Friday, March 20, 2026
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मध्य प्रदेशः भोजशाला से जुड़ा क्या है इतिहास और विवाद?

इंदौरः मध्य प्रदेश का भोजशाला परिसर सुर्खियों में हैं। ये परिसर राजा भोज (1000-1055 ईस्वी) से जुड़ा है। इस परिसर पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोग दावे करते हैं। इस विवाद को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक याचिका पर मार्च महीने में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को इस स्मारक का सर्वेक्षण करने की अनुमति दी थी। सर्वे का काम पूरा होने के बाद एएसाई ने सोमवार (15 जुलाई) को अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ को सौंप दी। मामले में अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की गई है।

पूजा और नमाज दोनों होते हैं परिसर में

भोजशाला एक एएसआई संरक्षित स्मारक है। लंबे अरसे से भोजशाला मंदिर था या मस्जिद, इसको लेकर विवाद चल रहा है। यही कारण है कि (एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के अनुसार) यहां मंगलवार को पूजा होती है और शुक्रवार को नमाज अता की जाती है। यह मामला उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में पहुंचा जिसने एएसआई को सर्वे करने का निर्देश दिया।

भोजशाला पर दो समुदाय के दावे

हिन्दू मानते हैं कि ये स्मारक देवी वाग्देवी का मंदिर है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है। 19 फरवरी को एक हिन्दू संगठन ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एएसआई को भोजशाला स्मारक की “वैज्ञानिक जांच” कराने का आदेश देने की मांग की थी। जिसका मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी ने विरोध किया था।

उनका कहना था कि भोजशाला विवाद पर रिट अपील पहले से ही जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ के समक्ष लंबित है और एएसआई का 7 अप्रैल 2003 का आदेश अभी भी कानूनी रूप से अस्तित्व में है।

हालांकि एएसआई ने 22 मार्च से सर्वे शुरू किया जो 27 जून तक चला। कुल 98 दिन तक सर्वे हुआ। एएसआई के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया था।

भोजशाला के मंदिर होने के दावे पर भोजशाला मुक्ति यज्ञ का क्या कहना है?

एएसआई ने सर्वे के दौरान खुदाई कराई, जिसकी वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी भी की गई। साथ ही इसमें ग्राउंड पेनिट्रेट रडार (जीपीआर) और ग्लोबल सिस्टम (जीपीएस) की सहायता ली गई। इस सर्वे के दौरान एएसआई को 1700 से ज्यादा अवशेष मिले हैं।

भोजशाला के मंदिर होने का दावा करने वाली भोजशाला मुक्ति यज्ञ के पदाधिकारी का दावा है कि सर्वे के दौरान एएसआई को जो अवशेष मिले हैं, वह भोजशाला के मंदिर होने का प्रमाण है। जो 37 मूर्तियां मिली हैं, उनमें भगवान कृष्ण, हनुमान, शिव, ब्रह्मा, वाग देवी, गणेश, पार्वती, भैरवनाथ आदि देवी देवताओं की मूर्तियां शामिल हैं।

भोजशाला से जुड़ा इतिहास और विवाद क्या है?

इंडिया टीवी ने धारा जिले की आधिकारिक वेबसाइट के हवाले से बताया है कि परमार राजवंश के महान शासक राजा भोज ने धार में एक महाविद्यालय बनवाया था। बाद में इस शिक्षण संस्थान को भोजशाला के नाम से जाना गया, जहां दूर-दूर से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे।

भोजशाला या सरस्वती मंदिर के अवशेषों को बाद में मुस्लिम शासक महमूद खिलजी द्वारा मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह में बदल दिया गया। बाद में इसका नाम कमाल मौला मस्जिद रखा गया। मस्जिद में एक बड़ा खुला प्रांगण है, जिसके चारों ओर खंभों से सजा हुआ बरामदा है और उसके पीछे पश्चिम दिशा में एक प्रार्थना कक्ष स्थित है। मस्जिद में इस्तेमाल किए गए खंभे और प्रार्थना कक्ष की खूबसूरती से तराशी हुई छत, भोजशाला से ली गई थीं। मस्जिद की दीवारों में लगे पत्थरों पर उकेरे गए बहुमूल्य कार्य भी खोजे गए हैं।

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इन चट्टानों पर संस्कृत के अलावा प्राकृत भाषा में भी लिखे हुए पाए गए हैं। ये लेख भगवान विष्णु के कच्छप (कर्म अवतार) से जुड़े दो भजनों के बारे में हैं। साथ ही, दो सर्पबंध स्तंभों पर शिलालेख मिले हैं। एक शिलालेख में संस्कृत वर्णमाला और संज्ञा तथा क्रिया के मुख्य प्रत्यय हैं, वहीं दूसरे में संस्कृत व्याकरण के दसों कालों और वाच्यों के अलग-अलग विभक्तियां लिखी हुई हैं।

ये शिलालेख 11वीं-12वीं शताब्दी के माने जाते हैं। इनके ऊपर अनुष्टुप छंद में दो संस्कृत ग्रंथ उत्कीर्ण हैं।  इनमें से एक में राजा भोज के उत्तराधिकारियों उदयादित्य और नरवर्मान की प्रशंसा की गई है। दूसरे लेख में बताया गया है कि ये स्तंभ उदयादित्य द्वारा स्थापित किए गए थे। इन शिलालेखों से ये स्पष्ट होता है कि यहाँ निश्चित रूप से राजा भोज का महाविद्यालय या सरस्वती मंदिर रहा होगा, जिसे उनके उत्तराधिकारियों द्वारा विकसित किया गया था।

ग्रंथों के अनुसार भोजशाला मूल रूप से सरस्वती का मंदिर था, जिसका उल्लेख कवि मदन ने अपने नाटक में किया है। माना जाता है कि सरस्वती माता की मूल प्रतिमा अब लंदन के संग्रहालय में है। धार के कलाकारों ने मूल प्रतिमा जैसी ही एक तस्वीर को खोदकर बनाया है।

न्यूज 18 के मुताबिक,  भोजशाल में नमाज और पूजा की बहुत पुरानी है। साल 1935 में धार स्टेट दरबार के दीवान नाडकर ने परिसर को मस्जिद बताते हुए शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति दी थीं।  इसके बाद पूजा और नमाज होना शुरू हुआ था। पूजा और नमाज के कारण कई बार फसाद भी हुए। क्योंकि कई बार बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़े। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2003, 2006 और 2013 को बसंत पंचमी शुक्रवार को होने के कारण दोनों समुदायों के बीच काफी विवाद हुआ।

 

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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