस्टम, ये सभी अनुमानित मौसमी चक्रों के हिसाब से बने हैं। जब ये चक्र बिगड़ते हैं, तो इसका नतीजा पूरी अर्थव्यवस्था और समाज पर भी पड़ता हैं। फसलों का नुकसान, शहरों में बाढ़, पानी की कमी और गर्मी से होने वाली बीमारियाँ पहले से ही ज्यादा आम होती जा रही हैं।
जाहिर है भारत को गर्मी से बचाने वाले शहर के डिजाइन, बाढ़ से बचने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर, एक मजबूत शुरुआती चेतावनी सिस्टम और जलवायु के हिसाब से खेती के तरीकों में बदलाव के अपने प्रयासों को तेज करना चाहिए। भारत और बाकी दुनिया के लिए संदेश साफ है कि जलवायु संकर अब दरवाजे पर दस्तक नहीं दे रहा है। यह अंदर आ चुका है।
सऊदी अरब में जो हुआ है, वह एक बदलते बड़े ट्रेंड को दिखा रहा है। दक्षिण पूर्व एशिया लगातार बाढ़ से जूझ रहा है, जिससे लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। अफ्रीकी देश लंबे सूखे और अचानक बाढ़ के बीच झूल रहे हैं, जिससे खेती तबाह हो रही है। दूसरी ओर दक्षिण अमेरिका में तापमान में असामान्य बढ़ोतरी ने इकोसिस्टम को बाधित किया है।
जानकारों के अनुसार विकासशील देश इस उथल-पुथल का सबसे ज्यादा असर झेल रहे हैं। ज्यादा आबादी, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, और जलवायु पर निर्भर आजीविका का मतलब है कि थोड़े समय के मौसम में बदलाव के झटके भी इन देशों में मानवीय और आर्थिक आपातकाल में बदल सकते हैं।

