चेन्नईः मद्रास हाई कोर्ट ने शुक्रवार, 12 दिसंबर को तमिलनाडु सरकार से पूछा कि क्या उसे तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ियों पर स्थित पत्थर के स्तंभ पर कार्तिकई दीपम जलाने में कोई आपत्ति है। अदातल इस मामले को लेकर दायर की गई कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।
अदालत ने कार्यवाही की शुरुआत करते हुए जिसे उसने केंद्रीय मुद्दा बताया, पूछा, “यदि बेहतर दृश्यता प्राप्त की जा सकती है तो पहाड़ी पर दीपम जलाने में क्या समस्या है?”
यह मामला उस विवाद के संदर्भ में सामने आया है जिसमें यह तय करना था कि पारंपरिक दीपम को पहाड़ी पर स्थित कथित “दीपाथून” संरचना पर जलाया जाना चाहिए या उची पिल्लैयार मंदिर में जहां राज्य का दावा है कि दशकों से इसे पारंपरिक रूप से जलाया जाता रहा है।
गहराता जा रहा है दीपम विवाद
अदालत द्वारा अनुष्ठान की अनुमति दिए जाने के आदेश के बाद से तिरुपरनकुंड्रम की पहाड़ी पर दीपम दीपक जलाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। तिरुपरनकुंड्रम में एक मंदिर और पास में एक दरगाह दोनों स्थित हैं।
अदालत के पहले के आदेश के मुताबिक, 4 दिसंबर तक ‘दीपातून’ स्तंभ पर दीपक प्रज्वलित किया जाना था। हालांकि, मंदिर अधिकारियों और दरगाह प्रबंधन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा। इस दौरान अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में श्रद्धालुओं के एक छोटे समूह को यह अनुष्ठान करने की अनुमति दी जाए।
राज्य सरकार ने हालांकि कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए इस फैसले को लागू करने से इनकार कर दिया। इससे हिंदू समर्थक समूहों ने विरोध प्रदर्शन किया, पुलिस के साथ झड़पें हुईं और तब से यह मामला एक बड़े राजनीतिक और न्यायिक टकराव में तब्दील हो गया है।
तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल ने क्या कहा?
शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल पी.एस. रमन ने सरकार के इस रुख को दोहराया कि पिछले 100 वर्षों की परंपरा के अनुसार, इस वर्ष भी तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ियों में स्थित उची पिल्लैयार मंदिर के शीर्ष पर ही दीप प्रज्वलित किया गया था।
उन्होंने कहा कि वर्तमान मुकदमा तब शुरू हुआ जब “एक व्यक्ति ने अपने द्वारा निर्दिष्ट किसी अन्य स्थान पर दीप प्रज्वलित करने की मांग करते हुए एक रिट याचिका दायर की,” जिसे अब एक दरगाह के पास स्थित दीपथून कहा जा रहा है।
एडवोकेट जनरल रमन ने इस बात पर जोर दिया कि यह “जनहित याचिका नहीं बल्कि निजी हित याचिका है।” उन्होंने कहा “विवाद में ही यह मूलभूत प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में कोई दीपाथून (दीपक) मौजूद है?”
उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को “पहले दीपाथून के अस्तित्व और प्रथागत तौर पर उस पर दीपम जलाने की आवश्यकता को साबित करना होगा।”
रमन ने आगे कहा कि अदालत के समक्ष ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि कम से कम कभी न कभी वहां दीपम जलाया जाता था।
सुनवाई के दौरान एडवोकेट जनरल ने पहले की न्यायिक टिप्पणियों का हवाला दिया और कहा कि एक डिवीजन बेंच ने कहा था कि “मंदिर और दरगाह के अधिकारी शांतिपूर्वक गतिविधियां कर रहे थे तो शांति भंग करने का कोई कारण नहीं था।”
उन्होंने कहा कि जस्टिस जीआर स्वामीनाथन को भी “शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए यथास्थिति के पक्ष में झुकना चाहिए था।”
उन्होंने दीपाथून पर पहले दिए गए निर्देश के तथ्यात्मक आधार पर सवाल उठाते हुए पूछा, “न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के पास यह कहने का क्या प्रमाण है कि किसी परंपरा का परित्याग कर दिया गया है?”
रमन ने दृढ़ता से कहा कि “किसी भी परंपरा के परित्याग का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है।”
लोकसभा में भी हंगामा
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान भी यह मुद्दा गर्माया। इसी बीच भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर द्वारा तमिलनाडु सरकार पर तीखा हमला करते हुए यह आरोप लगाने के बाद कि राज्य “सनातन धर्म विरोधी का प्रतीक बन गया है।”
कार्यवाही के दौरान इस मुद्दे को उठाते हुए ठाकुर ने कहा, “मैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाना चाहता हूं जहां भारत का एक राज्य सनातन धर्म विरोधी का प्रतीक बन गया है। उनके मंत्री सनातन धर्म के विरुद्ध बयान दे रहे हैं। लोगों को मंदिर तक पहुंचने के लिए अदालत का रुख करना पड़ा।”
ठाकुर ने कार्तिकई दीपम विवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने हालिया न्यायिक टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा, “मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु सरकार पर कड़ी फटकार लगाते हुए अधिकारियों पर कार्तिकई दीपम दीपक जलाने के अपने आदेश की जानबूझकर अनदेखी करने का आरोप लगाया है।”

