नई दिल्ली और नोएडा में हाल ही में खुदे हुए गड्ढों में दो युवकों की मृत्यु की खबर दिल दहला देने वाली है। एक युवक अपनी कार सहित एक ऐसे जलभराव वाले गड्ढे में गिर गया, जो पास के निर्माणाधीन फ्लैट परिसर के लिए खोदा गया था, और अगले दिन सुबह वह मृत पाया गया। रोहिणी में जल बोर्ड द्वारा खोदे गए गड्ढे में 26 वर्षीय एक बैंक कर्मचारी की मोटरसाइकिल फिसलकर गिर गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
ऐसी ही प्रकृति की एक घटना लगभग 15 वर्ष पहले भी हुई थी, हालांकि उस मामले में जान बच गई थी। उस समय राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी में तत्कालीन महानिरीक्षक रहे, मध्य प्रदेश कैडर के 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी संजीव कुमार सिंह ने एक युवती की जान बचाई थी। उस अवधि में एनआईए दिल्ली के ओखला क्षेत्र में स्थित एक अस्थायी कार्यालय से काम कर रही थी। संजीव कुमार सिंह का निधन कोरोना काल के दौरान हो गया था।
संजीव कुमार सिंह की पत्नी ज्योति सिंह उस घटना को याद करते हुए कहती हैं, “नई दिल्ली और नोएडा में हुई हालिया घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों की लापरवाही पर मैं स्तब्ध और अत्यंत क्षुब्ध हूं। ऐसी त्रासदियां न तो नई हैं और न ही हाल की, फिर भी समझ नहीं आता कि लगातार आने वाली सरकारें इन मौतों के लिए जिम्मेदार एजेंसियों को उचित दंड कब देंगी, ताकि मानव जीवन का सम्मान हो और उसे महज एक और भुला दी जाने वाली संख्या की तरह न देखा जाए।”
ज्योति सिंह बताती हैं कि 10 सितंबर 2011 को संजीव, जिया सराय, हौज़ खास के पास ममता पंत नाम की एक युवती को डूबने से बचाने में सफल रहे थे। उस समय क्षेत्र किसी कारणवश खोदा गया था और मूसलाधार बारिश के कारण पूरा इलाका जलमग्न हो गया था। लगातार वर्षा से दृश्यता बहुत कम हो गई थी।
वह आगे याद करती हैं, “उस दिन संजीव दफ्तर जाते समय अतिरिक्त सतर्क थे। उनकी आशंका उन्हें किसी संभावित दुर्घटना की चेतावनी दे रही थी। ड्राइवर वाहन चला रहा था और सड़क कीचड़ तथा कचरे से भरे दलदल जैसी हो गई थी, इसलिए गति धीमी रखी गई थी।”
“संजीव ने आगे एक धुंधली आकृति देखी—एक दुबली लड़की, जिसके हाथ में बड़ा काला छाता था। तेज बारिश के कारण बहुत कम लोग बाहर थे। अचानक उन्हें लगा कि लड़की मानो हवा में गायब हो गई है और केवल तैरता हुआ छाता दिखाई दे रहा है।”
स्थिति को भांपते ही वे तुरंत कार से उतरे और उस स्थान की ओर दौड़े, जहां छाता तैर रहा था। उन्होंने गंदे पानी में हाथ डालकर पूरी तरह डूब चुकी लड़की को पकड़ने की कोशिश की। उत्कृष्ट तैराक होने के कारण वे पानी में कूदने को तैयार थे, लेकिन ऐसा करना नहीं पड़ा। वे डूबती हुई लड़की का सिर पकड़ने में सफल रहे, जो किसी तरह खुद को तैरते रखने की कोशिश कर रही थी।
संजीव को उस समय यह पता नहीं था कि जो सड़क पानी से भरी हुई दिखाई दे रही थी, वह वास्तव में बारिश के पानी से भरा एक गहरा खुदा हुआ गड्ढा था। पानी का स्तर सड़क के बराबर था, जिससे गड्ढा पूरी तरह छिप गया था और सामान्य जलभराव का भ्रम पैदा हो रहा था।
बाद में ममता पंत को कई टीवी चैनलों पर अपने उस भयावह अनुभव के बारे में बताने का अवसर मिला।
नई दिल्ली में आधिकारिक स्तर पर यह स्वीकार किया गया है कि अब भी लगभग 3,400 खुले गड्ढे या अधूरे खुदाई स्थल मौजूद हैं। 1978 के बाद ड्रेनेज प्रणाली में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग 44 तथा मुंडका, जनकपुरी और मयूर विहार जैसे क्षेत्रों में अब भी खुले गड्ढों की समस्या सामने आती रही है। पिछले मानसून में गुरुग्राम के कई इलाकों में अंडरपास और सुरंगें पानी से भर गई थीं, जहां सड़क और जमीन का अंतर दिखाई नहीं दे रहा था और अनेक वाहनों में पानी घुस गया था।


अत्यंत दुखद।