बरसात के बाद की सुबह थी। पहाड़ों पर फैली धुंध ऐसे उतर आई थी मानो किसी ने सफ़ेद ओढ़नी लपेट दी हो। घाटी में बहती नदी का शोर दूर से सुनाई देता था, बीच-बीच में पक्षियों की चहक उसे और मधुर बना देती। बाँज, बुराँस और देवदार की महक से भरी हवा एक साथ ठंडी और सुगंधित लग रही थी। पहाड़ की पगडंडियों पर ओस की बूँदें जड़ी-जवाहर की तरह चमक रही थीं।
यहीं, इस छोटे-से गाँव मलथूली में संजीवनी रहती थी। उसके घर के आँगन में हरियाली ऐसे बिखरी रहती जैसे प्रकृति ने उसे खास तौर पर सँवारा हो। आँगन में बुराँस का पेड़ था, जिसकी लाल-लाल कलियाँ हर साल फूलने पर घर को जैसे आग की रोशनी से भर देतीं। संजीवनी को यही पेड़ सबसे प्रिय था। वह अक्सर उसकी छाँव में बैठकर अपनी कॉपी में कुछ लिखती या दूर घाटी की ओर देखती।
उसका पिता, भीमदत्त, पहाड़ों का पुराना किसान था। खेतों में मक्का, झंगोरा और आलू उगाने वाला, और जंगलों से औषधीय जड़ी-बूटियाँ पहचानने वाला। वह मानता था कि “धरती हमारी माँ है, इसे खोद-खोद कर हम अपना ही भविष्य बर्बाद करेंगे।” लेकिन गाँव के नए लड़कों को यह समझ कहाँ थी! उन्हें तो शहर की चकाचौंध और पैसे की भूख ही दिखाई देती थी।
संजीवनी की दादी, बिजुली देवी, गाँव की जानी-पहचानी कथावाचक थीं। लोकगीत, किवदंतियाँ, देवताओं की कथाएँ – सब उन्हें कंठस्थ थीं। हर शाम जब गाँव के बच्चे उनके चारों ओर बैठते तो वह कोई न कोई पहाड़ी लोककथा सुनातीं। कहते हैं, बरसों पहले जब पहाड़ों के देवता नाराज़ हुए तो उन्होंने भूस्खलन से गाँव का आधा हिस्सा बहा दिया था। तभी से लोग जंगलों और नदियों को पवित्र मानते आए थे।
गाँव का जीवन कठिन जरूर था, पर उसमें आत्मीयता और संगीत की कमी नहीं थी। वसंत आते ही बुराँस के फूलों से घाटियाँ लाल हो उठतीं। और गाँव की औरतें मिलकर गीत गातीं—
“फूलदेई-छम्मा देई,
घर-घर बुराँस देई,
जंगल जगे, धरती जगे,
जगमग सब देई…”
इन गीतों की गूंज में संजीवनी को हमेशा लगता कि पहाड़ खुद गा रहे हों।
लेकिन पहाड़ अब वही नहीं रहे थे। जहाँ पहले हिरन और जंगली मुर्गे दिखते, वहाँ अब खनन की मशीनों की आवाज़ें सुनाई देतीं। नदी का पानी जो कभी इतना साफ होता कि तली के पत्थर दिखते, अब मटमैला हो गया था। संजीवनी जब कभी किताबों से सिर उठाकर यह सब देखती तो उसके मन में अजीब-सी टीस उठती।
पिछले साल गाँव के पास वाली पहाड़ी पर बड़ी कंपनी ने खनन शुरू किया था। गाँव के कई नौजवान वहाँ मज़दूरी करने लगे। “पैसा मिलेगा, रोज़गार मिलेगा” – यही उनकी उम्मीद थी। लेकिन भीमदत्त हर बार कहता, “पैसा पेड़ पर नहीं उगता, पर पेड़ काट दिए तो रोटी कहाँ से उगेगी?”
संजीवनी, पिता की इन बातों को सुनते-सुनते बड़ी हुई थी। उसे लगता, जैसे उसके भीतर भी एक पहाड़ बसा है – स्थिर, गहरा, और मौन। वह पहाड़ की हर ध्वनि को सुन सकती थी: बहते पानी की कलकल, हवा का सरसराना, देवदार की चुप्पी। कभी-कभी वह महसूस करती कि ये पेड़, ये झरने, ये घाटियाँ सब जीवित हैं, जैसे वह उनसे संवाद कर सकती हो।
गाँव के बच्चे जब खेलते-खेलते पेड़ों की शाखें तोड़ देते, तो संजीवनी डाँटते हुए कहती, “ये तुम्हारे भाई-बहन हैं, इन्हें मत दुखाओ।” और बच्चे हँसते हुए भाग जाते, पर उसके शब्द किसी के मन में गहराई तक उतर जाते।
गाँव का त्योहार “घुघुतिया” पास आ रहा था। यह त्योहार खासतौर पर जंगलों और नदियों के देवताओं को समर्पित होता था। उस दिन गाँव के लोग एक जगह इकट्ठा होते, नाचते-गाते और पेड़ों की पूजा करते। मकर संक्रांति के इस अवसर पर, लोग तले हुए आटे से चाकू, तलवार आदि जैसी विभिन्न आकृतियों वाली मिठाइयाँ बनाते हैं। स्थानीय लोग कौवों और प्रवासी पक्षियों को दाना खिलाकर उनका स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि वे अगले साल फिर आएँ। बच्चे इन प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करने के लिए गीत भी गाते हैं।बिजुली दादी कहतीं –
“अगर पेड़ सूख गए तो त्योहार भी सूख जाएँगे।
जंगल में गूँज न रही तो गीतों की धुन कहाँ से आएगी?”
लेकिन इस बार त्यौहार की तैयारी में वैसी रौनक नहीं थी। गाँव के कई लोग खनन कंपनी की तरफ हो गए थे। उनका मानना था कि परंपराओं से पेट नहीं भरता।
संजीवनी इस बदलाव को देखती तो कभी रोना आता, कभी गुस्सा। वह चाहती थी कि कोई ऐसा गीत रचे जिसमें पहाड़ की पीड़ा हो, ताकि लोग सुनें और शायद रुक जाएँ। उसने अपनी डायरी में लिखा—
“पहाड़ की साँसें भारी हैं,
नदी का पानी कड़वा है,
फूल खामोश हैं,
क्या सचमुच हम ही उनके हत्यारे हैं?”
बरसात खत्म होते-होते पहाड़ के चेहरे पर हरियाली की बुनावट और गाढ़ी हो जाती। खेतों में मक्का के दाने दूधिया होकर लहराते, सेब के बागानों में डालियाँ झुक पड़तीं। नदी का पानी अब भी उफनता था, लेकिन उसमें एक लय और चमक लौट आती। गाँव की औरतें खेतों में काम करतीं तो उनके गीत घाटियों में गूंजते—
“घाम लग्यो नंदा देवी छैं,
पानी ल्याओ संजुड़ी छैं।”
गीतों में देवताओं का स्मरण, धरती का आभार और जीवन की थकान को हरने की तान होती।
संजीवनी को यह मौसम सबसे प्रिय था। सुबह वह बरामदे में खड़ी होकर देखती तो लगता—मानो पहाड़ ने नए वस्त्र पहन लिए हों। बादलों के टुकड़े पहाड़ की चोटियों पर ऐसे टिके होते, जैसे माँ की गोद में सोए बच्चे।
गाँव में त्योहारों की आहट थी। फूलदेई का समय आने वाला था। बच्चों के झुंड घर-घर जाकर फूल और अन्न बटोरते, और गीत गाते—
“फूलदेई, छम्मा देई,
घर की लक्ष्मी बरसे देई…”
संजीवनी भी बचपन में ऐसे ही दौड़ लगाती रही थी। अब वह बड़ी हो चुकी थी, लेकिन उसके भीतर वह बचपन अभी भी जिंदा था। उसे लगता, इन लोकगीतों में पहाड़ की आत्मा बसी है।
बिजुली दादी अकसर कहा करतीं—
“ये गीत, ये मेले, ये फूलदेई सब हमारी धरती की साँसें हैं। जब तक ये हैं, पहाड़ जिंदा है। जब ये खत्म होंगे, तब समझना कि हमारी आत्मा भी उजड़ गई।”
लेकिन गाँव के युवाओं में एक बेचैनी थी। कुछ लड़के शहरों से लौटते तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती। वे कहते—
“क्या रखा है इन खेतों में? दो महीने की मेहनत और अन्न आधा। शहर में काम है, पैसा है, सुख है।”
संजीवनी को यह सुनकर अजीब लगता। वह सोचती—सुख क्या सिर्फ पैसों से नापा जा सकता है? क्या इन पहाड़ों की हवा, पानी, गीत, जंगल की चिड़ियों की चहचहाहट से बड़ा सुख कहीं और है?
इन्हीं दिनों गाँव के पास ही एक ठेकेदार ने पत्थर खनन का काम शुरू कर दिया। पहाड़ के पेट में छेद कर-करके मशीनें गरजतीं। धूल उड़कर खेतों और घरों तक पहुँचने लगी। संजीवनी ने पहली बार महसूस किया कि पहाड़ की चुप्पी टूटी है।
पिता भी चिंता में रहते।
“ये खनन धीरे-धीरे हमारी जमीन, हमारा पानी सब सोख लेगा। लेकिन हम विरोध करें तो गाँव के कुछ लोग ही साथ देंगे। बाकी तो नौकरी और पैसों के लालच में चुप रहेंगे।”
गाँव में दो धड़े बनने लगे—
एक तरफ वे लोग जो विकास और रोजगार के नाम पर खनन का समर्थन करते, दूसरी तरफ वे जो मानते कि यह पहाड़ की आत्मा को घायल करने जैसा है।
संजीवनी का मन अकसर पहाड़ के जंगलों में भाग जाता। वहाँ देवदार और बुरांश के पेड़ों के बीच उसे सुकून मिलता। वह बिजुली दादी से सुनी कहानियों को याद करती—
“कभी इन पहाड़ों में देवता रहते थे। पेड़ों पर परियां झूलतीं, नदियों में नागराज खेलते। अगर कोई लालच करता, तो प्रकृति उसे दंड देती।”
उसे लगता, जैसे ये लोककथाएँ चेतावनी हैं, जिनसे लोग अब आँख मूँद रहे हैं।
गाँव में अब हवा थोड़ी बदलने लगी थी। रात को जब मशीनें गड़गड़ातीं तो पहाड़ की खामोशी चीख पड़ती। चिड़ियों के झुंड जो सुबह-सुबह गाँव के ऊपर से गुजरते थे, अब कम हो गए थे। नदी का पानी धुंधला हो चुका था।
संजीवनी अपने मन में यह सब दर्ज करती रहती, जैसे वह कोई अदृश्य डायरी लिख रही हो—प्रकृति की पीड़ा, लोगों की अनदेखी और पहाड़ की थकान।
बरसात की उस रात आसमान जैसे फट पड़ा। पहाड़ की ढलानों से पानी की धाराएँ उमड़-घुमड़कर नीचे उतरने लगीं। बिजली की गड़गड़ाहट, आसमान में फटी हुई रेखाएँ और धरती का थरथराना—गाँव वाले सहम गए।
संजीवनी खिड़की से देख रही थी—बरसाती धाराओं में मिट्टी, पत्थर और पेड़ की जड़ें बह रही थीं। नदी का पानी काला और उफनता हुआ गर्जना कर रहा था।
अचानक खबर आई कि पास वाले गाँव में पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा दरक गया। दो घर मलबे में दब गए। लोग चिल्लाते हुए एक-दूसरे को पुकार रहे थे। गाँव की औरतें सिर पकड़कर रोने लगीं।
संजीवनी के पिता बोले—
“मैंने कहा था, ये खनन पहाड़ की नसें काट देगा। देखो, अब पहाड़ अपनी भाषा में चेतावनी दे रहा है।”
गाँव के कुछ लोग अब भी कहते—
“नहीं-नहीं, यह तो प्राकृतिक आपदा है। पहाड़ तो हमेशा बरसात में ऐसे ही टूटते आए हैं।”
लेकिन संजीवनी को लगता, जैसे पहाड़ खुद बोल रहा हो—
“तुमने मेरी जड़ें खोदीं, मेरी छाती पर मशीनें चलाईं। अब यह मलबा उसी लालच का उत्तर है।”
अगली सुबह गाँव के लोग नदी किनारे जमा हुए। पानी में मरे हुए मछलियों के झुंड तैर रहे थे। बच्चों ने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मृत जीव देखे थे। उनकी आँखों में भय और सवाल था—
“अगर मछलियाँ मर रही हैं तो क्या हम भी जिंदा रह पाएंगे?”
गाँव के बुज़ुर्गों ने भी कहा—
“पहाड़ दुखी है। जब धरती का पेट छलनी हो जाता है तो वह अपनी संतान को दंड देती है।”
इन्हीं दिनों गाँव का फूलदेई पर्व आया। हर घर में सात प्रकार के अनाज बोए गए, धरती की उर्वरता और प्रकृति की कृपा के लिए प्रार्थना की गई। लोग गीत गाने लगे—
“जय हो धरती माता की,
धान-गहना उपजाऊं।”
लेकिन इस बार गीतों की तान में खुशी कम और बेचैनी ज्यादा थी। लोग जानते थे कि धरती माता रूठी हुई है।
संजीवनी ने तय किया कि वह चुप नहीं बैठेगी। उसने गाँव के बच्चों और कुछ युवाओं को इकट्ठा कर एक छोटी टोली बनाई। वे पेड़ लगाते, नदी किनारे साफ-सफाई करते और हर सभा में खनन का विरोध करते।
बिजुली दादी ने उसका माथा चूमते हुए कहा—
“तू सच में इस पहाड़ की बेटी है। याद रख, पहाड़ अपनी संतानों को पुकार रहा है। अगर तुम सब खड़े नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन गीतों, इन त्योहारों और इस हवा को सिर्फ कहानियों में सुनेंगी।”
संजीवनी ने उस रात आकाश की ओर देखा। तारों की टिमटिमाहट मानो उसका साथ दे रही थी। हवा ने उसके चेहरे को छुआ, जैसे पहाड़ ने उसके संकल्प को आशीर्वाद दिया हो।
बरसात थम चुकी थी, लेकिन गाँव की आँखों में जो डर था, वह अभी भी गीला-गीला था। टूटी हुई पगडंडियाँ, बह चुके खेत और सूखी मछलियों की गंध हर ओर पसरी थी।
संजीवनी ने तय किया कि अब गाँव के लोग सिर्फ शोक में डूबे नहीं रहेंगे, बल्कि लड़ेंगे। उसने पंचायत चौक में एक सभा बुलाई।
पहली बार इतने लोग इकट्ठा हुए। बच्चे, औरतें, बुज़ुर्ग और जवान—सब। संजीवनी ने गहरी साँस लेकर कहा—
“हमारे पहाड़ को हमसे छीना जा रहा है। नदी को जहरीला बनाया जा रहा है। यह सिर्फ मिट्टी-पत्थर की बात नहीं है, यह हमारी साँसों की बात है। अगर हम अभी खड़े नहीं हुए, तो हमारे गीत, हमारे त्योहार, हमारी कहानियाँ सब मर जाएँगे।”
सभा में कुछ देर खामोशी रही। फिर बिजुली दादी उठीं। उनकी आँखों में उम्र का धुँधलका था, लेकिन आवाज़ में पहाड़ की गूँज—
“बेटी सही कह रही है। जब तक हम एक नहीं होंगे, तब तक पहाड़ को बचा नहीं पाएँगे। याद करो हमारे गीत—
‘नदी बहे, खेत लहराए,
धरती मुस्काए, जन बसाए।’
अगर नदी नहीं बहेगी तो धरती कैसे मुस्काएगी?”
गाँव की औरतें सबसे पहले आगे बढ़ीं। उन्होंने कहा—
“हम पेड़ लगाएँगी। बच्चों को सिखाएँगी कि मिट्टी और बीज का रिश्ता खून से भी गहरा होता है।”
युवकों ने तय किया—
“खनन मशीनों का विरोध करेंगे। अगर ज़रूरत पड़ी तो धरने पर बैठेंगे।”
सभा का समापन एक लोकगीत से हुआ। ढोल-दमाऊँ बजे, और सबने मिलकर गाया—
“धरती हमारी जननी है,
हम उसकी संतान हैं।
उसकी रक्षा में अडिग रहें,
हम पहाड़ के प्राण हैं।”
यह गीत सुनते-सुनते सबकी आँखों में आँसू थे, पर उन आँसुओं में डर नहीं, एक संकल्प था।
अगले महीनों में गाँव बदलने लगा। बच्चे हर सुबह नदी किनारे साफ-सफाई करते। महिलाएँ खेतों में काम के बाद शाम को पौधे लगातीं। युवा पहाड़ी ढलानों पर दीवारें बनाते ताकि बरसात का पानी मिट्टी को बहाकर न ले जाए।
धीरे-धीरे गाँव के त्योहारों में फिर से रौनक लौटी। हिलजात्रा पर जब नकली हल-बैल के साथ नाच-गान हुआ, तो लोग समझ गए कि परंपरा तभी जीवित है जब धरती जीवित है।
सरकार और कंपनियों पर भी दबाव पड़ा। गाँव के सामूहिक विरोध ने मीडिया का ध्यान खींचा। अखबारों में लिखा जाने लगा—
“छोटा पहाड़ी गाँव बड़े आंदोलन की आवाज़ बना।”
एक शाम संजीवनी अकेली पहाड़ी चोटी पर खड़ी थी। नीचे गाँव के घरों की बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं, और दूर-दूर तक फैले जंगल चाँदनी में नहाए थे। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसमें थकान नहीं, एक नई ताजगी थी।
उसने आँखें मूँदकर महसूस किया—
पहाड़ साँस ले रहा है।
नदी का पानी धीरे-धीरे स्वच्छ हो रहा है।
पक्षियों की चहचहाहट लौट रही है।
उसे लगा, जैसे पहाड़ ने उसके कानों में फुसफुसाकर कहा हो—
“तुमने मुझे बचाया है। अब मैं तुम्हारी पीढ़ियों को बचाऊँगा।”
संजीवनी मुस्कुराई। उसकी आँखों से आँसू ढलक गए, लेकिन वे आँसू किसी हार के नहीं, एक विजय के थे।


सकारात्मक परिवर्तन की ओर उम्मीद की एक किरण है यह कहानी ! प्रकृति के संरक्षण में गीत, पर्व और परंपरा की अनमोल भूमिका है । यह बात इतनी कम उम्र में समझ लेना बहुत बड़ी बात है । कथ्य जितना सामयिक है, शिल्प उतना ही पारंपरिक और रोचक है ।
भव्या को खूब बधाई और शुभ कामनाएँ !
भव्या की कहानी को इतने संवेदनशील और गहरे ढंग से पढ़ने के लिए आपका हृदय से आभार। उसके प्रयास को आपने जिस आत्मीयता और समझ के साथ सराहा, वह हमारे लिए अत्यंत मूल्यवान है। भव्या सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय नहीं है, इसलिए उसकी ओर से, एक माँ होने के नाते, मैं आपको धन्यवाद देती हूँ। आपकी शुभकामनाएँ और सकारात्मक दृष्टि उसके लिए निश्चित ही प्रेरणास्रोत बनेंगी।
सादर,
भव्या की माँ