आलोचक नामवर सिंह ने एक बार कहा था, कहानी का दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है। यह बात आज भी सच-सी लगती है। बावज़ूद इसके कि कहानी अपनी विकास यात्रा के सवा सौ साल पूरे कर चुकी है। 1900 के आसपास माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को पहली मौलिक कहानी माना जाता है। तब से बहुत पानी बह चुका है, पूरी दुनिया बदल गई है…रहन-सहन, सोचने के तरीके, देखने के और सुनने के तरीके, लिखने के तरीके, संवाद के तरीके, विमर्श के तरीके, जीवन मूल्य, प्राथमिकताएँ…सब कुछ बदल गया है। इसलिए आज कहानी को पुराने मानकों के हिसाब से देखना कहानी और कहानीकारों-दोनों के साथ अन्याय होगा। आज की कहानी न तो हेमिंग्वे की आइसबर्ग थ्योरी पर खरी उतरती है और ना आस्कर वाइल्ड की थ्योरी पर। आइसबर्ग थ्योरी कहती है कि कहानी में केवल कुछ ही तथ्य बताए जाते हैं, शेष पाठक को स्वयं खोजने या महसूस करने होते हैं। आस्कर वाइल्ड का कहना था कि दुनिया का असली रहस्य दृश्य में निहित है, अदृश्य में नहीं। कहानी में वह दीखने वाले दृश्य को ही महत्व देते हैं, अदृश्य को नहीं। यहाँ यह जान लेना भी अनुचित नहीं होगा कि दोनों लेखकों के बीच एक पूरी सदी का फ़ासला है। हेमिंग्वे का जन्म 1899 में हुआ और 1961 में निधन। जबकि आस्कर वाइल्ड का जन्म 1854 में और निधन 1900 में हुआ। इसलिए हेमिंग्वे की थ्योरी से तो एकबारगी सहमत हुआ जा सकता है लेकिन कहानी में दीखने वाले दृश्य ही महत्वपूर्ण होते है, इसे मानना थोड़ा मुश्किल है। कहानी में जो अनकहा है, जो दिखाई नहीं दे रहा वह अधिक महत्वपूर्ण होता है… हो सकता है। फिर भी अनेक कहानियाँ हेमिंग्वे और आस्कर वाइल्ड की थ्योरीज़ पर आज भी देखने और पढ़ने को मिलती हैं।
नामवर सिंह की बात भी उस वक्त सही लगने लगती है जब हम देखते हैं कि वरिष्ठ लेखक भी यह कहते पाए जाते हैं कि कहानी में ‘एन्टरटेनमेंट’ नहीं है। यह कहानी की विडम्बना ही है कि विकास के इतने चरण देखने के बावज़ूद हम आज भी कहानी से मनोरंजन की आस लगाए बैठे हैं। दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि आज का युवा बेहद प्रयोगधर्मी (कथ्य भाषा और शिल्प के हिसाब से) कहानियाँ लिख रहा है। ऐसे बहुत से नाम गिनवाये जा सकते हैं। युवाओं के साथ-साथ पूर्व की पीढ़ी के कुछ लेखक भी कुछ अच्छी कहानियाँ अपने नाम कर गए हैं। अवधेश प्रीत का कहानी संग्रह ‘मिनी और अन्य कहानियाँ’ (राजकमल पेपरबैक्स) भी इसी श्रेणी में आता है। अवधेश प्रीत ने कहानियाँ लिखीं, उपन्यास लिखे, पत्रकारिता की, रंगकर्म से जुड़े। कहानियों ने उन्हें एक पहचान दी, इस पहचान को व्यापक बनाने के लिए उन्होंने ‘अशोक राजपथ’ और ‘रूई लपेटी आग’ जैसे उपन्यास लिखे।
राजेन्द्र यादव ने उनकी शुरुआती कहानियाँ पढ़कर कहा था, अवधेश प्रीत की कहानियों में एक फायर दिखाई देती है। सत्ता से आम आदमी का संबंध, वाम राजनीति की विसंगतियाँ और साम्प्रदायिकता का विरोध उनकी कहानियों को मूल स्वर है। अवधेश प्रीत की कहानियों में यह स्वर तो है ही, लेकिन इस संग्रह की कुछ कहानियाँ यह भी बताती है कि उनके पास कुछ और स्वर भी थे। उनके पास स्मृतियाँ थीं, कुछ अधूरी रह गईं इच्छाएँ थीं, बारिश में एक उम्र के बाद जागृत रूमान था, नौकरियों का सिकुड़ता स्पेस था, वह मोड़ था जो अफ़साने के ख़त्म होने के बाद बेहद क्रूर रूप में दोबारा सामने आ जाता है। अवधेश प्रीत की दो कहानियाँ-कॉफी, बारिश-स्मृतियों की कहानियाँ हैं। पहली में, नायक अचानक एक दिन पत्नी से कॉफी पीने की इच्छा प्रकट करता है। लेकिन घर में कॉफी नहीं है, कभी पी ही नहीं। वह सोचता है तब कॉफी पीना लग्ज़री था…हम कॉफी एफोर्ड नहीं कर सकते थे। नायक कॉफी खरीदने के लिए बाज़ार जाता है। लेकिन वह कॉफी नहीं खरीद पाता। वह सुपर मार्केट पहुँचता है। वह रैक में करीने से सज़े कॉफी ब्रांड्स देखता है…कंटिनेंटल, लेविस्टा, ब्रू, डेविडॉफ़ नेस्कैफ़े, स्लीपी, अराकू, ब्लू टोकाई….वह समझ नहीं पाता कि कौन सा ब्रांड लें। कहानी एक तरफ़ बाज़ार के विस्तार की बात करती है, दूसरी तरफ़ दुनिया को दो हिस्सों में बाँटती दिखाई देती है। अवधेश प्रीत बड़ी सादगी से दोनों दुनियाओँ का चित्रण करते हैं। दूसरी कहानी में लेखक आर्थिक अभावों, नौकरियों के लिए सिकुड़ते स्पेस में बारिश के भीगने से पैदा होने वाले संकटों और आशंकाओं का सहज चित्रण करता है। कभी-कभी जीवन में प्रेम की स्मृतियाँ एक ऐसे रूप में सामने आती हैं कि आप उन्हें स्वयं ही आग लगा देते हैं (उस मोड़ का अफ़साना)। लेकिन अवधेश प्रीत का मूल स्वर राजनीति ही है। ‘नग्न’ इसी स्वर की कहानी है। पुलिस की परीक्षा देकर लौट रहे दो युवाओं को गाँव की टेढ़ी पुलिया के बीचोबीच एक लड़की की लाश मिलती है। कपड़े फटे हुए, शरीर बुरी तरह नुचा हुआ, बाल बेतरतीब, स्याही सा चेहरा…भयावह। पुलिस आती है और उसका वह चेहरा दिखाई देता है जिसे हम बख़ूबी पहचानते हैं। अवधेश प्रीत ने पुलिस तंत्र में व्याप्त चेहरे महीनता से दर्ज़ किया है। उन्होंने यह भी दिखाया है कि न्याय की मौज़ूदा प्रक्रिया में किसी लड़की को न्याय तो क्या ही मिलता है, उसे अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है। यह कहानी पुलिस तंत्र और न्याय प्रणाली के खिलाफ़ प्रतिरोध दर्ज़ कराती है।
‘ये शरीफ़ लोग’ कहानी में अवधेश मध्यवर्गीय परिवारों में चौका बर्तन करने वाली राजमती उस साहस को चित्रित करते हैं जो वह वार्ड पार्षद के चुनाव में गुंडे बिसनवा के खिलाफ़ लड़कर दिखाती है। वह सभी से प्रार्थना करती है कि वे उसे वोट दें। लेकिन राजमती चुनाव हार जाती है। बिसनवा जीत जाता है। राजमती कहती है, हम यह चुनाव मुहल्ले के लिए ही तो लड़ रहे थे। हम इस मुहल्ले का डर फाड़ना चाहते थे।
‘मिनी’ नये रूप में ढल रही स्त्री की कहानी है, जो स्त्री विमर्श को भी नया आयाम देती है। मिनी अपनी माँ नीला से हमेशा अपने पिता के बारे में पूछती है। नीला के बताने पर मिनी अपने पिता को तलाश करने के लिए भुवनेश्वर के उस कार्यालय पहुँचती है, जहाँ उसके पिता काम किया करते थे। अवधेश ने इस कहानी में स्त्री की यात्रा के समानांतर पत्रकारिता की दुनिया को भी बाक़ायदा चित्रित किया है। मिनी अपने पिता के पास पहुँचती है। उसे पता चलता है कि उसके पिता आदिवासियों के बीच काम करते हैं। वह कहते हैं, मैं पत्रकारिता से हारकर यहाँ आया। मुझे लगा, पत्रकारिता जब ग़रीब आदिवासियों के साथ खड़े होने के बजाय पूँजीपतियों, माफ़ियाओं के साथ खड़ी हो, तो वहाँ रहने का कोई औचित्य नहीं है। वह आगे कहते हैं, मैं यहाँ आया इस संकल्प के साथ कि आदिवासियों को अपने शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ़ ख़ुद आवाज़ उठानी होगी। उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। इसके लिए इन्हें तैयार करने के इरादे से आया और यहीं का होकर रह गया। मिनी के पिता यह भी कहते हैं, यहाँ से लौटने की मेरी कभी इच्छा नहीं हुई, यह मेरा चुनाव था। मिनी को याद आता है कि मॉम भी हमेशा यही कहती हैं कि यह मेरा चुनाव है। यह एक बड़े फ़लक की कहानी है, जो पत्रकारिता की अनेक गहरी परतें खोलती है, आदिवासियों के शोषण-उत्पीड़न को दर्ज़ करती है और स्त्री की मुक्ति की राह बनाती है, स्त्री को चुनाव की स्वतंत्रता देने की पैरवी करती है।
‘ग्रेवयार्ड’ में अवधेश एक बार फिर उस तंत्र से यह सवाल पूछते हैं कि 200 साल पुराने अंग्रेजों के इस ऐतिहासिक ग्रेवयार्ड की हिफ़ाजत सरकार क्यों नहीं कर रही? यहाँ बनी कब्रों के ज़रिये अवधेश इस कहानी में अनेक पुरानी प्रेम कहानियाँ भी दर्ज करते हैं। आज के समय में यह एक ज़रूरी कहानी है। ‘मुन्ना मोटिवेशनल’ राजधानी दिल्ली में कुछ साल पहले हुए एक बड़े जन आन्दोलन के नायक की कहानी है, जिसने आम जनता को यह सपना दिखाया कि कैसे भ्रष्टाचार को दूर किया जा सकता है, कैसे जनता की भलाई के लिए काम किया जा सकता है। बाद में यह नायक एक राजनीति पार्टी बनाकर सत्ता पर काबिज हो गया। सत्तारूढ़ पार्टी की बी टीम कहे जाने वाली इस पार्टी के नायक राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिरोध मार्च निकालते हैं। लेकिन नायक मुन्ना को बराबर लगने लगता है कि वह नींद और जाग के बीच भटक रहे हैं। उन्हें लगता है कि भेड़िये उनके पीछ पड़े हैं और वह भाग रहे हैं। अवधेश ने इस कहानी का अंत किया है कि नायक एक आदमकद दर्पण के सामने पहुँच जाता है कि दर्पण में उन्हें अपनी ही परछाई दिखाई देती है। क्या नायक के भीतर बचपन से भेड़िये मौज़ूद थे? क्या राजनीतिक स्थितियों ने उसे भेड़िए में बदल दिया? कहानी की दृष्टि से यह अंत ठीक लग सकता है लेकिन लेखक को ऐसी कहानी लिखने से बचना होता है जिसके किरदार साफ़-साफ़ पहचाने जा सकते हों। ‘छोटे सरकार’ भी राजनीति और गुंडई के बीच बदलते पालों की कहानी है।
संग्रह की एक बेहद मार्मिक कहानी है-हाथ। राजधानी के एक बड़े सरकारी अस्पताल में, इमरजेंसी में एक पेशेंट लाया जाता है। होश में आने पर वह अपना नाम गोपीचंद बताता है। डॉक्टर उसके दायें हाथ की ग्राफ़्टिंग करने के बाद पाते हैं यह सक्सेस नहीं हुई है। गोपीचंद को नर्स एक जगह दस्तख़त करने को कहती है। लेकिन गोपीचंद अपना हाथ पीछे खींचते हुए कहता है। ये लोग हाथ काटने को कह रहे हैं। बताइए भला, हाथ बिना कैसे कमाए-खाएँगे? यह श्रमिक वर्ग पर लिखी एक बेहतरीन कहानी है।
अवधेश प्रीत का यह संग्रह केवल पठनीय ही नहीं नितांत मौलिक भी दिखाई पड़ता है। उनकी भाषा में स्थानीय लहज़ा और शब्द दिखाई देते हैं। वह पत्रकार रहे, लिहाज़ा उनकी कहानियोँ में पत्रकारिता से आई सूचनाएँ भी हैं, लेकिन वह कहानी बुनना जानते थे और कहानी में जो कहना चाहा, उन्होंने कहा। जहाँ प्रतिरोध करना था, जहाँ सवाल पूछने थे, जहाँ मन के भीतर की इच्छाओं को दर्ज़ करना था, उन्होंने किया। उन्होंने किसी भी स्थिति से बचने का प्रयास नहीं किया, यही इस संग्रह की ताक़त है। इसलिए भी ये कहानियाँ एन्टरटेनमेंट के लिए नहीं हैं!
किताब- मिनी और अन्य कहानियां
विधा-कहानी संग्रह
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन समूह
मूल्य-299
पृष्ठ संख्या-176

