पर मौसम
चहे जितनी ख़राब हो
उम्मीद नहीं छोड़तीं कविताएं
वे किसी अदृश्य खिड़की से
चुपचाप देखती रहती हैं
हर आते-जाते को
और बुदबुदाती हैं
धन्यवाद! धन्यवाद! (केदारनाथ सिंह)
देश और दुनिया की सभी विषम परिस्थितियों, युद्ध और हिंसा के तांडव, नफ़रतों और अन्याय के सभी कुचक्रों के बीच उम्मीद की तरह इस साल भी कविताएँ आती रहीं, परिवर्तन की राह ताकती रहीं। चमकीली बेस्टसेलर किताबों, तमाम साहित्यिक विवादों और उत्सवों की गहमागहमी के मध्य भी कविताओं ने अपना वैभवशाली एकांत बनाए रखा और हमें उम्मीद की डोर पकड़ाए रखी कि ‘और कुछ भी नहीं में सब कुछ होना बचा रहेगा’।
अभी जब मैं ये पंक्तियाँ उद्धृत कर रही हूँ, इनके सर्जक, हमारे समय के विलक्षण रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल भौतिक रूप से उपस्थित नहीं रह गए हैं। इस साल के जाते हुए ये अंतिम दिन कविता के लिए, हिंदी साहित्य के लिए और सबसे बढ़कर मनुष्यता के लिए बहुत बड़ी क्षति बनकर आए। फिर भी, उनके शब्द बचे रहेंगे, कविताएँ बची रहेंगी जो हमें बेहतर और सार्थक लिखने-पढ़ने का साहस देती रहेंगी, यह जानते हुए भी कि जीवन और समाज में धीरे-धीरे कविताओं की जगह कम होती जा रही है, बाजार के चमकीले शोर के बीच उनका सतत प्रतिरोध अनसुना- अनदेखा कर दिया जा रहा है।
इस वर्ष भी बहुत अच्छे कविता संग्रह प्रकाशित हुए, जिन्होंने हिन्दी कविता के बृहत्त संसार को समृद्ध किया। इनमें ध्वनित प्रतिबद्धता, सरोकार, प्रकृति, पर्यावरण और वंचित मनुष्यों के प्रति चिंताओं ने अमरीकी कवि ऑड्रे लॉर्ड के इस कथन को पुख्ता किया कि ‘कविता विलासिता का समान नहीं है’। यदि वह कवि के अंतर्मन की आवाज़ है तो हमारे आसपास जो कुछ भी सुंदर और ज़रूरी है, उसे बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध भी है। मैं इस साल पढे गए कुछ बेहतरीन कविता संग्रहों को यहाँ रेखांकित कर रही हूँ, ताकि उनमें समाहित तरलता और संवेदना को आत्मसात करते हुए नए साल की ओर उम्मीद से देखा जा सके। इन संग्रहों में एकदम युवतम कवि का पहला संग्रह भी है तो कविता के अग्रज भी हैं, जिन्होंने हिंदी कविता को ठोस जमीन दी है। (कवियों का चयनक्रम हिन्दी वर्णमाला के अनुसार रखा गया है।)
धड़कनों के भीतर तक जाकर- ए. अरविंदाक्षण का यह कविता संग्रह उनकी समग्र कविता-यात्रा को समेटे हुए है और बाईस खंडों में विभाजित है। अरविंदाक्षण कहते है, ‘मेरे लिए कविता अपने एकांत का पुनर्वास है लेकिन कविता के अंतिम शब्द तक आते-आते वह एकांत पूरी तरह से लुप्त हो जाता है और उसकी जगह मेरा समय ले लेता है’। इन कविताओं में हमारे समय के कई ज्वलंत टुकड़े है, यथार्थ की ऐसी गहन अभिव्यक्ति है कि कविता पढ़ते हुए हम अपने देश और दुनिया के हालातों को जीवंत देखने लगते हैं। ‘अपनी कविता से मैंने कहा, मणिपुर जाओ, जो संभव है करो/ मैंने मणिपुर के लोगों को सूचना दी, मेरी कविता आप की तरफ़ आ रही है, वह आप के लिए कुछ कर पाएगी/ क्योंकि वह कविता है’। यह एक ऐसे कवि की कविताएँ हैं जो कविताओं को सिर्फ़ भाषा में सौन्दर्य रचने का माध्यम नहीं मानता, उन्हें प्रतिरोध और परिवर्तन के सशक्त माध्यम के रूप में देखता-गुनता है।

अतिरिक्त दरवाज़ा- अब स्त्री का लिखना, उसकी कविताएँ अतिरिक्त नहीं रहीं, उन्हें सिर्फ़ स्त्री-स्वर की परिधि में बाँधकर नहीं पढ़ा-गुना जा सकता। युवा कवि ज्योति रीता का दूसरा संग्रह ‘अतिरिक्त दरवाज़ा’ स्त्रियों, वंचितों, देश और दुनिया में धर्म, जाति, वर्ण, भाषा आदि अनगिनत खांचों के नाम पर हिंसा झेल रहे मनुष्यों की आवाज़ बनता है। यहाँ गाज़ा के बच्चे हैं जो पूछते हैं, ‘कोई तो देश होगा जहाँ बच्चों पर दया की जाती होगी’ तो ‘बोगनविलिया के फूल’ की वह नई स्त्री भी जो कहती है, ‘प्रेम राह चलते हुए बोगनविलिया का फूल बना जा सकता है/ प्रेम में मीरा बनना कभी आसान नहीं था’। ज्योति की कविताओं में स्त्री संवेदना के स्वर हैं तो देश-दुनिया के तत्कालीन मुद्दों के प्रति एक संवेदनशील मनुष्य की चिंता भी जो सोचती है कि ‘हर युद्ध के बाद अंततः मनुष्यता हारती है’।

आँखों में मानचित्र- युवतम कवि दिव्या श्री का यह पहला संग्रह है जहाँ स्त्री मुक्ति के आह्वान के साथ प्रेम के विविध शेड्स अपने सबसे तरल, कोमल और पारदर्शी रूप में उपस्थित हैं। दिव्या श्री अपने आत्मकथ्य में भी लिखती हैं कि कविताएँ उनके लिए प्रेम है और प्रेम का अर्थ है प्रतीक्षा। यहाँ एक युवा लड़की का स्वप्न संसार है तो परिवार और समाज की जड़ता और पूर्वग्रहों के कारण उनके टूटने की किरचें भी; यहाँ उसके संकल्प और परिवर्तन की आकांक्षा है तो कई सारे प्रश्न भी, जिनके उत्तर वह अपनी कविताओं में खोजती है: ‘मेरी माँ, नहीं करूँगी तुमसे कोई प्रश्न/ बस इतना कहूँगी मुझे तुमने नहीं इन प्रश्नों ने बड़ा किया है’। किसान पिता की यह लड़की जब किसान बनने के अपने निर्णय पर पिता की सहमति नहीं पाती तो कागज़ों पर ही प्रेम, सुख-दुख, सपने बोने लगती है। दिव्या की कविताओं में संभावना हैं, और रचनात्मकता की उर्वर भूमि, जहाँ ‘उन सबके लिए एक घर बनना है’, जो बेघर और और वंचित हैं’।

एक अनाम पत्ती का स्मारक- वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना अपने संग्रह की भूमिका में लिखते हैं, ‘कविता निरी भाषा और संवेदना से संभव नहीं होती। उसमें अनुभव, सौदर्यबोध, विचार, सरंचना, सूक्ष्मता, काव्य कौशल सब कुछ को इस तरह एक साथ होना होता है; जैसे किसी ऑर्गैनिक सरंचना के उसके तत्व होते हैं, जिन्हे आसानी से अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता’। नरेश सक्सेना की कविताओं की ऑर्गैनिक सरंचना में विचार की ऊष्मा के साथ प्रकृति का सौन्दर्यबोध, उसके प्रति चिंता, वैज्ञानिक तथ्य और हमारे जीवन मूल्य, राजनीति और समाज के सभी तत्व आपस में इतनी महीनी से गूँथे हुए कि कविताएँ जीवन का हिस्सा बन जाती हैं, अनदेखी लगभग अदृश्य चीजें जो दृष्टि के सामने होकर भी छूटती रहीं, उन्हें देखने की सलाहियत देती हैं –‘दरवाज़ा बारिश में भीगा फूल गया है/ कभी पेड़ था हम समझे थे भूल गया है’।

मैं मरा दो बार- नवीन रंगियाल के पास पास प्रेम, विरह और मृत्यु की कई ऐसी कविताएँ हैं, जिसे इंस्टाग्राम की कविता-प्रेमी युवा पीढ़ी उद्धरणों की तरह प्रयोग करती है। नवीन का यह दूसरा संग्रह भी युवाओं में खासा लोकप्रिय हो रहा जहाँ जीवन और रिश्तों से जुड़ी कई मोहक और संवेदनशील पंक्तियाँ मिलती हैं। एक बानगी देखिए: ‘क्योंकि मुझे मरना ही था तुम पर/ मैं मरा एक जीवन में दो बार/ पहले तुम पर मरा/ फिर मरा हमेशा के लिए’। प्रेम और कविता किसी व्यक्ति को जीवन दे या नहीं, मर्मांतक पीड़ा ज़रूर दे जाते हैं। प्रेम और दुख लिखता हुआ कवि आत्महंता हो जाता है लेकिन संसार को कुछ सुंदर कविताओं की सौगात दे जाता है। नवीन लिखते हैं: ‘कवि का दुर्भाग्य यह है कि उसकी सबसे लहुलुहान कविता पर भी लोग वाह कर उठते हैं’।

उम्मीद की तरह लौटना तुम- इस संग्रह में पिता के चले जाने के बाद की विकलता को व्यक्त करती कुछ बेहद मार्मिक कविताएँ हैं, जिन्हें पंकज सुवीर ‘जुनून अवधि’ की कविताएँ कहते हैं, जब पिता के चले जाने की गहन पीड़ा और रिक्तता अनायास ही कागज़ों पर ढलने लगी थी। ‘पर उस रात अपने नहीं पुकारा/एकदम चुप कर सो गए/जैसे युगों की थकान बसी हो शरीर में/तीन दिन बीत गए, मैं आज भी इंतज़ार में हूँ आपके पुकारने के’। ‘प्रवेश, प्रकृति, प्रेम प्रारूप, प्रतिरोध नामक पाँच खंडों में विभाजित इस संग्रह में प्रेम, रिश्तों, मित्रता और राजनीति पर संवेदनशील कविताएँ संकलित की गई हैं। अपनी पुत्री, पिता, नानी, मित्र – गौतम राजऋषि, यतीन्द्र मिश्र, शहरयार, सुधा और ओम जी आदि को समर्पित कविताएँ न सिर्फ़ कवि के भावुक, प्रेमिल हृदय की अभिव्यक्तियाँ हैं, इस संग्रह को विशिष्ट भी बनाती हैं।

बस चाँद रोएगा- वरिष्ठ कवि मदन कश्यप के इस संग्रह की कविताओं के मूल में उनकी लोकधर्मी चेतना और प्रतिरोध का स्वर है। युद्ध और हिंसा के तांडव, फासीवाद, धर्म के उन्माद एवं वंचित वर्ग की आवाज़ को मुखरित करती सशक्त कविताएँ इस संग्रह की विशेषता हैं। इन कविताओं में उपस्थित अन्याय और विषमता के विरूद्ध प्रतिबद्धता का स्वर आज के मूल्यविहीन समय के लिए एक चेतावनी और सीख की तरह ध्वनित होता है। कवि प्रेम, प्रकृति और स्त्री को अभिव्यक्त करते हुए बहुत सघन और पारदर्शी होते हैं। इस संग्रह में भी इन विषयों पर लिखी कविताएँ अपनी गहन संवेदना से पाठकों के मर्म को छूती हुई, साथ रह जाती हैं: ‘बस चाँद रोएगा/और किसी के रोने की ज़रूरत भी नहीं,केवल वही जानता है मेरा अकेलापन,उसके साथ ही तो की है सबसे ज़्यादा बातें उस पर कुछ लिखा नहीं फिर भी’।

बिना कलिंग विजय के सुपरिचित रचनाकार यतीन्द्र मिश्र का यह संग्रह उनके पिछले कविता संग्रह के बारह वर्षों के बाद प्रकाशित हुआ है। अपने आत्मकथ्य में कवि लिखते हैं कि माँ के संसार से जाने की असह्य पीड़ा को झेलते हुए उनसे जुड़े रहने के लिए उन्होंने कविताओं को चुना। यह संग्रह चार काव्यात्मक खंडों में विभाजित है, चौथा खंड- हम सब में टूट-टूटकर बिखर तुम्हारा होना पर माँ की स्मृति में लिखी कुछ बेहद मार्मिक कविताएँ हैं- ‘मैं अपने होने को तुम्हारे न होने के बीहड़ सच में ढूंढ रहा हूँ/ तुम्हारी अनुपस्थिति की चादर में मेरी उपस्थिति का सलमा-सितारा उघड़ गया है’। संग्रह की कविताएँ इतिहास और मिथक से संवाद करती वर्तमान के मूल्यों और प्रश्नों से स्वयं को जोड़ती एक बृहत्त वितान रचती हैं और हिन्दी कविता के फलक को समृद्ध करती हैं।

नमी बची रहती है आखिरी तल में सुपरिचित रचनाकार राजीव कुमार का यह पहला कविता संग्रह है लेकिन यहाँ जीवन के गहन अनुभवों का सार है, जहाँ उनकी बहुपठनीयता भोगे गए यथार्थ के साथ संवाद करती हुई कल्पना और संवेदना का एक मार्मिक संसार रचती है। इतिहास और मिथक यहाँ वर्तमान और कल्पना से मिलकर कविताओं को बहुस्तरीयता प्रदान करते हैं, संग्रह पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही यह कवि का पहला संग्रह है लेकिन ये कविताएँ उसके मानस पर वर्षों से लिखी जा रही थीं, अभी बस कागज़ों पर उतरी हैं: ‘ज़िंदगी का एक छोटा स हिस्सा मेरी जगह से भी दिखाई पड़ा था/ तुम्हें उस हिस्से की भनक तक नहीं थी/ मेरी तरफ़ से तुम एक बड़े वृक्ष की छाया में खड़े दीखते थे, जिसकी दृष्टि बाधित थी शाखाओं से’।

चुप्पी प्रेम की भाषा है- रंजीता सिंह की कविताओं का मूल विषय प्रेम रहा है। प्रेम, प्रतीक्षा, प्रेम में मिले दुख को वह अपनी स्त्री भाषा में रचती सपनों और आकांक्षाओं का एक प्रतिसंसार रचती हैं। रंजीता प्रेम को वह एक ऐसे प्रतिरोध के रूप में देखती हैं जो स्त्री को समाज की रूढ़ियों से मुक्त कर उसके स्वप्नों को पंख दे सकता है। इस संग्रह में घर, रिश्तों, मित्रता, स्त्री-यौनिकता आदि पर कुछ बेहद मोहक कविताएँ हैं, जो स्मरण में रह जाती हैं। यहाँ स्त्री मन की थाह तो है ही, उसकी वर्जित मानी जानी कामनाओं को भी पूरी बेबाकी लेकिन संजीदगी से अभिव्यक्त किया गया है:’हम अपनी चुप्पियों में दुनिया के सुंदरतम गीत रचने लगे/ हम बेआवाज़ एक दूसरे को पुकारने लगे’।

रूँधे कंठ की अभ्यर्थना- कवि स्मिता सिन्हा के इस दूसरे संग्रह में स्त्री-संसार की सभी प्रतिध्वनियाँ है। यहाँ उसके प्रेम, स्वप्न, पीड़ा, छोटी- छोटी खुशियों का ऐसा संसार है, जिसे देखने- गुनने की दृष्टि सिर्फ़ स्त्री-भाषा को ही मिल सकती है। स्त्री को एक व्यक्ति की तरह देखे जाने की आकांक्षा इन कविताओं के मूल में है जो घर-बाहर की दुनिया, प्रेम, मित्रता, रिश्तों को सहेजती सिर्फ़ इतना चाहती है कि उसे उसके हिस्से का स्पेस, उसकी वांछित मुक्ति का अधिकार मिले: ‘देर तक करती रहेगी बहस, अपने ही पक्ष और प्रतिपक्ष में/ ओस के फाहे देते रहेंगे थपकी इनकी थकी आँखों को, और लगती रहेगी गर्म पानी की सेंक इनकी पीठों पर आज फिर देर तक/ आज ये फिर से छोड़ देंगी अपनी किसी कविता को अधूरी हमेशा के लिए’।

इस वर्ष पराग पावन का संग्रह जब हर हँसी संदिग्ध थी भी प्रकाशित हुआ। पराग को निरंतर पढ़ती-सुनती रही हूँ। उनकी बेरोजगारी शृंखला की कविताओं में अभिव्यक्त यथार्थ और उसके संवेदनशील चित्रण ने प्रभावित किया। उनका संग्रह मैं कई प्रयासों के बाद भी पढ़ नहीं सकी लेकिन बेरोज़गारी शृंखला की कविताओं के कारण वे मेरे चयन का हिस्सा बननी ही थीं।
‘क्या बेरोज़गारी में आपको माँ की याद आती है?
और बचपन की? और उन दोस्तों की
जो फटी जेब से सिक्कों की तरह कहीं गिर गए?
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं
और त्यौहारों की तरह चली गयीं
जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
क्या बेरोज़गारी में आप भी कोई भी शब्द उठाकर
पत्थर में बदल देते हैं?’

