अपनी किताब ‘नो फ़ुल स्टॉप्स इन इंडिया’ के पहले पन्ने पर मार्क टली ने लिखा—
‘पत्रकारों का सबसे बड़ा मोह यह होता है कि जो कहानियाँ वे लिखते हैं, उन्हें अपनी मानें। मगर वे उनकी नहीं होतीं—वे दरअसल उन लोगों की कहानियाँ होती हैं, जो रिपोर्ट की गई घटनाओं में शामिल होते हैं। पत्रकार कोई नायक नहीं है। नायक तो दरअसल वे लोग हैं जो अकाल या बाढ़ से जूझते हैं, क्रूरता या उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ते हैं, वे जो शासन करते हैं और वे जो उनका विरोध करते हैं। इस बात का एहसास मुझे बहुत शिद्दत से तब होता है, जब मैं क़ुदरती तबाहियों के बीच से “एक बढ़िया स्टोरी” की सामग्री रिकॉर्ड करके, पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़कर लौट आता हूँ।’
उनकी यह बात किसी पत्रकार की मानवीय संवेदनाओं, उसकी जनपक्षधरता, पेशे की ईमानदारी और साफ़गोई की शिनाख़्त तो करती ही है, एक पेशेवर के तौर पर मार्क टली के अपने फ़लसफ़े का बयान भी है। तभी तो उनके इस इनकार के बावजूद अवाम ने उन्हें अपना नायक माना। एक पत्रकार के तौर पर नाम और शोहरत, सम्मान और उपाधियों से परे दशकों तक वे लोगों के बीच एक भरोसेमंद आवाज़ बने रहे। ऐसा भरोसा, जिसका उत्स उनके इसी फ़लसफ़े में था—निर्भीकता और निष्पक्षता से अपनी बात कहने में, और उनके चेहरे पर बनी रहने वाली मुस्कान में, जो व्यक्ति के तौर पर उनकी पहचान रही।
निष्पक्षता का उनका जज़्बा अवाम के दिलो-दिमाग़ पर कितने गहरे तक पैठा हुआ था, टेलीविज़न के पहले के युग में पूरे दक्षिण एशिया में बीबीसी की न्यूज़ सर्विस पर लोगों के भरोसे से इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है। तब जब बीबीसी रेडियो पर सुनी गई ख़बरें यक़ीन करने लायक़ नज़ीर हुआ करती थीं—गपशप के अड्डों से लेकर गंभीर बातचीत करने वालों के बीच भी। उनकी ख्याति किसी किंवदंती सरीखी हो चुकी थी।
भारत में और एशिया के दूसरे देशों में भी कितनी ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को दुनिया ने उनकी रेडियो-रिपोर्ट्स के हवाले से जाना था। उनकी निष्पक्षता हमेशा, हर किसी को रास आती रही हो, ऐसा भी नहीं। कई वाक़ये पेश आए, जब उनका यह पेशेवर हुनर उन पर भारी पड़ गया—इमरजेंसी के दौरान जब सरकार ने दूसरे विदेशी पत्रकारों के साथ उन्हें भी चौबीस घंटे में देश छोड़ने का हुक्म दिया था, और तब भी जब अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ ने ‘मार्क टली मुर्दाबाद’ और ‘बीबीसी मुर्दाबाद’ के नारे लगाए थे। उस वक़्त भी, जब बीबीसी की नीतियों में बदलाव से असहमत होकर उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था।
पत्रकारिता की दुनिया के दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की तरह ही मार्क टली के लिए भी ऐसे अप्रिय प्रसंग शायद अनहोनी नहीं रहे होंगे। इमरजेंसी में उन्हें देश निकाला मिला था, पर इंदिरा गाँधी का इंटरव्यू उन्होंने कई बार किया, और मानते थे कि कई प्रधानमंत्रियों के मुक़ाबले इंटरव्यू के मामले में वह ज़्यादा उदार थीं। इंदिरा गाँधी से उनकी मुलाक़ात का एक क़िस्सा उन्हीं के हवाले से—
बीबीसी के एक और महानिदेशक को मैं उन दिनों इंदिरा गाँधी से मिलाने ले गया, जब इमरजेंसी के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार जा चुकी थी और वह फिर से सत्ता में थीं। वह महानिदेशक पहले राजनीतिक संवाददाता रह चुके थे, सो उन्होंने सीधा सवाल दागा—‘देश के लोगों का समर्थन खो देने के बाद आपको कैसा लगा था?’ मुझे उम्मीद थी कि इस तरह के सवाल का वह कोई सख़्त जवाब देंगी। मगर मेरी उम्मीद के उलट इंदिरा गाँधी मुस्कराईं और बड़ी विनम्रता से कहा—‘मेरे देश के लोगों ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा। अफ़वाहों से वे सिर्फ़ गुमराह हो गए थे।’ थोड़ा ठहरकर वह फिर मुस्कराईं और कहा—‘और इनमें से तमाम अफ़वाहें बीबीसी ने फैलाई थीं।’ उन महाशय ने इसका हल्का प्रतिवाद किया और फिर बात बदल दी।

भारतीय समाज और सियासत की उनकी समझ गहरी और अनुभवजन्य थी। 1985 में बीबीसी के अपने सहयोगी सतीश जैकब के साथ मिलकर लिखी हुई उनकी किताब ‘अमृतसरः मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटल’ से भी इसे समझा जा सकता है। इसकी शुरुआत में ही उन्होंने लिखा-
‘अमृतसर, श्रीमती गाँधी की आख़िरी लड़ाई, सिखों के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं थी। यह ऐसा समुदाय है जिससे श्रीमती गाँधी हमेशा बहुत लगाव रखती थीं। यह एक ऐसी लड़ाई थी जिसमें फ़ौज, बख़्तरबंद गाड़ियों और तोपख़ाने का इस्तेमाल सिखों के एक छोटे से गुट के ख़िलाफ़ किया गया था, जिन्होंने स्वर्ण मंदिर परिसर में क़िलेबंदी करके उसे भारत सरकार की सत्ता को चुनौती देने के लिए आधार के तौर पर इस्तेमाल किया था। अफ़सोस की बात यह है कि बहुतेरे सिख यह बात नहीं मानते। वे कहते हैं कि सचमुच यह उनके समुदाय के ख़िलाफ़ लड़ाई थी।’
‘श्रीमती गाँधी की हत्या होने के पहले से ही हमने इस किताब पर काम शुरू कर दिया था। क्योंकि हमें पूरा अहसास था कि अगर यह बात नहीं समझी गई कि ऑपरेशन ब्ल्यूस्टार की ज़िम्मेदारी सिख नेतृत्व पर भी उतनी ही है, जितनी भारत सरकार पर, तो भारत की एकता के संदर्भ में इस दुर्घटना के बहुत गंभीर नतीजे होंगे। श्रीमती गाँधी की हत्या की त्रासदी ने हमारे विचारों को सच ही साबित किया।’
भारत से उनका लगाव पत्रकारिता के अपने लगाव से कहीं ज़्यादा था। बीबीसी की नौकरी के दौरान और उसके बाद भी वह देश भर में घूमते रहे। ख़ासतौर पर क़स्बों और गाँव-देहात में आम लोगों से मिलना, उन्हें क़रीब से जानना और उनकी ज़िंदगी की कहानियाँ लिखकर दुनिया को बताना उन्हें ज़्यादा रास आता था। अंग्रेज़ी हुकूमत की तर्ज़ पर हिंदुस्तानी नौकरशाही की कारगुज़ारी उन्हें नागवार लगती थी। पश्चिम की तरह के उपभोक्तावाद को तरक़्क़ी का ज़रिया मानने से उन्हें इनकार था, और उनके लेखन में यह बात बार-बार सामने आती है। उनकी किताबें, उनके रिपोर्ताज और कहानियाँ इसकी गवाह हैं।
हाल के दिनों में संस्मरण की तर्ज़ पर उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखकर पूरी की थी—‘अ वेरी लकी मैनः द मेमॉयर्स ऑफ़ अ रेडियोवाला’। अब वह छपकर आए तो उनके अनुभवों के ख़ज़ाने से कुछ और नई-अनजानी बातें मंज़र-ए-आम पर आएँ।
उनकी रेडियो रिपोर्ट्स के मुक़ाबले में मैंने उन्हें उनकी किताबों के मार्फ़त ही ज़्यादा जाना है। उनके रिपोर्ताज के मौज़ू, उनकी दृष्टि और कहन के बारे में यक़ीन के साथ कहा जा सकता है कि ये दिलचस्प या मारक निष्कर्ष भर नहीं हैं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को देखने-सोचने और अवाम की ज़िंदगी को क़रीब से जानने के लिए नई खिड़कियाँ खोलते हैं।
यहाँ उनकी तमाम किताबों या रिपोर्ताज के नाम लिए जा सकते हैं, मगर कुछ का ज़िक्र पर्याप्त है—चुनार के इक्कावान मोहम्मद इस्लाम (द इक्कावाला लैमेंट), बलरामगाँव की बाँझ रानी (द बैरेन वूमन ऑफ़ बलरामगाँव), रामचंदर की कहानी या ‘द रीराइटिंग ऑफ़ द रामायण’ के क़िस्से। इनके ज़रिए वह भारतीय समाज और मानस के बारे में अपनी गहरी समझ का परिचय देते हैं। इलाहाबाद के कुंभ मेले पर उनका रिपोर्ताज ‘द कुंभ मेला’ भी इसमें जोड़ा जा सकता है।
संयोग से मुझे उनके एक कहानी-संग्रह ‘अपकंट्री टेल्सः वन्स अपॉन अ टाइम इन द हार्ट ऑफ़ इंडिया’ का हिंदी अनुवाद करने का मौक़ा मिला। तब उनके इस नए हुनर से भी परिचय हुआ। आम तौर पर लगता है कि अख़बारनवीस के पास कहानी लिखने लायक़ कल्पनाशीलता नहीं होती, पर मार्क टली अपवाद रहे। पूर्वांचल की ग्राम्य पृष्ठभूमि में रची गई ये सात कहानियाँ उनके अख़बारनवीसी के अनुभवों का ही विस्तार हैं। उनकी भाषा में पत्रकारिता के अनुभव और क़िस्सागोई का अनूठा मेल है, साथ ही वेधक व्यंग्य और वक्रोक्तियाँ भी अंतर्निहित हैं।
दिलफ़रेब क़िस्सागोई के अंदाज़ में ये गुज़री सदी में हमारे देश में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की कहानियाँ हैं। ये प्रजातंत्र में राजनेताओं, नौकरशाहों और लोप हो चुकी सामंतशाही के अवशेषों के गठजोड़ में फँसे आम आदमी और तरक़्क़ी के उसके सपनों की ऐसी तस्वीर रचती हैं, जो भले चौंकाती नहीं, मगर यह अहसास ज़रूर दिलाती हैं कि आपने इन्हें पहले भी सुना है। इनके किरदार पहचाने हुए लगते हैं—और यही इनकी ताक़त है। मेरे नज़दीक इस संग्रह की सबसे दिलचस्प कहानी ‘स्लो ट्रेन टू संतनगर’ के हिंदी शीर्षक ‘धीमी वाली फ़ास्ट पैसेंजर’ से ही इस संग्रह को अपना नाम मिला।
मेरी उनसे दो-तीन बार की मुख़्तसर मुलाक़ातें हुई हैं। मैंने उन्हें हमेशा सजग और गर्मजोशी से भरा हुआ पाया। आप उनसे किसी भी विषय पर बात कर सकते थे, मगर उन्हें मन से बोलते देखने के लिए विषय का उनके मन का होना ज़रूरी था।
चंडीगढ़ में मेरी नौकरी के दिनों में वह चितकारा इंस्टीट्यूट के पत्रकारिता विभाग के बुलावे पर वहाँ आए थे। इंस्टीट्यूट मेरे दफ़्तर की ऊपर वाली मंज़िल पर ही था और मैं भी आमंत्रित था। वे विद्यार्थियों से बात करके फ़ारिग़ हुए तो चाय लेकर हम साथ बैठे। बातचीत चल ही रही थी कि दूसरे अख़बार के एक साथी भी उनसे मिलने आ पहुँचे। मुझे ख़ूब याद है कि बहुत जतन करके उन्होंने अख़बारनवीसी के मौजूदा सरोकारों पर अंग्रेज़ी में सवाल किया—शायद इसलिए कि उनका नाम मार्क टली था। मार्क ने बड़े मज़े से उन्हें हिंदुस्तानी में जवाब दिया। बाद में उन्होंने बताया था कि उनके साथ अकसर ऐसा होता है—लोग अपनी तरफ़ से ही मान लेते हैं कि उनसे हिंदी में बात नहीं की जा सकती।
2013 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में एक रात उनसे फिर भेंट हो गई। वे बीबीसी के चैनल फ़ोर के लिए कोई रेडियो ड्रामा बनाने आए हुए थे। मेले के मौक़े पर वे पहले भी आते रहे हैं। कड़ाके की सर्दी थी और उन्हें सिर्फ़ क़मीज़ में देखकर, जैकेट पहने होने के बावजूद, मुझे झुरझुरी होने लगी। उनका कुंभ वाला रिपोर्ताज पढ़ा था, तो मेले में हुए बदलावों के बारे में उनसे पूछा। तय हुआ कि उनके तंबू में मिलकर बात होगी, पर कुंभ का मेला तो इसी लिए होता है कि वहाँ एक बार बिछड़कर फिर मिलना आसान नहीं होता।

