वॉशिंगटनः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आव्रजन नीति और ईरान युद्ध को लेकर अमेरिका में विरोध तेज होता जा रहा है। इसी क्रम में ‘नो किंग्स’ (No Kings) अभियान के तहत पूरे अमेरिका में लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। न्यूयॉर्क से लेकर डलास तक लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं। इन प्रदर्शनों का असर अमेरिका से बाहर यूरोप के कई देशों तक भी देखने को मिला।
आयोजकों के मुताबिक, यह एक सुनियोजित राष्ट्रीय अभियान था जिसके तहत अमेरिका में 3,000 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। पिछले साल जून और अक्टूबर की रैलियों में क्रमशः 50 लाख और 70 लाख लोगों ने हिस्सा लिया था, वहीं इस बार भागीदारी का लक्ष्य 90 लाख तक पहुंचने का था।
मिनेसोटा के सेंट पॉल स्थित स्टेट कैपिटल में सबसे बड़ी रैली हुई, जहां अनुमानित दो लाख से अधिक लोग जुटे। यहां प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीति और ईरान युद्ध में उसकी भूमिका के खिलाफ आवाज उठाई।
No Kings: ट्रंप को कड़ा संदेश
इस मुख्य कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियां भी शामिल हुईं। गवर्नर टिम वॉल्ज ने रैली को संबोधित करते हुए “अमेरिका का दिल और आत्मा” बताया, जबकि सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने कड़ा संदेश देते हुए कहा, “2026 में हमारा संदेश स्पष्ट है- अब और कोई राजा नहीं। हम इस देश को तानाशाही की ओर नहीं जाने देंगे।”
इस दौरान मशहूर अमेरिकी गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने यहां “स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस” गीत गाकर समां बांध दिया। यह गीत उन्होंने संघीय एजेंटों की गोलीबारी में मारे गए दो अमेरिकी नागरिकों- रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की याद में लिखा था।
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प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे दिग्गज अभिनेता रबर्ट डी नीरो ने मैनहट्टन में उमड़ी भारी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि अमेरिकी इतिहास में ट्रंप से पहले किसी भी राष्ट्रपति ने हमारी स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए ऐसा अस्तित्वगत खतरा (Existential Threat) पैदा नहीं किया है।
डलास और लॉस एंजिल्स में झड़पें
न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन, लॉस एंजिल्स, शिकागो और सैन फ्रांसिस्को सहित कई बड़े शहरों में लाखों लोगों ने अपना विरोध जताया। कहीं लोग मुख्य सड़कों पर कतार बनाकर खड़े हुए तो कहीं रैलियां और मार्च निकाले गए।
डलास में स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब ‘नो किंग्स’ (No Kings) प्रदर्शनकारियों और धुर दक्षिणपंथी संगठन ‘प्राउड बॉयज’ के पूर्व नेता एनरिक टैरियो के नेतृत्व वाले समर्थकों के बीच झड़प हुई। पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए कई गिरफ्तारियां करनी पड़ीं।
लॉस एंजिल्स में हिंसा की खबरें भी सामने आईं। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग के अनुसार, लगभग 1,000 प्रदर्शनकारियों ने एक संघीय इमारत को घेर लिया, जहाँ दो अधिकारियों पर सीमेंट के ब्लॉक से हमला किया गया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया।
वॉशिंगटन में प्रदर्शनकारी लिंकन मेमोरियल से नेशनल मॉल तक मार्च करते हुए “Put down the crown” और “Regime change begins at home” जैसे नारे लगाते दिखे। वहीं, ह्यूस्टन में प्रदर्शनकारी अमेरिकी संविधान की एक बड़ी प्रतिकृति लेकर निकले, जिसे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रतीक के तौर पर देखा गया। कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और भाषण भी विरोध का हिस्सा रहे।
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‘नो किंग्स’ आंदोलन की गूंज यूरोप में भी सुनाई दी। आयोजकों के अनुसार, एक दर्जन से अधिक देशों में प्रदर्शन हुए। रोम, लंदन और पेरिस में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। लंदन में “नस्लवाद के खिलाफ खड़े हों” और पेरिस में “अति-दक्षिणपंथ को रोकें” के नारों के साथ मानवाधिकार समूहों और अमेरिकी प्रवासियों ने रैलियां निकालीं।
प्रदर्शनकारियों की क्या है मांग?

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे सत्ता के केंद्रीकरण और “राजा जैसी राजनीति” के खिलाफ खड़े हैं। प्रदर्शनकारियों की मांगों में मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण बिंदु शामिल थे। सबसे पहले, उन्होंने ईरान पर अमेरिका और इजराइल द्वारा किए जा रहे हमलों को तत्काल रोकने की मांग की, क्योंकि इस युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।
इसके साथ ही, प्रदर्शनकारियों ने प्रवासियों के खिलाफ चलाए जा रहे दमनकारी अभियानों और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गहरा विरोध जताया।
प्रतिनिधि जॉन लार्सन ने कहा, “अमेरिका में कोई राजा नहीं होता।” सीनेटर क्रिस्टिन गिलिब्रैंड ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार को महंगाई, स्वास्थ्य सेवा और आर्थिक स्थिरता पर ध्यान देना चाहिए, न कि निजी छवि चमकाने पर।
सरकार ने क्या कहा?
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एबिगेल जैक्सन ने इन प्रदर्शनों को “वामपंथी फंडिंग नेटवर्क” की उपज बताया और कहा कि आम जनता का इन्हें कोई समर्थन प्राप्त नहीं है। वहीं, नेशनल रिपब्लिकन कांग्रेसनल कमेटी ने इन रैलियों का समर्थन करने वाले डेमोक्रेटिक नेताओं की कड़ी आलोचना की है।
समिति के प्रवक्ता माइक मारिनेला ने कहा कि “ये अमेरिका से नफरत करने वाली रैलियां हैं, जहां धुर वामपंथियों की हिंसक और विक्षिप्त कल्पनाओं को मंच दिया जा रहा है।”
ट्रंप की गिर रही लोकप्रियता
बता दें कि रॉयटर्स/इप्सोस के एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप की एप्रूवल रेटिंग गिरकर 36% पर आ गई है, जो व्हाइट हाउस में उनकी वापसी के बाद सबसे निचला स्तर है।
आगामी मिड-टर्म चुनावों से पहले ‘नो किंग्स’ आंदोलन को पेन्सिलवेनिया, जॉर्जिया और एरिजोना जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के उपनगरीय इलाकों में भारी जनसमर्थन मिल रहा है। आंदोलन के आयोजकों का दावा है कि लोग अब राजाओं की तरह व्यवहार करने वाले शासन के खिलाफ ‘लोकतंत्र’ और ‘स्वतंत्रता’ की रक्षा के लिए लामबंद हो रहे हैं।
शनिवार के इन प्रदर्शनों का एक बड़ा कारण अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किया जा रहा हमला भी है, जिसे शुरू हुए अब चार हफ्ते हो चुके हैं। वॉशिंगटन में प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने इसे “बेवकूफी भरा युद्ध” करार देते हुए कहा कि अमेरिका को वहां होने की कोई जरूरत नहीं है।

