मुंबई: भारत में चुनाव के दौरान मतदाता की उंगली पर बैंगनी रंग का निशान एक आम दृश्य है। इसे न मिटने वाली स्याही भी कहा जाता है। इसका मकसद यह है कि धांधली रोकी जाए और जिसकी उंगली पर निशान लगा है, इसका मतलब कि वह व्यक्ति वोट दे चुका है। हालांकि, गुरुवार को महाराष्ट्र में हुए नगर निगम चुनावों के दौरान यह विवाद का विषय बन गया। विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि जो स्याही जल्दी मिटनी नहीं चाहिए, वह आसानी से मिट रही है। इससे चुनाव में धांधली की गुंजाइश बनी।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे से सहित कांग्रेस और कई दूसरी विपक्षी पार्टियों ने ये मुद्दा उठाया। वोट डालने के बाद मीडिया से बात करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि सरकार किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना चाहती है। सरकार ने तय कर लिया है कि इस चुनाव को किसी भी तरह जीतना है। ये वही तरीका है जो उन्होंने विधानसभा चुनावों में अपनाया था। पहले अमिट स्याही इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब मार्कर का उपयोग किया जा रहा है। ये मार्कर सैनेटाइजर से आसानी से साफ हो जाता है। ऐसे चुनाव जीतकर सत्ता में आना लोकतंत्र नहीं कहला सकता।
क्या है ये स्याही, कब से हो रहा भारत में इस्तेमाल
वोटिंग के बाद वोटर की उंगली पर न मिटने वाली स्याही लगाई जाती है। इसका मकसद सिर्फ यह पक्का करना है कि कोई भी एक से ज्यादा बार वोट न दे। अमूमन यह निशान कई दिनों तक उंगली पर रहता है और आसानी से नहीं मिटता। पूरी तरह इसके खत्म होने में दो से तीन हफ्ते या कुछ ज्यादा समय भी लग जाता है। इसलिए इसे नहीं मिटने वाली स्याही भी कहा जाता है।
भारत ने 1962 में अपने तीसरे आम चुनाव के दौरान इस न मिटने वाली स्याही का इस्तेमाल शुरू किया। यह पक्का करने के लिए कि लोग एक से ज्यादा बार वोट न दें, भारत के चुनाव आयोग ने वोटरों की उंगलियों पर स्याही का निशान लगाने का फैसला किया। यह तरीका काम आया और तब से इसका इस्तेमाल हो रहा है।
इस इंक में सिल्वर नाइट्रेट होता है, जो स्किन और लाइट के साथ रिएक्ट करके एक गहरा निशान छोड़ देता है। यह दाग तभी हल्का होता है जब स्किन की ऊपरी परत हट जाती है। इंक में एक डाई भी होती है ताकि यह साफ दिखाई दे।
कौन बनाता है ये स्याही?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार चुनाव द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पक्की स्याही एक खास फॉर्मूले से बनाई जाती है, जिसे 1950 के दशक की शुरुआत में भारत की नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ने डेवलप किया था। यह स्याही अभी सिर्फ मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (Mysore Paints and Varnish Ltd) बनाती है, जो मैसूर में कर्नाटक सरकार की एक कंपनी है। यह कंपनी चुनाव आयोग और केंद्रीय कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय के साथ करार के तहत काम करती है।
यह कंपनी पूरे देश में चुनावों के लिए पक्की स्याही सप्लाई करती है। चुनाव आयोग और भारत सरकार की मंजूरी से इसने अफगानिस्तान, कंबोडिया, केन्या, मंगोलिया, नेपाल और नाइजीरिया जैसे कई देशों को भी इसका निर्यात किया है।
स्याही आमतौर पर बाएं हाथ की तर्जनी उंगली पर नाखून और उसके बेस की स्किन पर लगाई जाती है, जहाँ से इसे हटाना मुश्किल होता है। इसे बोतलों, ब्रश या मार्कर पेन से लगाया जा सकता है। पोलिंग कर्मचारी को निर्देश दिया जाता है कि वे मतदाता के वोट डालने के बाद ही स्याही लगाएं। महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव में, स्याही को सीधे नाखूनों पर ब्रश से लगाने के बजाय, इसके लिए स्याही वाले मार्कर पेन का इस्तेमाल किया गया था।
आम तौर पर त्वचा पर यह निशान तीन से चार दिन तक दिखना चाहिए। नाखून पर दाग दो से चार हफ्ते तक रह सकता है। यह कितने समय तक रहता है, यह त्वचा और इस बात पर भी निर्भर करता है कि स्याही ठीक से लगाई गई थी या नहीं।
महाराष्ट्र में क्या विवाद हुआ?
महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों के दौरान कुछ मतदाताओं और विपक्षी पार्टियों ने दावा किया है कि मतदान के बाद लगाई गई स्याही आसानी से मिट रही है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए वीडियो में सैनिटाइजर या नेल पॉलिश रिमूवर से स्याही के निशान मिटाते हुए दिखाया गया है, खासकर उन जगहों पर जहां मार्कर पेन का इस्तेमाल किया गया था।
इस पर विवाद हुआ और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हुईं। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने सरकार और चुनाव अधिकारियों पर वोटिंग में गड़बड़ी को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों को कमजोर करने का आरोप लगाया।
विवाद बढ़ने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने जवाब देते हुए कहा कि चुनाव आयोग ही चुनाव से जुड़ी सभी चीजों का फैसला करता है। मार्कर पेन पहले भी इस्तेमाल होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर संदेह है तो आयोग अलग पेन इस्तेमाल करे। यहां तक कि ऑयल पेंट भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
वहीं, बीएमसी कमिश्नर भूषण गगरानी ने जांच का आदेश दिया। कई शिकायतें मिलने के बाद प्रशासन ने नए निर्देश दिए कि वोटर्स की अंगुलियों पर जो इंक लगाई जाए, वह त्वचा में अच्छी तरह से लगे ताकि आसानी से न मिट सके। नगर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि इस चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने पारंपरिक इंडलेबल इंक की जगह मार्कर किट उपलब्ध कराई थी। चुनाव आयोग का कहना है कि ये मार्कर 2012 से हर लोकल बॉडी चुनाव में इस्तेमाल हो रहे हैं।
राज्य चुनाव आयोग ने क्या कहा है?
इन सबके बीच चुनाव आयोग ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार राज्य चुनाव आयोग ने मार्कर पेन में इस्तेमाल की गई स्याही की जांच करने का फैसला किया है। जांच में स्याही की क्वालिटी और दिन भर सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो शामिल किए जाएंगे।
राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे ने कहा, ‘वीडियो की जांच यह पता लगाने के लिए की जाएगी कि उंगली पर स्याही वोटिंग के दौरान लगाई गई थी या शरारत के तौर पर।’
वाघमारे ने कहा कि राज्य निर्वाचन जिला परिषद चुनावों में स्याही लगाने के पारंपरिक तरीके पर वापस लौटेगा। उन्होंने कहा, ‘हम लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक स्याही का इस्तेमाल करेंगे।’
विवाद पर अपनी बात रखने के लिए निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। वाघमारे ने कहा कि वही स्याही इस्तेमाल की जा रही है जो हमेशा से इस्तेमाल होती रही है और कोई नया पदार्थ नहीं मिलाया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग 2011 मार्कर पेन के रूप में इस स्याही का इस्तेमाल कर रहा है।
उन्होंने कहा, ‘स्याही लगाने के बाद सूखने में लगभग 10 से 12 सेकंड लगते हैं। इस दौरान वोटर अभी भी पोलिंग बूथ के अंदर होता है। एक बार सूखने के बाद इसे हटाया नहीं जा सकता। यह वही स्याही है जिसका इस्तेमाल भारत का चुनाव आयोग करता है। अगर डबल वोटिंग होती है, तो पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।’
निर्वाचन आयोग ने कहा, ‘मतदाताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे स्याही को मिटाने की कोशिश न करें। अगर स्याही सूखने से पहले हटा दी जाती है, तो यह वोटर की गलती होगी। ऐसे मतदाताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है।’
वाघमारे ने आगे कहा कि सोशल मीडिया पर चल रहे वीडियो की जांच की जाएगी और गलत जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

