राजी सेठ नहीं रहीं हमारे बीच। यह एक दुखद समाचार था। राजी अपनी बीमारी के कारण जीते जी हम से दूर चली गईं थीं। उनसे मिलना और बात करना नामुमकिन सा हो गया था। इस बात की बेचैनी अंदर ही अंदर होती कि राजी बीमार है और उनका हालचाल लेना और दो घड़ी उनके पास बैठना भी मुश्किल हो रहा है। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो महसूस होता है कि हमारा मिलना कितना ज़्यादा होता था।
उन दिनों किसी न किसी लेखिका के घर माह में एक बार बैठक होती थी। फिर गोष्ठियों और समारोहों में। इसके अलावा दूसरी जगहों पर भी मुलाक़ातों का सिलसिला रहता था। राजी ने एक बार शंकर दयाल सिंह जी के यहाँ हुऐ आयोजन में कहा भी थी कि हम दोनों साथ-साथ बुलाए जाते हैं, यह किसी हद तक सच भी था कि लेखकों के बीच अक्सर लेखिकाओं में बस हम दो होते। ऐसी पै-दर-पै मुलाक़ातों के बाद अचानक विराम लग जाना तकलीफ़ तो देता है। दिल में उम्मीद रहती राजी जी जल्द ठीक हो जायेंगी और फिर से उनकी भरपूर हँसी सुनने को मिलेगी।
संवाद के मंच पर उन्हें कहानी पढ़ने के लिए हमने आमंत्रित किया था। साथ में सेठ साहब भी थे। कहानी में सब डूबे हुए थे कि अचानक सेठ साहब रोने लगे। राजी ने उनके हाथों को सहलाया और हम सब कुछ कहने की स्थिति में नहीं रह गए थे। संवाद मंच के अलावा हम लोधी गार्डन में भी मिलते थे जिसका नाम सिम्मी हर्षिता ने “सूरज के साए तले “ रखा था। हम लेखिकाओं का तीसरा साहित्यिक ठिकाना जे एन यू की अरावली पहाड़ियों पर किकर के पेड़ों के झुंड के नीचे होता जहाँ बड़ी गम्भीरता से हम साहित्य पर चर्चा करते थे। इन दोनों जगहों पर राज़ी साथ न भी होतीं तो भी हमारी चर्चा में उनकी कहानियों का ज़िक्र दूसरी अन्य लेखिकाओं के साथ होता। ख़ासकर रिल्के के “ युवा कवि को पत्र “जो उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा से हिंदी में अनुवाद किया था। वह अनुवाद बेमिसाल था। भाषा और सरलता पढ़ने वाले को प्रोत्साहित ही नहीं प्रभावित भी करती और कवि रिल्के के विचार बड़ी सहजता के साथ हम तक पहुँच जाते हैं।
बीमारी के शुरू के दौरान राजी से कई बार फोन पर बातें हुईं बहुत मुख़्तसर फिर फ़ोन उठना बंद हो गया मिलना जुलना भी। अचानक एक दिन उनका फ़ोन आया कि उन्हें ‘पारिजात’ उपन्यास चाहिए। मैंने कहा कि ठीक है प्रकाशक से कह देती हूँ और आपका पता दे देती हूँ। उपन्यास पहुँच जायेगा। और अगर आप कहें तो किसी के हाथों भिजवा सकती हूँ। सुनकर राजी ने कहा -”नही! मुझे तुम भेजोगी डाक से।” उनकी ख़्वाहिश समझ नहीं पाई तो कह उठी,” जी !उस पर आप के लिए कुछ लिख दूँगीं।” सुन कर हँसी और बोलीं -“ यह मत करना। मुझे उसे किसी को अपने हस्ताक्षर के साथ भेजना है, भूलना मत।”

उनका घर मेरे घर से बहुत दूर नहीं था तो भी उनके के कहने के मुताबिक़ मैंने उपन्यास की कापी बिना कुछ उसपर लिखे भिजवा दी। फिर ख़ामोशी! एक लम्बी ख़ामोशी इस खयाल के साथ राजी हमारे बीच मौजूद हैं। एक इत्मीनान भरा संतोष रहा। अचानक वह ख़ामोशी इस सूचना के साथ टूटती है कि हिंदी की महत्वपूर्ण लेखिका राज़ी सेठ अब इस दुनियाँ में नहीं रहीं -जन्म १९३५ और मृत्यु २०२५।वह पूरे ९० वर्ष हमारे साथ रहीं।
नब्बे के दशक में किसी पत्रिका का सम्पादन करना था। उसके लिए एक परिचर्चा आयोजित की। सवाल मेरे बनाए हुए थे मगर उसे लेना किसी और को था। पन्नों की कमी के कारण वह परिचर्चा पत्रिका में न जा पाई वह आज भी मेरे पास मौजूद है। राजी ने वह सवाल मेरे नाम से अपनी साक्षात्कार वाली पुस्तक में डाल दिया। जो सवाल एक साथ सब से किया गया था। जब इस बात की मुझे ख़बर मिली तो मुझे बहुत हैरानी हुई और अफ़सोस भी। सोचती रही , मौक़े से इस बात का ज़िक्र कर उनसे कहूँगी कि अगले संस्करण में इस को ठीक कर लें।अफ़सोस मौक़ा मिला नहीं।

राजी के साथ जयपुर जाना हुआ। साथ में पद्मा सचदेव भी थीं। उस समय लेखिका नलिनी उपाध्याय का लेखिका मंच और पत्रिका पूरे राजस्थान में लेखिकाओं को साथ लेकर चल रही थी जिन में ग़ज़ब का उत्साह और साहित्य के प्रति समर्पण था। वह किसी न किसी लेखिका को हर साल सम्मानित भी करती थीं। जयपुर ज़्यादा दूर न था। रेल और बस से जाया जा सकता था मगर ऐन मौक़े पर पद्मा ने एलान कर दिया कि हमको हवाई टिकट चाहिए। राजी और मैं ताज्जुब में। जहाज़ में भी उन्होंने चाय नाश्ता की बात उठाई जो इस कम वक़्त की फ्लाइट में मुमकिन नहीं थी मगर मुमकिन हो गया मगर हम दोनों अपनी झेंप मुस्कुरा कर छुपाते रहे और आँखों से कुछ कहते रहे। मेरा जाना जयपुर साल में दो बार होता था। सब से मेरा परिचय था। लेखिका संघ ने इस बार विश्वविद्यालय के गेस्ट हाऊस में न ठहरा कर हमें कहीं और ठहराया। वहाँ पर पद्मा को ताश खेलते केयर टेकर गेस्टहाउस के दिख गए बस फोन कर दिया कि यहाँ ठहरना ठीक नहीं, अभी जगह बदलो। जगह क्या बदली जाती इस रात को आख़िर जर्मन भाषा की प्रोफ़ेसर पवन सुराना जी के घर रहना पड़ा। उनकी असुविधा देख अच्छा नहीं लग रहा था ख़ासकर तब जबकि मैं सभी से पहले से परिचित रही हूँ। रात को हम तीनों एक कमरे में थे। राजी को कुछ नोट्स लेने थे मगर लाइट बुझाने के लिए पद्मा ने कहा तो राजी ने मोबाइल की रौशनी में चादर के नीचे अपना काम किया। इस यादों भरी यात्रा का ज़िक्र मैं राजी के स्वभाव के लिए करना चाह रही हूँ। ख़ासकर तब जब वह दोनों बहुत अच्छी दोस्त रहीं मगर बहस किसी बात पर नहीं। दूसरे दिन राजी बहुत अच्छा फ़ील नहीं कर रही थीं। वह मुझसे बार बार कह रहीं थीं और मैं दुविधा में थी कि वह साफ़ बात पद्मा से क्यों नहीं करतीं और मैं तो दोनों के क़रीब नहीं हूँ। आख़िर वह मुझसे क्या चाहती हैं?
मुम्बई में हुए सेमिनार में हम दोनों दिल्ली से गए थे। छह दिसम्बर थी। बोगी में सुरक्षा हेतू कुत्ते सूँघते घूम रहे थे किसी ने तारीख़ पर ध्यान नहीं दिया था। बाबरी मस्जिद ढाने का दूसरा या तीसरा साल था, ठीक से याद नही। मुझे घबराहट नहीं थी मगर सेठ साहब यह देख कर परेशान हो बोले,” यदि कुछ लग रहा हो तो मत जाओ ।” राजी ने कहा ,”ऐसी कोई बात नहीं है।” हम महिला विश्वविद्यालय में ठहराये गए थे। राजी अपने उस पुरस्कार का ज़िक्र बहुत चाव से करतीं जो कलकत्ता में उन्हें मिला था। कैसे उनकी पुस्तकें फूल मालाओं से सजाई गईं थीं। हमारी जान पहचान बढ़ी।

मेरी कोई रचना पढ़कर वह मुझे फोन करती थीं। बहुत प्यार से तारीफ़ें करतीं। देर से उन्होंने लिखना शुरू किया जिसकी वजह से उनके यहाँ मासूमियत की जगह भावनाओं को व्यक्त करने की पुख्तगी थी। उस में समय और अनुभवों की मिलावट भी थी। मौत की आहटें और शोक में लिपटे उनके चरित्र आपको गम्भीर बना देते थे।उनसे जितनी मुलाक़ातें नहीं हुईं उस से ज़्यादा उनकी बीमारी के कारण दूरी बन गई क्योंकि न फोन उठता न उन से मुलाक़ात का मौक़ा दिया जाता था। जबकि हम एक दूसरे के घर आते जाते रहे थे।
राजी की कहानियाँ हमारे साथ हमेशा रहेंगी और उनके वजूद को ज़िंदा रखेंगीं।


नसीरा आपा आपने बहुत प्यार मोहब्बत से राजी सेठ जी को याद किया है| उनकी यादों को नमन | विनम्र श्रद्धांजलि
Padhna bahut achchha laga. Paristhitiyon ke bahaav mein bahte rahe. Har-ek lamhan, har-ek baatcheet se hamara judaav bana raha. Kitne arthkar aur gahan atoot-ta liye ye zindagi ke ehsasaat
kuchh-kuchh smriti mein darj huve. Sabhi ka shukriya to banta hai. Raji ji ko naman.