चंडीगढ़ः पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ‘जातिवादी गुंडे’ जैसे शब्दों तक विस्तारित नहीं होता है। अदालत ने कहा कि ये शब्द केवल दोषी व्यक्तियों की आलोचना करने के बजाय पूरी जाति या सामाजिक समूह पर अपराध, नैतिक पतन और सामूहिक दोषारोपण करते हैं। इस शब्द का इस्तेमाल करने के आरोप में गिरफ्तार वकील को भी राहत देने से इंकार किया है।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने एक हत्या के मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने के लिए पुलिस द्वारा मामला दर्ज किए गए एक कार्यकर्ता-वकील के खिलाफ आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?
उन्होंने सुनवाई के दौरान कहा “जब इस तरह की अभिव्यक्तियां सार्वजनिक रूप से व्यक्त की जाती हैं और सामान्य मान ली जाती हैं, विशेषकर तनावपूर्ण या भावनात्मक परिस्थितियों में तो इनसे पूर्वाग्रह को वैधता मिलने, शत्रुता भड़काने और सार्वजनिक शांति भंग होने का वास्तविक और तत्काल खतरा पैदा हो जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उन अभिव्यक्तियों को संरक्षण देने के लिए नहीं किया जा सकता जो अलगाव, सार्वजनिक अव्यवस्था या हिंसा को बढ़ावा देती हैं या देने की संभावना रखती हैं या जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती देती हैं। अनियंत्रित विभाजनकारी भाषण अंततः कानून का पालन करने वाले नागरिकों की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है।”
आरोपी वकील जत कलसन पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने, शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करने और सार्वजनिक उपद्रव को बढ़ावा देने वाले बयान देने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया गया था।
वकील के खिलाफ यह आपराधिक मामला जुलाई में एक शिकायत के बाद दर्ज किया गया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि हिसार में एक सार्वजनिक सभा में भाषण के दौरान उन्होंने कुछ ग्रामीणों को ‘जातिवादी गुंडे’ कहा था क्योंकि उन पर एक अनुसूचित जाति (एससी) महिला और अन्य लोगों को हत्या के मामले में झूठा फंसाने की कोशिश करने का आरोप था।
आरोप है कि वकील कलसन ने दावा किया था कि एक विशेष जाति से ताल्लुक रखने वाली मृतक महिला की हत्या 2024 में संपत्ति विवाद को लेकर उसके ही परिवार के सदस्यों ने कर दी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ग्रामीणों की शिकायत पर पुलिस ने एक अनुसूचित जाति की महिला और अन्य लोगों को इस मामले में झूठा फंसा दिया।
शिकायत में क्या कहा गया?
इस शिकायत के मुताबिक, कलसन ने कहा कि अनुसूचित जाति की महिला पर दबाव डालने के लिए ऐसा किया गया ताकि वह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम (SC/ST Act) के तहत दायर किया गया अपना पुराना मामला वापस ले ले। महिला ने अपने बेटे के साथ मुर्गी चोरी के आरोप में अन्य जाति के लोगों द्वारा कथित तौर पर मारपीट किए जाने के बाद मामला दर्ज कराया था।
कलसन द्वारा अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि यह तथ्य कि उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत यह कहकर की कि उन पर एक जाति को निशाना बनाने का आरोप लगाया जाएगा, यह दर्शाता है कि वे अपने भाषण की प्रकृति और लहजे से पूरी तरह अवगत थे।
अदालत ने आगे यह भी कहा उसे बार-बार ‘जातिवादी गुंडे’ शब्द प्रयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ने कलसन ने एक सभा को संबोधित करते हुए, झूठे आरोप लगाते हुए और इस तरह की सामग्री को इंटरनेट पर अपलोड करते हुए एक वकील के रूप में अपने कर्तव्य की सीमा से बाहर जाकर काम किया था।
ऐसे में अदालत ने यह माना कि वकील की भूमिका को एक निष्पक्ष और स्वतंत्र पेशेवर के समान नहीं माना जा सकता जो अदालत कक्ष की सीमाओं के भीतर ही अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करता है। इसलिए वकील को कोई राहत नहीं दी गई और मामले को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।

