Monday, April 13, 2026
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पुस्तक समीक्षा: स्मृति का शिल्प और एक ‘पालतू बोहेमियन’ का विस्मय

प्रभात रंजन द्वारा लिखित- ‘ पालतू बोहेमियन मनोहर श्याम जोशी एक याद’ किताब मनोहर श्याम जोशी के व्यक्तित्व, लेखन और अंत:संघर्षों को जिस पारदर्शिता से सामने लाती है, वह इसे साधारण स्मरण-लेखन से अलग करती है और एक गंभीर साहित्यिक दस्तावेज़ बना देती है। प्रस्तुत समीक्षा इस कृति की संवेदनात्मक गहराइयों, वैचारिक विस्तार और स्मृति के शिल्प को परखने का एक सजग प्रयास है।
स्मृति, आत्मीयता और साहित्यिक दृष्टि के त्रिकोण पर खड़ी ‘पालतू बोहेमियन…’ किसी लेखक के लिए, किसी लेखक के द्वारा लिखा गया संस्मरण मात्र नहीं, बल्कि उस पूरे रचनात्मक समय की पुनर्रचना जैसा है।

साहित्य में समय का पैमाना स्मृतियों की सघनता तय करती है। प्रभात रंजन जी की किताब पालतू बोहेमियन को पढ़ना मेरे लिए अपनी ही यादों के किसी पुराने घाट पर लौटने जैसा रहा. यह कृति महज़ एक संस्मरण नहीं है। यह हिंदी के शिखर पुरुष मनोहर श्याम जोशी के बहाने एक समय और समाज की साफ़-सुथरी पहचान है। जोशी जी ने अपने उपन्यासों ‘कुरु कुरु स्वाहा’ से लेकर ‘कसप’ और ‘क्याप’ तक, और ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’ व ‘कक्काजी कहिन’ जैसे कालजयी धारावाहिकों के ज़रिए जिस दुनिया की रचना की, वह हमारे सामूहिक मानस का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

प्रभात रंजन ने 127 पृष्ठों और 11 अध्यायों में उनके जिस व्यक्तित्व को सहेजा है, वह बेहद आत्मीय और गहरा है। यह किताब साल 2019 में राजकमल प्रकाशन से आई थी, लेकिन इसे पढ़ते हुए लगता है जैसे यह किसी कालखंड की सीमाओं में बँधी नहीं है। प्रभात जी मेरे पड़ोसी गाँव से हैं और हमारी मातृभाषा भी मैथिली है, पर यह किताब उस आंचलिक आत्मीयता से कहीं आगे बढ़कर एक ज़रूरी और वैश्विक साहित्यिक संवाद रचती है।

इस किताब को पढ़ना मेरे लिए निजी स्मृतियों के एक अनमिट संचयन को खोलने जैसा था। दिल्ली के ‘अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी’ वाले हिस्से ने मुझे और मेरे छोटे भाई अतुल को के.जी. मार्ग के उन सुनहरे दिनों की याद दिला दी। हम दोनों ब्रिटिश काउंसिल और अमेरिकन सेंटर लाइब्रेरी के सदस्य थे। वहाँ घंटों बैठकर ऑस्कर विजेता फ़िल्में देखना और साहित्य के उस धीमे, गरिमापूर्ण माहौल में साँस लेना आज भी मन के किसी गोपन कोने में सुरक्षित है। याद आता है वहीं विलियम डेलरिंपल से मिलना, जब उनके बेटे सैम डेलरिंपल महज़ एक छोटे बच्चे थे। वही सैम जो आज स्वयं एक स्थापित लेखक हैं। उन इलाकों की सड़कों पर मेरा पैदल चलना बाद के वर्षों में भी जारी रहा, जब मैं पास के ही एचएसबीसी (HSBC) बैंक में कार्यरत था। प्रभात जी की किताब पढ़ते हुए वे तमाम रास्ते और चेहरे फिर से मन में उजास की तरह जाग उठे हैं।

सुपरिचित विद्वान पुष्पेश पंत ने इस पुस्तक की लंबी और विचारोत्तेजक भूमिका में जोशी जी के साथ अपने संबंधों और प्रभात जी के लेखन पर जो विस्तार से लिखा है, वह इस कृति की गरिमा को द्विगुणित कर देता है। प्रभात रंजन की भाषा शैली में एक ऐसी सहजता और आत्मीय लयात्मकता है, जो पाठक को सीधे उस दृश्य का हिस्सा बना देती है। वास्तव में यह किताब मनोहर श्याम जोशी के जीवन के उन दुर्लभ और दिलचस्प संस्मरणों (Anecdotes) से भरी है, जो हमें एक महान लेखक के भीतर छिपे उस ‘पालतू’ पर ‘बोहेमियन’ इंसान से मिलाते हैं।

पुष्पेश पंत की भूमिका को पढ़ते हुए यह अहसास और गहरा होता है कि हिंदी के साहित्यिक संसार में मनोहर श्याम जोशी जैसी ‘स्वीकार्यता’ विरल है। वे उन गिने-चुने लेखकों में थे, जिनकी रचनाशीलता आम पाठक की उत्सुकता और मर्मज्ञ आलोचक की पैनी दृष्टि, दोनों को एक साथ तृप्त करती थी। जोशी जी की सबसे बड़ी ताक़त उनका किसी वैचारिक खांचे में न बँधना था। एक ऐसे समय में जब लेखक के पैर अक्सर किसी न किसी विचारधारा की बेड़ी में जकड़े होते थे, जोशी जी अपनी सर्जनात्मक स्वतंत्रता के साथ उस पार खड़े दिखते थे। वे परंपरा और आधुनिकता के बीच किसी द्वंद्व की तरह नहीं, बल्कि एक सहज सेतु की तरह उपस्थित रहे।

साल 2020 में मुझे इस पुस्तक पर एक ऑनलाइन सत्र के संयोजन का अवसर मिला था। वहाँ प्रभात जी और चर्चित लेखक-पत्रकार आशुतोष भारद्वाज के बीच के संवाद ने जोशी जी के जीवन के कई अनछुए कोनों को बहुत पारदर्शिता के साथ सामने रखा। उस संवाद में यह बात उभरकर आई थी कि जोशी जी के यहाँ ‘विद्वत्ता’ कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं थी, बल्कि वह उनकी साँसों में रची-बसी थी।

प्रभात जी ने न केवल जोशी जी के लेखन पर अपना शोध-कार्य बखूबी किया, बल्कि उनके साथ बिताए गए समय को इस संस्मरण की शक्ल देकर एक बड़ी साहित्यिक ज़िम्मेदारी निभाई है। ‘किस्सागो से पहली मुलाकात का किस्सा’ अध्याय में प्रभात जी लिखते हैं कि उस ज़माने में जोशी जी से मिलना आसान नहीं था। बिना समय लिए उनके पास जाने से उनके कोपभाजन बनने का खतरा रहता था। लेकिन उदय प्रकाश जी के ज़रिए शुरू हुआ यह सिलसिला आगे चलकर एक ऐसी आत्मीयता में बदला कि प्रभात जी उनके निजी और बौद्धिक जीवन के सबसे करीबी गवाह बन गए।

वास्तव में, ‘पालतू बोहेमियन’ प्रभात रंजन को हिंदी के एक स्थापित लेखक के रूप में प्रतिष्ठित करने में एक आधार-स्तंभ की तरह खड़ी होती है। यह पुस्तक प्रभात जी की उस गद्य-शक्ति का उद्घोष है जो आलोचना की सूक्ष्मता और कथाकार की तरलता को एक साथ साधती है। इस कृति ने यह सिद्ध किया है कि प्रभात जी के पास वह दृष्टि है जो किसी कद्दावर व्यक्तित्व के प्रभामंडल से दबे बिना, उसकी मानवीय गरिमा और बौद्धिक जटिलता को पूरी पारदर्शिता के साथ कागज़ पर उतार सकती है। मनोहर श्याम जोशी जैसे बहुआयामी व्यक्ति पर इस तरह का अधिकारपूर्ण लेखन ही उन्हें समकालीन हिंदी गद्य के मुख्य विमर्श में एक अनिवार्य नाम के रूप में स्थापित कर देता है।

जोशी जी के रचना-संसार का गणित बड़ा अनूठा और विस्मयकारी है। महज़ 21 वर्ष की कच्ची उम्र में, जब लोग राहें तलाश रहे होते हैं, वे पूर्णतः ‘मसिजीवी’ हो चुके थे। यानी कलम ही उनकी जीविका और जीवन बन चुकी थी। पर विडंबना और धैर्य का सुंदर संयोग देखिए कि दशकों तक पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय रहने के बावजूद, उनका पहला उपन्यास उनके जीवन के 47वें वर्ष की परिपक्वता में प्रकट हुआ। यह ठहराव ही शायद उनके गद्य को वह सघनता देता है जो आज के त्वरित दौर में दुर्लभ है. तकनीक को लेकर भी उनकी दृष्टि किसी ऋषि की तरह भविष्यद्रष्टा थी; उन्होंने बहुत पहले ही यह देख लिया था कि आने वाली तकनीक हिंदी को वैचारिक जकड़न और पुराने आग्रहों से आज़ाद कर एक नई तरलता प्रदान करेगी।

प्रभात रंजन ने पुस्तक में जोशी जी के जिस ‘शब्दकोश प्रेम’ का ज़िक्र किया है, वह आज के लेखकों के लिए एक बुनियादी सबक़ की तरह है। जोशी जी का वह प्रसंग कि उन्होंने अज्ञेय जी से कोश पढ़ना सीखा, भाषा के प्रति उनकी पवित्रता को दर्शाता है। उनके लिए शब्दकोश केवल अर्थ ढूँढने का कोई यांत्रिक साधन नहीं था, बल्कि वह शब्दों से परिचय और उनके संस्कार सीखने की पाठशाला थी। वे मानते थे कि भाषा लेखक का ‘मूलधन’ है, जिसे शब्दकोश के ज़रिए संचित किया जाना चाहिए। आज की पीढ़ी के लिए, जो भाषा को महज़ एक सुविधा या ‘सूद’ की तरह बरतती है, जोशी जी का यह अनुशासन याद दिलाता है कि बिना शब्दों की जड़ों में उतरे, कोई भी लेखन दीर्घायु नहीं हो सकता।

जोशी जी ने पत्रकारिता, संस्मरण, कहानी और उपन्यास के साथ-साथ कविताएँ भी लिखीं। टीवी धारावाहिकों के पीछे के उनके श्रम और उनके ‘क्रिएटिंग प्रोसेस’ को प्रभात जी ने जिस तरह सहेजा है, वह काबिले गौर है। ‘कसप’ की बेबी और डी डी की प्रेम कहानी हो या ‘हम लोग’ का वह मध्यमवर्गीय यथार्थ, प्रभात जी ने उन सबको जोशी जी के व्यक्तित्व की परछाइयों के रूप में देखा है। इस किताब के कई किस्से, जैसे जोशी जी का अपने ‘चेलों’ के साथ व्यवहार और उनकी हाज़िरजवाबी, पाठक को हँसाते भी हैं और सोचने पर विवश भी करते हैं।

प्रभात रंजन ने पुस्तक में मनोहर श्याम जोशी के उन गहरे बौद्धिक संबंधों और आत्मीय श्रद्धाओं का भी बड़ी पारदर्शिता से उल्लेख किया है, जो उनके व्यक्तित्व के कम चर्चित किंतु अनिवार्य पक्ष थे। जोशी जी के मन में वागीश शुक्ल की विद्वत्ता के प्रति एक अगाध सम्मान था; वे उन्हें एक ऐसा आधिकारिक विद्वान मानते थे जिनकी मेधा के आगे वे नतशिर रहते थे। भारतीय साहित्य और आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह के प्रति भी उनकी श्रद्धा किसी से छिपी नहीं थी; प्रभात जी के अनुसार, जोशी जी उनके विषय में सदैव एक खास आदर के साथ बात करते थे। यही आत्मीयता अज्ञेय और निर्मल वर्मा के लेखन के प्रति भी थी, जिनके शब्दों और संवेदनाओं के वे अनन्य प्रेमी थे। जोशी जी का यह आदर-भाव दर्शाता है कि वे स्वयं एक विशाल वटवृक्ष होकर भी अपनी जड़ों और समकालीन मेधा के प्रति कितने विनम्र और सचेत थे।

जोशी जी के भौगोलिक और सांस्कृतिक सरोकार भी कम दिलचस्प नहीं हैं। अजमेर की धरती पर जन्मे जोशी जी का जीवन कई पड़ावों और शहरों से होकर गुज़रा, और शायद यही कारण था कि वे पहाड़ (कुमाऊँ) और राजस्थान, दोनों को ही अपना घर मानते थे। उनके भीतर एक गहरी टीस और योजना मरवाड़ी समाज के इतिहास और उनके जीवन-संघर्ष पर लिखने की भी थी, जिसके लिए उन्होंने काफी शोध भी किया था। हालाँकि, किंचित कारणों से वह महत्त्वाकांक्षी योजना मूर्त रूप न ले सकी और अधूरी रह गई। प्रभात जी ने इन तमाम अनछुए प्रसंगों को बड़ी कुशलता से किताब में दर्ज़ किया है, जो पाठक को जोशी जी के एक ऐसे ‘अनदेखे’ संसार से मिलाते हैं जहाँ स्मृतियाँ और अधूरी योजनाएँ एक साथ जीवंत हो उठती हैं।

मेरा यह विनम्र सुझाव है कि ‘पालतू बोहेमियन’ ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए। हिंदी में ‘साहित्यिक संस्मरण’ की लुप्त होती परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए हमें ऐसी किताबों को तलाश कर पढ़ना होगा।

यह किताब हमें बताती है कि एक बड़ा रचनाकार केवल अपनी भारी-भरकम किताबों के साथ-साथ उन छोटे किस्सों और अनौपचारिक मुलाक़ातों में भी बचा रहता है, जिन्हें प्रभात जी ने बड़ी कुशलता और ठहरे हुए प्रेम के साथ यहाँ दर्ज किया है।

यह भी पढ़ें- पुस्तक समीक्षाः टूटते-बिखरते समय और समाज की कहानियां

प्रभात जी की यह पारदर्शी दृष्टि हमें जोशी जी के उस ‘तिलिस्म’ के भीतर ले जाती है, जहाँ से बाहर निकलना किसी भी सहृदय पाठक के लिए लगभग असंभव है। यह केवल एक व्यक्ति की याद नहीं, बल्कि हमारी अपनी बौद्धिक जड़ों की तलाश है। जो लोग साहित्य में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह किताब एक अनिवार्य पाठ है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि कैसे अपनी स्मृतियों को ‘साहित्य’ में बदला जाता है और कैसे एक ‘बोहेमियन’ होकर भी अपनी परंपरा के प्रति ‘पालतू’ बना रहा जा सकता है।

पुस्तकः पालतू बोहेमियन, मनोहर श्याम जोशी एक याद
लेखकः प्रभात रंजन
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
कीमत: रु.150/-

आशुतोष कुमार ठाकुर
आशुतोष कुमार ठाकुर
आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं।
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