नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पाठ्यपुस्तक को वापस लेते हुए उसमें शामिल न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर बिना शर्त माफी मांगी है।
एनसीईआरटी ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि हाल ही में प्रकाशित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक “एक्सप्लोरिंग सोसायटीः इंडिया एंड बियॉन्ड” (पार्ट II) में अध्याय-4 “द रोल ऑफ ज्यूडिशियरी इन अवर सोसायटी” शामिल था। इस अध्याय को लेकर उठे विवाद के बाद परिषद के निदेशक और सदस्यों ने बिना शर्त माफी व्यक्त की है।
परिषद ने बताया कि पूरी पुस्तक को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया गया है और फिलहाल यह कहीं भी उपलब्ध नहीं है। एनसीईआरटी ने इस मामले से हुई असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हुए सभी संबंधित पक्षों के सहयोग और समझ के लिए आभार जताया है।

विवाद की जड़: क्या था उस अध्याय में?
दरअसल, इस अध्याय में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था से जुड़े कुछ संवेदनशील मुद्दों का भी उल्लेख किया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों और देश में लंबित मामलों के बड़े बोझ का जिक्र किया गया था।
अध्याय में यह भी कहा गया था कि भारत में पांच करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं। साथ ही देरी के पीछे जजों की कमी, जटिल प्रक्रियाएं और न्यायिक ढांचे से जुड़ी समस्याओं जैसे कारणों का भी उल्लेख किया गया था।
इसी मुद्दे को लेकर मामला अदालत तक पहुंचा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्याय के प्रकाशन और प्रसार पर रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत की ओर से इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई गई और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू किए जाने की खबरें भी सामने आईं।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि ‘बार और बेंच सभी चिंतित हैं। सभी हाई कोर्ट के जज चिंतित हैं। मैं इस मामले को स्वतः संज्ञान में लूंगा। मैं किसी को भी इस संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।’ वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इसे संविधान की मूल संरचना पर हमला बताया। उन्होंने ने कहा, ‘यह पुस्तक संविधान की मूल संरचना के ही विरुद्ध प्रतीत होती है।’
इस विवाद की वजह से एक संवैधानिक बहस भी उठा। एक तरह जहां न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत विश्वास को बनाए रखने का सवाल है, वहीं दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय न्यायशास्त्र में किसी सामग्री के प्रकाशन से पहले उस पर पूर्ण प्रतिबंध यानी “प्रायर रेस्ट्रेंट” को आम तौर पर संदेह की दृष्टि से देखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई पुराने फैसलों में कहा है कि अभिव्यक्ति पर रोक तभी लगाई जानी चाहिए जब उससे गंभीर और निकट भविष्य में खतरा पैदा होने की आशंका हो।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि किसी शैक्षणिक सामग्री में असंतुलन या तथ्यात्मक कमी है तो उसका समाधान संशोधन या स्पष्टीकरण हो सकता है, न कि पूरी सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध।
हालांकि दूसरी ओर यह तर्क भी दिया जा रहा है कि न्यायपालिका के खिलाफ गंभीर आरोपों को स्कूल की किताबों में शामिल करने से कम उम्र के छात्रों के बीच अदालतों की छवि पर असर पड़ सकता है, इसलिए इस तरह के विषयों को बेहद सावधानी और संतुलन के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

