पुस्तक समीक्षाः कभी न खत्म होनेवाला सफर- यार मेरा हज करा दे

इश्क हक़ीक़ी हो या मज़ाज़ी, क्या अपने शहर का इश्क सबसे पहला इश्क हो सकता है? क्या शहर भी पीर ओ मुर्शिद हो सकता है? यह सवाल लेखक राजिन्दर अरोरा के मन में तब उठा, जब उनके पिता सतपाल अरोरा ने लाहौर ले चलने की ज़िद की। उन्होंने कहा कि लाहौर जाना और वहाँ अपना … Continue reading पुस्तक समीक्षाः कभी न खत्म होनेवाला सफर- यार मेरा हज करा दे