Saturday, April 4, 2026
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‘माछे भाते बंगाली…’, बंगाल का खानपान कैसे चुनावी संग्राम में बना हथियार; तृणमूल और भाजपा का वार-पलटवार

‘माछे भाते बंगाली’ वाली कहावत जो घरों और रसोई तक पश्चिम बंगाल में सीमित थी, उसे अब विधानसभा चुनाव में नारे के तौर पर खूब उछाला जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस इसे लेकर खूब मुखर है और इसी के जरिए भाजपा को घेरने की भी खूब कोशिश हो रही है।

कोलकाता: पिछले साल दिसंबर में कोलकाता में एक धार्मिक कार्यक्रम के पास चिकन पैटी बेचने वाले एक शख्स पर कथित तौर पर हमला हुआ। इस घटना से अच्छा-खासा विवाद पैदा हुआ था। अब चूकी चुनाव नजदीक हैं तो तृणमूल कांग्रेस लगातार भाजपा के खिलाफ ऐसा दांव फेंक रही है, जिससे राज्य की विपक्षी पार्टी के लिए निपटना बड़ी चुनौती न भी हो लेकिन, लगातार सफाई जरूर देनी पड़ रही है। बात हो रही है बंगाली खानपान की…माछे भाते बंगाली की।

दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की बढ़ती सरगर्मी के बीच, हर बंगाली घर में बोले जाने वाली कहावत ‘माछे भाते बंगाली’ अब राजनीति नारेबाजी में भी सुनाई देने लगी है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से खासकर बंगाली खानपान को पहचान, संस्कृति और गौरव के प्रतीक के तौर पर जोरशोर से पेश किया जा रहा है। भाजपा भी इसमें तृणमूल से कमतर नजर नहीं आना चाहती और ये सबकुछ बंगाल में चुनावी मुकाबले की कहानी को नया आकार दे रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसी हफ्ते पुरुलिया में एक रैली में भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, ‘वे आपको मछली नहीं खाने देंगे। आप मांस नहीं खा सकते, अंडे नहीं खा सकते, बंगाली में बात नहीं कर सकते। अगर आप ऐसा करेंगे, तो वे आपको बांग्लादेशी कहेंगे।’

माछे भाते बंगाली…

पश्चिम बंगाल के खानपान में लाइफलाइन मानी जाने वाली मछली अब एक तरह से सियासी दांव-पेंच में भी केंद्र बन गई है। वैसे भी, लगभग हर बंगाली के भोजन का अभिन्न अंग होने की वजह से मछली बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। यही वजह है ‘मछे भाते बंगाली’ वाली कहावत, जिसका अर्थ है- ‘मछली चावल खाने वाला ही बंगाली है’, अब रसोई से निकलकर राजनीतिक क्षेत्र में भी खूब गूंज रहा है।

तृणमूल कांग्रेस इसका इस्तेमाल बंगाली गौरव के साथ खुद को खड़ा हुआ दिखाने के लिए खूब कर रही है। वह लगातार मछली, मांस जैसे भोजन को उछाल रही है। वहीं भाजपा संभली हुई है। पार्टी खुद को ‘माछे भाते बंगाली’ की भावना के गलत पक्ष में दिखने नहीं देना चाहती। तृणमूल के बिछाए चक्रव्यूह में फंसने से बचने के लिए हर संभव प्रयास पार्टी की ओर से किया जा रहा है।

दूसरी ओर तृणमूल लगाता इस भावना को हथियार बनाने की कोशिश कर रही है और तर्क दे रही है कि भाजपा हिंदी भाषी लोगों और शाकाहार के पक्ष की बात करने वाली पार्टी है। तृणमूल लगातार कह रही है कि भाजपा पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक रूप से अनजान है और अगर सत्ता में आती है, तो मछली, मांस और अंडे पर प्रतिबंध लगा सकती है।

ममता बनर्जी ने एक रैली में इस मुद्दे को और जोरशोर से उठाया। उन्होंने कहा, ‘अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो वे बंगाल में मांस और मछली पर प्रतिबंध लगा देंगे। मैंने बिहार के उपमुख्यमंत्री को यह कहते सुना कि खुली जगह में मछली और मांस नहीं बेचा जा सकता। केवल लाइसेंसधारक ही बंद दुकानों में मांस बेच सकते हैं। तो क्या हर कोई शॉपिंग मॉल में मांस और मछली बेचेगा? आर्थिक रूप से सक्षम तो कुछ ही लोग हैं। यहाँ ज्यादातर मछली विक्रेता सड़कों पर ताजी मछली बेचते हैं। इसी से उनकी रोजी-रोटी चलती है। मैं ऐसी राजनीति की निंदा करती हूँ।’

कुल मिलाकर बंगाली पहचान के इर्द-गिर्द चुनाव प्रचार करके टीएमसी का पूरा ध्यान ‘सांस्कृतिक पहचान और रिवाजों’ की ओर मोड़ने की कोशिश में है।

सोशल मीडिया पर भी तृणमूल का कैंपेन

ऐसा नहीं है कि तृणमूल की ओर से केवल प्रचारों या कुछ एक बयानबाजी मछली और बंगाली खानपान पर हो रही है। तृणमूल के सोशल मीडिया हैंडल ने भी इस मुद्दे को धार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अमित शाह की 15 दिवसीय बंगाल यात्रा से पहले पार्टी ने ट्वीट किया, ‘बंगाल पर्यटकों का स्वागत करता है। हमारे व्यंजनों को खाने से न चूकें। हमारी ओर से सलाह है: मुरी घोंटो, पाबदा माचेर झाल, इलिश भापा, चिंगरी मलाई करी, भेटकी पतुरी, कोशा मंगशो। आपका प्रवास सुखद रहे!’

टीएमसी के एक और पोस्ट में कहा गया, बीजेपी को वोट देने का मतलब है: हमारी संस्कृति का अंत, हमारे खान-पान के विकल्पों का अंत और हमारी बंगाली पहचान का अंत। क्या बंगाल के लोग चाहते हैं कि सभी मांस की दुकानें बंद हो जाएं? क्या हम चाहते हैं कि मछली बाजार बंद हो जाएं? क्या हम चाहते हैं कि बाहरी लोग हमारे खान-पान और जीवनशैली को निर्धारित करें? बंगाल कभी भी अपने भोजन, अपनी परंपराओं या अपनी आत्मा को बांग्ला-विरोधी भाजपा के हवाले नहीं करेगा।’

भाजपा कैसे निपट रही तृणमूल के चक्रव्यूह से?

भाजपा लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि तृणमूल लोगों में डर फैलाने का काम कर रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल में मछली या मांस पर प्रतिबंध लगाने का कोई विचार नहीं है। हालांकि, इसके बावजूद यह धारणा इतनी प्रबल हो गई लगती है कि भाजपा उम्मीदवार अब हाथ में मछली लेकर प्रचार कर रहे हैं।

बिधाननगर से भाजपा उम्मीदवार शरदवत मुखर्जी 5 किलो की कटला मछली लेकर घूमते नजर आए और मतदाताओं को भरोसा दिलाया कि भाजपा बंगाली खान-पान में कभी दखल नहीं देगी।

ऐसे ही पांडवेश्वर में भाजपा उम्मीदवार जितेंद्र नाथ तिवारी ने ‘मछली जुलूस’ के साथ नामांकन पत्र दाखिल किया, जिसमें समर्थक टोकरियां लिए हुए थे और उन्होंने खुद एक बड़ी टोकरी पकड़ी हुई थी। उन्होंने कहा, ‘अगर पश्चिम बंगाल की संस्कृति को बढ़ावा देना नाटक है, तो मुझे इस नाटक पर गर्व है।’

ऐसी बातें सामने आ रही हैं कि तृणमूल के फैलाए धारणाओं को तोड़ने के लिए स्थानीय पार्टी नेताओं को अब सार्वजनिक रूप से मछली खानी पड़ रही है और इसके साथ प्रचार करना पड़ रहा है।

राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य का भी बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि, ‘मछली पर प्रतिबंध लगाने का कोई सवाल ही नहीं है। बंगाली मछली खाएंगे और बिहारी मटन खाएंगे। अगर कोई मुझे रोकने की कोशिश करेगा, तो मैं उसका विरोध करूंगा।’

पश्चिम बंगाल और मछली..व्यंजन भी पहचान भी

पश्चिम बंगाल में मछली का केवल भोजन से भी कहीं अधिक महत्व है। बच्चे के पहले चावल खाने के समारोह से लेकर शादियों में उपहार और शोक के बाद के भोजन तक में मछली अहम है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में सालाना 8.36 लाख टन मछली की खपत होती है, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है।

यही नहीं, समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक राज्य में घरेलू खाद्य व्यय का लगभग पांचवां हिस्सा मछली और मांस मिलाकर खर्च होता है। जानकार बताते हैं कि बंगालियों के लिए मछली सिर्फ भोजन नहीं है। यह रीति-रिवाज और पहचान का हिस्सा है।

यह भी पढ़ें- खेती बाड़ी-कलम स्याहीः बंगाल के पहाड़ी इलाकों की राजनीति और ममता-अमित शाह के आरोप-प्रत्यारोप

विनीत कुमार
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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