बिहार का पूर्णिया जिला आज अपना 256वां स्थापना दिवस मना रहा है। जिला स्तर पर ढेर सारे कार्यक्रम होते हैं। मीडिया में जिला के बारे में ढेर सारी रोचक कहानियाँ छपती है। हर बार पूर्णिया के पहले कलक्टर डुकरैल के बारे में लोग बातचीत करते हैं।अख़बारों में भी उनका नाम छप जाता है।
लेकिन इन सब जानकरियों के अलावा भी डुकरैल के बारे में बहुत कुछ जानने की ज़रूरत है। वे जब पूर्णिया के कलक्टर बनकर आए थे तो उन्हें पता चला कि किसी नजदीक के गांव में एक स्त्री विधवा हो गई है और लोग उसे सती बनाने जा रहे हैं।इतना सुनते ही डुकरैल सिपाहियों के साथ घोड़े पर सवार हुआ और उसने उस विधवा की जान बचाई। इतना ही नहीं, डुकरैल ने उस विधवा से विवाह कर लिया और सेवानिवृत्ति के बाद उसे अपने साथ लंदन ले गए।
कई सालों के बाद अबू तालिब नामका एक यात्री जब लंदन गया तो उसने बुजुर्ग हो चुके डुकरैल और उसकी पत्नी के बारे में विस्तार से अपने वृत्तांत में लिखा।ये घटना उस समय की है जब भारत में सती प्रथा पर रोक लगाने संबंधी कानून नहीं बना था। वो कानून उसके बहुत बाद सन् 1830 में में राजा राम मोहन राय और लॉर्ड विलियम बेंटिक के जमाने में बना-जबकि डुकरैल की कहानी 1770 की है। यानी सती प्रथा कानून से करीब 60 साल पहले की। लेकिन डुकरैल को कोई किसी ने सती प्रथा के समय याद नहीं किया, न ही उसे बाद में वो जगह मिली जिसे पाने का वो सही में हकदार था।
पूर्णिया निवासी और ऑक्सफोर्ड में पढ़ा चुके इतिहासकार डॉ रामेश्वर प्रसाद, जिन्होंने पूर्णिया की स्थापना पर शोध किया था, ने बिहार सरकार से आग्रह किया था कि पूर्णिया में डुकरैल के नाम पर कम से कम सड़क का नाम होना चाहिए-लेकिन बिहार सरकार ने इसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। कम से कम कलक्टर ऑफ़िस की तरफ़ जाने वाली सड़क को ही ‘डुकरैल लेन’ नाम दे दिया जाता !
डुकरैल के जीवन पर एक खूबसूरत कहानी बिहार सरकार में भू राजस्व विभाग में पदाधिकारी सुबोध कुमार सिंह ने ‘परती-पलार’ नामकी एक पत्रिका में (जनवरी-जून 2013 अंक) में लिखी थी, जिसका शीर्षक है- “यह पत्र मां को एक साल बाद मिलेगा”। यह सब पढ़ने के बाद लगता है कि हम सब कितने अनजान हैं। हम तो विभूति भूषण मुखोपाध्याय की किताब ‘कोशी प्रांगनेर चिठि’ भी नहीं पढ़ रहे।
पूरैनिया से अपना शहर पूर्णिया हो गया। यक़ीनन बहुत कुछ बदला है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम अपनी कथा, अपने इतिहास को ही भूल जाएँ। हम उन लोगों को भूल जाएँ, जिन्होंने इस माटी से बेपनाह मोहब्बत की। इस माटी के लोगों को फ़्रांसिस बुकानन का भी शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जिन्होंने ख़ूब मेहनत कर
1809-1810 में An Account of the district of Purnea लिखा। ओ मैली का भी जिन्होंने पूर्णिया रिपोर्ट तैयार किया। हम उस घर को भी संभाल नहीं सके जहाँ सर अलेक्जेंडर फोर्ब्स रहते थे।
आइए, इस बार पूर्णिया के 256 वें स्थापना दिवस पर अपने ज़िले की उन कहानियों के नायकों को याद करते हैं जिन्होंने पूर्णिया को बनाया। हम अपने स्तर पर ही लेकिन डुकरैल के लिए ज़रूर कुछ करें। आज भी पूर्णिया के बारे में कुछ भी पुरानी जानकारी यदि हमें चाहिए तो हम बुकानन और ओ मैली को ही पढ़ते हैं, ऐसे में हम उनके लिए कुछ तो करें।।।
कहते हैं कभी यहां जंगल हुआ करता था मतलब पूर्ण-अरण्य। दूर दूर तक केवल पेड़ ही पेड़। शहर के मध्य सौरा नदी बहा करती थी, वहीं शहर के सीमांत से कारी कोसी। धीरे-धीरे नदी सिमटती चली गई और वृक्ष को हमने गायब कर दिया।
1809-1810 में फ्रांसिस बुकानन ने खूब मेहनत कर एन एकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया लिखा, इसे पढ़ते हुए लगता है कि यह इलाका सचमुच में पूर्ण अरण्य था। यहां लोगबाग खूब वृक्षारोपण किया करते थे।
बुकानन लिखते हैं, “पूर्णिया के लोगबाग वृक्षारोपण को धार्मिक कार्य समझते हैं। वे अपने घर के आसपास पेड़ को जगह देते हैं।”
बुकानन और फिर एक और अंग्रेज ऑफिसर ओ मैली का लिखा पूर्णिया रिपोर्ट बताता है कि यह इलाका पानी और जंगल से भरा था। अब जब वक्त बदल चुका है, विकास ने कई रास्ते खोल दिए हैं, ऐसे में वृक्ष और पानी से मोहब्बत करना हम सबने छोड़ दिया है। लेकिन अब चेत जाने का समय आ गया है। आप अपने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं, इस पर बहस होनी चाहिए।
विभूतिभूषण वंध्योपाध्याय का एक उपन्यास है- ‘आरण्यक’। इसे पढ़ते हुए हम पूर्णिया को पूरैनिया के रुप में देखने लगते हैं।
वृक्ष के बहाने पूर्णिया की कथा इसलिए भी हमें सुनानी चाहिए क्योंकि देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया भी है। ऐसे में पुराने पूर्णिया की दास्तानगोई बहुत ही जरूरी है।
देश के अन्य हिस्से के लोग इस इलाके के बारे में जानें जिसके बारे में फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे- “आवरण देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान।।।।”
उस पूर्णिया को हम जानें जहां वृक्ष की पूजा आज भी हर गांव में होती है, उस पूर्णिया को लोग महसूस करें जहां की माटी ने यूरोपियन लोगों को भी किसान बना दिया।
बंगाल की नजदीकी ने इसे सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध किया, आज भी यह शहर अपने बांग्ला भाषी मोहल्ला दुर्गाबाड़ी पर गर्व करता है। हम हर दुर्गा पूजा वहां कोलकाता को महसूस करते हैं, रबिन्द्र संगीत सुनते हैं ‘आन्दोलोके मंगलालोके…’ सुनते हैं।
इसी मोहल्ले में बांग्ला के साहित्य के बड़े नाम सतीनाथ भादुड़ी का घर है, हालांकि उनका घर बिक चुका है लेकिन मोहल्ले की सड़क भादुड़ी जी के नाम से है।
इस शहर को, इस अंचल को नए सिरे से नहीं बल्कि इसके पुराने तार के सहारे समझने बूझने की जरुरत है।
हम इस उम्मीद में हैं कि 2026 में पर्यावरण के मुद्दे पर हम जागरुक होंगे और वृक्ष से मोहब्बत करना सीखेंगे।
यहां की उस संस्कृति को समझने की जरुरत है जहां घर-घर में पेड़-पौधे को लेकर कहावतें हुआ करती थी- घर के आगू मैना पात, पाछू केला गाछ ( घर के आगे मैना पौधा और पीछे केला का पौधा रहना चाहिए।)
कोई जिला 256 साल का होने जा रहा है तो इसका एक अर्थ यह भी है कि पूर्णिया के पास ढेर सारे अनुभव होंगे ठीक घर के उस बुजुर्ग की तरह जिसने सबकुछ आंखों के सामने बदलते देखा है। ऐसे में पूर्णिया को अपनी कहानी सुनानी होगी, अपने उस दर्द को बयां करना होगा जब 1934 में आए भूकंप में सबकुछ तबाह हो गया था लेकिन पूर्णिया फिर से उठ खड़ा हुआ।
पूर्णिया को अपने गांधी सर्किट की कथा बांचनी होगी। महात्मा गांधी 1925, 1927 और 1934 में पूर्णिया आते हैं। यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया के एक गांव की यात्रा का जिक्र जरूरी है।
बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर पहुंचते हैं, एक पुस्तकालय का उद्घाटन करने। वहां उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे। गांधी ने वहां लोगों को संबोधित किया। शाम में वे एक पुस्तकालय पहुंचते हैं, जिसका नाम मातृ मंदिर था। गांधी जी ने इस पुस्तकालय का उद्घाटन किया। चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी।
गांधी जी ने पुस्तकालय के बाहर महिलाओं के एक समूह को संबोधित किया था। शहर से दूर देहात में पुस्तकालय और बापू का पहुंचना ही पूर्णिया परिचय है।

