इंदौरः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अल-फलाह समूह के चेयरमैन का कथित अवैध मकान को गिराने के नोटिस पर रोक लगा दी है। अल-फलाह ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी का पैतृक घर महू में स्थित है। इसी को लेकर छावनी परिषद ने नोटिस जारी किया था।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने इस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है। पीठ ने मकान पर मालिकाना हक का दावा करने वाले एक युवक की याचिका को लेकर यह आदेश जारी किया। हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका में याचिकाकर्ता ने हिबानामा के जरिए मकान पर मालिकाना हक का दावा किया है।
अधिकारियों ने क्या बताया?
लाइव हिंदुस्तान ने अधिकारियों के हवाले से लिखा कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति (चेयरमैन) जवाद अहमद सिद्दीकी मूल रूप से मध्य प्रदेश के महू जिले का रहने वाला है। सिद्दीकी के पिता हम्माद अहमद लंबे समय तक महू शहर के काजी थे।
अधिकारियों ने बताया कि इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर महू की छावनी परिषद के रिकॉर्ड में मुकेरी मोहल्ले में घर स्थित है। यह घर सिद्दीकी के दिवंगत पिता हम्माद अहमद के नाम पर दर्ज है।
गौरतलब है कि छावनी परिषद ने 19 नवंबर को जारी एक नोटिस में कहा था कि 3 दिन के भीतर इस मकान का कथित अवैध हिस्सा हटा लें अथवा छावनी परिषद कानूनी प्रावधानों के तहत इस निर्माण को ढहा देगी। परिषद की ओर से जारी बयान में यह भी कहा गया था कि इस कार्रवाई का खर्च मकान पर कब्जा धारी या फिर संपत्ति के मालिकाना हक के वैध वारिसों से ली जाएगी।
इस मकान में रहने वाले 59 वर्षीय अब्दुल माजिद ने छावनी परिषद के नोटिस को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी। माजिद ने याचिका में दावा किया कि हम्माद अहमद की मौत के बाद सिद्दीकी ने उन्हें 2021 में यह संपत्ति ‘हिबा’ के तहत दी थी।
याचिका में माजिद ने दावा किया कि इस तरह से वह इसका मालिक है। दरअसल हिबानामा मुस्लिम कानून के तहत एक उपहार विलेख या कानूनी दस्तावेज है जो बिना किसी प्रतिफल के किसी को दिया जाता है। इसके जरिए चल या अचल दोनों तरह की संपत्तियों का हस्तांतरण होता है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले में अब्दुल माजिद की तरफ से वकील अजय बागड़िया ने पक्ष रखा। वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल को सुने बिना ही नोटिस जारी किया गया है। ऐसे में सुनवाई का एक मौका जरूर दिया जाना चाहिए।
वहीं, छावनी परिषद की तरफ से पेश हुए वकील ने दलील दी कि इसे लेकर पहले भी कई नोटिस जारी किए गए थे लेकिन कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया तो अब याचिकाकर्ता को और मोहलत नहीं जानी चाहिए।
इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस प्रणय वर्मा ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कहा कि नोटिस करीब 30 साल पहले जारी किए गए थे। अदालत ने याचिकाकर्ता को 15 दिनों के भीतर संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है।
इस दौरान अदालत ने आदेश देते हुए कहा कि जब तक प्रक्रिया पूरी नहीं होती और याचिकाकर्ता की सुनवाई नहीं हो जाती तब तक कोई कार्रवाई नहीं होगी। गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली में लाल किले के पास हुए विस्फोट में फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी जांच के दायरे में है।

