नई दिल्ली:राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को शामिल किया है। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ शीर्षक वाली पुस्तक के प्राध्यापक अध्याय “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” में पहली बार ‘न्याय में देरी न्याय से वंचित होने के समान है’ और ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे अलग-अलग खंड जोड़े गए हैं। पहले की किताबों में अदालतों की संरचना और भूमिका तक ही चर्चा सीमित थी, लेकिन अब न्याय व्यवस्था की जबड़े पर भी स्पष्ट टिप्पणी की गई है।
‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ खंड में बताया गया है कि जजों के लिए आचार संहिता होती है, जो अदालत के भीतर और बाहर उनके आचरण को नियंत्रित करती है। किताब में यह भी उल्लेख है कि यदि कोई जज इन मानकों का पालन नहीं करता, तो न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक तंत्र मौजूद है। शिकायतों के निपटारे के लिए केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली का जिक्र करते हुए बताया गया है कि 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं।
पुस्तक में गंभीर मामलों में संसद द्वारा महाभियोग प्रस्ताव के जरिए जज को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। किताब यह भी स्वीकार करती है कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार के अनुभव सामने आते रहे हैं, जिसका असर खासतौर पर गरीब और वंचित तबकों की न्याय तक पहुंच पर पड़ता है। पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर तकनीक के इस्तेमाल और त्वरित कार्रवाई जैसे कदमों का जिक्र भी किया गया है।
पुस्तक में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के जुलाई 2025 के बयान को भी उद्धृत किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार या कदाचार की घटनाएं जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं, लेकिन पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई से इस भरोसे को दोबारा मजबूत किया जा सकता है।
‘न्याय में देरी न्याय से वंचित होने के समान है’ खंड में लंबित मामलों के आंकड़े भी दिए गए हैं। इसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में करीब 81 हजार, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला व अधीनस्थ अदालतों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं।
किताब में कहा गया है कि समस्या केवल मामलों की संख्या नहीं, बल्कि उन्हें सुलझाने में लगने वाला लंबा समय है। उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों में से लगभग तीन-चौथाई एक वर्ष से अधिक समय से और आधे से ज्यादा तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं। कुछ मामले तो 50 वर्ष से भी ज्यादा समय से लंबित हैं। पाठ में जोर दिया गया है कि यदि मामलों का निपटारा उचित समय में नहीं होता, तो लोगों को लगता है कि उन्हें न्याय नहीं मिला।

