हम भोपाल में थे- संभवतः विश्व रंग के कार्यक्रम में। रात गपशप के बाद ऊपर से उतरते हुए अचानक ममता जी (कालिया) का पांव फिसला और वे गिर पड़ीं। हम घबरा से गए। अस्सी पार की उम्र हल्की चोट भी कितनी बड़ी होती है- इसका अनुमान तो लगाया जा सकता है। लेकिन ममता जी हल्के सहारे से उठ खड़ी हुईं- उस समय भी उनके चेहरे पर वह जानी-पहचानी हंसी थी जो अमूमन रहती है। उन्होंने किसी दर्द का कोई एहसास नहीं होने दिया। बस संकोच में पड़ी हंसती रहीं जैसे बच्चों में गिरते हुए एक संकोच सा होता है। अगली सुबह भी वे उसी तरह मिलीं। नाश्ते पर हम कई लेखक थे। मैंने चर्चा छेड़ी, उन्होंने हंसते हुए कहा ‘कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ।’ मैंने मज़ाक में कहा- ‘सच बताइए, वरना अख़बार में छपवा दूंगा कि ममता कालिया सीढ़ियों से गिर पड़ीं।’ वे हंसती रहीं।
बाद में अलग से धीरे से कहा-‘ हाथ में वाकई दर्द है। अब ठीक से याद नहीं है, मैंने उनके लिए कुछ दवाएं ख़रीदीं। उन्होंने जबरन पैसे पकड़ाए- ‘नहीं, मैं किसी से नहीं लेती, बेटों से भी नहीं।‘ इस आग्रह में अकड़ नहीं थी, कोई अभिमान नहीं था। वह सहजता थी जिसके साथ वे अपनी बात रखती रही हैं। तो अपनी तकलीफ़ साझा न करने की ज़िद, हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहने की आदत और ज़रूरत पड़े तो अपने स्वाभिमान को व्यक्त करने की सहज हिम्मत- इससे ममता जी का जीवन भी बनता है और लेखन भी। यह सच है कि मैंने उन्हें रवींद्र कालिया के रहते कम देखा। बस उनके संस्मरण पढ़े- पहले ‘रवि कथा’ में और फिर ‘जीते जी इलाहाबाद’ में। लेकिन दिल्ली के हाशिए पर ग़ाज़ियाबाद के एक विकसित हो रहे कोने को उन्होंने अपनी उपस्थिति से बस केंद्रीय बना डाला। अकेले रहते हुए जैसे एक मेला वे शब्दों का लगाती रही हैं- मित्रों का भी। उनको साहित्य अकादेमी मिलने पर हिंदी में उल्लास का जो माहौल है, उसकी एक वजह उनकी ज़िंदादिली भी है।
लेकिन सच तो यह है कि जो पुरस्कार ममता जी को बीस साल पहले मिल जाना चाहिए था- वह अब मिला है- ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान।
लेकिन साहित्य अकादेमी की पुरस्कार सूची को देखें तो पता चलता है कि यह अपवाद का मामला नहीं है- यही नियम है।
जब लेखक अपनी श्रेष्ठतम कृतियां लिख ले, जब वह अपने संघर्षों से पार पा चुका हो, तब अचानक उसके झोले में किसी पके फल सा यह पुरस्कार गिर पड़ता है। मुदुला गर्ग, रमेशचंद्र शाह, नंदकिशोर आचार्य, रमेश कुंतल मेघ, नासिरा शर्मा, रामदरश मिश्र, चित्रा मुद्गल, संजीव- सब इसी दुर्घटना के शिकार हुए हैं और अब ममता कालिया इसकी नई कड़ी भर हैं। हालांकि बेशक, इसके अपवाद भी हैं। इसी दौर में बदरी नारायण को काफी कम उम्र में मिल गया।
वैसे साहित्य अकादेमी इन दिनों अपना सम्मान खोती जा रही संस्था है- कई और संस्थाओं की तरह। वह एक सरकारी संस्था हो चुकी है जिसके पुरस्कार मंत्रालय के इशारे पर रोक लिए जाते हैं। इस साल यही हादसा लगभग अपमानजनक ढंग से घटा, जब प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने और पत्रकारों के इंतज़ार करने के बावजूद अचानक सूची रोक ली गई है। अब वह सूची आई है तो हमें नहीं मालूम कि इसमें किनके नाम बदले गए हैं या फिर बस मंत्रालय की हेठी की वजह से इसे रोका गया। इसके बावजूद साहित्य अकादेमी अंतत: लेखकों की संस्था है और कभी इसका मिज़ाज और चरित्र बदलेगा, यह उम्मीद बिल्कुल बेमानी नहीं है। इस वजह से भी ममता कालिया के नाम इस सम्मान की घोषणा खुशी देती है।
बीते कुछ वर्षों से वे हिंदी के लोकवृत्त में अपनी सार्वजनिक उपस्थिति के साथ हिंदी की तमाम पीढ़ियों के लेखकों पर जो ममता लुटाती रही हैं, उसका कुछ हिस्सा मुझ तक भी आता रहा है। वे शायद लेखकों के बीच सबसे प्रिय और लोकप्रिय लेखकों में हैं। वे खूब पढ़ती हैं और कई बार उनकी उदारता कुछ अपात्र कृतियों पर भी दिखती है। मेरे उपन्यास ‘ज़िंदगी लाइव’ की भी उन्होंने भूरि-भूरि तारीफ़ की। कहा कि वे उसे लगातार पढ़ती रहीं- रात दो बजे जब लगा कि तबीयत बिगड़ जाएगी तो सुबह के लिए छोड़ा। फिर सुबह उपन्यास पढ़ कर अपनी बहू को सुनाया।
हालांकि यह बात मैंने जब चित्रा मुद्गल जी को बताई तो उन्होंने कहा कि ममता ने दरअसल तुम्हारा उपन्यास मुझे सुनाया था। इस प्रसंग की चर्चा बस इसलिए की कि नए लेखकों और नई कृतियों के प्रति उनका सहज उत्साह बता सकूं। वैसे उनको साहित्य अकादेमी दिए जाने पर मेरी खुशी की वजह दूसरी है। अपनी किशोर उम्र से ही जिन लेखकों का गद्य मुझे अत्यंत प्रिय रहा है, उनमें ममता जी हैं। ऐसा विहंसता हुआ- वाग्मिता से भरा- गद्य हिंदी की कृत्रिम गुरु-गंभीर मुद्रा वाली कंकड़नुमा भाषा के बीच अलग तरह की राहत देता रहा है। उनमें विलक्षण क़िस्सागोई है।
उनके उपन्यासों ‘नरक दर नरक’ और ‘बेघर’ को सबसे पहले पढ़ा था। उन्हीं दिनों यह समझ में आया कि बड़ी सहजता से, हंसते-मुस्कुराते, ममता जी काफी गंभीर वैचारिक लेखन कर डालती हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनका लेखन बहुपरतीय नहीं है, लेकिन शायद इस बहुपरतीयता की उनको ज़रूरत भी नहीं है। वे बहुत भारी-भरकम पंक्तियां नहीं लिखतीं, बहुत गहन-गझिन वाक्य नहीं रचतीं, लेकिन एक उल्लसित और जगमग बतकही उनकी भाषा को बहुत जीवंत बनाती है। उनको अक्सर मालूम होता है- कौन सी बात कहां से शुरू करनी है, उसे किस तरह दिलचस्प बनाए रखना है।
उनकी कुछ कहानियां तो मुझे बेहद महत्वपूर्ण लगती हैं।
कभी इंडिया टुडे के किसी विशेषांक में उनकी एक कहानी छपी थी। कहानी में एक ब्राह्मण लड़का अपने लिए एससी का प्रमाण पत्र बनवा कर किसी बड़े इंजीनियरिंग संस्थान में दाख़िला ले लेता है। वहां वह पाता है कि उसकी प्रतिभा से सब अभिभूत हैं, उसकी दलित पहचान उसके सम्मान में आड़े नहीं आती। उसे लगता है कि यहां तो कोई जातिगत भेदभाव नहीं है। लेकिन जब वह एक लड़की से प्रेम करता और शादी की सोचता है तो पाता है कि उसकी ओढ़ी हुई जाति उसके आड़े आ गई। ममता कालिया ने यह कहानी तब लिखी थी जब प्रीमियर शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के आरोप लगने शुरू नहीं हुए थे। इसी तरह उनकी एक और कहानी किसी पत्रिका में छपी थी- बहुत नामालूम ढंग से। किसी काम से एक गांव गई एक अभिजात क़िस्म की महिला को वापसी में बहुत देर हो जाती है। अंधेरा हो चुका है और वह बस में घबराई सी बैठी है। तभी एक बेफ़िक्र सी गांव की महिला आती है और साथ बैठ जाती है। दोनों की बातचीत में पता चलता है कि वह महिला किसी भी नतीजे से डरने वाली नहीं है। यहां तक कि रेप के हौवे को भी वह अपने ऊपर हावी होने देने को तैयार नहीं है।
ममता जी खूब लिखती हैं, कभी-कभी लापरवाह भी दिखती हैं, लेकिन यह लापरवाही भी मुझे सुंदर लगती है। शायद इसलिए भी कि मैं भी एक लापरवाह लेखक ही हूं। बहुत लिखता हूं और इस बात की परवाह नहीं करता कि जो लिखूं, वह मास्टरपीस ही हो। गीतांजलि श्री ने अपने उपन्यास ‘रेत समाधि’ में एक जगह लिखा है कि स्त्रियों का लेखन सीटी-घंटी लेखन होता है। यानी वे प्रेशर कुकर की सीटी और आने-जाने वालों की कॉलबेल के बीच लिखती रहती हैं। ममता जी ऐसी ही लेखिका हैं- बगल में पकती रोटी के साथ वे कागज़ पर कहानियां पकाती रही हैं।
ममता जी की एक और ताक़त उनका वैचारिक खुलापन है। शायद उम्र ने, अनुभव ने या फिर पहले से चले आ रहे अभ्यास ने, इसमें एक और ताक़त जोड़ी है। वे अपनी बात पर मज़बूती से टिकी रहती हैं। विवादों से कतराती नहीं और कई बार असहमत होने को मजबूर करती हैं। क़रीब साल भर पहले एक ऐसा अवसर था जब मैंने ख़ुद को उनके रुख से असहमत ही नहीं, असंतुष्ट भी पाया, लेकिन इसके बावजूद उनकी शख्सियत में कुछ था जिसने मुझे उनसे जोड़े रखा। उनकी कृतियों ‘रवि कथा’ और ‘जीते जी इलाहाबाद’ में उनका खुलापन भी दिखता है और अपने ढंग से जिसे सच समझा, उसे कहने का साहस भी। दरअसल उनका लेखकीय वैभव संस्मरणों में सबसे ज़्यादा खुलता है। ‘तद्भव’ में जब उन्होंने ‘कितने शहरों में कितनी बार’ जैसा स्तंभ लिखा तो वह बेहद पठनीय साबित हुआ। ‘रवि कथा’ में कहीं भी वे उदासी या मायूसी को हावी नहीं होने देतीं, हालांकि चाहतीं तो वहां इसकी गुंजाइश भरपूर थी। लेकिन किसी तरह की आत्मदया शायद उन्हें मंज़ूर नहीं है। उनकी ज़िंदादिल शख्सियत हमेशा उजले पक्षों की तलाश में रहती है- या कम से कम उन्हीं में रस लेती है। ज़रूरत पड़ने पर कटु प्रसंगों से पलायन भी उनका स्वभाव नहीं है। हालांकि वे कभी भी जान-बूझ कर, सुनियोजित ढंग से कोई विवाद पैदा नहीं करतीं, लेकिन उनकी सहज शैली में कोई बात चली आए तो उसे रहने देती हैं।
हालांकि फिर दुहराने की इच्छा होती है कि एक संस्था के रूप में साहित्य अकादेमी की जिस तरह दुर्गति हुई है, उसे देखते हुए उसके किसी भी पुरस्कार का कोई अर्थ नहीं रह जाता। शायद यह हालत हिंदी के ज़्यादातर पुरस्कारों की होती जा रही है। फिर भी किसी अपने को ऐसा कोई सम्मान मिलता है तो अच्छा लगता है। ममता कालिया हमारे समय की शान हैं। वे 85 पार की हैं, लेकिन ख़ूब सक्रिय हैं। हालांकि उनकी देह पर उम्र का हमला दिखता है। कई बार लगता है, उनको सुनने में कुछ समस्या होती है। लेकिन दुनिया बहुत सुनने लायक बची नहीं है,. वैसे भी इन दिनों शोर- एक शायर के लफ़्ज़ों में- ‘इतना है कि वह सुनाई नहीं दिखाई पड़ता है।’ वैसे भी लेखक आंख-कान से नहीं, अपने भीतर के किसी हिस्से से देखते-सुनते हैं- रोशनी को भी अंधेरे को भी, शब्दों को भी और चुप्पी को भी।
ममता जी ने बीते दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि उनकी उम्र पर लोग न जाएं, उनके पास अब भी बहुत कहानियां बची हुई हैं। तो अभी हमें मिलने वाली हैं और भी कहानियां। जीते जी इलाहाबाद लौटता रहेगा, बार-बार एक नई दुनिया खुलती रहेगी।

