Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: पट्टूड़ा- मारवाड़ की ओढ़ी हुई विरासत

पहले पट्टूड़ा स्थानीय भेड़ की ऊन से बुना जाता था। एक व्यक्ति पूरा जीवन एक ही पट्टू में निकाल देता था। व्यक्ति और पट्टू की एक ही पहचान हो जाती थी।

“कभी मैं हर घर की जरूरी चीज हुआ करता था। हर गुड़ाल और कोटड़ी मुझसे ही रंगीन होती थी। सर्दियों में किसी साधु की तरह झोंपड़ो में अलाव तापते बुजुर्गों को जितनी गर्मी अग्नि देती, उतनी ही मैं भी देता था। लेन देन, दहेज़, भेंट और ओढ़ावनी में मैं ही काम आता था। रेयाण की रंगत का भी मैं एक कारण होता था। जितना मारवाड़ की और किसी भी रीत का इतिहास है उतना ही मेरा भी है। और जिस तरह आज रीत रिवाज़ और परंपराओं का ह्रास हो रहा है, मेरा भी यही हाल है।” 

सारी भूमिका बांधने के बाद गड़ीसर झील के पास लगे स्टोर में पट्टू ने खुद को निहारते हुए पर्यटक से कहा “हाँ, मैं पट्टूड़ा हूँ।” 

“मैं सर्दियों में ओढ़ने की चीज़ हूँ। आकार में शॉल से काफी बड़ा। ऊपर कसीदा किया हुआ। मुख्य रूप से लाल रंग का आधार लिए हुए।” 

पर्यटक ने भी कुछ रुचि दिखाई तो आगे बात बढ़ी।

“मनुष्य जब से सभ्य हुआ और ओढ़ना पहनना सीखा तबसे ही धीरे धीरे अलग अलग रूपों में इनके जीवन में मेरा प्रवेश हुआ। और समय के साथ में मैं मारवाड़ के रंग में ही रंग गया। जैसा रंग रंगीलो राजस्थान, वैसा ही मैं भी रंग रंगीला हो गया। प्रकृति ने राजस्थान को कम ही रंग अता किए है। पर यहाँ के लोग बड़े मजबूत और निराश नहीं होने वाले है। इसलिए उन्होंने अपने ही पुरुषार्थ से यहाँ के मरुस्थल में इतने रंग भर दिए कि ईश्वर भी अचंभित होता होगा। परिधान,भोजन से लेकर इमारतों तक में रंग ही रंग नजर आएंगे।” 

“पश्चिमी राजस्थान के सीमा से लगते धनाऊ,सेड़वा और भूनिया आदि गाँवों के मेघवाल समाज के लोगों ने बड़ी लगन, परिश्रम और प्रेम से बुनकर मुझे घर घर पहुंचाया। पहले यहाँ की स्थानीय भेड़ की ऊन से ही मुझे बुना जाता था। तब लोग भी कठोर थे तो देसी ऊन की कठोरता उन्हें उतनी अखरती नहीं थी। आजकल के महिला तो क्या पुरुष को भी वैसा पट्टू ओढ़ा दिया जाए तो उसकी चमड़ी छिल जाएगी। सच कहूँ तब लोग बड़े मजबूत होते थे। इसका एक उदाहरण मैने खूब सुना है कि ‘एक बार एक अधेड़ आयु वाले व्यक्ति अपनी ढाणी से कुछ कोस दूर अपने रिश्तेदार के यहाँ जाने को पैदल घर से निकले। तब इतने साधन कहाँ थे। रोज़ मीलों का सफ़र दिनचर्या का हिस्सा था। उन लोगों के हाथ ही वज्र जैसे होते थे फिर पांवों का कहना ही क्या ! ऊपर से सर्दियां भी थी तो एड़ियों में गहरी दरारें पड़ी हुई, और उन दरारों में रेत मिट्टी आदि न जाने क्या क्या भर आया था। तो राह चलते एक साँप ने उन्हें एड़ी में काट खाया। वो अपनी मस्ती में चलते रहे। शाम को जब रिश्तेदारों के यहाँ पहुंचे तो उन्होंने उनके पाँव के पीछे लटकती हुई कोई चीज़ देखकर पूछा कि, ये क्या हैं? उनकी भी नज़र तब ही गई कि अरे! ये तो सांप मरा हुआ लटक रहा है। मरी हुई मोटी चमड़ी में बेचारे सांप के दांत कहां तक घाव करते।’

दक्षिण भारत से आए यात्री के हाव भाव देखने लायक थे। चाय आ गई थी। सो चाय की चुस्कियों के साथ बात आगे बढ़ती है।

“तो मरुस्थल के हालातों से जूझते ऐसे मजबूत लोग थे इसलिए मेरा मजबूत रूप उन्हें सुहाता था। एक व्यक्ति पूरा जीवन एक ही पट्टू में निकाल देता था। व्यक्ति और पट्टू की एक ही पहचान हो जाती थी। धागों से कुछ गांठे बांध लेते या कुछ आड़े टेढ़े निशान बना देते कि कभी ज्यादा लोगों में भी गुम न हो जाए।” 

“स्थानीय बुनकर पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं। भेड़ों से ऊन उतारना, उसे कातना, उसका पाण करना (हल्का कड़प), फिर करघे पर कई कई दिन तक बुनाई करना। तब जाकर मैं अपने रूप में आता हूँ। ये काम किसी साधना जितना ही दुष्कर है।” 

यात्री ने पट्टू से पूछा कि “तुम्हे बनाने में कितने लोग और समय लगता है ?” 

पट्टूड़ा ने कहा कि ” बुनकर ऊन तो कताई की हुई ही लाते हैं। उसके बाद इसका पान करने के दौरान गांव के दस बारह लोगों को बुलाना पड़ता है। पूरे खेत में लोग बिखर जाते है। शाम होने तक ये सिलसिला चलता है तब जाकर महीन धागे व्यवस्थित हो पाते है जिनसे आगे बुनाई का काम किया जा सके। फिर पूरा परिवार बारी बारी बुनता है तब जाकर चार पांच दिन में एक पट्टू तैयार होता है।”

यात्री ने जिज्ञासापूर्वक आगे पूछा ” आज तो तकनीक का युग है। देश दुनिया में इतनी मशीनें आ गई हैं। फिर तुम्हारी बुनाई अब भी इतनी मुश्किल क्यों बनी हुई है? 

पट्टू बोला ” ठीक कहते हो तुम। कुछ काम मशीनों से हो सकता है पर जो मुझ पर ये सुंदर कारीगरी देख रहे हो यह तो बुनकर के हाथों के हुनर से ही संभव है। अब तक हमारे यहाँ तो ऐसा कोई आविष्कार हुआ नहीं जो इसे इतनी ही नफासत से कर सके।” 

पर्यटक ने मुझे छूते हुए कहा ” तुम तो कहते थे तुम बड़े कठोर हो पर छूने पर बड़े गर्म और मुलायम मालूम पड़ते हो ” 

पट्टू मुस्कुराया और बोला ” ठीक बात है। पहले कठोर ही हुआ करता था जब देसी भेड़ की ऊन से बनाया जाता था। आजकल ऑस्ट्रेलिया की मेरिनो भेड़ की ऊन काम में ली जाती है जो कि बहुत ही गरम और मुलायम होती है। ऑस्ट्रेलिया से जैसलमेर और बाड़मेर का सफर फिर यहां से वापस संसार के अनेक देशों का सफर। यह मुझे अंतरराष्ट्रीय भी बना देता है।” 

पर्यटक बोला ” फिर तो तुम्हारी कीमत बड़ी भारी हो जाती होगी “

पट्टूड़ा कुछ चिंतित सा बोला, “यही तो कारण है कि आज मेरा वो स्थान नहीं रहा जो कभी हुआ करता था। एक तो मेरिनो ऊन महंगी आती है। फिर चार पांच दिन तक एक व्यक्ति लगकर इन्हें बनाता है। सामान्य मजदूरी भी माने तो भी मेरी कीमत काफी अधिक हो जाती है। मुझे बुनने वाले को तो बस मजदूरी ही मिल पाती है बाकी तो जैसे हर धंधे में होता है वैसा यहां भी है। बिचौलिए ही सब कमाते है। यही कारण है कि बुनकर का काम करने वाले समाज और परिवार भी मुझसे दूरी बनाने लगे है। समय और श्रम अधिक लगता है जबकि मुनाफा उतना नहीं मिलता।”

पर्यटक भी कुछ उदास हो गया। फिर कुछ सोचकर बोला कि “तुम इस क्षेत्र की पहचान हो। क्या सरकार तुम्हारें संरक्षण को लेकर कोई प्रयास नहीं करती ?”

पट्टू इस बार अपना गम छिपाते हुए बोला ” देखो मित्र, सत्ता या सरकार का अपना स्वभाव होता है। सत्ता बनी कैसे रहे यही एक विचार उनके केंद्र में रहता है, बाकी सब औपचारिकता होती है। पहले की तरह नहीं है जब हर प्रकार की कला जैसे संगीत, स्थापत्य, चित्र, साहित्य, हस्तशिल्प, आभूषण, मूर्ति आदि को संरक्षण दिया जाता था। आज भी लोन आदि की सुविधा है, दस लाख से एक करोड़ तक का लोन मिल सकता है। परन्तु इसकी औपचारिकता काफी अधिक है और मुझे बनाने वाले ग्रामीण इसमें उलझ कर रह जाते है। इसलिए वो इसका लाभ नहीं ले पाते। पुरस्कार भी दिए जाते है। जिला से लेकर राज्य और केंद्र स्तर तक। हथकरघा क्षेत्र का सबसे बड़ा पुरस्कार है ‘ संत कबीर पुरस्कार’। धनाऊ के तोगाराम मेघवाल को यह पुरस्कार 2017 में मिला था। तब मुझे बड़ी खुशी है थी। आज तोगाराम इस कला के शिक्षक है और देशभर में जहां भी हस्तशिल्प के मेले लगते हैं, सरकार की तरफ से जाते हैं और लोगों को शिक्षित करते है। उन्होंने इस क्षेत्र में ही 100 से अधिक लोगों को यह कला सिखाई होगी।”

पर्यटक कहने लगा कि सब अच्छी चीजों के साथ ऐसा क्यों होता है?

पट्टूड़ा ने कहा ” इसे युग का प्रभाव ही जानो मित्र ! मेरी ही तरह राजस्थान की जो पहचान है राजस्थान का राजकीय पशु ऊंट, उसकी भी यही दशा है। सरकारी संरक्षण के बावजूद संख्या घट रही है। देसी खाना कितना स्वाद और पौष्टिक होता है, फिर भी लोग इससे दूर हो रहे है। पता नहीं ये दुनिया कहाँ जाएगी ।”

पर्यटक पट्टू को लेकर कैश काउंटर की तरफ जाता है और पैसे देकर पट्टू अपने बैग में रखते हुए मन ही मन विचार करता है कि और कोई न सही मैं तुम्हे बड़े अच्छे से रखूंगा और पूरे परिवार को तुम्हारी कहानी कहूंगा। 

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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