केंद्र सरकार देश के करोड़ों कामगारों के लिए श्रम कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। नए लेबर कोड्स के ड्राफ्ट नियम सार्वजनिक कर दिए गए हैं और इन पर केंद्र व राज्य सरकारों, प्लेटफॉर्म कंपनियों, यूनियनों और आम लोगों से सुझाव मांगे गए हैं।
सरकार की योजना है कि 1 अप्रैल 2026 से ये नियम पूरे देश में एक साथ लागू किए जाएं। इन बदलावों का सबसे बड़ा असर गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स पर पड़ेगा, जिन्हें पहली बार औपचारिक तौर पर सोशल सिक्योरिटी का दायरा मिलेगा।
सरकार ने जिन चार लेबर कोड्स को लागू करने का रोडमैप तैयार किया है, उनमें कोड ऑन वेजेस, 2019, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020, कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020 और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020 शामिल हैं। इनका उद्देश्य मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा से जुड़े नियमों को सरल बनाना और पूरे देश में एक समान ढांचा तैयार करना है।
गिग वर्कर्स के लिए पात्रता और नई शर्तें
ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सोशल सिक्योरिटी योजनाओं (बीमा, स्वास्थ्य लाभ, मातृत्व लाभ आदि) का हकदार बनने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। नियमों के मुताबिक, अगर कोई वर्कर एक ही एग्रीगेटर या प्लेटफॉर्म के साथ काम करता है, तो उसे कम से कम 90 दिन का काम पूरा करना होगा। वहीं, अगर वह एक से अधिक एग्रीगेटर्स के साथ जुड़ा है, तो पिछले वित्तीय वर्ष में कुल 120 दिन का काम जरूरी होगा। सरकार का कहना है कि यह सीमा नियमित रूप से जुड़े वर्कर्स तक लाभ पहुंचाने और दुरुपयोग रोकने के संतुलन के लिए तय की गई है।
ड्राफ्ट में ‘एंगेजमेंट’ की परिभाषा भी साफ की गई है। जिस दिन गिग वर्कर ने किसी प्लेटफॉर्म के जरिए थोड़ी भी कमाई की, वह दिन काम का दिन माना जाएगा। अगर एक ही दिन किसी वर्कर ने तीन अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर काम किया, तो उसे तीन दिन का एंगेजमेंट माना जाएगा। कई प्लेटफॉर्म्स पर किए गए काम के दिनों को जोड़कर कुल एंगेजमेंट की गणना होगी। यह प्रावधान उन वर्कर्स के लिए अहम माना जा रहा है, जो एक साथ फूड डिलीवरी, कैब या अन्य डिजिटल सेवाओं से जुड़े ऐप्स पर काम करते हैं।
सोशल सिक्योरिटी के दायरे में कौन-कौन?
नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एग्रीगेटर के साथ सीधे या उसकी सहयोगी, होल्डिंग, सब्सिडियरी कंपनी, एलएलपी या किसी तीसरे पक्ष के जरिए जुड़े वर्कर्स भी सोशल सिक्योरिटी के दायरे में आएंगे। लाभ पाने के लिए गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को केंद्र सरकार के तय पोर्टल पर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। इसी आधार पर जीवन और दिव्यांगता बीमा, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा जैसी योजनाओं की पात्रता तय की जाएगी।
सरकार ई-श्रम पोर्टल के जरिए सभी पात्र असंगठित और गिग वर्कर्स को डिजिटल पहचान पत्र जारी करने की योजना पर काम कर रही है। इसमें वर्कर की फोटो और जरूरी विवरण होंगे। ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, पंजीकृत वर्कर्स को समय-समय पर अपना पता, पेशा, मोबाइल नंबर और कौशल जैसी जानकारी अपडेट करनी होगी। ऐसा न करने पर वे सोशल सिक्योरिटी योजनाओं से वंचित भी हो सकते हैं। वहीं, प्लेटफॉर्म कंपनियों पर वर्कर्स की एंगेजमेंट से जुड़ा सत्यापित डेटा साझा करने की जिम्मेदारी डाली जाएगी।
गौरतलब है कि लेबर विषय केंद्र और राज्यों दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए ड्राफ्ट नियमों पर सुझावों की प्रक्रिया के बाद राज्य सरकारें भी अपने-अपने नियम जारी करेंगी। इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड पर सुझाव देने के लिए 30 दिन का समय रखा गया है, जबकि बाकी तीन कोड्स पर 45 दिन तक राय दी जा सकती है। परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद केंद्र सरकार अंतिम नियम अधिसूचित करेगी और राज्यों व डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर इन्हें लागू किया जाएगा।
केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकार का लक्ष्य मार्च 2026 तक 100 करोड़ कामगारों को सोशल सिक्योरिटी कवर देने का है। फिलहाल यह कवरेज करीब 94 करोड़ तक पहुंच चुकी है। 2015 में जहां केवल 19 प्रतिशत कामगार इस दायरे में थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 64 प्रतिशत से अधिक हो चुका है।
नए लेबर कोड्स के दायरे में कौन होंगे?
नए लेबर कोड्स का असर सिर्फ गिग वर्कर्स तक सीमित नहीं रहेगा। आम कर्मचारियों के लिए भी कई अहम प्रावधान प्रस्तावित हैं। नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य होगा, 40 साल से ऊपर के कर्मचारियों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य जांच का प्रावधान होगा, समान काम के लिए समान वेतन सुनिश्चित किया जाएगा और महिलाओं को सभी शिफ्ट्स में काम करने के समान अवसर देने की बात कही गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल सिक्योरिटी कोड के जरिए गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानून के दायरे में तो पहले ही लाया जा चुका था, लेकिन नियम न होने के कारण लाभ लागू नहीं हो पाए थे। नए ड्राफ्ट नियम उस खालीपन को भरने की कोशिश हैं। हालांकि, इनका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम नियमों में पोर्टेबिलिटी, अंशदान और प्रवर्तन जैसे मुद्दों को कैसे सुलझाया जाता है और हितधारकों की चिंताओं को कितनी जगह मिलती है।

