नई दिल्लीः साउथ सुपरस्टार थलपति विजय की फिल्म ‘जन नायकन’ (Jana Nayagan) को लेकर जारी सेंसर विवाद अब एक राजनीतिक मोड़ ले चुका है। एक तरफ जहां फिल्म की रिलीज का मामला देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है।
मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राहुल गांधी ने इस विवाद को ‘तमिल संस्कृति’ पर हमला करार दिया। उन्होंने केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा, “सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा ‘जन नायकन’ को रोकने का प्रयास तमिल संस्कृति पर हमला है। आप (पीएम मोदी) तमिल लोगों की आवाज को दबाने में कभी सफल नहीं होंगे।” कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार नियामक संस्थाओं का उपयोग करके उन राजनीतिक विमर्शों और असहमति की आवाजों को दबा रही है, जो वर्तमान शासन के समानांतर दिखाई देते हैं।

इस मामले पर दिग्गज एक्टर कमल हासन ने भी अपनी राय व्यक्त की है। बतौर राज्यसभा सांसद कमल हासन ने अपने आधिकारिक लेटरहेड पर एक संदेश साझा करते हुए इसे कला, कलाकारों और संविधान के सम्मान की लड़ाई बताया।
कमल हासन ने संवैधानिक लोकतंत्र का हवाला देते हुए कहा कि भारत का संविधान तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति की गारंटी देता है, जिसे अस्पष्टता या सेंसरशिप के जरिए कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह क्षण केवल एक फिल्म की रिलीज से कहीं अधिक बड़ा है; यह समाज में कलाकारों के स्थान और उनकी गरिमा को दर्शाता है।
हासन ने आगे फिल्म निर्माण की जटिलता को रेखांकित करते हुए लिखा कि सिनेमा केवल एक व्यक्ति का श्रम नहीं, बल्कि लेखकों, तकनीशियनों और उन हजारों छोटे व्यवसायों की उम्मीद है जिनका अस्तित्व इसी पर निर्भर करता है। उन्होंने आगाह किया कि स्पष्ट नियमों की कमी न केवल रचनात्मकता को सीमित करती है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है।
वहीं, ‘हीरामंडी’ फेम अभिनेता जेसन शाह ने भी इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। एक साक्षात्कार में उन्होंने फिल्म की रिलीज को लेकर उत्साह जताते हुए कहा कि धर्म और राजनीति का हमेशा से फिल्मों के साथ गहरा संबंध रहा है। उन्होंने सर्टिफिकेशन की जटिल प्रक्रिया पर बात करते हुए जनता की जिम्मेदारी की ओर भी इशारा किया। जेसन ने कहा कि जब हम किसी पार्टी को देश चलाने के लिए वोट देते हैं, तो अंततः सत्ता उन्हीं के पास होती है और वे ही ऐसे नीतिगत निर्णय लेते हैं। उनके अनुसार, नागरिकों के वोट ही इस तरह के फैसलों का आधार बनते हैं।
थलपति विजय के करियर का आखिरी प्रोजेक्ट है जन नायकन
यह फिल्म थलपति विजय के करियर का आखिरी प्रोजेक्ट है, जिसके बाद वे अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) के जरिए सक्रिय राजनीति में उतरने वाले हैं। विवाद की मुख्य जड़ सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का वह निर्णय है, जिसमें उन्होंने ‘एग्जामिनिंग कमेटी’ द्वारा फिल्म को U/A 16+ सर्टिफिकेट देने की सहमति के बावजूद इसे ‘रिवाइजिंग कमेटी’ के पास भेज दिया। एक सदस्य की शिकायत के आधार पर आरोप लगाया गया कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को आहत करती है और सशस्त्र बलों का चित्रण गलत तरीके से किया गया है। वहीं, निर्माताओं (केवीएन प्रोडक्शंस) का तर्क है कि उन्होंने बोर्ड द्वारा सुझाए गए सभी 27 बदलावों को पहले ही मान लिया था, फिर भी जानबूझकर रिलीज में बाधा डाली जा रही है।
यह विवाद मद्रास हाईकोर्ट से होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। ‘जन नायकन’ का निर्माण कर रही केवीएन प्रोडक्शंस ने मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के अंतरिम आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 9 जनवरी को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने निर्माताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तुरंत सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश दिया था, लेकिन उसी दिन डिवीजन बेंच ने सेंसर बोर्ड की अपील पर इस आदेश पर रोक लगा दी।
मुख्य न्यायाधीश मणींद्र मोहन श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि निर्माताओं ने रिलीज डेट पहले घोषित कर कोर्ट पर दबाव बनाने की कोशिश की और बोर्ड को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं मिला। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को होनी है। इस झटके के बाद निर्माताओं ने अब सुप्रीम कोर्ट में ‘स्पेशल लीव पिटीशन’ दायर की है। वरिष्ठ वकीलों की एक बड़ी टीम इस उम्मीद में मैदान में उतरी है कि सर्वोच्च अदालत से फिल्म की रिलीज का रास्ता जल्द साफ हो सकेगा।
गौरतलब है कि थलपति विजय के लिए फिल्मों पर विवाद होना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले उनकी ‘मार्शल’, ‘सरकार’ और ‘लियो’ जैसी फिल्में भी कड़े विरोध और सेंसर की कैंची का सामना कर चुकी हैं। वर्तमान में ‘जन नायकन’ को लेकर यह चर्चा गर्म है कि विजय अपनी आखिरी फिल्म के जरिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

