Friday, March 20, 2026
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महाराष्ट्र का धर्मांतरण-रोधी विधेयक- धर्म स्वतंत्र बिल विधानसभा में पेश, क्या है इसमें?

धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 में यह प्रावधान है कि ‘अवैध’ धर्मांतरण के बाद हुए विवाह से पैदा हुए बच्चे का वही धर्म माना जाएगा, जो उसकी मां का विवाह से पहले का था। साथ ही इस बिल के अनुसार जो लोग धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें जिला अधिकारियों को 60 दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी।

मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को विधानसभा में ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक-2026’ पेश कर दिया। सरकार के अनुसार प्रस्तावित कानून का उद्देश्य जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच देकर कराए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरण पर रोक लगाना है। इस बिल में सख्त प्रशासनिक शर्तें और आपराधिक दंड का प्रस्ताव रखा गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि धर्म परिवर्तन जबरदस्ती नहीं, बल्कि पूरी तरह व्यक्तिगत पसंद का मामला हो।

इस विधेयक में ‘प्रलोभन’ या लालच के दायरे को विस्तारित करते हुए इसमें एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ बताना, किसी धर्म के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों, समारोहों या किसी भी भाग को दूसरे धर्म की तुलना में हानिकारक तरीके से चित्रित करना भी शामिल किया गया है।

धर्म स्वतंत्र बिल में क्या प्रावधान हैं?

इस बिल के अनुसार, जो लोग धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं, उन्हें जिला अधिकारियों को 60 दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी। धर्म परिवर्तन के बाद, इसे कानूनी रूप से वैध माने जाने के लिए 25 दिनों के भीतर आधिकारिक तौर पर पंजीकृत करवाना जरूरी होगा।

बिल में यह प्रस्ताव किया गया है कि जिस व्यक्ति का धर्म परिवर्तन हो रहा है, उसके खून के रिश्तेदार शिकायत दर्ज करा सकते हैं, अगर उन्हें शक हो कि इस प्रक्रिया में जबरदस्ती या कोई लालच शामिल है।

सरकार का कहना है कि यह कानून कमजोर लोगों को धर्म परिवर्तन की गलत चालों से बचाने के लिए जरूरी है। विधेयक में यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति विवाह के माध्यम से या विवाह के वादे के तहत किसी दूसरे का धर्म परिवर्तन कराता है, तो यह धर्म परिवर्तन गैरकानूनी माना जाएगा। यदि विवाह केवल धार्मिक धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया जाता है, तो विधेयक में यह प्रावधान है कि सक्षम न्यायालय विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है।

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो महाराष्ट्र हाल के वर्षों में धार्मिक धर्मांतरण को विनियमित करने वाला कानून बनाने वाला कम से कम 10वां राज्य बन जाएगा। जिन राज्यों ने इसी तरह के कानून पारित किए हैं, उनमें झारखंड (2017), उत्तराखंड (2018), हिमाचल प्रदेश (2019), उत्तर प्रदेश (2020), गुजरात और मध्य प्रदेश (2021), हरियाणा और कर्नाटक (2022) और राजस्थान (2025) शामिल हैं।

अवैध धर्मांतरण के बाद पैदा हुए बच्चे के धर्म की भी बात

कई राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों से एक कदम आगे बढ़ाते हुए महाराष्ट्र के धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 में यह प्रावधान है कि ‘अवैध’ धर्मांतरण के बाद हुए विवाह से पैदा हुए बच्चे का वही धर्म माना जाएगा, जो उसकी मां का विवाह से पहले का था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा जैसे कुछ राज्य ऐसे विवाहों से पैदा हुए बच्चों के उत्तराधिकार अधिकारों को मान्यता देते हैं, लेकिन महाराष्ट्र विधेयक में बच्चे के धर्म को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

विधेयक में कहा गया है, ‘अवैध धर्मांतरण के कारण हुए विवाह या विवाह के समान संबंध से पैदा हुए किसी भी बच्चे को विवाह या विवाह के समान संबंध से पहले माता के धर्म का अनुयायी माना जाएगा।’

दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान

इस विधेयक में ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को एक साथ दो या दो से अधिक व्यक्तियों के धर्मांतरण के रूप में परिभाषित किया गया है। प्रस्तावित कानून के तहत ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान है। विधेयक के अंतर्गत अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, और इनकी जांच सब इंस्पेक्टर से कम रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी।

विधेयक में कहा गया है, ‘अवैध धर्मांतरण के संबंध में शिकायत धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति, उनके माता-पिता, भाई, बहन या रक्त संबंध, विवाह या दत्तक ग्रहण से संबंधित किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दर्ज की जा सकती है। ‘अवैध’ धर्मांतरण के लिए विधेयक में सात वर्ष के कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। अपराध यदि किसी नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के साथ होता है तो जुर्माना बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया गया है। सामूहिक धर्मांतरण के लिए सात वर्ष के कारावास और 5 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।’

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि ‘पुलिस स्टेशन के प्रभारी पुलिस अधिकारी के लिए रक्त संबंध, विवाह संबंध या दत्तक ग्रहण से संबंधित किसी भी व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत को दर्ज करना अनिवार्य होगा। यदि पुलिस अधिकारी संतुष्ट है कि धर्मांतरण अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन में किया गया है या किया जा रहा है, तो वह ऐसे उल्लंघन का स्वतः संज्ञान लेगा।’

प्रस्तावित कानून में बार-बार अपराध करने वालों, चाहे वे व्यक्ति हों या संगठन, उनके लिए कठोर दंड का प्रावधान है। इसके तहत 10 वर्ष तक की कैद और 7 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। यदि कोई संस्था या संगठन ‘अवैध’ धर्मांतरण में सहायता करते हुए पाया जाता है, तो सरकार उसका पंजीकरण रद्द कर सकती है और किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता या अनुदान वापस ले सकती है।

विनीत कुमार
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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