Friday, March 27, 2026
Homeकला-संस्कृतिलोक के राम: जन्म, विरह और मृत्यु की साझी कथा

लोक के राम: जन्म, विरह और मृत्यु की साझी कथा

आज रामनवमी के दिन अवध के राम पर रुपम मिश्र का यह आलेख। यह लेख अद्भुत लोक-चेतना को उद्घाटित करता है। यहाँ मिथक और जीवन के बीच की रेखाएँ धुंधली हो जाती हैं, और एक ऐसे राम उभर कर सामने आते हैं जो लोक की स्त्रियों की भाषा, उनके दुःख-सुख, उनके प्रतिरोध और उनकी कल्पनाओं में निरंतर जीवित है। यहाँ राम केवल पूजे नहीं जाते, वे जिए जाते हैं, सवालों के घेरे में भी आते हैं, और सबसे बढ़कर, मनुष्य की तरह समझे जाते हैं।

मेरी रहनवारी अवध के गांवों में रही इसलिए यहाँ का लोक मेरी स्मृति का हिस्सा ही नहीं बल्कि अबाध रूप से मेरी समसामयिकता में भी व्याप्त रहता है। इसलिए यहाँ के लोक को कहने के लिए मुझे किसी डेटा या अलग से बहुत संदर्भों की जरूरत नहीं पड़ती। मैं यहाँ के सुख-दुःख ,काज-परोजन ,गीत-गवनई से लेकर तरह-तरह के पारंपरिक कर्मठों में शामिल रहती हूँ। अवध में जिसको सबसे ज्यादा सम्बोधित किया जाता है वो चरित्र है राम।यहाँ नवजात का जन्म होने पर राम जन्म लेते हैं और बधाई गीतों में राम ही गाये जाते हैं।

जेहि दिन राम के जनम भयें बदरी ओनई आई
बादरि बरसऊ न कंचन नीर त मोतियन ओरी चुवई।

इसी तरह जन्म के जाने कितने गीत में राम का जन्म होता है। एक ब्याह का मौजूँ गीत है जिसे लोक में स्त्रियां गाती हैं। जिसमें राम एकदम दुबले पतले किशोर हैं और वो बाजार में सिन्धुर खरीदने चले जाते हैं जहाँ पान बेचती स्त्री उनसे परिहास करती है।

पतरी राम पतरी करिहईया
ठाढ़ भये बनिजी बाजार
किया तुहूँ लेब दूल्हे खैरा सोपरिया
किया रे मघईया ढोली पान
नाहीं हम लेब खैरा सोपरिया नाहीं रे मघईया ढोली पान
हम तऊ लेब भरल सिन्होरिया …

इसी तरह जीवन के सारे पड़ावों से गुजरने के बाद अन्ततः जब मौत होती तब भी राम ही मरते हैं। यहाँ आज भी परिजन या किसी प्रिय की मौत पर स्त्रियां राम का ही तरह-तरह से उच्चारण करके रोती हैं जैसे हमरे राम हेरायी गये ..! मोरे रमऊ हमई छोड़ गये..! इसी तरह के कितने करुण सम्बोधन भरे वाक्य अपनी बोली में वो कहकर रोती हैं जिसमें राम से बिछोह है।और यही नहीं आप जब इन रूलाइयो को ध्यान से सुनेंगे तो पाएंगे कि करुणा और दुःख की गहराई ने एक लय पकड़ ली है । पीड़ा की अद्भुत लय। जहाँ दुःख को कह-कर रोया जाता है। पता नहीं दुनिया की किसी और संस्कृति में ऐसा होता है कि नहीं लेकिन अवध के लोक में तो ये राम नाम का चरित्र मनुष्य की खासकर स्त्रियों की संवेदनाओं में आज भी डोलता दिखता है। यहाँ मिथकों के ईश्वर की भूमिका से भिन्न है वो चरित्र। वो अगर ईश्वर है तो उसकी मौत कैसे होती है। उसका रोज जन्म क्यों होता है और मनुष्यों की तमाम आकांक्षाओं को जीता रहता है।

अपने संस्कृत ग्रंथ रामायन को प्रारंभ करते समय वाल्मीकि ने कहा ” “कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके…” जिसका अर्थ था कि लोक में ऐसा कौन है जो छाया हुआ है जो अपने इतने गुणों के साथ दिख रहा है। कहने का अर्थ है कि वाल्मीकि को अपने महाकाव्य के लिए एक नायक की खोज थी और उस नायक की खोज उन्हें लोक के एक चरित्र में दिखी। उस वर्तमान में उन्हें राम नाम का चरित्र मिला जो लोक के वर्तमान में सबसे लोकप्रिय है। इस लिहाज से देखा जाये तो राम उस समय के वर्तमान का एक बेहद लोकप्रिय चरित्र थे जिसे बाल्मीकि अपने ग्रंथ का नायक बनाकर महाकाव्य रचते हैं। और आज भी लोक इस बात का साक्षी है कि उनके यहाँ राम एक मानवीय चरित्र है वो कोई दैवीय शक्ति नहीं एक मनुष्य हैं जिनसे गलतियां होती हैं जो दुःख पाते हैं , दुःख देते हैं , जिनका दुलार किया जाता है , और जिन्हें ताना भी दिया जाता है ।लोक की स्त्रियां तो अपने गीतो में कितनी बार उन्हें उलाहना देती हैं नाराज होकर उन्हें गालियां भी देती हैं लेकिन फिर भी राम उनका चिर और प्रिय चरित्र है। जो उनके भीतर जाने कितने चरित्रों में रहता है। जो उनके जीवन के सारे क्रिया-कलापों में एक केन्द्रक की तरह रहता है। उनके प्रेम ,विरह ,मिलन सब मे एक नाम उपस्थित रहता है राम ! उनके यहाँ कोई ईश्वर नहीं है उनका अपना है जो उनसे नाराज होता है और कभी उनसे प्रेम करता है , कभी उनको तज देता है और कभी अपना लेता है।

और सबसे अद्भुत बात कि वो राम ऐसा चरित्र है जो उनसे ही जन्म भी लेता है उनके सोहरों का नायक होता है यहाँ तक जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजेडी मृत्यु में राम ही मरता है। एक अमूर्त लेकिन मूर्त भी , सजीला और स्नेही भी कभी कठोर और निर्मोही भी ।कभी रोता कभी हँसता अद्भुत सा चरित्र लोक में आज भी डोल रहा है।

पता नहीं वो कौन है जिसे कवियों ने अपने महाकाव्यों का नायक बनाया। वो जो भी है लेकिन लोक में वो एक मनुष्य है, मनुष्यगत तमाम कमजोरियों से बना हुआ। वो कभी मेहनत मजदूरी करता है कभी खेती -किसानी और कभी-कभी उसका राजपाठ भी होता है। वो अपनी ससुराल में जाकर चंदन के पीढ़े के लिए रूठ जाता है। “सखिया नाही पायेंन चनना पीढ़ईया त राम रिसियायी गयेन।

उनकी प्रेयसी ,पत्नी राम के इस रूठने से उस नगर को आग लगाने को तैयार है। “इतनी बचन सुनी सीता त नैनन आँसू ढूरई माया अगिया लगाई यही नगरिया जहाँ रे राम रूठे।

अवध के लोकगीतों में तो राम उनका एक आदिम सम्बोधन होता है हर स्थिति में राम ही सम्बोधित होते हैं भले ही वो किसान हो राजा हो ,पति हो ,पुत्र हो या पुत्र हो वो सारे चरित्रों के सम्बोधन में रहेगा। यहाँ के लोकगीतों में कहीं-कहीं बहुत मजेदार प्रसंग होते हैं जहाँ राम नायक तो होते हैं लेकिन जीत स्त्री की होती है। ये सदियों से चुप रही स्त्री की फैंटसी रही होगी जिसमें वो पुरुष को हरा देती है। एक सोहर गीत में राम किसान हैं और बाकायदा हल जोत रहे हैं और सीता खेत में उनके पीछे चलती बीज बो रही हैं और बीज कम पड़ जाता है।

अर्थात यहाँ राम ग्रामीण किसान जीवन की कठिनाइयों और अभावों के साथ उपस्थित हैं। समाज की वर्गीय दृष्टि का यहाँ बेहद सटीक उदाहरण दिखता है कि राजमुकुट शीश पर धारे राम अभिजातों के यहाँ मिलते होंगे, मजदूर किसान के यहाँ तो राम हल जोत रहा है और तुलसी की पुर से निकसी /रघुवीर वधू /गरीब किसान राम के साथ खेत में बीज छीट रही है। वो अपने श्रम के जीवन के साथी राम की श्रम-संझियारिन है। लोक के राम हमेशा मनुष्य के रूप में रहे। इसी तरह एक सोहर गीत में राम दवरी हांक रहे हैं अर्थात फसलों की राशि पर बैलों के मड़ाई कर रहे हैं और सीता दरवाजे पर खड़ी उन्हें निहार रही हैं । श्रम और प्रेम का अद्भुत गीत है ये लेकिन यहाँ कुलीनता का थोड़ा सा दखल दिखता है।

इसी तरह एक सोहर गीत में राम रोजगार के लिए परदेश जा रहे हैं और उनकी दरवाजे पर खड़ी उनकी नवविवाहिता घोड़े की लगाम पकड़ लेती है-

सबके बिदेशिया बिदेश गयें हमरऊ राम चले हो
सखिया डेवढ़ी के ठाढ़ रनियवा राम कहिया आउबऊ हो
सबके त घोड़वा अगरी गयें हमरई पिछरी गयें हो
रानी छोड़ी देतु घोड़े के लगाम दशेह मास आऊब हो।

अवध में स्त्रियों के दुःख-सुख बिरह मिलन सबके लिए उनके यहाँ एक चरित्र रहा राम। हो सकता है ये सम्बोधन इतना आदिम हो कि इसके उपज का कोई इतिहास न हो लेकिन लोक के साहित्य का ये नायक राम नाम का कोई चरित्र है जो उनके गीतों कथाओं यहाँ तक जन्म से लेकर मृत्यु तक में नायक की तरह सम्बोधित होता रहा।

अभिजातों की दुनिया में राम तो एक ईश्वर हैं सर्वशक्तिमान लेकिन मेहनतकश समाज और स्त्रियों के यहाँ वो उनके ही बीच का मनुष्य है जो सिर पर पगड़ी बांध कर खेत में श्रम करता है।

राम सिर पर बांधे पगड़िया त कांधे पर कुदरिया
राम गोड़ाई खेत त माया निहारे
भीतर बाटू कि बहरे शीतल रानी
सीता लई लेतु डेलरिया में धान तुहू खेत बोउतु।

इस गीत के बोलों को ध्यान से देखें तो यहाँ स्त्री को कुलीन घरों की तरह घर के भीतर नहीं ठेला गया है उसे अपने साथी के साथ श्रम के मोर्चे पर खड़े होने की बात कही जा रही है। विवाह कितने गीतों में तो राम अक्सर रूठे रहते हैं वो भी बहुत मामूली चीजों के लिए ये मनुष्य जीवन की आकांक्षाओं लोक रूपांतरण है । जहाँ विवाह से जन्म और मृत्यु तक राम नाम के चरित्र को माध्यम बनाकर उसकी अपनी कथा कही जा रही है।

जन्म के एक सोहर गीत में हिरण और हिरणी की कथा के माध्यम से सत्ता के अन्याय की पराकाष्ठा को ऐसे चित्रित किया जाता कि आँखे बरबस भर आती हैं।

छापक पेड़ छिउलिया त पतवन झापस हो
ताहि तर ठाढ़ हरिनवा त हरिनी से पूछई हो
हरिनी! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझाई हो
नाहीं मोर चरहा झुरान ना पानी बिनु मुरझींले हो
हरिना आजु राजा के छठिहार तोहे मारि डरिहें हो
मचियहीं बइठली कोसिला रानी, हरिनी अरज करे हो
रानी! मसुआ तो सींझेला रसोइया खलरिया हमें दिहितू हो
पेड़वा से टांगबी खलरिया त मनवा समुझाइबि हो
रानी हिरि-फिरि देखबि खलरिया जनुक हरिना जिअतहिं हो
जाहू! हरिनी घर अपना खलरिया ना देइबि हो
हरिनी खलरी के खंझड़ी मढ़ाइबि राम मोरा खेलिहें हो
जब-जब बाजेला खंजड़िया सबद सुनि अकनई हो
हरिनी ठाढ़ि छिऊलिया के नीचे हरिना बिसूरई हो।

विभिन्न मानवीय गुणों से लैस एक चरित्र जाने कब जन्मा, कहाँ रहा, कैसा रहा उसका जीवन। वो कभी किसी समय में रहा भी कि मनुष्य मन से गढ़ा गया एक काल्पनिक चरित्र भर रहा लेकिन इतना तय है कि वो एक आदर्श मनुष्य रहा और लोक का अपना व चहेता रहा।

लोक का अगर स्त्री दृष्टि से अध्ययन हो तो मिथकों के सरोकार दूसरे हो जाते हैं कथा में ही सही लेकिन गर्भवती स्त्री को घर से निकाल देने की स्थिति को लोक में स्त्रियां कभी राम को माफ नहीं करती इसी लिहाज से वो चरित्र उनके लिये ईश्वर भी नहीं होता । लोक में इसे स्त्रियाँ मर्दवादी और फासिस्ट व्यवहार ही मानती हैं। एक सोहर गीत है कि

राम रसोइया सीता त ननदी हठ करई
भऊजी एक बेर रवना उरेहितु
उरेही के देखौतीऊ हो
जऊ हम ननदी रवना उरेहब
उरेही के देखाउब हो ननदी भईया आगे लाईया लगाऊब
हमई मरवऊबू हो

इस गीत का थोड़ा सा अंश यहाँ उद्घृत हैं जहाँ सीता के वनगमन को लेकर लोकगीतों में एक अन्य कथा कही जाती है कि एकबार रसोई में काम करते हुए सीता उनकी ननद जिद करती है कि रावण की छवि तुम्हें याद है अगर याद है तो चित्र बनाकर दिखाओ। पहले सीता मना करती हैं लेकिन ननद की जिद पर राख पर रावण का चित्र बना देती हैं जिसे देखकर राम उनको घर से निकाल देते हैं।

मिथकों में चाहे जो कथाएं हो लेकिन लोक की स्त्री यहाँ कितनी सजगता से पितृसत्तात्मक व्यवस्था को समझ रही है। सीता के मन में रावण की छवि रह जाना एक मनुष्यगत स्मृति की क्रिया है और राम का उनको घर से निकलना एक सामन्ती मर्दवादी दृटिकोण है कि उनकी स्त्री के मन में किसी दूसरे पुरूष की अनुहार क्यों रही गयी। इन लोकगीतों का अध्ययन करते आप उनकी वैज्ञानिक व द्वंदवादी दृष्टिकोण पर हैरान हो सकते इतनी आधुनिक व मानवीय है उनकी दृष्टि उनके गीतों में लगता है कि स्त्रियाँ तो जाने कब से कह रही हैं लेकिन कोई सुन नहीं रहा है। इसी तरह के एक सोहर गीत में गर्भवती सीता के निष्कासन को लेकर लोक की स्त्रियों में गजब गुस्सा है।

इतनी अकिली सीता तोहरे
अकीलियन आगरी
सीता कइसे के तजीउ अजोधिया रामहि बिसराईउ

आगे इसी गीत में साफ कहा गया है कि राम का मुँह नहीं देखना है क्योंकि वो पापी है उसने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया है। यहाँ स्त्री मे अपनी अस्मिता और गरिमा की इतनी तड़प है वो भला किसी मिथक में कहाँ समायेगी। कवि प्रभात अपनी “लोकगायिकायें ” कविता में कहते हैं कि- वे उस रामायण को गाती हैं जो रामायण में लिखने से रह गया..

अवध के लोक व लोकगीतों में राम ही जन्मते और राम ही मरते हैं राम ही मीत हैं राम ही बैरी । राम ही ब्याह करने जाते हैं राम ही परदेश चले जाते हैं। राम ही किसान हैं राम ही मजदूर हैं। उनका मिलन भी राम से होता है और विछोह भी राम से होता है। राम ही जन्म लेते हैं और राम ही मरते हैं।

यह भी पढ़ें- अनिकेतः बनारस के ‘काशी’- एक बदलते शहर का बूढ़ा दरख्त

रूपम मिश्र
रूपम मिश्र
रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित। "एक जीवन अलग से' इनका कविता संग्रह है। 'अनहद कोलकाता सम्मान' और 'कलावती उदयीमान रचनाकार सम्मान' से सम्मानित। 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments