Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: मरुस्थल की धड़कन- अंत:सलिला लूणी नदी की अनकही कथा

लूणी नदी: अपने उद्गम के समय इसका पानी मीठा ही है, इसलिए वहाँ इसका नाम सागरमती है। प्राचीन ग्रंथों में इसे लवणवती कहा गया है। बालोतरा के आस पास इसमें खारापन आ जाता है।

भारत और विश्व के लोग जब राजस्थान आने का मन बनाते है तो उनके ख्यालों में इसका इतिहास, संस्कृति और स्थापत्य रहता है। वो यहाँ पर ऐतिहासिल किले,महल,हवेलियां,बावड़ियां और अनूठी संस्कृति से रूबरू होने आते हैं। साथ ही सभी के मन मस्तिष्क में यह भी रहता है कि यह क्षेत्र बड़ा सूखा है और चारों ओर मरुस्थल ही होगा। ये झूठ भी नहीं है और दूसरे तो क्या स्वयं उत्तरी और पूर्वी राजस्थान के लोग भी यही मानते हैं कि पश्चिमी राजस्थान में पानी है ही नहीं। फिर चित्रकारों और फिल्मकारों ने सिर पर मटका लिए जाती महिला और धोरों पर ऊंट को लेकर चलते बुजुर्ग की एक ऐसी सुदृढ़ छवि बना दी कि राजस्थान का मतलब कम पानी का देश।

अब सबके मन में था तो हम भी इससे कैसे ही बचते। जयपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए गए तो राजस्थान का सामान्य ज्ञान पढ़ना पड़ा। इसमें एक रोचक प्रश्न सामने आया कि “राजस्थान के उन जिलों का नाम बताओ जहाँ कोई नदी नहीं बहती है ?” मैने सोचा यह तो प्रश्न ही गलत है। प्रश्न यह होना चाहिए था कि “राजस्थान के किन जिलों में नदी बहती है?” कारण कि अबतक यही सुना था। पर उस रोचक प्रश्न का उत्तर था “बीकानेर और चुरु में कोई नदी नहीं बहती है।” मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि फिर शेष राजस्थान में इतनी कितनी नदिया बहती है? अगर इतनी ही नदियां हैं तो फिर अबतक क्या पढ़ाया और दिखाया गया।

लूणी नदी के साक्षात् दर्शन

फिर जब जयपुर से वापस आए तो मन में था ही कि दो जिलों को छोड़कर सब जगह ही नदियां हैं तो उन्हें देखा जाए। सब न सही अपने बाड़मेर में ही देख लिया जाए। तो सिणधरी में मेरी भुवासा की शादी हो रखी है, वहाँ आना जाना होता ही है। सिणधरी कस्बे में घुसने से पहले एक छोटी सी पुलिया आती है, पूछने पर किसी ने बताया कि यह लूणी नदी पर बनी है। जबकि उस वक्त वहाँ कोई नदी बह नहीं रही थी। फिर गुजरात में काफी रिश्तेदारी है तो जालौर से होकर जाना पड़ता है। बीच में गांधव गांव में एक बड़ा पुल पड़ता है। पुल से पहले एक पुलिस चौकी भी है। किसी वक्त बड़ी मालदार चौकी हुआ करती थी, लोग सिफारिशें लगाकर यहाँ पोस्टिंग लेते थे। पता किया तो मालूम चला कि वो गांधव पुल भी लूणी नदी पर बना हुआ था। पानी उस वक्त भी नहीं चल रहा था बहाव क्षेत्र को देखकर अंदाजा हो रहा था कि यहाँ जरूर कोई बड़ी नदी बहती है।

फिर मैंने विचार किया कि सिणधरी में भी लूणी नदी और गांधव में भी लूणी नदी। दोनों गांवों की दूरी भी अस्सी किलोमीटर से ज्यादा है, इतनी लंबी नदी ! फिर पुराने नोट्स खंगाले तो याद आया कि यह थार के रेगिस्तान की सबसे लंबी नदी है जो अजमेर की पुष्कर घाटी के नागा पहाड़ियों से निकलती है। मुझे सहसा ही लगा कि नोट्स पढ़ना और वास्तविक रूप से देखना, दोनों में भावनात्मक जुड़ाव के स्तर पर जमीन आसमान का अंतर है।

जीवन में जिस चीज की कमी होती है उसका महत्व भी सबसे अधिक होता है। हमारे यहाँ पानी की कमी है तो हमें यह सबसे अधिक आकर्षित करता है। सूखा रहता है तो हरियाली भी उतनी ही मनभावन लगती है। बड़ा कौतुक रहता है जब बड़ी संख्या में पर्यटक हमारे यहाँ के रेत के धोरे देखने आते है, कि इनमें ऐसा क्या है जो इतना दूर इन्हें देखने आते है। पर बात वही है कि जिसकी कमी उसका आकर्षण।

मीठे से खारा पानी का सफर

अपने उद्गम के समय इसका पानी मीठा ही है अतः वहाँ इसका नाम सागरमती है। प्राचीन ग्रंथों में इसे लवणवती कहा गया है।

बालोतरा के आस पास इसमें खारापन आ जाता है। इसका कारण है भू परतों की लवणता और मानव जनित प्रदूषित पानी का मिल जाना। हमारे यहाँ नमक को लूण कहते है इसलिए यहाँ इसका नाम भी लूणी पड़ गया।

इसकी लंबाई 450 किमी से अधिक है। लूणी बेसिन राजस्थान के कई जिलों जैसे अजमेर, नागौर, पाली, जोधपुर, जालौर, बाड़मेर आदि और उत्तरी गुजरात के बनासकांठा और पाटण कुछ हिस्सों तक फैला माना जाता है।

इसकी प्रमुख सहायक नदियां जवाई, सुकड़ी, बाँडी, गुहिया और जोजरी है। जाेजरी ही इसमें दाईं ओर से मिलती है बाकी सारी नदियां इसमें बाईं ओर से मिलती हैं। लूणी नदी आगे चलकर किसी समुद्र में नहीं गिरती, बल्कि गुजरात के कच्छ के रण में समा जाती है। इसीलिए महाकवि कालिदास ने अपने साहित्य में लूणी नदी को अन्तःसलिला नाम से पुकारा है। जो अंतर्मुखी स्वभाव की है और रेत में ही समा जाती है।

लूणी नदी पर बने बांध

लूणी और इसकी सहायक नदियों पर कुछ बांध भी बने है। सिंचाई और पेयजल के रूप में इनका बड़ा महत्व हैं। इनके निर्माताओं के नाम पढ़ने पर आश्चर्य और हर्ष मिश्रित भाव उमड़ते हैं कि कितने महान लोग रहे होंगे वो जिन्होंने आज से 100–150 वर्ष पूर्व भी अपनी जनता के लिए इतने कालजयी निर्माण करवाएं।

जसवंत सागर बांध (पिचियाक बांध): जोधपुर के बिलाड़ा के पास स्थित है। यह लूणी नदी पर बना सबसे प्रमुख बांध है। इसे 1892 में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने बनवाया था।

सरदार समंद बांध: इस बांध का निर्माण 1905 में महाराजा सरदार सिंह के शासनकाल में हुआ था। यह मुख्य रूप से पाली जिले में सिंचाई के लिए बनाया गया था।

जवाई बांध: यह लूणी की सहायक जवाई नदी पर पाली में बना है। इसे “मारवाड़ का अमृत सरोवर” कहा जाता है। इसका निर्माण जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने करवाया था। इसका कार्य 1946 में शुरू हुआ और 1957 में पूरा हुआ।

हेमावास बांध: यह पाली जिले में लूणी की सहायक बांडी नदी पर बना है।

बांकली बांध: यह जालौर जिले में लूणी की सहायक सुकड़ी नदी पर स्थित है।

दांतीवाड़ा बांध: यह लूणी नदी बेसिन का हिस्सा है और गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित है।

ये ऐसे निर्माण है जिन्होंने यहाँ की जनता के जीवन को आसान बनाया है। सैकड़ों वर्षों से ये सीना ताने खड़े हैं जबकि आज तकनीकी के क्षेत्र में इतनी ऊंचाइयां हासिल करने के बाद भी कुछ वर्षों पूर्व बने पुल और बांध टूटने की खबरें हम पढ़ते ही रहते हैं। इसका कारण सीमेंट,लोहे या तकनीक की कमी नहीं बल्कि इसका मुख्य कारण है भाव की कमी। अब वो सेवा का भाव ही शेष नहीं रहा गया। सब कार्य औपचारिकता मात्र रह गए है।

लूणी नदी का बहाव क्षेत्र और ऐतिहासिक स्थान नदी के उद्गम के पास ही विश्व प्रसिद्ध ब्रह्मा जी का मंदिर है। बालोतरा जो अब नया जिला बन गया गया है लूणी नदी के किनारे ही है। यहीं आकर लूणी खारी हो जाती है। बालोतरा के पास प्रसिद्ध नाकोड़ा जैन तीर्थ स्थल भी इसी नदी क्षेत्र के निकट स्थित है।

यहाँ से होकर यह नदी तिलवाड़ा पहुंचती है, यहाँ राजस्थान का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध मल्लीनाथ पशु मेला भरता है। आगे चलकर यह गुड़ामालानी जाती है,बाड़मेर जिले का यह अंतिम बड़ा क्षेत्र है जहाँ लूणी बहती है। यहाँ नदी का पाट काफी चौड़ा हो जाता है फिर आगे जालौर के सांचौर और चितलवाना तक जाती है। जालौर और सांचौर क्षेत्र में इसके किनारों पर मुख्य रूप से जीरा और ईसबगोल की खेती बहुत अच्छी होती है।

अंत में यह गुजरात के कच्छ के रण में स्थित धोलावीरा जो कि सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, तक जाती है और फिर कच्छ के रण में विलीन हो जाती है।

इतने लंबे ऐतिहासिक जुड़ाव और ममतामयी स्नेह के कारण लूणी नदी को मरू गंगा भी कहा जाता है।

इस बीच एक बार और सिणधरी जाना हुआ तो मैंने देखा कि उस पुलिया के ऊपर से पानी बह रहा था और सिणधरी कस्बे में जाने का वह रास्ता बंद था। हमें घूम कर जाना पड़ा और उसके बाद अखबारों में भी खबरें पड़ी की लूणी नदी में बाढ़ आ गई है, फसलों को नुकसान हुआ है और कई लोगों की डूबने से मृत्यु भी हो गई है।

मैंने सोचा कभी तो यह बिल्कुल सूखी नजर आती है पानी का नामोनिशान तक नहीं होता और कभी इसमें बाढ़ आ जाती है, इसका क्या कारण हो सकता है?

लूणी बारहमासी नदी नहीं है, यह एक बरसाती नदी है।पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्र में अचानक होने वाली अत्यधिक बारिश लूणी नदी में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण है। इसके अलावा लूणी नदी का तल काफी उथला है, जिससे कम पानी आने पर भी नदी उफनकर किनारों से बाहर बहने लगती है। साथ ही अनियंत्रित बजरी खनन भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करता है। अवैध खनन ने इसके पारिस्थितिकी (Ecosystem) को भी भारी नुकसान पहुँचाया है।

लूणी नदी पर संकट के बादल

खनन से याद आया कि क्यों साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सख्त टिप्पणियां चर्चा का मुख्य विषय बने हुई हैं। लूणी नदी पर सबसे बड़ा संकट पाली, जोधपुर और बालोतरा की कपड़ा (Textile) इकाइयों से निकलने वाले जहरीले रसायनों का है। उद्योगों का दूषित पानी बांडी और जोजरी जैसी सहायक नदियों के माध्यम से लूणी में पहुँचता है, जिससे इसका पानी रसायनों से भर गया है।

दूषित जल के कारण नदी किनारे की उपजाऊ जमीन बंजर हो रही है। औद्योगिक अपशिष्ट और एसिडिक पानी जमीन में रिसने से आसपास के गाँवों (जैसे समदड़ी, बालोतरा के आसपास) के कुओं और बोरवेल का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।

साथ ही उचित जल प्रबंधन न होने के कारण मानसून के दौरान लगभग 40% पानी बाढ़ के रूप में बर्बाद हो जाता है।

एक तो सूखा क्षेत्र उसके उपरांत इसमें जो एक दो नदियां हैं, उनके भी यह हाल है तो मन में यह विचार आता है कि मुझे तो जयपुर में सामान्य ज्ञान के नोट्स में जो लूणी नदी पढ़ने को मिली थी उसके साक्षात दर्शन भी मैंने कर लिए थे। पर क्या आने वाली पीढ़ी को लूणी नदी सिर्फ नोट्स में ही उपलब्ध होगी ?

हमारी सागरमती,लवणवती,अन्तःसलिला, लूणी और मरुगंगा क्या सिर्फ किताबों तक सीमित हो जाएगी ? जनता जनप्रतिनिधि और व्यवस्था को संभालने वाले लोगों को इसके बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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