कभी हम उस शख्स से अचानक मिल जाते हैं जिससे मिलने की उम्मीद वर्षों से पाले हुए हों…कभी सोचो तो लगता है हर चीज की मियाद की तरह किसी शख्सियत से मिलने की भी मियाद होती है और जब पूरी होती है तब मुलाक़ात हो पाती है ….
इस दफ़ा तमन्ना पूरी हुई और ग़ालिब के दौलतखाने पर जाने का मौका मिल गया । असदउल्लाह खां ग़ालिब! जिनके चर्चे खूब सुने….जिसे पढ़ा, सुना और गुना। उनके एक-एक शेर पर दाद दी…..। उन्हें जब थोड़ा-बहुत समझ पाया तो जाना कि ग़ालिब का दर्द से एक मुसलसल रिश्ता रहा| दर्द का शायरी से एक अपनापा होता है, इसीलिए ग़ालिब कहते हैं –
“दिल ही है न संग-ओ-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यों….रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों....
ग़ालिब धीरे-धीरे असर करने वाले शायर हैं| उनकी शायरी में एक गहराई है… उनको समझने के लिए एक तैयारी करनी पड़ती है| इसके लिए उम्र का एक तजुर्बा चाहिए…..
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले…
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले।
ग़ालिब का यह शेर न जाने कितनी दफा, कितनों के द्वारा इस्तेमाल किया गया होगा। फिर भी कुछ बात तो इसमें ऐसी है कि इसकी रौनक कभी कम नहीं हुई। मानीखेज चीजें इस्तेमाल से कभी घिसती नहीं बल्कि निखर आती हैं। ग़ालिब हर दिल अजीज शायर हैं। मेरे जेहन में भी ग़ालिब न जाने कब से आकर बस गए थे। मन की ख्वाहिश का क्या भरोसा! कब कहाँ कौन इसमें दाखिल हो जाए! बहरहाल जब ग़ालिब ख्वाबों की गलियों से अपनी लंबी दाढ़ी और टोपी के साथ दाखिल हुए तो फिर उनसे गुफ्तगू करने की ख्वाहिश भी जगी। पर बिना उनके दौलतखाने पर गए क्या यह कहाँ संभव था? हाँ कुछ हद तक तो संभव था। गुफ्तगू की यह ख्वाहिश थोड़ी-सी ही सही गुलजार ने पूरी कर दी थी अपने सीरियल में, जिसमें ग़ालिब की भूमिका निभाने वाले नसरुद्दीन शाह ने खुद में और ग़ालिब में अंतर करना ही भुला दिया था। मैं उनमें ही ग़ालिब की छवि ढूँढ़ता रहा।

हालाँकि गुलजार की मखमली आवाज में ग़ालिब का पता बहुत पहले मिल गया था।
‘‘बल्लीमारां के मोहल्ले की वो पेंचीदा दलीलों की-सी गलियाँ…सामने टाल के नुक्कड़ पर बटेरों के कसीदे…गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वाह…चंद दरवाजों पर लटके हुए पोशीदा से कुछ टाट के पर्दे… एक बकरी के ममियाने की आवाज…और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे..ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ के चलते हैं यहां.. चूड़ी वालान के कटरे की बड़ी बी जैसे अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाजे टटोले…इसी बेनूर अंधेरी-सी गली कासिम से एक तरतीब चरागों की शुरू होती है एक कुराने-सुखन का सफा खुलता है असदउल्लाह खां गालिब का पता मिलता है….’’
लेकिन उस गली कासिम जान में गालिब से मिलने बहुत बाद में पहुंच पाया। पहुंचते ही चचा गालिब ने टोका- ‘अमां….मियां बहुत देर कर दी।’ हमने भी कहा चचा आपने ही तो फरमाया था-
‘उग रहा है दर-ओ-दीवार से सबजा गालिब।
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है।’
हम भी बयाबां में भटकते रहे और अपने महबूब शायर के घर अब तक न पहुंच सके थे।
मिर्जा नौशा के घर पर उनसे मिलने की तमन्ना आखिर इस बार पूरी हो सकी। दिल्ली में रणेन्द्र जी और संतोष जी द्वारा श्रमिक साथियों से मिलने का कार्यक्रम तय हुआ तो हम 28 दिसंबर 2025 ई. को इस कार्यक्रम से मुक्त होकर मिर्जा साहब के घर की ओर प्रस्थान हुए। हम बल्लीमारान की गली कासिम जान पहुंचे। मैं और वरिष्ठ कथाकार पंकज मित्र। पंकज मित्र जी से मेरी यह पहली मुलाकात थी। पहली ही मुलाकात में यह महसूस हुआ जैसे हम एक दूसरे को बहुत पहले से जानते हों। मैंने कार्यक्रम से छूटते ही कहा ‘सर फ्री हों तो मिर्जा गालिब के घर चलें।’ ‘हां, चलिए। मैं भी बहुत दिनों से सोच रहा था।’ बस क्या था हम लोग ऑटो रिजर्व कर पुरानी दिल्ली के उस इलाके की ओर प्रस्थान कर गए। हमारे पास समय कम था क्योंकि हमें यह पता चल चुका था कि शायद देर शाम उनके घर में जाने की इजाजत न मिले। हम इन दुश्चिंताओं को परे हटाकर बस चलते गए।
एक भीड़-भाड़ वाले इलाके में पहुंचकर ऑटो रिक्शा वाले ने कहा कि इससे आगे हम नहीं जा सकते। अब आगे के लिए आपको दूसरा रिक्शा लेना पड़ेगा। हमने बल्लीमारान के लिए रिक्शा लिया। एक बुजुर्गवार उसे चला रहे थे। वो पैर से खेंचने वाला रिक्शा नहीं था बल्कि जुगाड़ से बनाया गया बैट्री चालित था। रिक्शा ज्यों-ज्यों बढ़ने लगा पुरानी दिल्ली का वो इलाका, भीड़ भाड़, बाजार की रौनक, वो तंग गलियां सामने जीवंत हो गईं। रिक्शा वाले बुजुर्ग के कहा. ‘कहां जाना है बिल्ली मारान?’ ‘हाँ बल्लीमारान’ मैंने दुरुस्त करने हुए कहा। फिर लगा कि लोक को दुरुस्त करने का साहस कर रहा हूं। क्या ये अच्छी बात है?

जाम और तंग गलियों से निकलते हुए हम आखिर पहुंच गए ‘गालिब की हवेली पर’ मैंने पहुंचते ही झुक कर सलाम किया और मन ही मन चचा गालिब को कहा ‘बिलेटेड हैप्पी बर्थडे’। 27 दिसंबर को उनके घर में बड़े फीके ढंग से सारगिरह मनाई गई। वहाँ नियुक्त गार्ड मुस्तफा जी(नाम स्मृति के आधार पर है) ने कहा ‘अब कहां आता है कोई साहब!’
क्या गालिब ने कभी इसी तन्हाई के आलम में दुखी मन से कहा होगा..
‘रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुखन कोई न हो और हमजबाँ कोई न हो।
बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।’
इतिहास पढ़ते हुए 1857 का गदर याद आता है और दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह-शायर जफ़र याद आते हैं। मोमिन और जौक याद आते हैं। उसी दिल्ली के शायर जौक फरमाते हैं कि-
‘इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुखन
कौन जाए जौक पर दिल्ली की गलियां छोड़ कर।’
दिल्ली में कुछ तो बात रही होगी कि गालिब भी ‘उनकी गलियां’ छोड़कर न जा सके होंगे। मुगलों की पहले की राजधानी आगरे की उनकी पैदाइश और उस शहर को छोड़कर दिल्ली का बाशिंदा हो जाना। उस्ताद जौक से उनके टकराव के किस्से। बेदिल और मीर के प्रति उनकी दीवानगी। कई चीजें याद आती रहीं। मीर से शायद उनके अपनापे का एक कारण यह भी हो कि मीर भी बचपन में अनाथ हो गए थे और उन्हें भी पारिवारिक कारणों से आगरा से दिल्ली आना पड़ा था।
मिर्जा गालिब सीरियल का वो अंश याद आता रहा जिसमें एक फकीर मीर की ग़ज़ल गा रहा है-
‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है।
जाने न जाने ये गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है।’
और उसे ही सुनकर गालिब दाद दे रहे हैं-
‘रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो गालिब
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था।’
गली कासिम जान की ‘गालिब की हवेली’ में हम रिक्शे से पहुंचे तो शाम के लगभग पौने छह बज गए थे। हवेली मिर्जा गालिब में घुसने से पहले एक तख्त पर लिखा था कि इस हवेली में वर्ष 1860 से 1869 तक गालिब ने अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत किया। हम उनकी हवेली में जैसे ही घुसे तो स्मृतियों में बसे किसी ऐतिहासिक जगह पर आने की खुशी में मन में हलचल और देह में जो सिहरन होती है वही हमारे साथ हो रही थी। हम लोग की रूह लगा जैसे गालिब में फना हो गई। मैंने एक लंबी सांस भरी। भीतर पीली हल्की रोशनी में पत्थर के टुकड़ों और ईंटों से जोड़कर बनाई गई दीवार का एक घर है…घर में प्रवेश करते ही एक छोटी सी गैलरी, जिसमें बाईं ओर ग़ालिब के जीवन के बारे में कुछ अंश लिखित हैं और दाईं ओर एक छोटा कमरा है जिसमें ग़ालिब का बुत है जो गुलज़ार साहब के सौजन्य से है। जिसे बनाया है श्री भगवान रामपुरे ने और जिसका अनावरण 26 दिसंबर 2010 ई. को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित के द्वारा किया गया था। वहीं शीशे में बंद गालिब की हस्तलिखित शायरी की एक किताब है। गैलरी के सामने भी एक बड़ा कमरा है जिसमें कई झरोखे बने हुए हैं। एक झरोखे के भीतर गालिब खुद बैठे हुए लिख रहे हैं। एक दीवार पर ग़ालिब की हुक्का पीते हुए और शायरी लिखती हुई पेंटिंग बनी है। शराब की एक बोतल सामने रखी हुई है। दीवार पर ग़ालिब की पोशाक सुरक्षित रखी हुई है। ग़ालिब की यह हवेली भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के द्वारा संरक्षित रखी गई परन्तु लगा कि यह भी अपनी शायरी में भी शुरूआत में यह अजीम शायर उपेक्षा का दंश झेलता रहा। उसी तरह उनकी इमारत भी उपेक्षित सी लगी।

ग़ालिब होते तो कहते….
‘पूछते हैं वो कि गालिब कौन है…,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या..’
अभी एक ही दिन गुजरे हैं उनकी सालगिरह के मौके पर उनके गरीबखाने पर वो रौनक नहीं दिखी। वहां की देखरेख करने वाले भाई मुस्तफा भी मन-मिजाज से शाइर निकले। उनसे हम खूब बोलते-बतियाते रहे। उनकी शाइरी ने शमा बांध दी। लगा जैसे हम ग़ालिब की महफिल में हैं। लगा कि अगर कोई ग़ालिब के घर की पहरेदारी करने वाला हो तो वह मुस्तफा भाई जैसा ही हो। भाई मुस्तफा ने अपना दर्द बयान किया। ‘बरखुरदार! यहां की उपेक्षा का आलम यह है कि कल समूची दिल्ली में ग़ालिब की याद में महफिलें सजती रहीं और यहां इक्के दुक्के लोग ही आए। बमुश्किल यहां बहुत दिनों से फ्यूज बल्व बदले जा सके और अभी जो कमरे में थोड़ा उजाला दिख रहा है वह कल के पहले आते तो अंधेरा ही दिखता।’
हमसे बात करते भाई मुस्तफा के चेहरे की रौनक कुछ उसी तरह आई जैसे खुद गालिब कह रहे हों…..
‘उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।’
ग़ालिब की मायूसी में एक कोना दुख यह भी था कि उनकी संतानें एक-एक कर गुजर गईं। गोद लिया बच्चा भी जवानी में गुजर गया। जुए का शौक और फकामस्ती का आलम। शराब की लत। ये तमाम चीजें उनके मायूसी से उपजी हुई हैं। ग़ालिब ने अमीरी के बाद गरीबी या कहें कि अमीरी की अनुपस्थिति देखी लेकिन मिजाज वही रईंसों वाला रहा। जुआ खेलने में दो बार गिरफ्तारी हुई। एक बार जुर्माने पर छूटे, दूसरी बार ‘कैदे-बामशक्कत’ की सजा हो गई। इस वाकये से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल हुई। उनकी शाइरी उनकी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान से जुड़ी थी। साहित्यिक समाज में अपमानों को वे अपनी हाजिर जबाबी और विनोदप्रियता से टालने की कोशिश करते। या घुटन को शायरी और पत्रों से व्यक्त करते। 1
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
चर्चित कथाकार पंकज मित्र भी ग़ालिब से संवाद करने में मसरूफ हो गए थे। जैसे एक अजीज शक्स से यादगार मुलाकात के बाद विदा होने की जो मायूसी छाती है…जैसे लगा कि अब ग़ालिब की देखरेख करने वाले भाई मुस्तफा आंखों ही आंखों में कह रहे हों कि अब वक्त हो रहा है। वे वहां पधारे एक और यू-ट्यूबर को आवश्यक निर्देश देने लगे। हमलोग कमरे से बाहर गैलरी में आ गए जैसे फिर ग़ालिब का साया हमारे साथ चल रहा है और गुलज़ार के द्वारा लिखित और निर्देशित उस सीरियल का गीत मेरे कानों में बज रहा है……
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज-ए- बयां और…..
हम बाहर निकल कर पलट कर देखते हैं…..
गली कासिम जान में पैदल, रिक्शे, स्कूटर की आवाजाही बढ़ गई है। दोनों ओर छोटी-छोटी दुकानें हैं….खाने-पीने के चीजें बिक रही हैं….तंदूर…उस पर सिंकते कबाब….और लाल-पीली-नीली रोशनी से जगरमगर करते साइन बोर्ड। हमें प्यास लगी है और पानी की एक बोतल खरीदकर पंकज मित्र मेरी आंखों में देखते हैं….‘चलें!’ मुझे गली में चलते हुए ज़फर के दरबार में नज्म फरमाते मिर्जा सुनाई पड़ते हैं- ‘हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है। तुम्हीं कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है? रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल। जब आंख ही न टपका तो फिर लहू क्या है।’
जौक झूम रहे हैं….वाह! ज़फर कह रहे हैं वाह! जौक बार-बार कह रहे हैं मिर्जा मुकर्रर…..। वही जौक जिसके लिए मिर्जा ने कभी कहा था-
‘हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता। वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है।’
हम अब पैदल ही वहां आ गए हैं जहां से हम अब मंडी हाउस की तरफ प्रस्थान करेंगे। हमें अगले दिन अपने अपने शहर लौटना है। मैं मन ही मन गालिब की पंक्तियां दोहराता हूं- ‘हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है। वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता….
सन्दर्भ- 1. दीवाने-गालिब, संपादन शीन काफ निजाम, वाणी प्रकाशन।


रंग जमा दिया आपने। उर्दू, फारसी और अरबी शब्दों पर आपकी अच्छी पकड़ है। पूरे आलेख में आपने इन भाषाओं के शब्दों का बाखूबी प्रयोग किया है। गालिब से संबंधित ऐसा ही आलेख लिखा जाना चाहिए।
वाकई गालिब मियां की रूह को उतार दिया है आपने इस आलेख में।
गालिब की शायरी में गालिब को श्रद्धांजलि। बुलंद भाषा है आपकी श्रीधर करुणानिधि।
शुभकामनाएं भाई।