नई दिल्लीः संसद के बजट सत्र में बुधवार (11 फरवरी) को प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत देश भर की अदालतों में 2.24 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनकी सुनवाई में छह महीने से लेकर चार साल से अधिक का समय लग रहा है।
राज्यसभा सांसद एस निरंजन रेड्डी के एक लिखित प्रश्न के उत्तर में, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि 31 दिसंबर, 2025 तक, 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 774 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) कार्यरत होने के बावजूद, कुल 2,24,572 पॉक्सो मामले लंबित हैं। इनमें से 398 न्यायालय विशेष रूप से पॉक्सो मामलों के लिए समर्पित हैं।
संसद में पेश आंकड़ों में क्या निष्कर्ष निकला?
संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में मामलों के निपटारे की दर सबसे धीमी है जहां मुकदमों को पूरा होने में औसतन 4.5 वर्ष लगते हैं। त्रिपुरा में चार वर्ष से अधिक का समय लगता है, जबकि मणिपुर में औसतन 3.7 वर्ष लगते हैं। गुजरात में POCSO मामलों के निपटारे में औसतन लगभग 3.5 वर्ष लगते हैं। बिहार और असम में लगभग 2.6 वर्ष लगते हैं, जबकि नागालैंड, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी प्रति मुकदमे में ढाई वर्ष से अधिक का समय लगता है।
इसके विपरीत, पुडुचेरी में मुकदमे महज छह महीनों में पूरे हो जाते हैं। उसके बाद आंध्र प्रदेश में औसतन 257 दिन लगते हैं जबकि छत्तीसगढ़ में लगभग 332.5 दिनों में मामलों का निपटारा हो जाता है।
मंत्री द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। इसके मुताबिक झारखंड 7 जुलाई, 2025 को फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना से पूरी तरह बाहर हो गया, जिससे राज्य में बाल यौन शोषण के मामलों के लिए कोई समर्पित न्यायिक ढांचा नहीं बचा है।
सरकार ने क्या कदम उठाए?
सरकार ने पीड़ितों की सहायता के लिए उठाए गए कदमों पर भी प्रकाश डाला जिनमें अदालत परिसरों के भीतर बाल-अनुकूल वातावरण बनाने के लिए कमजोर गवाह गवाही केंद्रों (VWDCs) की स्थापना शामिल है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति ने 10,000 से अधिक प्रतिभागियों को शामिल करते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। सरकार ने जांच क्षमताओं को मजबूत करने के लिए नई केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं को भी मंजूरी दी है।
हालांकि मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद 233 और 234 के संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, जजों, अभियोजकों और अदालती कर्मचारियों की भर्ती की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की है। लंबित मामलों की भारी संख्या और मुकदमों की लंबी अवधि भारत के बाल संरक्षण ढांचे की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
पॉक्सो के मामलों के अलावा भी अन्य मामलों के निपटारे में भी लंबा समय लगता है जिससे न्यायपालिका के ऊपर दबाव बना हुआ है और लोगों को न्याय मिलने में लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

