बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 25 साल के बाद सोमवार को विधान परिषद की सदस्यता त्याग दी। वे राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हो चुके हैं। बिहार से लालू प्रसाद यादव, रामकृपाल यादव और सुशील कुमार मोदी भी इससे पहले चारों सदनों के सदस्य रह चुके हैं।
सौभाग्य की बात रही कि नीतीश कुमार को इस्तीफा देने के लिए विधान परिषद नहीं जाना पड़ा। स्वयं परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह उनके आवास 1, अणे मार्ग गए। इस्तीफा पत्र पहले से तैयार था, जिस पर नीतीश कुमार ने सिर्फ हस्ताक्षर किए।
बिहार की राजनीति में नीतीश जी ने पिछले 25 साल में 10 बार राजभवन में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। नीतीश, जो 1977 और 1980 के विधानसभा चुनाव हार गए थे, 1985 में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए थे।
नीतीश जी, जो कभी पटना में छाजूबाग में स्वजातीय और नालंदा जिले के एक विधायक के बंगले के आउटहाउस में रहते थे, अब राजभवन से सटे 1, अणे मार्ग के विशाल भवन में रहते हैं। पिछले पच्चीस साल से यही उनका आवास है। नीतीश जी, जो कभी पैदल ही फ्रेजर रोड स्थित समाचार पत्रों, न्यूज एजेंसियों और आकाशवाणी केंद्र में अपना प्रेस नोट देने जाते थे, अब बीस गाड़ियों के काफिले के साथ चलते हैं। जो कभी आउटहाउस में रहते थे, उनके लिए राजभवन से लेकर सर्कुलर रोड का आम रास्ता करीब बीस साल पहले ही बंद कर दिया गया था।
नीतीश जी के इंजीनियरिंग कॉलेज के पुराने मित्र याद करते हैं कि उन्हें साइकिल चलाना भी नहीं आता था। गर्दनीबाग में अपने एक मित्र के घर वे अक्सर जाते थे, जहां उनका मित्र साइकिल चलाता और नीतीश आगे के डंडे पर बैठते थे। यह कहानी नीतीश जी ने खुद मुझे सुनाई थी, जब हम लोग उसी मोहल्ले में एक विवाह में अतिथि थे।
नीतीश जी जब समता पार्टी में थे, तब आर्थिक तंगी में रहते थे। फ्रेजर रोड पर उनके जिले के मित्र विजय कृष्ण (पूर्व मंत्री), अरुण सिन्हा और हेमेन्द्र नारायण के साथ पानी टंकी के पास स्थित एक पुरानी चाय की टपरी पर चाय पीते और कचरी खाते थे। कई बार उनके पास पैसे नहीं होते थे, तो उनके मित्र ही भुगतान करते थे।
उनका ससुराल कंकड़बाग कॉलोनी में था। उनके ससुर अभियंता थे। नीतीश जी चार आना किराया देकर शेयर ऑटो-टेंपो से आते-जाते थे। यदि अपने गांव जाते, तो शटल ट्रेन से बख्तियारपुर तक डिब्बे में खड़े होकर ही सफर करते थे, क्योंकि ट्रेन अक्सर भरी रहती थी।
उनके पुराने मित्र वशिष्ठ नारायण सिंह बताते हैं कि वे दिल्ली से नीतीश के लिए कुर्ता-पायजामा लेकर आते थे।
मुझे उनका एक संस्मरण याद है। 1986 में बिहार विधानसभा की एक समिति के साथ वे पत्नी और बेटे निशांत के साथ गुजरात के सोमनाथ और द्वारका की यात्रा पर आए थे। उस समय मैं राजकोट में पदस्थापित था। समिति को शाम आठ बजे राजकोट पहुंचना था, लेकिन वे रात साढ़े बारह बजे पहुंचे। इसके बावजूद रात में गर्म खाना मिला और अच्छा सत्कार हुआ, जिससे वे काफी प्रभावित हुए।

