Thursday, April 9, 2026
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दृश्यम: रंगमंच के बहाने- स्मृति, मिथक और मनुष्य

इस बार के मेटा (महेंद्रा एक्सिलेंस इन थिएटर अबार्ड्स) फेस्टिवल की तीन अहम प्रस्तुतियों पर यहां बात कर रहे हैं, वरिष्ठ रंग-आलोचक रवींद्र त्रिपाठी। इस बार मंच सिर्फ प्रदर्शन का नहीं, विचार का भी वाहक बना। मेटा फेस्टिवल की ये तीनों प्रस्तुतियां परंपरा, स्मृति और मिथक के सहारे हमारे समय के जटिल प्रश्नों से संवाद करती दिखाई देती हैं।

‘द ओल्ड मैन एंड द सी’, ‘ समथिंग लाइक ट्रूथ’ और ‘ मिथ्यासुर’  इन तीनों प्रस्तुतियों को साथ रखकर देखें तो वे समकालीन रंगमंच की तीन अलग-अलग दिशाओं की ओर संकेत करती हैं। एक ओर परंपरा का नए संदर्भों में रूपांतरण है  तो दूसरी ओर इतिहास और स्मृति की पुनर्प्राप्ति, और तीसरी ओर मिथक के सहारे गहरे दार्शनिक प्रश्नों से मुठभेड़। शैली, संरचना और विषय में भिन्न होने के बावजूद, ये नाटक अपने समय की जटिलताओं को समझने और व्यक्त करने की एक साझा बेचैनी से जुड़े हुए हुए लगते हैं।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य और वैश्विक संवेदना

कथकली भारत के शास्त्रीय नृत्यों में एक है। हालांकि ये लगभग चार सौ साल ही पुराना है लेकिन इसे एक विश्वव्यापी प्रतिष्ठा भी मिली है। यूजीन बार्बा, रिचर्ड शेकनर और पीटर ब्रुक जैसे कई और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के रंगकर्मी केरल आकर कथकली से जुड़ चुके हैं और अपने रंगकर्म में उसके तत्वों को समाहित कर चुके हैं। दूसरे भारतीय रंगकर्मी भी इसके कुछ पहलुओं को अपने रंगकर्म में शामिल करते रहते हैं। आकस्मिक नहीं कि एक भारतीय शास्त्रीय नृत्य होने के बावजूद इसकी सौंदर्यभूमि का प्रसार हो रहा है। और ये कई स्तरों पर हो रहा है। भारत के बाहर के नर्तक, नृत्यांगनाएं, रंगकर्मी और नाट्य निर्देशक तो इसके प्रति आकृष्ट हो ही  रहे हैं, भारत, विशेषकर केरल के कथकली कलाकार भी विदेशी कृतियों की संवेदनाओं को भी अपने भीतर शामिल कर रहे हैं। इससे कथकली में भी एक वैश्विकता आ रही है। उसकी स्थानीयता सुरक्षित है पर उसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप भी विकसित हो रहा है।

हाल में दिल्ली के दर्शकों को इसका प्रमाण मिला इस बार के मेटा – (महेंद्रा थिएटर फेस्टिवल में) में। इसमें हुआ नाटक `द ओल्ड मैन एंड द सी’ – कथकली ऑफ मौरो’ (the old man and the sea -kathakali of morrow) इस लिहाज से एक  नायाब   प्रस्तुति रही। `द ओल्ड मैन एंड न सी’ अमेरिकी-अंग्रेजी के उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे का विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित उपन्यास है। केरल के रंगकर्मी और कथकली में दीक्षित नीरज जीएम ने इस उपन्यास और कथकली की शास्त्रीय शैली के मिश्रित कर ये नाटक तैयार किया। कमानी ऑडिटोरियम के मंच को ही प्रेक्षागृह में तब्दील कर इस नाटक को खेला गया। लगभग सौ के करीब दर्शकों के लिए ये विशिष्ट अनुभव की तरह था।

 हेमिंग्वे  का `द ओल्ड मैन एंड द सी’ एक मछुआरे की कहानी है। नाम है सांतियागो। सांतियागो बूढ़ा हो चुका है। उसकी इंद्रियां शिथिल हो रही हैं। फिर भी मछली पकड़ने का काम जारी रखता है हालांकि हाल के दिनों मे उसे विफलता ही मिल रही है। उसका एक शागिर्द भी है। एक कम उम्र का लड़का मनोलिन। हालांकि मनोलिन का परिवार ये मानता है कि उसे अब सांतियागो के साथ नहीं रहना चाहिए पर वो अपने उस उस्ताद की मदद करता रहता है।

समुद्र में एक बड़ी मछली है मर्लिन। सांतियागो उसे पकडना चाहता है। और बहुत मशक्कत करने के बाद उसे पकड़ भी लेता है। हालांकि समुद्र की दूसरी शार्क मछलियां शिकार हुई मर्लिन को अपना आहार बनाती रहती है। कहानी लंबी है पर मुख्तसर में यहां ये जानना जरूरी है ये एक बूढे मछुआरे और समुद्र व समुद्री जीवों को बीच संघर्ष की कहानी है। कह सकते हैं कि ये मनुष्य और प्रकृति के बीच संघर्ष की गाथा है। ये व्यक्ति की जीजिविषा और संकल्प की भी कहानी है।

नीरज जीएम द्वारा निर्देशित इस नाटक में ए सांतियागो नाम के बूढे मछुआरे की भूमिका मारियो नाम के इतालवी मूल के कथकली नर्तक ने निभाई है और मर्लिन मछली और दूसरे शार्क मछलियों की भूमिका कथकली के ही दूसरे कलाकारों ने। मारियो कथकली वेशभूषा में नहीं थे। वो आम मछुआरे की तरह लगते हैं। हालांकि चूंकि वे भी पिछले चालीस साल से केरल आकर कथकली का प्रशिक्षण लेते रहते हैं, इसलिए इस नृत्य के तत्व भी उनके अभिनय में हैं। उनके अलावा अन्य नृत्यांगनाएं भी इसमें हैं, जिनमें कुछ पारंपरिक कथकली वेशभूषा में नहीं हैं। भरत के नाट्यशास्त्र में वर्णित शास्त्रीय नृत्य की कई मुद्राएं इस प्रस्तुति में हैं। कथकली की वेशभूषा के कारण ये रंगारंग अनुभव भी बढ़ गया। दर्शक नृत्य भी देख रहा होता है और नाटक भी। कथकली के संगीत के कारण भी नाट्य प्रभाव में अतिरिक्त असर आ जाता है।

‘ओल्ड मैन एंड द सी’ सिर्फ एक प्रस्तुति के रूप में ही उल्लेखनीय नहीं है, बल्कि एक शुरुआत के रूप में भी इस पर ध्यान जाना चाहिए। कैसी शुरूआत? ये समझने की जरूरत है।

वैसे तो भरत के नाट्यशास्त्र में नृत्य भी नाट्य के अंतर्गत आता है लेकिन कई सौ बरसों से नाटक और नृत्य अलग अलग भी पहचाने जाते हैं। दोनों भिन्न विधाओं के रूप में देखे और सराहे जाते हैं। हालांकि नृत्य के दौरान भी अभिनय होता है इसलिए वे भी नाटकीय प्रस्तुतियां हैं। मगर नृत्य और नाटक के बीच आवाजाही होती रहती है और दोनों एक दूसरे को समृद्ध भी करते हैं। यहां वही हुआ है। नीरज जीम को इस प्रस्तुति को केरल कला मंडलम से भी काफी मदद मिली। नीरज वहां प्रशिक्षण भी देते हैं। इस तरह के संस्थागत पहल की वजह से रंगकर्म और नृत्य की दुनिया में प्रयोगशीलता आ रही है। इस तरह का प्रयोग दूसरे शास्त्रीय नृत्यों में भी हो सकता है, होना चाहिए। आखिर भरत नाट्यम, कथक या ओडिसी भी किसी उपन्यास को अपनी शैली में क्यों नहीं पेश कर सकते?

क्या स्मृति का सिर्फ लोप ही हो रहा है ?

( शांता गोखले के नाटक `समथिंग लाइक ट्रूथ’ के संदर्भ में)

ये अक्सर पढ़ने और सुनने में आता है कि हम स्मृतिहीनता के दौर में जी रहे हैं। कुछ हद तक ये बात सही भी है। लेकिन क्या ये पूरी तरह सही है? कदापि नहीं। इसलिए कि मनुष्य से उसकी स्मृति पूरी तरह कभी छीनी नहीं जा सकती। और कभी छीनी गई भी नहीं हालांकि उसके प्रयास होते रहे हैं। लेकिन हर संजीदा लेखक एक पुरातत्ववेत्ता भी होता है। गोताखोर भी कह सकते हैं। इतिहास और सभ्यता के अंदर जाकर वो उन स्मृतियों को फिर से सामने ला सकता है जिनके बारे में ये मान लिया जाता है दुनिया उनको भूल चुकी है। शांता गोखले ने अपने नाटक `समथिंग लाइक ट्रूथ’ में यही किया है। और ऐसा करते हुए वे सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि दूसरे देशों तक चली जाती हैं। आखिर मनुष्य और लेखक वैश्विक नागरिक भी हैं।

`समथिंग लाइक ट्रूथ’ इस लिहाज से भी उल्लखनीय है कि ये उस आख्यान को भी चुनौती देता है कि राजसत्ताएं हमेशा हमेशा के लिए किसी सच को दफन कर सकती हैं। सच तो सामने आएगा। दुनिया को कोई ने कोई लेखक उसे उजागर करेगा।

इस बार के मेटा समारोह में इसे नाटक को पर्ण पेठे के निर्देशन में खेला गया। इसमें चार एकालाप है और ये चार अभिनेत्रियों के हैं। शर्वरी देशपांडे, अश्विनी गिरि, दुशा और कल्यानी मूले। लेकिन नाटक के बारे में आगे बताने के पहले इसकी पृष्ठभूमि में बसी घटनाओं को भी बताना जरूरी है।

चार में पहले दो एकालापों की कहानी उन्नीसवीं सदी के फ्रांस से जुड़ी है। तब अल्फेड ड्रीफस का मामला काफी विवादास्पद हुआ था। ड्रीफस एक यहूदी था और फ्रांसीसी सेना में था। उसके खिलाफ सेना के ही अधिकारियों ने षडयंत्र किया। उसे जर्मन जासूस बताया गया हालांकि वो ऐसा नहीं था। उसे गिरफ्तार किया गया। मेरी नाम की एक महिला (शर्वरी) जो जर्मन खेमे में साफ सफाई का काम करती है, उससे कूड़े में पड़े कुछ कागज मंगवा कर ड्रीफस के विरुद्ध मामला बनाया गया। पूरे फ्रांस में बवाल मच गया। एमिल जोला, जो फ्रांसीसी के बड़े लेखक थे,  ड्रीफिस के पक्ष में ख़ड़े हुए पर तब उन्हें भी कई तरह की प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा। दूसरा एकालाप ड्रीफस की पत्नी लूसी का है।  तीसरा  जमीरा (दूशा) नाम की महिला का है जो जिसका चरित्र गुजरात में हुए बेस्ट बेकरी कांड पर आधारित है। चौथा श्रीलंका की पत्रकार (कल्याणी मूले) का है जो दरअसल वहां के एक पुरुष पत्रकार पर आधारित है।

इस तरह इस नाटक में भारत और दूसरे देशों में किस तरह सत्ताएं- राज्य, सैन्य प्रशासन, राजनैतिक नेता अपने अपने फायदों और छुद्र स्वार्थों के लिए मासूमों और  निरपराधों को प्रताड़ित करते हैं, इसको सामने लाता है। कई निरपराध इंसाफ से वंचित रह जाते। इस नाटक के चरित्र सिर्फ चार महिलाएं नहीं बल्कि इतिहास में सताए गए लोगों का समुच्चय है। हालांकि हर चरित्र के पीछे वास्तविक इतिहास है, लेकिन नाटककार ने लेखकीय आजादी की धारणा का इस्तेमाल करते हुए कल्पना के सहारे भी एक ऐसा आख्यान रचा है जिसका संबंध सत्य व आजादी से है। जैसे साफ सफाई करने वाली महिला मेरी के चरित्र  को शांता जी ने बिल्कुल कल्पना से रचा है।  लूसी का बयान भी बहुत कुछ लेखक की अपनी सोच है। बेस्ट बेकरी कांड में जिस महिला गवाह जाहिरा शेख को पुलिस ने बाद में मुजरिम बना दिया,  उसको इस नाटक में जमीरा नाम दिया गया ह। और लंकाई पत्रकार लासंता विक्रेमातुंगे, जिन्होंने पहले ही लिख दिया था कि उनकी हत्या वहां की सरकार कराएगी, वो पुरुष थे पर यहां उसे महिला पत्रकार में ढाल दिया गया है। वैसे ये श्रींलंका में प्रेस की आजादी का मामला है पर, नाटककार ने इसे जिस तरह लिखा है उससे ये सार्वदेशिक बन गया है। आज हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें शायद ही कोई देश हो जहां सच्चाई के लिए समर्पित पत्रकार, राज्य की ओर से सुरक्षित महसूस करते हों।

चूंकि ये अभिनेत्रियों का नाटक है इस कारण इसमें वो स्वर भी आ गया है जिसे नारीवाद या फेमिनिज्म भी कहते हैं। लेकिन इसमें सिर्फ फेमिनिज्म नहीं है। मूल बात को, नाइसांफी को सामने लाना है और जिस भुला दिए जाने की कोशिश की गई उसे सामने लाना है।  वैसे अमूमन चार एकालाप वाले नाटक कई बार बोरिंग हो जाते हैं पर ये निर्देशकीय दक्षता है कि ये शुरू से आखिर तक दर्शक को बांधे रखता है। नाटक का सेट भी न्यूनतम वाला है।

ईश्वर, अवतार और मिथ के आलोक में `मिथ्यासुर

ईश्वर सत्य है या एक धारणा- एक अतिप्राचीन बहस है, जो लगातार जारी है। और इसे लेकर युद्ध भी। फिर भी ईश्वर को लेकर नए नए प्रश्न भी उठते हैं। मेटा फेस्टिवल में हुआ नाटक `मिथ्यासुर’ इसी प्रश्न को फिर से उठाता है, लेकिन भारतीय संदर्भ में है। भारतीय संदर्भ में इसलिए कि हमारे यहां अवतारवाद  की धारणा है। ईश्वर का अवतार होता है,  ये विश्वास  सिर्फ भारत और हिंदू धर्म में है।

`मिथ्यासुर ‘ के लेखक प्रणय पांडे और निर्देशक अजीत सिंह पालावत ने इसी अवतारवाद के आलोक में ईश्वर की धारणा को लेकर नाटक बनाया है। ये अलग से कहने की जरूरत नहीं कि आज के जमाने में ये जोखिम का काम भी है। लेकिन लेखक और निर्देशक, दोनों की ये काबलियत है कि उन्होंने इस विषय को ऐसे निबाहा कि वैचारिक पक्ष भी सामने आया और दर्शकों को इसका मजा आया।

नाटक में एक राक्षस-राज है जो एक राज परिवार के मंदिर मे अधिष्ठित है। एक पुजारी वहां है जो उसकी पूजा करता है। राजा राक्षस-राज से युदध की अनुमित लेने आता है, लेकिन उसक बेटी रेवती चाहती है कि युद्ध न हो। युद्ध होगा कि नहीं इसका फैसला राक्षस राज को करना है। लेकिन सीधे सीधे आकर नहीं। प्रत्य़क्ष दर्शन देकर नहीं। बल्कि पुजारी के स्वप्न में आकर।  मंदिर में प्रथा है कि पुजारी हर स्वप्न को अपनी बही में दर्ज करेगा। राज परिवार उस बही को नियमित देखता है। चूंकि राक्षस राज एक अरसे से पुजारी के स्वप्न में आया ही नहीं इसलिए बही में कुछ दर्ज ही नहीं। राजा चाहता है कि पुजारी राक्षस राज से युद्ध की अनुमित ले। लेकिन राजा की बेटी कुछ खेल खेलती है। वो पुजारी से कहती कि वो गर्भवती है और राक्षस राज की संतान की मां बनने वाली है। यानी राक्षस राज उसके माध्यम से अवतार लेने वाला है।

इसी बीच राक्षस राज पुजारी के स्पप्न के में आता है और कहता है कि रेवती झूठ बोल रही है और वो तो अवतार लेने को इच्छुक ही नहीं है। अब पुजारी क्या करे? वो राजा को नाराज करे या राजा की बेटी को झूठी बताकर उसके गुस्से का शिकार बने? खैर, अंत में पुजारी रास्ता निकाल लेता है। वो कुछ और कह देता है।

नाटक में दो चीजें बहुत प्रभावशाली हैं। एक तो राक्षस राज के रूप में साहिल आहूजा का अभिनय़। राक्षस राज शुरू में थोड़ा भयानक लगता है, लेकिन धीरे धीरे उसके व्यक्तित्व में हास्य उभरने लगता है। निर्देशक पालावत ने कथकली की वेशभूषा का इस्तेमाल करते हुए राक्षस राज के वेश को थोड़ा आधिदैविक तो बना दिया है लेकिन उसमें कॉमेडी के तत्व को मिलाकर उसे लोकरंजक भी बना दिया है। जब राक्षस राज पुजारी से कहता है कि वो अवतार लेना ही नहीं चाहता, क्योंकि अवतार लेने में बहुत झंझट है तो हंसी भी छूटती है। बतौर अभिनेता साहिल ने एक ऐसी भूमिका निभाई है जिसमें राक्षस राज का रौद्र भी दिखता है लेकिन रौद्रता के पीछे का `सेंस ऑफ ह्यूमर’ भी सबके समझ आता है। राजा की बेटी रेवती की भूमिका में प्रतीक्षा कोटे के रोल में भी पेचीदगी है। वो युद्ध नहीं चाहती लेकिन चालाक भी है। ये पेचीदगी यहां उभरती है। पुजारी सोमदेव विजय पाटीदार भी मंदिरों में बैठे पंडो की छवि से अलग हैं। अमूमन ये छवि बनी है कि पुजारी धूर्त होते है, लोगों को बेवकूफ बनाते रहते हैं। लेकिन सोमदेव धूर्त नहीं है। ईमानदार है। पर आखिर में राह निकाल लेता है समस्या का समाधान कैसे निकाला जाए।

 क्या ईश्वर एक मिथ्या है? या आज की आधुनिक शब्दावली में कहा जाए तो क्या जिस हम ईश्वर मानते हैं वो क्या एक मिथ है?  नास्तिकों और आधुनिक मिजाजवालों का कहना है कि वो मिथ है। नाटक कोई ठोस जवाब नहीं देता। न हां कहता और न ना। लेकिन वो हमारे दिमाग में प्रश्न डालता है कि ईश्वर क्या है?  क्या ईश्वर की कोई अपनी इच्छा होती है, क्या ईश्वर खुद भी अवतार लेना चाहते हैं या सब मिथ है?` मिथ्यासुर‘ ईश्वर की धारणा को लेकर परीक्षण करता है। प्रश्न सनातन भी है और समकालीन भी। और मनोरंजक भी।

अंततः, ये तीनों प्रस्तुतियां यह स्पष्ट करती हैं कि रंगमंच आज भी अपने समय से गहरे संवाद में है।वह चाहे परंपरा को नए अर्थ देना हो, भूली हुई स्मृतियों को उजागर करना हो या फिर विश्वास और मिथक पर सवाल उठाना ; मंच  आज भी इन सबका जीवंत माध्यम बना हुआ है। यही उसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता और ताकत है।

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रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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