Friday, March 20, 2026
Homeकला-संस्कृतिचिठिया हो तो हर कोई बांचे

चिठिया हो तो हर कोई बांचे

समाज, राजनीति, साहित्य और संस्कृति की दुनिया में घटित प्रेम से संवाद और संवाद से विवाद तक की जाने कितनी कहानियां बीते जमाने में लिखे गए पत्रों की इबारतों में छुपी हुई हैं। संचार की क्रांति ने भौगोलिक दूरी को तो खत्म किया ही, इसके साथ आत्मीयता, सुकून, बेचैनी, इंतज़ार और कागज़ तथा लिखावट की खुशबू वाले वो अहसास भी चले गए। ‘चिठिया हो तो हर कोई बाँचे’ नामचीन साहित्यकारों, विचारकों, कलाकारों की सहेज कर रखी जाने लायक ऐसी ही चिट्ठियों को आप तक पहुंचाने का खास सिलसिला है। इसकी नवीनतम कड़ी के रूप में हम अब पढेंगे मिर्जा़ गाल़िब द्वारा उनके कुछ अजी़ज और करीबी लोगों को लिखे गये कुछ ख़त।

खत-1

                  मुंशी हरगोपाल तफ्ता को

क्यों साहिब,

रूठे ही रहोगे या कभी मनोगे भी? और अगर किसी तरह नहीं मानते हो तो रूठने का वजह तो लिखो। मैं इस तनहाई में सिर्फ खतों के भरोसे जीता हूं। यानी जिसका खत आया मैंने जाना कि वह शख्स तशरीफ लाया। खुदा का एहसान है कि कोई दिन ऐसा नहीं होता, जो इतराफ व जवानिय से दो-चार खत नहीं आ रहते हों। बल्कि ऐसा भी दिन होता है कि दो-दो बार डाक का हरकारा खत लाता है, एक-दो सुबह को और एक-दो शाम को। मेरी दिल्लगी हो जाती है, दिन उनके पढ़ने और जवाब लिखने में गुज़र जाता है। यह क्या सबब ? दस-दस बारह-बारह दिन से तुम्हारा खत नहीं आया। यानी तुम नहीं आए। खत लिखो, साहिब, न लिखने की वजह लिखो। आध आने में बुख्त न करो। ऐसा ही है तो बेरंग भेजो।

सोमवार,27 दिसंबर, 1858 ई.

ग़ालिब

खत- 2

                 मुंशी हरगोपाल तफ्ता को (ही)

तो साहिब

खिचड़ी खाई दिन बहलाए, कपड़े फाटे घर को आए 8 जनवरी माह-ओ-साल-ए-हाल दोशंबे के दिन गज़ब-ए-इलाही की तरह अपने घर पर नाज़िल हुआ। तुम्हारा खत मय मज़ामीन-ए-दर्दनाक से भरा हुआ रामपुर में मैंने पाया। जवाब लिखने की फुरसत न मिली कि मुरादाबाद में पहुंचकर बीमार हो गया। पांच दिन सदर-उलसदूर साहिब के यहां पड़ा रहा। उन्होंने बीमारदारी और गमखारी बहुत की।

क्यों तर्क-ए-लिबास करते हो? पहनने को तुम्हारे पास है क्या जिसको उतार फेंकोगे? तर्क-ए-लिबास से कैद-ए-हस्ती मिट न जाएगी। बगैर खाए पिए गुज़ारा न होगा। सख्ती व सुस्ती रंज-ओ-आराम को हमवार कर दो जिस तरह हो उसी सूरत से, ब-हर सूरत गुजरने दो-

ताब लाए ही बनेगी गालिब, 

वाकिया सख्त है और जान अजीज।

इस खत की रसीद का तालिब

-ग़ालिब

खत- 3

         मुंशी नबी बख्श ‘हकीर’ को

भाई साहिब,

मेंह का यह आलम है कि जिधर देखिए, उधर दरया है। आफताब का नजर आना बर्क का चमकना है यानी गाहे दिखाई दे जाता है। शहर में मकान बहुत गिरते हैं। इस वक़्त भी मेंह बरस रहा है। खत लिखता तो हूं, मगर देखिए डाकघर कब जाये। कहार को कमल उढाकर भेज दूंगा।

आम अब के साल ऐसे तबाह हैं कि अगर बमुश्किल कोई शख्स दरख्त पर चढ़े और टहनी से तोड़कर वहीं बैठकर खाए, तो भी सड़ा हुआ और गला हुआ पाये। यह तो सब कुछ है, मगर तुमको तफ़्ता की भी कुछ खबर। पितंबर सिंह उसका लाडला बेटा मर गया। हाय उस गरीब के दिल पर क्या गुज़री होगी…..

खत लिखते रहो, तो ऐसा क्या मुश्किल है। तुम अब खत लिखने में बहुत देर करते हो। आठवें दिन अगर एक खत लिखते रहो, तो ऐसी क्या मुश्किल है!

यहां दोनों लड़के अच्छी तरह हैं। अब वहां के लड़कों की खैर-ओ-आफियत लिखिए।

26 जुलाई, 1855 ई.

असद

 खत- 4

                सैयद यूसुफ मिर्जा को

यूसुफ मिर्ज़ा,

मेरा हाल सिवाए मेरे खुदा और खुदावंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक्ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-गम में मेरी कुव्वत मुत्तफक्रा में फर्क आ गया हो तो क्या अजब है? बल्कि इसका बावर न करना ग़ज़ब है। पूछो कि ग़म क्या है? गुम-ए-मर्ग, ग़म-ए-फिराक, ग़म-ए-रिज़्क, ग़म-ए-इज़्ज़त ? गुम-ए-मर्ग में, किलआ नामुबारक से क्ताअ नज़र करके, अहल-ए-शहर को गिनता हूं। मज़्ज़फरुद्दौला, मीर नासरुद्दीन, मिर्जा आशूर बेग मेरा भांजा, उसका बेटा अहमद मिर्ज़ा उन्नीस बरस का बच्चा, मुस्तफा खां इब्न आज़मउद्दौला, उसके दो बेटे अर्तज़ाखां और मुर्तज़ाखां, काजी फैजउल्ला, क्या मैं उनको अपने अज़ीज़ों के बराबर नहीं जानता था? ए लो, भूल गया। हकीम रज़ीउद्दीन खां, मीर अहमद हुसैन मैकश अल्ला अल्ला उनको कहां से लाऊं? ग़म-ए-फिराक, हुसैन मिर्ज़ा, यूसुफ मिर्ज़ा, मीर मेहदी, मीर सरफराज़ हुसैन, मीरन साहिब, खुदा इनको जीता रखे। काश यह होता कि जहां होते, वहां खुश होता। घर उनके बेचिराग, वह खुद आवारा। सज्जाद और अकबर के हाल तक जब तसव्वुर करता हूं कलेजा टुकड़े-टुकड़े होता है। कहने को हर कोई ऐसा कह सकता है, मगर मैं अली को गवाह करके कहता हूं कि उन अमवात के गुम में और ज़ंदों के फिराक में आलम मेरी नजर में तीरा-ओ-तार है। हकीकी मेरा एक भाई दीवाना मर गया। उसकी बेटी, उसके चार बच्चे, उनकी मां यानी मेरी भावज जयपुर में पड़े हुए हैं। इस तीन बरस में एक रुपया उनको नहीं भेजा। भतीजी क्या कहती होगी कि मेरा भी कोई चचा है। यहां अग्रनिया और उमरा के अज़दवाज व औलाद भीख मांगते फिरें और मैं देखें! इस मुसीबत की ताब लाने को जिगर चाहिए। अब खास अपना दुख रोता हूं। एक बीवी, दो बच्चे, तीन-चार आदमी घर के, कल्लू, कल्यान, अय्याज़, ये बाहर। मदारी के जोरू बच्चे बदस्तूर, गोया मदारी मौजूद है। मियां धम्मन गए गए महीना भर से आ गए कि भूखा मरता हूं। अच्छा भाई, तुम भी रहो। एक पैसा की आमद नहीं। बीस आदमी रोटी खाने वाले मौजूद। मेहनत वह है कि दिन-रात में फुर्सत काम से कम होती है। हमेशा एक फिक्र बराबर चली जाती है। आदमी हूं, देव नहीं, भूत नहीं। इन रंजों का तहम्मुल क्योंकर करूं? बुढ़ापा, जोफ-ए-क्वा, अब मुझे देखो तो जानो कि मेरा क्या रंग है। शायद कोई दो-चार घड़ी बैठता हूं, वरना पड़ा रहता हूं। गोया साहिब-ए-फाश हूं, न कहीं जाने का ठिकाना, न कोई मेरे पास आने वाला। वह अर्क जो ब-कद्र-ए-ताकत, बनाए रखता था, अब मुयस्सर नहीं। सबसे बढ़कर, आमद-ए-गवर्नमेंट का हंगामा है। दरबार में जाता था, खलहत-ए-फाखिरा पाता था। वह सूरत अब नज़र नहीं आती। न मक्कूल हूं, न मरदूद हूं, न बेगुनाह हूं, न गुनहगार हूं, न मुखबिर, न मुफसिद, भला अब तुम ही कहो कि अगर यहां दरबार हुआ और मैं बुलाया जाऊं तो नजर कहां से लाऊं। दो महीने दिन-रात खून-ए-जिगर खाया और एक कसीदा चौंसठ बैत का लिखा। मुहम्मद फज़ल मुस्सविर को दे दिया, वह पहली दिसंबर को मुझको दे देगा।…

मियां, हम तुम्हें एक और खबर लिखते हैं, ब्रह्मा का पुत्र दो दिन बीमार पड़ा, तीसरे दिन मर गया। हाय, हाय, क्या नेक बख्त गरीब का लड़का था। बाप उसका शिवजी राम, उसके गम में मुर्दे से बदतर है। यह दो मुसाहिब मेरे यूं गए, एक मुर्दा, एक दिल अफ्सुर्दा, कौन है जिसको तुम्हारा सलाम कहूं? यह खत अपने मामू साहिब को पढ़ा देना और फर्व उनसे लेकर पढ़ लेना और जिस तरह उनकी राय में आए, उस पर हसूल-ए-मतलिब की बिना उठाना, और इन सब मदारिज का जवाब शिताब लिखना। जियाउद्दीन खां रोहतक चले गए और वह काम न कर गए। देखिए, आकर क्या कहते हैं। या रात को आ गए हों या शाम तक आ जाएं। क्या करूं? किसके दिल में अपना दिल डालूं? ब मुर्तजा अली। पहले से नीयत में यह है कि जो शाह-ए-अवध से हाथ आए, हिस्सा ब्रादराना करूं निस्फ हुसैन मिर्ज़ा और तुम और सज्जाद, निस्फ में मुफलिसों का मदार-ए-हयात खयालात पर है। मगर उसी खयालात से उनका हुसन-ए-तबीयत मालूम हो जाता है।

खत-5

                 मास्टर प्यारेलाल के नाम

क्यों साहिब, हमसे ऐसे खफा हो गए कि मिलना भी छोड़ा। खैर मेरी तकसीर मुआफ करो और अगर ऐसा ही गुनाह अज़ीम है कि कभी न बख्शा जाएगा तो गुनाह मेरा मुझ पर ज़ाहिर कर दो। ताकि मैं अपने कसूर पर इतिलाअ पाऊं। बरखुरदार हीरासिंह तुम्हारे पास पहुंचता है। और ये तुम्हारा दस्त गिरफ्ता है। रोहतक में तुमने उसे नौकर रखवा दिया था। खैर वहां की सूरत बिगड़ गई। अब ये ग़रीब बहुत तबाह है और अमूर-ए-मआश में सख्त दिल तंग। तुम्हीं दस्तगीरी करो तो ये संभले; वरना इसका नकश-ए-हस्ती सफ्हा-ए-दहर से मिट जाएगा।

इनायत का तालिब

                  गा़लिब

साभार– आजकल पत्रिका, अंक- गाल़िब दौ सौ वर्ष, दिसम्बर-1997

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments