Friday, March 20, 2026
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पुस्तक समीक्षाः ‘माई रे’- लोकगायिका के जीवन-संघर्ष और मानवीय संवेदना का मार्मिक आख्यान

प्रेम रंजन अनिमेष का उपन्यास ‘माई रे’ एक लोकगायिका के बहुरूपी संघर्ष को मानवीय संवेदना की उष्मा के साथ दर्ज करता है।  यह कथा स्त्री के सपनों, टूटनों और पुनः उठ खड़े होने की जिद को बेहद संक्षिप्त लेकिन गहन रूप में प्रस्तुत करती है। शिबू, अबू और रबू की त्रिकोणीय दुनिया में मायानगरी की चमक भी है और उसका अंधेरा भी। विभाजन की पीड़ा, फिल्म जगत की सच्चाइयाँ और कला-संगीत का अनूठा लोक-स्वर, सब मिलकर इस उपन्यास को एक मार्मिक सामाजिक दस्तावेज़ का रूप देते हैं।

उपन्यास ‘ माई रे ‘ प्रेम रंजन अनिमेष की नव्यतम और अन्यतम औपन्यासिक कृति है। सतत सृजनात्मक सामर्थ्य से संपन्न इस अनन्य रचयिता की सोलहवीं पुस्तक। पहले तो बात करें प्रवेशद्वार की। द्वार जैसे तोरणदार! नीले रंग का एक अलग आकर्षण होता है। उसी नीले रंग में जगमोहन सिंह रावत द्वारा निर्मित आवरण अतिशय आकर्षक है। 

गहन अनुभव एवं अनुभूति की कृति है यह उपन्यास। लोकगायिका की संगीतात्मक, चित्रात्मक गाथा के साथ बहुरंगी परिवेश। एक स्त्री के त्रासद जीवन की मार्मिक कथा है यह तकरीबन सौ पृष्ठों का उपन्यास ‘ माई रे ..’ ! कम पृष्ठों में समाया बृहत्तर जीवन संघर्ष, पीड़ा, जिजीविषा की कहानी है। अप्रतिम सहयोग, आस्था की भी। शिबू नामक महिला की, पति अबू की और उनके बेटे रबू अर्थात प्रभु की । लोकगायिका शिबू के सवप्न, स्वप्न भंग, फिर उड़ान की कोशिश की व्यथा कथा !

साथ ही इसमें विभाजन की पीड़ा और एक निर्धन, प्रतिभाशाली शायर दर्जी की पीड़ा भी समाहित है। यहां फिल्म जगत के जाने-अनजाने यथार्थ के परिचय देते दृश्य, अंतर्कथाएँ, स्कूलों और रियलिटिज शोज की सच्चाई भी कहानी में जरूरी टूल की तरह गुँथी हुई है। अर्थात एकरेखीय नहीं,  उपन्यास बहुरेखीय है। कई मनोरंजक उपशीर्षको में समाया, बहुस्तरीय उपन्यास है ‘ माई रे ‘ । इसकी संवेदनशीलता परिचायक है कवि, लेखक, गायक, संगीतकार, कलाकार  प्रेम रंजन अनिमेष के संवेदनशील मन की।

बारीक बुनावट के साथ कथानक को रेशे-रेशे खोलती अत्यंत महत्वपूर्ण है यह कृति ! लोकगायन में सिद्धहस्त ग्रामबाला शिबू स्वर्ण कारोबारी अबू से ब्याही जाती है। ससुराल मुंबई आते वक्त वह सपनों के परों पर सवार रहती है। सखियों ने जगाया है यह सपना कि छोटे से गाँव से निकलकर वह मायनगरी मुंबई जा रही है तो वहाँ उसके गायन कला को मंजिल मिल सकती है। पर प्रेम प्रतिदान और त्याग भी माँगता है। पति उसके गायन-नृत्य को अपने तक सीमित रखने की बात कहता है। बाद में जब वह बीमार अबू के कारण पुनः गाना शुरू करती है, बेटे रबू को भी सिखाती है। बेटे की लगन, मेहनत और प्रतिभा परवान चढ़ती है। इसमें शिबू के प्रति आसक्त बादशाह की बेहद महत्वपूर्ण, परोपकारी भूमिका है। 

सभी पात्रों की मन:स्थिति का वर्णन पाठकों को बाँधकर रखने में सक्षम है। कथा तत्व भरपूर। पठनीयता की कसौटी पर गजब का विश्वसनीय। भाषा का प्रवाह बहती स्वच्छ नदी सा कल-कल, निर्बाध, ठिठककर सोचने को मजबूर करता हुआ।

अंत इतना मार्मिक है कि पाठक सन्न सा रह जाता है, जैसे भौंचक्के रह गये प्रतियोगिता में गायक प्रभु की “माई रे…” की टेर सुननेवाले । माई की मृत्यु की खबर से आहत प्रभु माई के वचन से बँधा गा तो रहा है पर गीत, बोल, संगीत बिसराकर बस ‘ माई रे…’  का आलाप ले पाता है। लेखक के शब्दों में, ‘आत्मा को छूने, झिंझोड़ने, बेधनेवाला!’ यह आलाप एक सिहरन पैदा करता है। घनीभूत पीड़ा की अनुभूति और उसके गायन से प्रभावित बड़ा संगीतकार उस पर प्यार-आशीर्वाद, विश्वास की बौछार सी करता है।

नेपथ्य में चलते अन्य पात्रों के क्रियाकलाप भी पाठकों की उद्वेलित करते हैं। यह उद्वेलन की कृति है। उद्वेलित होकर लिखी गई। लेखक प्रेम रंजन चूँकि बहुत अच्छे गज़लगो, कवि भी है तो कहानी में गुँथे हुए हैं अशआर, दोहे, श्रुत सुभाषितानि आदि। 

अंतरतम की गहराई से लिखे उपन्यास ‘ माई रे ‘ का शीर्षक बड़ा बेजोड़ है, शीर्षक में ही मार्मिकता छिपी है। प्रेम रंजन अनिमेष  ने अद्भुत कौशल से कथा बुनी है। एकदम कॉम्पैक्ट। अनोखे उपशीर्षकों और मुख्य पात्रों की तिकड़ी शिबू, अबू, रबू के नामों की जुगलबंदी ने उपन्यास में रोचकता का तड़का लगाया है। भाषा पर लेखक की गजब की पकड़ है। 

मायानगरी के दोनों पक्षो को उभारा गया है। एक है बेदिल मुंबई, दूसरा है, दिलवाला महानगर। यहां खल पात्र दुदा बेदिली का, उदार बादाशाह दिलदार का प्रतिनिधित्व करते हैं। कथा वितान घाघ फिल्मकारों का पर्दाफाश करता है तो बादा के उदात्त चरित्र को उजागर भी।

लेखक अनावश्यक विस्तार और उलझाव से कथानक को बचा पाने में सफल रहे हैं। आज के कथाविहीन शिल्प के उलझावों से बच पाना बहुतेरे कहानीकारों के लिए संभव नहीं । लेकिन अनिमेष ने  बड़ी सूझ और समझदारी से यह बचाव किया है। सीधी, सहज, सरल प्रस्तुति में रचाव का सौंदर्य देखते बनता है। गंभीर पीड़ादायक प्रसंगों के बावजूद रोचकता उपन्यास को पठनीय बनाती है।

विवशता, करुणा, त्याग-तपस्या और निःस्वार्थ प्रेम की उज्ज्वल कहानी! न जाने कितनी स्त्रियों ने अपने स्वप्नों को पति प्रेम की खातिर तिलांजलि दे दी है। मायानगरी के घिनौने चेहरे के साथ मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत वहीं के बाशिंदे बादाशाह के प्रेम और उदारता की कथा भी मन को अंदर तक छूने वाली और अत्यंत ह्रदयस्पर्शी है। ऐसा प्रेम 70-80 के दशक के प्रेम की याद दिलाता है, जो त्याग, समर्पण, सहयोग की भाषा जानता था।

अबू के अब्बा फजल दर्जी थे लेकिन उच्च कोटि के ग़ज़लगो, गायक। अपने फन में माहिर। जब उन्हें ग़ज़ल चोर दुदा के कारण मानसिक चोट पहुँचती है, तो वे अशआर कहना छोड़ देते हैं। तीसरी कसम में नायक खुद तीन कसमें खाता है, यहाँ त्रस्त, हताश शायर पिता फजल ने अपने बेटे अबू को तीन कसमें खिलायीं और शायरी से दूर रहने की सलाह दी।

विभाजन की मर्मांतक त्रासदी हो या जड़ छोड़ती तथाकथित  आधुनिक शिक्षा व्यवस्था  — प्रेम रंजन अनिमेष का चित्रण जितना चित्ताकर्षक है उतना ही हृदयस्पर्शी भी ! सधे सिद्धहस्त शब्दसाधक की तरह जिस कसावट के साथ इन प्रसंगों को वे प्रस्तुत करते हैं, कहीं कसक और ललक उभरती है इनमें और देर तक डूबे रहने अवगाहन करने की। यह भी बतौर आख्याता अनिमेष की अनेक खूबियों में से एक कही जा सकती है।

दृश्यात्मकता, चित्रात्मकता और बिम्बों की काव्यात्मकता से परिपूर्ण इस उपन्यास के शिखर पर ‘माई रे…’  का आलाप किसी कसी हुई कलात्मक चलचित्र के क्लाइमेक्स की तरह चरमोत्कर्ष तक ले जाता है। ‘माई रे …’ — बस इन दो शब्दों  तीन अक्षरों के आर्तनाद में मानो पूरे विश्व और आदि अनंत का अनहद नाद गूँज उठता है । सारी बाजारी कारोबारी दुनियादार कारगुजारियाँ एक ओर धरी की धरी रह जाती हैं और यही पुकार सर्वोपरि हो जाती है!

जीवंत कोलाज की तरह  कहन प्रभावशाली, संवाद रोचक भी, मार्मिक भी, पात्रों का चरित्र चित्रण, पात्रानुकूल संवाद और प्रवाह, सब कुछ अत्यंत सराहनीय है। शैली में भी चुंबकीय आकर्षण ! ‘ माई रे ‘ कथानक, कथ्य, संप्रेषणीयता और अपने उद्देश्य में सफल उपन्यास है। 

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पुस्तक : माई रे
विधा : उपन्यास 
लेखक : प्रेम रंजन अनिमेष
प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली
मूल्य : ₹150

अनिता रश्मि
अनिता रश्मि
नाम-अनिता रश्मि रचनाएं-अनेक विधाओं में रचनारत। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब मैगजीनों में निरंतर प्रकाशन। 15 पुस्तकें।रचनाओं का विभिन्न भाषा में अनुवाद। पुरस्कार- शैलप्रिया स्मृति सम्मान, इंडिया नेटबुक्स बीपीए कथा रत्न सम्मान, जयपुर साहित्य संगीति सम्मान, सर्व भाषा ट्रस्ट, कथा सम्मान आदि पुरस्कार, सम्मान।
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