शनिवार, मार्च 21, 2026
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पुस्तक समीक्षाः स्त्रीसूक्त- एक रचनात्मक अंतर्दृष्टि

Book Review: समकालीन हिंदी साहित्य में यह सवाल लगातार तेज़ हुआ है कि स्त्री के अनुभवों को कौन लिखे और कैसे लिखे? क्या संवेदना सचमुच जेंडर की सीमाओं में कैद है? इसी बहस के बीच प्रेम रंजन अनिमेष का कविता-संग्रह ‘स्त्रीसूक्त’ एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की तरह उभरता है। वर्पतमान परिदृश्य में पवन करण और प्रेमरंजन अनिमेष  दो ऐसे कवि हैं, जिनके यहाँ स्त्री जीवन की करुणा, जिजीविषा और प्रतिरोध केवल विषय भर नहीं, बल्कि एक गहरी रचनात्मक अंतर्दृष्टि का सूचक बन जाते हैं।
प्रेम रंजन अनिमेष का कविता-संग्रह स्त्री सूक्त’ न सिर्फ स्त्री-अनुभव की सूक्ष्म परतों को छूता है, बल्कि यह  साबित करता है कि सच्ची कविता की पहचान उसकी दृष्टि की प्रामाणिकता और संवेदना की ईमानदारी में होती है।

Book Review: इन दिनों आधुनिक समीक्षा ने कई चीजों को लेकर लकीर खींची है। पहली बात तो यह देखे जाने का चलन बढ़ा  है कि आप जिस समाज की कथा कह रहे हैं, उस तबके से हैं या नहीं ! मसलन अगर आप दलित हैं तभी दलितों पर लिखने की दखल रखते हैं! उसी तरह स्त्री जीवन पर पुरुष लेखन को भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा और खारिज किया जा रहा है। यानी आज के हिंदी साहित्य समाज में समानुभूति को एक महत्वपूर्ण टूल की तरह देखा जा रहा है। दूसरी तरफ साहित्य की अब तक की समझ बताती है कि पुरातन समय से द्रौपदी की पीड़ा हो या गांधारी की, गोपी-रुक्मणी की या फिर सीता की, पुरुष लेखकों ने उनके हृदयतल तक पहुँचने की कोशिश की है।

 परकायाप्रवेश जैसी सृजनात्मक शक्ति की परिकल्पना कोरी कल्पना भर नहीं है। प्रेम रंजन अनिमेष जी की कविता पुस्तक ‘स्त्रीसूक्त’ से गुजरते हुए सबसे पहली बात यही ध्यान में आती है कि उन्होंने स्त्री को केंद्र में रखकर रचना की चुनौती ली है और बखूबी निभायी है।

प्रेमरंजन अनिमेष को ‘स्त्रीसूक्त’ रचते हुए निश्चित रूप से इस आग्रह से टकराना पड़ा होगा कि कहीं स्त्री जीवन को वह पुरुष दृष्टि से तो नहीं देख रहे! आप किस पक्ष में और किस जगह खड़े हैं, और किस कोण से देख पा रहे हैं, यह वैयक्तिक है और पूरी तरह लेखक की रचनात्मक अंतर्दृष्टि का प्रतिफल। यहाँ यह जोड़ना जरूरी है कि जेंडर से ज्यादा फर्क दृष्टि का होता है! यह मसला दो अलग-अलग व्यक्तियों के मानसिक गठन का है! एक अर्थ में पितृसत्ता जेंडर न्यूट्रल भी है। स्त्री हो या पुरुष दोनों को ऐसा सामाजिक प्रशिक्षण प्राप्त है, जिससे वे पितृसत्ता के वाहक बन सकें ।

पिछले दिनों संगत के एक इंटरव्यू में मृणाल पांडे ने अपनी माँ शिवानी की लेखन की चर्चा करते हुए कहा था कि जब कभी माँ ऐसी घटनाओं को लिखती जिसका साक्षी पूरा परिवार होता, लोग असहमत होते। कुछ ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते कि तुम लिखना जानती हो तो कुछ भी लिख दोगी! सच है कि सबका अपने पक्ष होता है और अपने हिस्से का सच। रचना पर इस दृष्टि से विचार करने का आग्रह कुछ अनुचित भी नहीं है।

निश्चित तौर पर प्रेम रंजन अनिमेष जी ने अपने अंदर बसने वाली करुण दृष्टि से स्त्री मन का संस्पर्श किया है। इस संग्रह की कविताओं में स्त्री जीवन के विविध आयामो पर लिखते हुए वे पर्याप्त संवेदनशील दिखते हैं। अवश्य ही जीवन में कई रिश्तों को से जीते हुए उनको  स्त्री मर्मस्थल के अंतरंग को आत्मीय ढंग से समझने का अवसर मिला होगा। दादी, नानी, माँ, बहन, बेटी, बुआ, मौसी, मामी, मित्र और पत्नी-  सबकी संवेदनाओं से उनका गहरा रिश्ता बना होगा।

अच्छी बात यह है कि उनकी कवितायें अपने आसपास के इस स्त्री समाज के साथ एक सार्थक सुंदर संवाद के रूप में उभर कर आयी हैं। उदाहरणार्थ’ दिनों का फेर ‘कविता’ की ये पंक्तियाँ  बड़ी ही सहजता से स्त्री जीवन की विडंबनाओं को उकेरती हैं –

वह मिट्टी का/ चूल्हा थी/लिपती रही पुतती रही/ बोझी जाती रही/ जलती रही नियम से …. 

सुमित्रानंदन पंत ने यूँ हीं नहीं कहा था कि ‘आह से निकला होगा गाना’! करुणा प्रेम रंजन अनिमेष  की कविताओं में सूक्ष्म अनुभूतियों को पकड़ने का सिरा बनती है। बिना लाउड हुए उनकी स्त्रियाँ सवाल करती है, तर्क करती हैं, अपने प्रेम और अपनी संघर्ष यात्रा को अभिव्यक्त करती हैं। वे परंपराओं के साथ भी हैं और अपने सपनों के साथ भी। उनके संवाद आधुनिक जीवन दृष्टि से सम्पृक्त हैं। ‘अवतार पुरुष’ में आधुनिकता बोध से भरी स्त्री के ये आर पार चीरते हुए प्रश्न देखिये और इन प्रश्नों की धार – ‘जब जब होती/ धर्म की हानि / साधुओं का परित्राण/ दुराचारियों का करने दलन / होता तुम्हारा अवतरण/ कि सुराज का हो पुनर्स्थापन / मगर इसके लिए/ हर बार जरूरी क्या पहले / किसी स्त्री का/ अपहरण/ चीरहरण…?’

अनिमेष की कवितायें इस बात की भी मिसाल हैं कि सधे और सीधे सवाल शोर किये बिना संयत किंतु सुदृढ स्वर में किस बेधकता से सामने रखे जा सकते हैं! शब्दवेधी बाण की तरह ये जरूरी सवाल वर्तमान के साथ साथ गत और आगत के घटाटोप को भी चीरते हैं।  ‘पुरुष चरित्र’ कविता का यह तीक्ष्ण प्रश्न मन को मथने और हृदय को झिंझोड कर रख देने वाला है – ‘ सदियों से/ सोच में/ स्त्री / कि सच में था/ बरताव किसका/ बेहतर…? / देव/ ऋषि महात्मा/ ईश्वर / क्यों/मिलना/दूभर / मनुष्य से/मनुष्य सा / मनुष्य होकर…?’

प्रवाह के साथ साथ अपनी कविताओं में लय और यति के सूक्ष्म प्रयोग अनिमेष जिस खूबी से करते हैं वह भी गौरतलब है।

संस्कृत साहित्य या दुनिया की तमाम भाषाओं के साहित्य को देखें तो स्त्री केंद्रित रचनायें पर्याप्त लोकप्रिय रही हैं। चाहे बाणभट्ट की कादंबरी हो, टॉलस्टॉय की अन्ना कारेनिना हो, गोर्की की माँ हो या प्रेमचंद की धनिया। या फिर  कनुप्रिया, यशोधरा, उर्मिला या चेतना पारीक — यह स्त्री चरित्र सृष्टि सबके हृदय के निकट रही है।

पौराणिक चरित्रों में देखें तो सीता एक ऐसा स्त्री चरित्र है, जो लव कुश को लेकर राम के पास वापस लौटने से इनकार करती है। स्त्री विद्रोह का पहला स्वर सीता में दिखता है कि जहाँ स्त्री का सम्मान नहीं है वह वहाँ नहीं लौटेगी! सीता के संपूर्ण जीवन संघर्ष को समाहित करने वाली इस संग्रह की सबसे बड़ी और बेमिसाल कविता ‘धरती का फटना’ पौराणिकता के पार इस संदर्भ की सार्वकालिक सशक्त अभिव्यक्ति है।

इसी तरह दुख का पता, सुनवाई, पुरुष चरित्र, अवतार पुरुष, एक अनार्य सत्य, अन्याय अनुचित, संभव असंभव, बोली का दुख दुख की बोली, दुखद दांपत्य, दोहरी, कंधा, क्रिया कर्म,  इच्छा मृत्यु, नमक छोड़ती धरती, अंतिम प्रार्थना, चिरप्रतीक्षा, जगाना, जुगाना जैसी इस संग्रह की अनेक कवितायें समकालीन कविता समय की ऐसी अनमोल उपलब्‍धियाँ है जिनकी अनुगूँज समय और सरहदों के पार तक सुनायी देगी और अंतरतम को आंदोलित करती रहेगी। कहना होगा कि ये ऐसी सारगर्भित रचनायें हैं जो अपनी बारीकी, गहराई, करूणा, बेधकता और मर्मांतक मन-मंथन के कारण स्त्री रचनाकारों के लिए भी स्पृहणीय हैं ।

प्रेम रंजन जी सूक्ष्म अभिव्यक्ति के कवि हैं। उनके रचनात्मक संसार को संवेदनाओं ने उर्वर बनाया है‌। कवि की संवेदना इतनी गहन है और उसका वितान इतना व्यापक कि उसके लिए कोई पराया है ही नहीं! यहाँ आत्म का अछोर अनंत तक विस्तार है और अनंत को आत्मसात कर अपने में समाहार। संभवतः यही अपनत्व, आत्मीयता और सहज ही अपनाने अपना बनाने की शक्ति उनकी लेखनी से ऐसी स्त्रीपरक अमूल्य रचनायें भी सहज संभव करवाती हैं जो स्त्री रचनाकारों को भी स्तब्ध और अवाक कर देती हैं। दोधार की तरह भीतर उतरती जाती ये रचनायें सधी लेखनी की अकूत शक्ति सामने लाती हैं। साक्ष्य के रूप में नमक को नये निहितार्थ सौंपती और दैनंदिन के जीवन संदर्भों को अद्भुत ढंग से जोड़ती संग्रह की कविताओं ‘स्वेद आस्वाद’ और ‘नमक छोड़ती धरती’ विचारणीय हैं और विचारोत्तेजक भी। यह भी देखने लायक है कि सोच और संवेदना की गहराई और कथ्य के साथ साथ कहन की महारत किस तरह स्त्री विमर्श को पूरे समय समाज और संसार के व्यापक विमर्श तथा जरूरी चिंताओं एवं सवालों की ओर  ले जाती है। गौर करने के काबिल है जिस तरह ‘नमक छोड़ती धरती’ की ये पंक्तियाँ अपने अर्थ -संस्तरों  के साथ अंतरतम में उतरती हैं-

‘जीवन सलोना

उन बिन

कितना अलोना ?

प्रेम का मधु

लवण करुणा का

स्त्रियाँ

छत्ते सारे शहद के

उजाड़े जा रहे

पानी छूट चुका पहले ही

बड़े अफसोस की बात है

कि अब धीरे धीरे 

यह धरती

यह जिंदगी

नमक छोड़ रही…’

रूह को छू लेने वाली गहराई, संवेदना,संजीदगी और सोज से भरी जगजीत सिंह की आवाज, अदायगी और गायकी के लिए एक बार मेंहदी हसन ने कहा था कि हर गजल में जैसे वे कलेजा काट कर रख देते हैं। प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं के लिए भी यह बात कही जा सकती है। ‘सुनवाई’, ‘कंधा’, ‘क्रिया कर्म’, ‘इच्छा मृत्यु’  सरीखी कवितायें पढ़ कर  कुछ ऐसा ही अहसास होता है मानो दिल निकाल कर रख दिया हो किसी ने! लेकिन साथ ही साथ अपनी गहरी समझ और सुलझी हुई सोच से यह संवेदनसिक्त सृजनात्मकता जोड़ने,भरने,  सँभालने, सँजोने और सहेजने का काम भी करती हैं, जो अच्छी और सच्ची कविता का एक महत्वपूर्ण काम है!

इन दिनों चमत्कार पैदा करने के उद्देश्य से कविताओं में वृहद प्रयोग दिखते हैं। पर अच्छी बात है कि ‘ स्त्रीसूक्त ‘ की कवितायें बिना किसी चमत्कार प्रदर्शन के सीधे अपनी बात कहती हैं। आधुनिक साहित्य ने रचनात्मक शक्ति के रूप में अमिधा की ताकत को स्वीकार किया है। इस दृष्टि से प्रेम रंजन ने एक विश्वसनीय कुशलता से पाठकों का भरोसा जीता है। बहता‌ नीर सा ऐसा साहित्य आज भी पाठकों की‌ पहली पसंद है।

अभिधा के साथ व्यंजना को भी अनिमेष बड़ी ही खूबी से साधते हैं। बतौर बानगी देखने में छोटी मगर दूर तक मार करने वाली और भीतर गहरे उतर कर बेधने वाली ये कवितायें देखी जा सकती है- 

‘सब लौटे हैं / एक सफर से / आकर/ पुरुष कर रहे/ तैयारी/ खाने की / और वहीं औरतें/ लगन में लगीं/ पकाने की…’ ( ‘किसी बड़े सफर से लौट कर’ ) 

या फिर : 

‘यह असंभव कहो/ संभव कैसे किया / प्यार के / ढाई आखर पढ़ गये/ और अब पढ़ा सिखा भी रहे / स्त्री के/ डेढ़ दो अक्षर/ जाने बिना… ‘ ( ‘संभव असंभव’ )

देखें तो साहित्य का काम आंदोलन या क्रांति करना नहीं, पर बदलाव के लिए मन को तराशना, सँवारना और सहेजना तो है। इस नजरिये से एक सजग नागरिक और सामाजिक मनुष्य के रूप में प्रेम रंजन जी का लक्ष्य स्पष्ट दिखता है। अमूमन जीवन में छूट जाने वाले सबसे छोटे और अहम प्रश्न इन कविताओं में दर्ज होते हैं। उदाहरणस्वरूप ‘जीवनसंग’ कविता ध्यातव्य है- ‘जीवन भर/ साथ निभाने का/ वादा तो दोनों का / फिर उसको ही क्यों/ सब कुछ करना धरना / हर दिन जीना मरना/ बिस्तर रात लगाना / चादर सुबह सलटना/ और सजाना…? या फिर ‘दिनों का फेर’ कविता की ये शिखर पंक्तियाँ :  मगर हिस्से अब भी/ सुबह शाम ही नहीं/ जब किसी का जी / तपना/ जलना / कब क्या/ अपना…?’

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘काव्येर अपेक्षित’ लिखा था। इसके पश्चात महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी सरस्वती पत्रिका में ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ आलेख लिखा था। इससे प्रेरित हो मैथिली शरण गुप्त ने ‘सखी वे मुझसे कह कर जाते’ और ‘उर्मिला का विरह वर्णन’ लिखा। साहित्य में हाशिये पर के चरित्रों को पुनर्जीवन देना एक ऐतिहासिक जरूरत थी। प्रेम रंजन अनिमेष की कविताओं में आत्मीयता से उपेक्षित स्त्री जीवन के कई पहलुओं पर बेबाकी से सृजन है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अनिमेष सूक्ष्म और आधुनिक दृष्टि के कवि हैं। आधुनिक दृष्टि का संबंध विचारों में निरंतर गतिशीलता से है। नये और जायज हक के लिए खड़ा होना है। यह नयी दृष्टि और सोच कितनी ऊँचाई तक जाती है, संग्रह की ‘नवरूप’ सरीखी कवितायें इसका साक्ष्य हैं –

‘अब और रोने की नहीं 

मजबूत होने की जरूरत है

जिस तरह

कपड़े धोते हुए 

उन्हें पीटती

पछींटती 

गारती

झटकारती

पसारती 

इस दुनिया को भी

अच्छी तरह 

धोने की जरूरत है…’

निस्संदेह स्त्री विमर्श को नये शिखर तक ले जाने वाली  यह किताब ‘ स्त्रीसूक्त ‘ सचमुच सूक्त यानी सुंदर कथन साबित होगी !

समीक्षित पुस्तक : स्त्रीसूक्त 
रचनाकार  : प्रेम रंजन अनिमेष 
विधा : कविता संग्रह 
प्रकाशक : पुस्तकनामा
मूल्य: ₹299

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अनामिका प्रिया
अनामिका प्रिया
समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, कथादेश ,परिकथा, इंद्रप्रस्थ, इरा बेव पत्रिका, भारती, ककसाड़, पाखी, दोआबा, वागर्थ और डायमंड बुक्स में कहानियां प्रकाशित। कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएं,शोध आलेख और समीक्षा आलेख प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तक- ‘हिन्दी कथा साहित्य और झारखंड' (यह पुस्तक रांची विश्वविद्याल के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्वीकृत) प्रभात खबर, रांची एक्सप्रेस और वनिता में पत्रकारीय लेखन। संप्रति- अध्यक्ष, हिंदी विभाग, रामगढ़ कॉलेज, रामगढ़ कैंट, झारखंड।
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